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दुबई की नौकरी छोड़ लौट आए स्वदेश, अब उगाते हैं 550 प्रकार के फल!

विलियम जब दुबई से नौकरी छोड़ अपने घर वापस लौटे और फलों की खेती शुरू की तो उनके दोस्तों और रिश्तेदारों को यह फैसला अजीब लगा। उन्होंने विलियम को आगे बढ़ने से हमेशा हतोत्साहित किया। लेकिन आज विलियम की सफलता ने उन्हें गलत साबित कर दिया है!

कोझीकोड के एक गाँव कपाटुमाला के रहने वाले विलियम मैथ्यूज ने पढ़ाई पूरी करने के बाद कई स्टार्टअप में हाथ आजमाया लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने दुबई जाने का फैसला किया। लेकिन वहां भी विलियम का मन नहीं लगा और आखिर 2010 में उन्होंने दुबई की नौकरी छोड़ दी और अपने घर केरल लौट आए। यहां विलियम ने एक नया काम शुरू करने पर विचार किया।

10 साल के भीतर, विलियम अपने 8 एकड़ की ज़मीन पर 550 किस्म की उष्णकटिबंधीय यानी ट्रॉपिकल फल उगाने में सफल हुए हैं। इसके साथ ही, उन्होंने नारियल की खेती, मछली-पालन और मधुपालन में भी हाथ आज़माया है।

आज की तारीख में, विलियम का फलों का यह खेत पूरे केरल में काफी लोकप्रिय है। इतना ही नहीं, यह एक ऐसी जगह भी है जिसका दौरा देश भर के शोधकर्ता और कृषि विशेषज्ञ करते हैं।

42 वर्षीय विलियम बताते हैं, “मैंने संयुक्त अरब अमीरात में अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि वहाँ मेरा जीवन थम सा गया था। मैं फलों का खेत विकसित करने का सपना लेकर घर वापस लौटा। मैंने सोचा था कि यह एक शौक होगा, लेकिन यह एक अच्छा व्यवसाय मॉडल बन गया है और मैं अच्छा-खासा पैसा कमा भी रहा हूं।”

अनोखा केरल

विलियम के खेतों में करीब 30 किस्म के नींबू, 19 किस्म के खजूर, 7 तरह के अमरूद और 8 तरह के पैशन फ्रूट देखे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, इन फलों के अलावा यहां कई तरह के विदेशी फल भी उगाए गए हैं, जैसे कि अमेरिकी कोकोनिया, “मिकी माउस फ्रूट,”वैक्स एपल, हिमालयन मलबेरी, रोलिनिया, और ब्राजीलियन जबोटिकाबा। यहां कुछ स्थानीय फल भी हैं जैसे कि ‘मूटी पाज़म’, ‘नजारा पाज़म’ और ‘करपज़म।’

विलियम्स ने इन पेड़ों के पौधे 2010 में खरीदे थे जिनकी कीमत तब 500 रुपये थी। आज उनकी लागत 1000 रुपये से 2000 तक है।

उन्होंने अपने परिवार के स्वामित्व वाले धान के खेतों को मैंगोस्टीन फल के बाग में बदल दिया जो अब इनके फलों के खेत का हिस्सा हैं।

विलियम बताते हैं, “फलों का जंगल या फलों का खेत भारत के बाहर एक बहुत लोकप्रिय कॉन्सेप्ट है, लेकिन देश में अब तक बड़े पैमाने पर प्रयोग नहीं किए गए हैं। मुझे लगता है कि पश्चिमी घाट के राज्यों को यह निश्चित रूप से प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इन क्षेत्रों में आर्द्र जलवायु उनके लिए उपयुक्त है।”

फलों के अलावा, खेत में लोबान, कपूर और रुद्राक्ष जैसे कुछ औषधीय पौधे भी हैं। विलियम ने हाल ही में मधुपालन और मछलीपालन में भी हाथ आज़माया है। वर्तमान में खेत में दो तालाब हैं जिनमें कई तरह की मछलियां हैं। साथ ही मधुमक्खियों के 100 बक्से भी हैं।

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विलियम ने बताया, “यह खेत रातों-रात नहीं बना है। मैंने बहुत रिसर्च किया है और यह खेती कैसे की जाती है, इसकी बेहतर समझ पाने के लिए भारत और विदेशों में कई खेतों की यात्रा की है। इनमें से ज़्यादातर पौधों की कीमत काफी ज़्यादा है। और उस समय जब मैं आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहा था, मेरे माता-पिता ने मुझे खेती में निवेश नहीं करने की सलाह दी। लेकिन हर बार जब मुझे एक उष्णकटिबंधीय यानी ट्रॉपिकल फल मिला जो दुर्लभ था और केरल की जलवायु परिस्थितियों में उगाया जा सकता था, मैंने उसे तुरंत खरीदा। आज जब मैं पीछे देखता हूं, तो मुझे खुशी होती है कि मैंने यह करने का फैसला लिया क्योंकि मैं आखिरकार अपने सपनों को सच होते हुए देख सकता हूं।”

सफलता की सीढ़ियां

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया था, खेती से पहले, विलियम ने ऐसे कई काम किए थे लेकिन सफलता प्राप्त नहीं कर पाए थे।

विलियम बताते हैं, “1996 में राजगिरी से ग्रेजुएशन के ठीक बाद, मेरे पास ‘ स्टेटस आइडिया’ नामक एक स्टार्टअप की योजना थी, जो आज के फेसबुक की तरह ही थी। यह एप्लिकेशन लोगों को वास्तविक समय में अपने दोस्तों और सहयोगियों से जुड़ने की अनुमति देता। लेकिन मेरी टाइमिंग गलत थी। भारत उस समय स्टार्टअप की अवधारणा से परिचित नहीं था और मैं बुरी तरह विफल रहा।”

खेती पर ध्यान रखते हुए, उन्होंने आईटी क्षेत्र में भी कुछ करने का विचार किया ताकि आईटी में उनका कौशल बेकार ना जाए। उन्होंने मावूर इंस्टीट्यूशन ऑफ कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (एमआईसीटी) नामक एक कौशल केंद्र शुरू किया है, जिसका लक्ष्य छात्रों को आईटी, कोडिंग और कंप्यूटर चलाने की बुनियादी कॉन्सेप्ट को सिखाना है। आज, कक्षा में करीब 60 छात्र हैं और यह काम भी धीर-धीरे गति पकड़ रहा है।

Kerala techie turns farmer

विलियम आगे बताते हैं, “मेरी पत्नी सीना वर्तमान में एमआईसीटी की प्रमुख है और मेरे बच्चे, जोशुआ और जोएल आठवीं और नौवीं के छात्र हैं। ये सभी खेतों में मेरी मदद करते हैं। दोनों बच्चों में खेती के लिए एक जुनून दिखाई देता है और मुझे खुशी है कि इतने कम उम्र में वे इसकी कीमत समझ रहे हैं।”

वह कहते हैं, “मेरा मानना है कि हर घर को अपने पास मौजूद जगह के हिसाब से सब्जी और फलों के पौधे लगाने चाहिए। यह कभी बेकार नहीं होते और आप जल्द ही अपने घर के बगीचे से उपज का उपयोग करने में सक्षम होंगे।”

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विलियम उन कई लोगों में से एक हैं जिन्होंने एक विविध ‘फल वन’ बनाने के उद्देश्य से और इन उष्णकटिबंधीय फलों को दूसरों के लिए सुलभ बनाने के लिए आईटी का कारियर छोड़ खेती की दुनिया का रुख किया है। ऐसे समय में जब किसान कृषि को छोड़ रहे हैं, विलियम जैसे लोग हमें उम्मीद दिखाते हैं।

मूल लेख – सेरीन सारा ज़कारिया


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Written by पूजा दास

पूजा दास पिछले दस वर्षों से मीडिया से जुड़ी हैं। स्वास्थ्य और फैशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित तौर पर लिखती रही हैं। पूजा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है और नेकवर्क 18 के हिंदी चैनल, आईबीएन7, प्रज्ञा टीवी, इंडियास्पेंड.कॉम में सक्रिय योगदान दिया है। लेखन के अलावा पूजा की दिलचस्पी यात्रा करने और खाना बनाने में है।

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