ऑफर सिर्फ पाठकों के लिए: पाएं रू. 200 की अतिरिक्त छूट ' द बेटर होम ' पावरफुल नेचुरल क्लीनर्स पे।अभी खरीदें
X
शहर का थका भरा जीवन छोड़, इस परिवार ने केरल में रखी प्रदूषण मुक्त गाँव की नींव!

शहर का थका भरा जीवन छोड़, इस परिवार ने केरल में रखी प्रदूषण मुक्त गाँव की नींव!

ग्लोबल वार्मिंग और प्रदूषण के बढ़ते कहर के बारे में जहाँ एक तरफ हम सिर्फ चिंता कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केरल के कुछ परिवार जुटे हैं एक जैविक गाँव बनाने में। मोहन चावड़ा के मार्गदर्शन में बन रहा यह गाँव एक प्रेरणा हैं आने वाली पीढ़ियों को एक खूबसूरत दुनिया सौंपने का और बेहतर भारत बनाने का।

Global Warming और प्रदूषण (Pollution) के बढ़ते कहर के बारे में जहाँ एक तरफ हम सिर्फ चिंता कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केरल के कुछ परिवार जुटे हैं एक जैविक गाँव बनाने में। मोहन चावड़ा के मार्गदर्शन में बन रहा यह गाँव (Pollution Free Village) एक प्रेरणा हैं आने वाली पीढ़ियों को एक खूबसूरत दुनिया सौंपने का और बेहतर भारत बनाने का।

भरतपुजा नदी का खूबसूरत किनारा, घने हरे-भरे पेड़ों की छाया और उनके बीच एक स्व-निर्मित ट्री-हाऊस। अंदर मोहन चावड़ा और उनका परिवार अपने जैविक बगीचे की ताजा उपज से भोजन पका रहा है।

11990536_1057559094254521_2583535791396249641_n

मोहन चावड़ा का परिवार केरल के पालक्काड़ जिले में उभरते इस जैविक गाँव का पहला निवासी हैं। चावड़ा द्वारा ही अवधारित और स्थापित यह गाँव ढाई एकड़ के प्राकृति ग्रामीण क्षेत्र के बीच में और मन्नंनूर रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर बसा हुआ है।

पढ़िए वह कहानी कि कैसे मोहन चावड़ा, एक प्रतिभाशाली मूर्तिकार, बना रहे हैं एक अनोखा जैविक गाँव जो आधारित है स्थिरता, साधारण जीवन और प्राकृतिक सामंजस्य जैसे मूल्यों पर।

चावड़ा और उनकी पत्नी रुक्मिणी (एक नर्सिंग कॉलेज की पूर्व प्रधानाध्यापिका) ने बहुत समय से एक सपना संजोया थाऐसे लोगों का समुदाय बनाने का, जो समर्पित हो पर्यावरण-अनुकूलित और हरित जीवन जीने के लिए। 2013 में उन्होंने अपनी ही तरह सोचने वाले 14 परिवारों से अपने लिए एक स्व-निर्वाहित जैविक गाँव बनाने की बात की। वे सब प्रदूषण, संसाधित खाद्य पदार्थ और शहर की अव्यवस्थाओं को छोड़कर प्रकृति की गोद में एक नया और स्वस्थ जीवन जीना शुरू करना चाहते हैं।

Pollution Free Village

जब उन्हे भरतपुजा  नदी के किनारे की खूबसूरत ढाई एकड़ जमीन का पता लगा, उन्हें वह जगह जैविक गाँव बनाने के लिए सबसे बढ़िया लगी अपनी पूँजी इकट्ठी कर उन्होंने वो जमीन खरीद ली, जहाँ पहले एक रबड़ बागान हुआ करता था।

उनके ग्रुप ने शुरूआत उन रबड़ के पेड़ों को काटने और हटाने से की जो मिट्टी के लिए हानिकारक थे। फिर फलदार पेड़ और सब्जी के बगीचे लगाने से पहले उन्होने अपने ही हाथों से अपना एक ट्री-हाऊस बनाया।

2015 में मोहन, रुक्मिणी और उनकी दो बेटियां — 18 वर्षीय सूर्या और 11 वर्षीय स्रेया इस उभरते गाँव में रहने आ गए, ऐसा करने वाले वे पहले थे।

Pollution Free Village

इस जैविक गाँव का प्रारूप साझेदारी और एकजुटता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। इसकी शुरुआत से ही यहां प्रशंसकों का आना जाना लगा रहा है, इसलिए चावड़ा परिवार और बाकी सभी परिवारों ने मिल कर एक गेस्ट हाउस और एक बड़ा सामुदायिक किचन (रसोईघर) बनाना तय किया, जहाँ सब मिलकर पका और खा सके। इन परिवारों ने कलाकारों, कार्यकर्ताओं और पड़ोसी गांवों के लोगों को भी गाँव में आयोजित होने वाले साप्ताहिक कला सम्मेलनों में आमंत्रित करने की योजना बनाई है।

हाल ही में, चावड़ा परिवार ने छत डालने के लिए थोड़ी बाहरी मदद लेकर, अपने लिए एक साधारण सा कच्चा मकान बनाना शुरू किया। फल, सब्जियाँ और दालें लगाने के अलावा चावड़ा परिवार गाय, बकरियाँ और मुर्गी पालन भी करता हैं।

गाँव में आने वाले हर मेहमान का स्वागत रुक्मिणी द्वारा जैविक बगीचे की ताजा पैदावार से बनाए स्वादिष्ट खाने से होता है। शाम का खाना अक्सर स्थानीय सुरीले गीतों और उत्साहपूर्ण  कला चर्चा के साथ होता है।

Pollution Free Village
Pollution Free Village

चावड़ा परिवार का मानना है कि प्रेम, मानवता और दया जैसी भावनाओं के बारे में  हम नियमित स्कूलों के बजाय  प्रकृति के बीच रहकर ज्यादा सीख सकते हैं। यही कारण है कि स्रेया और सूर्या स्कूल छोड़कर यह प्राकृतिक जीवन जी रही है। हालाँकि सूर्या अपनी क्लास की टाॅपर थी जब उसने आठवीं में स्कूल छोड़ा, लेकिन वह इस वैकल्पिक और अनौपचारिक शैक्षिक पद्धति के साथ ज्यादा सहज और खुश हैं

दूसरी तरफ स्रेया डिस्लेक्सिया से ग्रसित है। उसके शिक्षक हमेशा उसकी क्षमताओं को समझने और उनके साथ काम करने में असमर्थ रहे, लेकिन इस जैविक गाँव ने उसके सामने इतनी राहें खोल दी है कि वह धीरे-धीरे विकसित हो रही है।  

दोनों ही बहनों को प्रकृति को निहारना, काम करते हुए पक्षियों का कलरव सुनना और ट्री-हाऊस में रहकर ताजा हवा का आनंद लेना बहुत पसंद है।

Pollution Free Village

सूर्या और स्रेया लगातार घूमती भी रहती है ताकि अपने प्रदेश की सांस्कृतिक और सामाजिक विभिन्नता के बारे में जान सके। 2013 में उन्होंने अरनमूल तक  एक बाल-रैली का नेतृत्व किया था और प्रतीक स्वरूप धान के पौधे लगाकर एक प्रोजेक्ट, जिससे उस इलाके की जैव-विविधता को नुकसान पहुंचता, के प्रति जागरूकता फैलायी थी।

अपने पिता से सीखकर सूर्या और स्रेया मूर्तियाँ बनाने और दूसरी कलाओं में भी काफी कुशल हो गई है। अपनी सृजनात्मकता को मातापिता द्वारा हौसला बढ़ाने के चलते, दोनों  बहनों ने अपने कच्चे मिट्टी के मकान की दीवारें मूर्तियों और तस्वीरों से सजा दी हैं। शहर की भागमभाग से दूर एक शांत जगह बसाकर, मोहन चावड़ा ने अपने प्रयासों से  गाँव को पारंपरिक वन्य-जीवन और कलात्मक रचना का आकर्षक मिश्रण बना दिया है।

अपने बच्चों पर इस साधारण जीवनशैली का सकारात्मक प्रभाव देखकर चावड़ा और बाकी परिवारों ने खुद की शिक्षा प्रणाली (जिसमे कला और शिल्प वर्कशॉप, बागबानी, आदि भी सम्मिलित होंगी) जिससे कि बच्चे साथ मिलकर रहने के लिए प्रोत्साहित हो कि एक दूसरे से मुकाबला करने के लिए।

12063496_1078560715487692_7024750026731369046_n

अपनी इस साहस, स्थिरता और प्रेम की कहानी से चावड़ा परिवार ने जैविक जीवनशैली का एक अनोखा उदाहरण पेश किया है जो कि वाकई में पूरे भारत में कई लोगों को अपनी जड़ों की तरफ लौटने की प्रेरणा देगा।

मोहन चावड़ा से आप उनके फेसबुक पेज पर संपर्क कर सकते है।

मूल लेख : संचारी पाल

Source for all photos: Mohan Chavara

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें contact@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter (@thebetterindia) पर संपर्क करे।

Pollution Free Village, Pollution Free Village, Pollution Free Village,

किरण गोस्वामी

अखबारों और किताबों की दुनिया में डूबने के अपने सपने को किरण पत्रकारिता पढ़ते हुए पूरा कर रही है।अनुवाद भी करती है ताकि भाषाएँ आडे़ न आए बेहतर भारत बनाने में।
Let’s be friends :)
सब्सक्राइब करिए और पाइए ये मुफ्त उपहार
  • देश भर से जुड़ी अच्छी ख़बरें सीधे आपके ईमेल में
  • देश में हो रहे अच्छे बदलावों की खबर सबसे पहले आप तक पहुंचेगी
  • जुड़िए उन हज़ारों भारतीयों से, जो रख रहे हैं बदलाव की नींव