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History of pandemics

वैश्विक महामारी पार्ट 1: मानव सभ्यता के इतिहास की पहली इंफ्लुएंज़ा महामारी!

हिप्पोक्रेट्स के महामारी वर्णन से हम समझ पाते हैं कि वे जीवाणु जो हजारों साल पहले इंसानी सभ्यता को झकझोर रहे थे, पूरी तरह कभी नष्ट हुए ही नहीं। वे सोए पड़े रहे थे प्रकृति की तहों में, चुप्पी ओढ़े रहे थे। और जब-जब मौका लगा, दुनिया पर कहर बरपा करने से बाज नहीं आए!

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लिंग मा का उपन्यास सेवरेन्स  महज़ इत्तफाक था या कुछ और? 2018 में छपे इस उपन्यास में अमरीकी-चीनी मूल की लेखिका ने प्लेग की गिरफ्त में आने के बाद भुतहा शहर में तब्दील हो रहे न्यूयार्क की डरावनी तस्वीर खींची है। प्‍लेग के बाद मुट्ठीभर बचे रह गए लोगों में केंडेस चेन भी है, जो बाइबल छापने वाली एक फर्म में नौकरी करती है। जब शेन बुखार के प्रकोप से शहर कब्रगाह बन रहा था, केंडेस उससे बेखबर अपने काम में जुटी रही थी। देखते ही देखते कंपनियों ने काम बंद कर दिया और शहर का रेलतंत्र ठप्प पड़ गया। उसकी फर्म में कामगारों की गिनती गिरते-गिरते ऐसा वक़्त भी आया जब वह अकेली बची रही थी – शेन बुखार की छाया से दूर, प्लेग के अभिशाप से मुक्त।

वह अक्सर खाली वक़्त में एक गुमनाम ब्लॉग एनवाई घोस्ट चलाया करती थी जिसमें अपने देखे, अनुभव किए शहर के ब्योरे दर्ज करती थी और अब वह प्लेग के कहर से जूझते शहर का आंखो-देखा हाल दर्ज करने लगी थी। 

इसे अजब संयोग ही कहा जाएगा कि सेवरेन्समें प्लेग की वजह बना फंगल इंफेक्शन भी चीन से ही यहां पहुंचा था। लिंग मा का यह पहला उपन्यास है और किसी डरावने कथानक की तरह खुलने वाली इस रचना को पढ़ते हुए आप बार-बार खुद से पूछते हैं कि क्या साहित्य आने वाले भविष्य की पदचाप सुना रहा था? हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि एक आसन्‍न महामारी के संकेत किसी लेखक ने दिए हों। इससे पहले, 2011 की हॉलीवुड मूवी कन्‍टेजियन में जिस तरह से एक वायरस के प्रकोप से जूझती इंसानी सभ्‍यता चीथड़े-चीथड़े हो रही थी, वो मंज़र कोरोनावायरस के चलते मचे कोहराम का पूर्वकथन ही तो था। साहित्‍य, फिल्‍म, रंगमंच से होते हुए मीडिया और फिर इतिहास लेखन तक में महामारियों का वर्णन कोई अनोखी घटना नहीं है। और महामारी विज्ञान लेखन (एपिडिमियोलॉजी) तो इन कुदरती प्रकोपों के कारणों की शिनाख्‍़त, पड़ताल, इलाज या इनके लाइलाज बने रहने के तमाम पहलुओं के दस्‍तावेजीकरण के लिए है ही।

इंसानों को डसती रही हैं महामारियां

महामारियों और इंसान का संग हमेशा बना रहा है। और क्‍यों न हो ? इस ग्रह पर साढ़े तीन अरब साल से कायम है जीवाणुओं (बैक्‍टीरिया) का रुतबा और धरती पर सबसे पुराने जीवों में इनकी गिनती होती है। इसी तरह, विषाणु (वायरस) भी जीवन के विकासक्रम में हमेशा से हैं। हर सदी में दुर्भिक्ष, सूखे और भूकंप-बाढ़ से बच निकलने वाले लोग सैंकड़ों सालों से कितनी ही किस्‍म की महामारियों के संकट से जूझते रहे हैं जो इन बैक्‍टीरिया, वायरस, अमीबा जैसे सूक्ष्‍म जीवों की ही देन है। दरअसल, संक्रामक रोग तो तभी से इंसानों को डसते आए हैं जबसे वह गुफा मानव था और शिकार या भोजन की तलाश में भटका करता था। मगर तब तक समाजों और समुदायों का वैसा रूप नहीं था जैसा आज से करीब 9500 साल पहले कृषि शुरु होने के बाद बना था। और इन व्‍यवस्थित समाजों के साथ ही संक्रमणों ने महामारी की शक्‍ल लेनी शुरू की थी। फिर जैसे-जैसे मनुष्‍य सभ्‍य होता गया, उसकी गतिविधियां जैसे व्‍यापार, यात्राएं, तीर्थयात्राएं, मेले, युद्ध वगैरह महामारियों की ‘सैरगाह’ बनती चली गईं।

History of pandemicsphoto credit

सदियों पहले महामारियों को दैवीय प्रकोप समझता था इंसान 

प्राचीन यूनानी चिकित्‍सक हिप्‍पोक्रेट्स (460-370 ईपू) ने ढाई हजार साल पहले एपिडमिक  शब्‍द का इस्‍तेमाल अपने क्‍लासिक एयर्स, वॉटर्स एंड प्‍लेसेज़में किया था और वह भी उस दौर में जबकि रोगों को दैवीय प्रकोप समझा जाता था। यह पहला मौका था जब एपिडमिक्‍स का प्रयोग ‘किसी देश में व्‍यापक पैमाने पर फैलने या प्रसारित होने वाले रोग’ के लिए हुआ था। दरअसल, इससे पहले तक एपिडमिक्‍स के संदर्भ अलग-अलग थे। मसलन, ग्रीक नाटककार सोफोक्‍लीज़ ने किसी देश में फैलने वाली अफवाह, ख्‍याति, शोर, साख वगैरह के संदर्भ में एपिडमिक्‍स का प्रयोग किया था। यहां तक कि होमर ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्‍य ‘ओडिसी’ में, हिप्‍पोक्रेट्स से दो सदी पहले इसका इस्‍तेमाल किया था लेकिन वहां इसके मायने स्‍वदेशी, देश में ही होने वाला (एंडेमिक, इंडिजिनस) थे। प्‍लेटो के दौर में यह लफ़्ज़ थोड़ा और बदला और इसे अब ‘किसी दूर देश की लंबी यात्रा से अपने शहर लौटने/घर वापसी’ के संदर्भ मिल चुके थे। इस बीच, ग्रीस के ही दो चर्चित वक्‍ताओं डेमोस्‍थेनिस और एस्‍चिनिस (390-314 ईपू) ने एपिडमिक को ऐसे व्‍यक्ति के संदर्भ में इस्‍तेमाल करना शुरु किया जो कहीं बाहर से किसी शहर में रहने आया हो। लिहाज़ा, एपिडमिक्‍स शब्‍द क्रिया रूप में बदल गया जिसके मायने थे ‘रहना’ (to reside)। 

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यानी, हिप्‍पोक्रेट्स से पूर्व एपिडमिक्‍स शब्‍द की जितनी भी अर्थ छायाएं थीं (जो व्‍यक्ति, वर्षा, अफवाह, युद्ध, साख, प्रतिष्‍ठा से लेकर रहना और दूर देश की यात्रा से स्‍वदेश लौटने तक के संकेत लिए थीं), उनमें और चाहे जो कुछ हो, रोग के लक्षण लेशमात्र भी नहीं थे! हिप्‍पोक्रेट्स ने रोग-शास्‍त्र के साथ-साथ इंसानी शब्‍दावली भी बदल डाली थी। पश्चिमी औषध-शास्‍त्र के जनक कहलाने वाले हिप्‍पोक्रेट्स ने तत्‍कालीन यूनान के उत्‍तर में बसे एक पोत शहर में इंफ्लुएंज़ा जैसी बीमारी के फैलने का जिक्र बुक ऑफ एपिडमिक्‍स (412 ईपू) में किया था। उन्‍होंने शीत के साथ सांस की एक रहस्‍यमय बीमारी फैलने का विस्‍तार से वर्णन किया। मानव सभ्‍यता के इतिहास में यह पहली इंफ्लुएंज़ा महामारी कही जाती है। यह वर्णन इसलिए भी महत्‍वपूर्ण था कि उस दौर में अंधविश्‍वास ज्‍यादा हावी थे और रोगों को दैवीय श्राप या सजा समझा जाता था। हिप्‍पोक्रेट्स ने पहली बार रोगों का संबंध मौसम और खान-पान में बदलावों से जोड़ा था। 

आप सोच रहे होंगे कि ढाई ​हज़ार साल पुरानी फ्लू का यह जिक्र आज क्या मायने रखता है? विज्ञान और टैक्नोलॉजी के क्षेत्रों में बेइंतहा प्रगति कर चुकने के बाद, इक्कीसवीं सदी के संक्रामक रोग के संदर्भ समझने के लिए हजारों साल पीछे लौटने का सबब क्या हो सकता है? दरअसल, हिप्पोक्रेट्स के महामारी वर्णन से हम समझ पाते हैं कि वे जीवाणु जो हजारों साल पहले इंसानी सभ्यता को झकझोर रहे थे, पूरी तरह कभी नष्ट हुए ही नहीं। वे सोए पड़े रहे थे प्रकृति की तहों में, चुप्पी ओढ़े रहे थे। और जब-जब मौका लगा, दुनिया पर कहर बरपा करने से बाज नहीं आए!

अगली बार जानेंगे कि ये बेमुरव्वत रोगाणु आगे चलकर क्या गुल खिलाते रहे हैं।


पढ़ें – वैश्विक महामारी पार्ट 2: एपिडमिक बनाम पैंडेमिक, स्‍पेनिश फ्लू का वर्ल्‍ड टूर!


संपादन – मानबी कटोच
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