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घर को बनाया प्रकृति और पर्यावरण के अनुकूल ताकि पक्षी बना सके अपना बसेरा!

अपने घर में प्राकृतिक रूप से बगीचा तैयार करने के बाद अब रमेश वर्मा अपने गाँव में खाली पड़ी ज़मीनों को हर्बल पार्क में तब्दील करने में जुटे हैं।

रियाणा में हिसार के अग्रोहा ब्लॉक का गाँव है नंगथला। यहां एक शख्स है जो पिछले कई साल से पक्षियों के लिए कुछ अलग काम कर रहा है। 32 वर्षीय रमेश वर्मा पिछले 15 सालों से पर्यावरण और प्रकृति के लिए काम कर रहे हैं। किसान परिवार में जन्मे रमेश ने सदैव यही देखा कि कैसे उनके घर में पशु-पक्षियों का ख्याल रखा जाता है, चाहे चिड़ियाँ को पानी देना हो, आँगन में पेड़-पौधे लगाना हो या फिर किसी अन्य जीव-जंतु की जान बचाना।

रमेश ने द बेटर इंडिया को बताया, “मुझे बचपन से ही प्रकृति के प्रति लगाव था। हमेशा से ही मैं इससे संबंधित मैगज़ीन या फिर अख़बारों में छपने वाले लेख पढ़ता था। एक बार मैंने एक लेख में पढ़ा कि कैसे हमारे यहाँ घरेलू चिड़ियाँ हैं वह विलुप्त हो रही हैं। फिर मैंने अपने आस-पास के वातावरण पर ध्यान दिया। हरियाणा में उल्लू काफी होते हैं लेकिन मेरे गाँव में मुझे सिर्फ दो उल्लू के जोड़े दिखे। इन सब बातों ने मुझे सचेत कर दिया।”

कॉलेज के दिनों से ही गाँव में युवा क्लब के पर्यावरण प्रभारी रहे रमेश ने ठान लिया कि उन्हें कुछ करना होगा। इसकी शुरूआत उन्होंने अपने घर से ही की। अपने घर में उन्होंने घोंसले लगाए। उनका घर गाँव में खेतों के नजदीक है तो उन्होंने आस-पास के खेतों में पेड़ों पर भी घोंसले बनाकर टांग दिए। आज भी उनका यह निःस्वार्थ कार्य जारी है और अच्छी बात यह है कि अब बहुत से किसान उन्हें खुद बुलाते हैं घोसले लगवाने के लिए।

रमेश ने बताया, “जितना मैंने पक्षियों के बारे में पढ़ा और समझा है, उससे मैंने जाना कि सबसे पहले हमें अपने चारों तरफ पर्यावरण और पशु-पक्षियों के अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। इसके लिए मैंने अपने घर में ही किचन गार्डन लगाया।”

Ramesh Verma

रमेश के घर में आज 10-12 तरह के फलों के पेड़ और साथ ही, वे सब्ज़ी उगाते हैं। उन्होंने अपने घर में सैकड़ों घोंसले लगाए हुए हैं जिनमें तोता, मैना और चिड़िया का बसेरा है। वह बताते हैं कि उन्होंने अपने बगीचे को प्राकृतिक तरीकों से तैयार किया है।

साथ ही, वह पक्षियों को सिर्फ साफ़ पानी देते हैं, दाना नहीं। इस पर उनका कहना है कि अगर पक्षियों को दाना दिया जाए तो वे पालतू हो जाएंगे। लेकिन उनकी कोशिश है कि ये पक्षी प्रकृति से अपने खाने की ज़रूरत को पूरे करें। उनके पूरे बगीचे में घूमें और पेड़ों पर लगे कीड़े-मकोड़ों को खाएं। इसके अलावा, पक्षियों का बाहर के वातावरण में घूमना भी ज़रूरी है।

रमेश ने कहा कि प्रकृति को सहेजने के साथ-साथ वह अपने घर को भी सस्टेनेबल बनाने में जुटे हैं। उन्होंने अब से लगभग 6 साल पहले अपने घर का निर्माण कराया था और उस वक़्त भी उन्होंने ध्यान रखा कि घर बिल्कुल हवादार हो ताकि एसी-कूलर की ज़रूरत ही न पड़े।

इसके अलावा, उन्होंने घर की छत पर सोलर पैनल लगवाया हुआ है और उनके यहाँ रेन-वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी है। उन्होंने अपनी छत में पाइप इस तरह से डलवाया है कि बारिश का पानी इसमें से सीधा सीढियों के नीचे बने टैंक में आए।

His Garden

रमेश ने बताया, “हम अपने रोज़मर्रा के कामों में भी काफी एहतियात करते हैं। आप कहीं भी देखोगे तो सबसे बड़ी समस्या होती है घर से गंदा पानी बाहर जाने की और कूड़े-कचरे की। लेकिन हमारे घर से कोई गंदा पानी बाहर नहीं जाता। कपड़े धोने के बाद बचे पानी को बड़े और छायादार पेड़ों में डाल दिया जाता है। बाकी अगर लगता है कि पानी में बहुत ज्यादा गंदगी है तो हमारे घर में कच्ची जगह भी है वहां उसे डाला जाता है ताकि यह सीधा पेड़ों में भी न जाए और मिट्टी में नमी भी रहे।”

इसके साथ ही, गाँव अगर कहीं कोई सांप-बिच्छु जैसा जीव निकल आता है तो रमेश को ही उसे पकड़ने के लिए बुलाया जाता है। रमेश उसे पकड़कर जंगल की तरफ छोड़ आते हैं। यह रमेश के प्रयासों से ही संभव हुआ है कि इस गाँव के लोग अब प्रकृति और इसके जीवों की रक्षा करने लगे हैं। रमेश ने बहुत से लोगों को लोहे, लकड़ी के डिब्बों और गत्तों से घोंसला बनाना सिखाया है।

इस सबके अलावा, उन्होंने अपने गाँव की खाली-बेकार पड़ी ज़मीनों को हर्बल पार्क में बदलने की ठानी है। वह बताते हैं कि गाँव को हरियाली से लबालब करने और साथ ही, गाँव में औषधीय पौधे रहें, इसके लिए उन्होंने जगह-जगह एलोवेरा, तुलसी जैसे पेड़ लगाना शुरू किया है।

वह बताते हैं, “COVID-19 की वजह से जब बाज़ारों में सैनीटाइज़र नहीं मिल रहा था और लोगों को बताया गया कि घर पर ही आप यह बना सकते हो तो मेरे पास बहुत से लोगों के फोन आए। सबको एलोवेरा चाहिए था। इसके बाद, कई लोग मेरे यहाँ से अपने घर में लगाने के लिए एलोवेरा की कलम भी लेकर गए। अब लोगों को समझ में आ रहा है कि पेड़-पौधे हमारे लिए कितने ज्यादा ज़रूरी हैं।”

रमेश वर्मा को उनके निःस्वार्थ कार्यों के लिए कई जगह सम्मानित भी किया गया है। उनसे प्रेरित होकर उनके अपने बच्चे और गाँव के अन्य युवा भी पर्यावरण संरक्षण के काम से जुड़ रहे हैं।

रमेश कहते हैं, “मैं जहाँ भी घोंसला लगाता हूँ वहां की खोज-खबर समय-समय पर लेता रहता हूँ कि किसी चिड़िया ने घोंसला बनाया या नहीं। और खुशकिस्मती है कि ज़्यादातर में कोई न कोई पक्षी अपना बसेरा कर लेता है। मैं आप सबसे बस यही कहूँगा कि ज्यादा नहीं बस अपने घरों में हर किसी को एक-एक घोंसला लगाना चाहिए ताकि उसमें कोई चिड़िया शरण ले सके।”

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अगर आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है तो आप रमेश वर्मा से 9813117258 पर संपर्क कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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