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बजट 2018 : किसानों की नज़र से! मुश्किलें और सुझाव!

2018-19 के पूर्णकालिक बजट की घोषणा कर दी गयी हैं. इस बजट से किसानों को कई उमीदें थी और सरकार की माने तो उन्होंने अपनी नीतियों में ऐसे बदलाव भी किये है जिनसे किसान को लाभ मिलेगा. पर क्या ये नीतियाँ सही में कारगर साबित होंगी? क्या किसान क़र्ज़- मुक्त हो पायेगा? क्या किसानो की आत्महत्याएं रुकेंगी? और क्या इन नीतियों से ज़मीनी तौर पर बदलाव आएगा? इन सब सवालों के जवाब ढूंडने के लिए हमने अखिल भारतीय किसान संघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजाराम त्रिपाठी  से ख़ास बातचीत की.

डॉ. त्रिपाठी ने  बजट में किसानो के लिए किये प्रावधान पर अपने विचार रखें तथा किसानो की ओर से इन पर सुझाव भी दिए!

डॉ. राजाराम त्रिपाठी

तो आईये जानते है डॉ. त्रिपाठी से कि किसानों के हित में नज़र आ रहें बजट में किये गए 6 प्रावधानों पर उनकी क्या राय हैं और वे इन पर क्या सुझाव देना चाहेंगे –

1.कृषि ऋण में 11 लाख करोड़ का इज़ाफा

डॉ त्रिपाठी – बजट में कृषि ऋण में 11 लाख करोड़ का इजाफा करने की घोषणा सरकार ने की हैं, जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि इस घोषणा का लाभ लघु व सीमांत किसानों को मिलने के बजाय बड़े किसानों और कृषि व्यवसाय से संलग्न लोगों को होगा. वैसे भी अतीत की स्थितियां बयां करती है कि ऋण सीमा बढ़ाने से किसानों का भला होने के बजाय इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. किसान कर्ज के मकड़जाल में उलझ जाते हैं और अंततः आत्महत्याओं की संख्या बढ़ जाती है.

सुझाव –

क़र्ज़ देने की प्रक्रिया को सरल किया जाएँ . दस्तावेजीकरण न्यूनतम रखे. वास्तव में जो कर्जा दिखता है, उसका अधिकतम भाग रासायनिक खाद , बीज , दवाई , कृषि आदानों के नाम से दिया जाता हैं. कृषि निति इस तरह की हो की ऋण लेने की ज़रूरत ही न पड़े और यदि ज़रूरत पड़े  भी तो इसकी प्रकिया का सरलीकरण हो. इसके अलावा क़र्ज़ माफ़ी भी नहीं होनी चाहिए बल्कि अदायगी में कुछ रियायत बरतने की ज़रूरत हैं.

2.उपज की लागत का न्यूनतम समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना

डॉ त्रिपाठी-  किसानों को उनके उपज की लागत का न्यूनतम समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना देने की बात कही गई हैं, पर जो लागत तय करने का सरकारी तंत्र है, उसमे लागत ही सटीक रूप से तय नहीं हो पाता है. ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना भी कठिन हैं. इसके अलावा इस  उपज की खरीद भी अगले वर्ष से होगी. अर्थात अभी तुरंत किसानों को कोई लाभ नहीं मिल पायेगा.

सुझाव : फसल के लागत मूल्य निर्धारण में किसान तथा उसके परिवार के श्रम का मूल्य अर्थात मज़दूरी भी शामिल की जानी चाहिए तथा जिस भूमि पर खेती की जा रही है उसका किराया भी फ़सल की  लागत में जोड़ा जाना चाहिए. कृषि मशीनरियों की लागत पर ब्याज़ की गणना करके उसे भी फ़सल लागत व्यय में शामिल करना होगा, साथ ही साथ फ़सल के प्रबंधन व्यय, मंडी तक पहुंचाने का खर्च  तथा बाज़ार में बेचने की प्रक्रिया में लगे खर्च को भी जोड़ना होगा। फ़सल की लागत निर्धारण की प्रक्रिया को पारदर्शी युक्ति युक्त तथा वास्तविक एवं ज़मीनी हक़ीक़त के आधार पर तैयार करना ज़रूरी है।इस प्रक्रिया में सभी वर्ग के वास्तविक किसानों को शामिल किया जाना चाहिए।

4.लघु व कुटीर उद्योगों के विकास के लिए 200 करोड़

डॉ त्रिपाठी – लघु व कुटीर उद्योगों के विकास के लिए 200 करोड़ और स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए दो लाख 40 हजार करोड़ रुपये आवंटित किया गया है. उल्लेखनीय है कि देश की 68.84 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है तथा उनकी आजीविका में लघु व कुटीर उद्योगों का काफी महत्व है ऐसे में 200 करोड़ रुपये इस क्षेत्र के लिए नकाफी है. ऐसी स्थिति में ग्रामीणों का पलायन होगा और खेती-किसानी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

सुझाव :

देश के 2,36,000 से भी अधिक गांवों के विकास के लिए एक दूरगामी, दीर्घकालीन  लघु एवं कुटीर उद्योग विकास नीति की आवश्यकता है एवं बिना ग्रामीण उद्योगों के विकास के हम अपने बहुसंख्य बेरोज़गार नौजवानो कोरोज़गार मुहैया नहीं करा पाएंगे ।अतः लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए बजट में अधिक से अधिक राशि के प्रावधान करने होंगे तथा हमारे विभिन्न परम्परागत ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।

4. खाद्य प्रसंस्करण के लिए 1400 करोड़ रुपये आवंटित

डॉ त्रिपाठी – वित्तमंत्री ने खाद्य प्रसंस्करण के लिए 1400 करोड़ रुपये आवंटित किये है, जब कि प्रतिवर्ष खाद्यप्रसंस्करण के अभाव में 92 हजार करोड़ रुपये मूल्य के फल और सब्जियां सड़ जाती है और फेंकी जाती है. सिंचाई को लेकर कोई दूरगामी योजना नहीं दिखी.

सुझाव :

फसलों के उत्पादन के बाद उत्पाद के समुचित रख रखाव , समुचित भंडारण, उचित परिवहन तथा विभिन्न स्तरीय उचित प्रसंस्करण की व्यवस्था विकास फंड तथा जिला स्तर पर किया जाना नितांत ज़रूरी है। इस कार्य हेतु निजी क्षेत्र से भी पूंजी निवेश हेतु सहभागिता की जानी चाहिए। भारत की खुदरा बाज़ार जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में 100%  पूंजी निवेश हेतु लालायित विदेशी  बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ऐसे ही ग्राम्य उद्यमों/उपक्रमों में सहभागिता हेतु आकर्षित , प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

5. जैविक खेती को बढ़ावा

डॉ त्रिपाठी  – जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात की जा रही है लेकिन रसायनिक खाद के लिए तय की गयी राशि में से कितनी राशि को जैविक खेती के लिए हस्तांतरित किया जाएगा, इस पर स्पष्ट कुछ नहीं कहा गया है. वहीं जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया है. ऐसे में जैविक खेती को कैसे बढ़ावा मिलेगा, यह एक बड़ा सवाल है.

सुझाव :- 

 जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए ठोस प्रयास किए जाने की आवश्यकता है । रासायनिक खादों के लिए  करोड़ों का अनुदान देते रहने से जैविक खेती कैसे आगे बढ़ेगी? रासायनिक खाद के लिए दिया जाने वाला अनुदान जैविक खाद पर परावर्तित किया जाना चाहिए. जो किसान जैविक खेती कर रहे हैं तथा अपने खेतों  के लिए स्वयं जैविक खाद तैयार कर रहे हैं उन्हें भी रासायनिक खाद पर दिए जा रहे अनुदान की तर्ज़ पर जैविक खाद पर अनुदान दिया जाना चाहिए तभी जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा. इसके अलावा जैविक उत्पादों के बाज़ार को भी बढ़ावा दिए  जाने की ज़रूरत है.

जैविक खेती के तथा जैविक उत्पादों की प्रमाणीकरण हेतु समुचित निति बनाए जाने की ज़रूरत है. प्रमाणीकरण पर लगाए जा रहे जीएसटी/GST की 18 प्रतिशत tax को तत्काल हटाया जाना चाहिए तथा जैविक उत्पादों पर पूरी तरह से कर मुक्त व्यवस्था लानी चाहिए जिससे कि सही मायने में जैविक खेती तथा जैविक उत्पादोंको बढ़ावा मिले एवं किसानों के साथ ही साथ भारत के खेतों की ज़मीन की दशा सुधरेगी।

6. स्वास्थ्य बीमा के लिए 50 हजार करोड़ रुपये

डॉ त्रिपाठी  – स्वास्थ्य बीमा के लिए 50 हजार करोड़ रुपये आवंटित किया गया है, लेकिन ग्रामीण

क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे की स्थिति बदहाल है.  ऐसे में यह ग्रामीणों के लिए कम और बीमा कंपनियों की हितों को ज्यादा लाभ पहुंचायेगा..

सुझाव :-

सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता में सुधार तथा विस्तार किया जाना

आवश्यक है। गांवों में अपेक्षित संख्या में अस्पतालों की कमी है जहाँ अस्पताल है वहाँ चिकित्सकों की कमी दवाइयों का भी अभाव है. विशेषज्ञ चिकित्सकों की भारी कमी तो जिला स्तरीय चिकित्सालयों में भी है। इसलिए सर्वप्रथम भारत की परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों का विस्तार किया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाओं को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के उपरांत ही ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा का समुचित लाभ ग्रामीण

जनता को मिल पाएगा।

डॉ राजा राम त्रिपाठी अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के अध्यक्ष हैं और कई सालों से बस्तर के दंतेवाडा इलाके में औषधीय वनस्पतियों की किसानी कर रहे हैं. वे Central Herbal Agro Marketing Federation of India  (CHAMF India ) के चेयरमैन तथा

Aromatic Plants Growers Association of India ( APAGAI) के जनरल सेक्रेटरी भी हैं.

 

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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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