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8 जिले, 17 हेल्थ सेंटर, 24 लाख मरीज़ों का इलाज, एक महिला बदल रही है तस्वीर!

8 जिले, 17 हेल्थ सेंटर, 24 लाख मरीज़ों का इलाज, एक महिला बदल रही है तस्वीर!

रूरल हेल्थ केयर फाउंडेशन के सेंटर्स पर आने वाले मरीज़ों से कंसल्टेशन फीस मात्र 80 रुपये ली जाती है और उन्हें एक हफ्ते की दवाइयां मुफ्त में दी जाती हैं!

श्चिम बंगाल के कोलकाता में रहने वाले एक गुजराती परिवार में पली-बढ़ी फाल्गुनी ने अपने बचपन में कभी भी समाज सेवा के बारे में नहीं सोचा था। कॉलेज के दौरान उनकी मुलाकात अरुण नेवतिया से हुई और उनकी ज़िंदगी ने एक अलग मोड़ ले लिया। अरुण से मिलकर फाल्गुनी ने जीवन का एक अलग पहलू देखा।

एक मारवाड़ी व्यवसायी परिवार से आने वाले अरुण को 10 साल की उम्र से ही ब्लड कैंसर था। उनका इलाज हुआ और वे ठीक हो गए, लेकिन किसी ने भी नहीं सोचा था कि उनका कैंसर फिर से उभर कर आएगा।

फाल्गुनी बताती हैं, “अरुण ने मुझे सब बताया था कि उन्हें यह बीमारी है और उन्हें इलाज के बाद फिर से रिलैप्स हुआ है। पर उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि कभी लगा ही नहीं कि यह इंसान बीमार है। पढ़ाई में वह बहुत अच्छे थे और हमेशा लीडरशिप की भावना रखने थे, इसलिए मैंने उनसे शादी करने का फैसला किया।”

अरुण और फाल्गुनी ने लगभग 5 सालों तक अपने परिवारों को अपने रिश्ते के लिए मनाया और फिर उनकी शादी हुई। फाल्गुनी ने अपनी पढ़ाई के बाद एक स्कूल में गणित की शिक्षक के तौर पर नौकरी शुरू की। वहीं अरुण अपना पारिवारिक व्यवसाय संभालने लगे।

Falguni Nevatia

अरुण की बीमारी की वजह से उनके परिवार ने बहुत करीब से समझा था कि हमारे देश में स्वास्थ्य सुविधाएं किसी लक्ज़री से कम नहीं है। उन्हें यह बात अच्छे से समझ में आ गई थी कि अगर उनका परिवार समृद्ध न होता तो शायद उनका बेटा बच नहीं पाता। अपने खुद के अनुभवों को देख नेवतिया परिवार ने पास के ग्रामीण इलाके, मायापुर में गरीब तबके के लोगों के लिए एक मेडिकल डिस्पेंसरी शुरू की।

“पहले सिर्फ ज़रूरी दवाइयाँ गरीबों को मुफ्त में उपलब्ध करवाई जाती थीं और फिर साल 2007 में अरुण और उनके बड़े भाई, अनंत ने एक क्लिनिक शुरू करवाया। यह तीन दिन के लिए लगता था और यहाँ पर तीन डॉक्टर, एक एलोपैथिक, एक आई स्पेशलिस्ट और एक होम्योपैथिक डॉक्टर बैठते थे,” उन्होंने आगे बताया।

उस समय मात्र 5 रुपये की कंसल्टेशन फीस में डॉक्टर सभी मरीज़ों का चेकअप करते थे और 1 हफ्ते की दवा उन्हें मुफ्त में दी जाती थी।

फाल्गुनी उस समय अपनी टीचर की नौकरी करतीं थीं और छुट्टी वाले दिन अपने पति की मदद के लिए क्लिनिक जातीं थीं। साल 2008 में एक बार फिर अरुण की तबियत बिगड़ने लगी। इसके बाद फाल्गुनी ने तय किया कि वह अपनी नौकरी छोड़कर क्लिनिक के काम में उनकी मदद करेंगी।

मात्र एक साल में ही उनका काम काफी बढ़ गया और साथ ही, उनके क्लिनिक की चर्चा भी होने लगी। वह बताती हैं कि जैसे-जैसे लोगों को उनके इस पब्लिक क्लिनिक का पता चल रहा था, लोगों की संख्या बढ़ने लगी। अरुण और फाल्गुनी ने अपने इस काम को दूसरे इलाकों में भी फैलाने का सोचा और यहाँ से शुरुआत हुई, रूरल हेल्थ केयर फाउंडेशन की।

“दूसरे भी बहुत से लोगों ने मदद का हाथ बढ़ाया। हमने मायापुर के अलावा और भी कई ग्रामीण इलाकों में अपने सेंटर्स खोले। जैसे-जैसे हमारी पहुँच लोगों तक बढ़ी, वैसे-वैसे और दवाइयों और डॉक्टर्स की ज़रूरत भी बढ़ी। अपने इस मॉडल को सस्टेनेबल बनाने के लिए हमने फाउंडेशन में थोड़े बदलाव किए,” उन्होंने कहा।

साल 2013 में अरुण इस दुनिया से चले गए और पीछे रह गया तो उनका सपना कि गरीबों तक सही स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचे। फाल्गुनी ने अरुण के जाने के बाद उनके सपने को अपनी ज़िंदगी का मकसद बना लिया।

अरुण नेवतिया

“अरुण ने मुझे सब कुछ सिखाया कि कैसे, क्या करना है। वह हमेशा कहते थे कि हम बहुत खुशकिस्मत हैं कि हमारे पास इतने साधन हैं कि हम अच्छी ज़िंदगी जी पा रहे हैं। अच्छे अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं, लेकिन दुनिया में न जाने कितने लोग हैं जिन्हें खांसी-बुखार जैसी मामूली बीमारी का इलाज भी नहीं मिल पाता। उनकी बातों ने और उनके हौसले ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी,” उन्होंने बताया।

अरुण के बाद उनका पूरा परिवार फाल्गुनी की ताकत बना। आज भी नेवतिया परिवार संयुक्त है और घर का हर सदस्य फाउंडेशन के काम में हाथ बंटाता है। फाल्गुनी कहती हैं कि अरुण की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता, लेकिन उनके परिवार ने उन्हें कभी भी अकेला नहीं पड़ने दिया।

Falguni with Brother- in- law Anant Nevatia and his son

यह उनकी मेहनत और उनके परिवार का साथ ही है कि आज रूरल हेल्थ केयर फाउंडेशन के कुल 17 सेंटर हैं- 12 ग्रामीण इलाकों में और 5 शहरी इलाकों की झुग्गी-झोपड़ियों में। यह सेंटर्स पश्चिम बंगाल के 8 जिलों में फैले हुए हैं।

उनके सभी सेंटर्स सुबह 9 बजे से शाम के 5 बजे तक काम करते हैं। उनके यहाँ जनरल फिजिशियन, आई स्पेशलिस्ट, होम्योपैथिक डॉक्टर के अलावा एक डेंटल सर्जन भी बैठता है। डॉक्टर्स के अलावा हर एक सेंटर पर उनके लिए 2 हेल्पर, 1 फार्मासिस्ट, 1 एडमिनिस्ट्रेशन हेल्पर और 1 कुक रखा गया है।

हालांकि, फाउंडेशन को सस्टेनेबल बनाने के लिए पिछले कुछ सालों में उन्होंने कंसल्टेशन फीस बढ़ाई है। अब मरीज़ों से 80 रुपये कंसल्टेशन फीस ली जाती हैं, लेकिन दवाइयां उन्हें आज भी मुफ्त में दी जाती है।

“हर एक सेंटर पर काम करने वाले डॉक्टर और अन्य लोगों की सैलरी हमें मैनेज करनी होती है। इसके अलावा, हम निश्चित करते हैं कि किसी भी सेंटर पर दवाइयां कभी भी खत्म न हों। लोग हमारे पास 50 किमी दूर से भी इलाज के लिए आते हैं क्योंकि हम उन्हें दवाइयां मुफ्त में दे रहे हैं। हम डायबिटीज और हाइपरटेंशन की दवाइयां भी रखते हैं,” उन्होंने बताया।

हर महीने उनके यहाँ 25 से 30 हज़ार मरीज़ों का इलाज किया जाता है। फाल्गुनी के मुताबिक अब तक उनकी फाउंडेशन लगभग 24 लाख लोगों का इलाज कर चुकी है।

रूरल हेल्थ केयर फाउंडेशन का उद्देश्य पश्चिम बंगाल के दूर-दराज के इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाना है। इसके अलावा, उनके यहाँ दांतों से संबंधित जैसे दांत निकालना, फिलिंग, क्लीनिंग आदि मूलभूत बिमारियों का इलाज किया जाता है।

“कैटरैक्ट (मोतियाबिंद) के हमारे पास बहुत मरीज़ आते हैं। रोटरी के साथ टाई-अप करके हमने इन मरीज़ों की सर्जरी मुफ्त में करवाई है। इसके अलावा, हमारे कई अस्पतालों से भी टाई-अप हैं, जिनमें इमरजेंसी के केस में हम मरीज़ को रेफर करते हैं।”

रूरल हेल्थ केयर फाउंडेशन ने स्माइल चेन फाउंडेशन के साथ मिलकर मुफ्त में बहुत सी क्लेफ्ट (होंठ या फिर तालू में मांसपेशी संबंधी विकृति) सर्जरी भी करवाई हैं। इसके अलावा, उनका फाउंडेशन सब्सिडाइज्ड फीस में ब्लड टेस्ट की सहूलियत भी देता है।

फाल्गुनी आगे बताती हैं कि फंड्स और अच्छी मेडिकल सर्विस मैनेज करने के साथ-साथ और भी बहुत सी चुनौतियों का सामना उन्हें करना पड़ता है। सबसे पहले तो जब भी वह कोई नया सेंटर खोलती हैं तो वहां के लोगों का विश्वास जीतने में वक़्त लगता है।

इन सेंटर्स पर वे कोई लोकल डॉक्टर नहीं हायर कर सकते हैं क्योंकि ऐसे में बहुत बार वह डॉक्टर मरीजों को अपने प्राइवेट क्लिनिक पर बुलाने लगता है। इसलिए उन्होंने सभी सेंटर्स पर बाहर से डॉक्टर्स हायर किए हैं। उनके वहां रहने और खाने का इंतज़ाम भी फाउंडेशन ही करती है। ग्रामीण इलाकों में जाकर काम करने के लिए हर कोई तैयार नहीं होता।

“इन डॉक्टर्स में कुछ डॉक्टर ऐसे हैं जो रिटायर हो चुके हैं। इन डॉक्टर्स को अनुभव तो होता ही है, साथ में थोड़ी समाज सेवा करने की भावना भी ज्यादा होती है,” फाल्गुनी ने बताया।

हर चुनौती का सामना फाल्गुनी पूरे आत्म-विश्वास से करतीं हैं। वह कहतीं हैं कि वह हर किसी की समस्या हल नहीं कर सकतीं लेकिन जितनों की कर पाएंगी, उनकी ज़रूर करेंगी।

अंत में वह देश के युवाओं के लिए संदेश देतीं हैं, “आज के युवाओं को समाज सेवा से जुड़ना चाहिए और उनके लिए काफी मौके भी हैं। हफ्ते में कुछ घंटे ही सही लेकिन जहाँ भी वे कर सकते हैं, वॉलंटियरिंग करें और समाज में अपना योगदान दें। इससे उन्हें कम उम्र में ही लोगों की परेशानियों और ज़िंदगी के अलग पहलुओं के बारे में पता चलेगा और वे एक बेहतर इंसान बनेगें।”

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संपादन – अर्चना गुप्ता


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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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