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‘डेली इनकम मॉडल’: जानिए क्या है इस लखपती किसान की कमाई का राज़!

60 वर्षीय सुरेश गोयल ने 32 सालों तक ट्रांसपोर्ट का व्यापार करने के बाद साल 2013 में खेती शुरू की थी!

मैंने बचपन से एक ही बात सुनी है कि किसान को फसल की कमाई लेने के लिए महीनों इंतज़ार करना पड़ता है। कई महीनों की मेहनत के बाद उन्हें आमदनी मिलती है और इसी वजह से उनके घर के हालात कभी सुधरते नहीं है। बदलते जमाने के साथ अब यह चलन भी बदल रहा है कि किसानों को अपनी कमाई के लिए महीनों इंतज़ार करना पड़े।

हरियाणा के हिसार स्थित गाँव तलवंडी रुक्का के रहने वाले 60 वर्षीय सुरेश गोयल पिछले 7 सालों से ‘डेली इनकम मॉडल’ से खेती और बागवानी कर रहे हैं।

हैरानी की बात यह है कि सुरेश किसी किसान परिवार से नहीं हैं बल्कि उन्होंने तो 32 सालों तक भारत के बड़े शहरों जैसे मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद आदि में ट्रांसपोर्टेशन का बिज़नेस चलाया है। साल 2013 में अपने व्यवसाय को बच्चों को सौंपकर उन्होंने अपने गाँव की तरफ वापस रुख किया और यहीं के होकर रह गए।

उनके किसान बनने की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। वह बताते हैं कि उनके बचपन में गाँव में ज्यादातर चीज़ों की सुविधाएं नहीं थीं। यहाँ तक कि विभिन्न प्रकार के फल और सब्ज़ियाँ भी नहीं मिलती थी। गाँव के लोग खाने में ज्यादा से ज्यादा आलू-प्याज या फिर दाल और कढ़ी पर ही निर्भर थे। उनकी अपनी कोई ज़मीन भी नहीं थी तो वह खुद भी कुछ नहीं उगाते थे।

Suresh Goyal

“मेरे मामा जमशेदपुर में रहते थे और एक बार उनका हमारे यहाँ आना हुआ। उन्होंने माँ से पूछ लिया कि यहाँ फल-फ्रूट भी नहीं मिलते क्या? माँ ने भी उनको ताना देते हुए कहा कि, ‘मुझे कौन-सा तुम लोगों ने बागों वाले के यहाँ ब्याहा था जो फल-फ्रूट मिलेंगे’। बस उसी दिन से मेरे मन में यह बात रह गई कि मुझे अपनी माँ के लिए बाग लगाना है,” उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया।

तलवंडी रुक्का गाँव ट्रांसपोर्टेशन के काम के लिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ बहुत सारे लोग इस काम से जुड़े हुए हैं। सुरेश ने भी अपनी पढ़ाई पूरी करने बाद इसी व्यवसाय में अपनी किस्मत आजमायी और दिन-रात मेहनत की। उन्होंने मद्रास से अपना काम शुरू किया और फिर धीरे-धीरे इसे देशभर में फैलाया। अंत में जाकर वह और उनका परिवार मुंबई में रहने लगे। हालांकि, अपने गाँव में उनका आना-जाना हमेशा ही लगा रहा क्योंकि उनके माता-पिता और अन्य कुछ परिवारजन वहीं रहते थे।

साल 2012 में उन्होंने अपनी माँ के नाम पर गाँव में साढ़े सात एकड़ ज़मीन खरीदी और 2013 में व्यवसाय को अपने भाई और उनके बच्चों को सौंपकर वह गाँव आकर बस गए।

Suresh Goyal with his parents

“यहाँ आकर मैं कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों में गया, वहां पर खेती-किसानी के गुर सीखे। जैसे मुझे पता चलता कि खेती पर कोई वर्कशॉप हो रही है या फिर कोई ट्रेनिंग है, मैं वहाँ पहुँच जाता। मैंने हरियाणा और पंजाब के ही कई प्रगतिशील किसानों से मुलाक़ात की, उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। इसके बाद मैंने खुद किसानी शुरू की,” उन्होंने आगे कहा।

जैविक और प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग के दौरान उन्हें एक बात समझ में आ गई थी कि उन्हें न तो खुद केमिकल खाना है और न ही वह दूसरों को केमिकल खिलाएंगे। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी ज़मीन को 13 एकड़ तक फैला लिया और आज इस 13 एकड़ से सुरेश हर साल लगभग 20 लाख रुपये की बचत करते हैं। वह कहते हैं कि किसानी के लिए उनका सिद्धांत ‘डेली इनकम मॉडल’ यानी कि हर रोज की कमाई है।

क्या है ‘डेली इनकम मॉडल’:

सुरेश बताते हैं कि उन्होंने फलों के पेड़ लगाने से अपनी शुरुआत की और फलों के पेड़ों के बीच में उन्होंने एक उचित दूरी रखी। आज उनके बाग में अमरुद, मौसमी, निम्बू, कीनू, चीकू, आंवला, जामुन, आलूबुखारा, आडू, जामुन, अनार, बब्बूगोशा, लीची, सेब, नारंगी, एप्पल बेर जैसे फलों के 1500 पेड़ हैं।

उन्होंने अलग-अलग तरह के पेड़ लगाए ताकि उन्हें उपज लेने के लिए ज़्यादा इंतज़ार न करना पड़े। उन्हें साल के अलग-अलग मौसम में उनके अलग-अलग पेड़ों से उपज मिलती रहती है और इस तरह से उनका कोई भी मौसम बिना फलों की बिक्री के नहीं रहता।

फलों के अलावा, सब्ज़ियों से भी उन्हें बहुत फायदा मिलता है। अपनी ज़मीन के एक हिस्से में वह मौसमी सब्ज़ियाँ भी लगाते हैं, जिनमें पत्तागोभी, लौकी, आलू, गाजर, खीरा, पेठा, करककड़ी, कद्दू, तोरई, टमाटर, भिन्डी, आदि शामिल हैं।

वह बताते हैं कि 2 एकड़ की ज़मीन पर वह लगभग 10 तरह की सब्ज़ियों की खेती करते हैं। मल्टी-क्रॉपिंग का सबसे बड़ा फायदा उन्हें यह होता है कि हर दिन उनके खेत से किसी न किसी सब्ज़ी की उपज आती है और अगर किसी एक सब्ज़ी का दाम कम होता है तो दूसरी का थोड़ा बढ़ता है।

इसके अलावा, वह कभी भी अपनी सब्ज़ियों को सब्ज़ी-मंडी में नहीं बेचते हैं, बल्कि उन्होंने सीधे अपने ग्राहकों तक पहुँच बनाई है। तलवंडी रुक्का और इसके आस-पास के लगभग 5 गांवों के लोग उनके यहाँ से ही सब्ज़ी और फल लेकर जाते हैं। लोग अपने यहाँ होने वाले शादी-ब्याह में भी उनके यहाँ से सब्ज़ियाँ लेते हैं।

“शहर तक सब्ज़ी मंडी में सब्ज़ियाँ पहुंचाने पर खर्च होता है और फिर वहां पर बहुत कम कीमत में सब्ज़ियाँ खरीदी जाती हैं। वहां ग्राहकों को भले ही आलू 25 रुपये किलो दें लेकिन किसानों से उनकी उपज ज्यादा से ज्यादा 15 रुपये किलो के हिसाब से खरीदती जाती है। ऐसे में, मैंने अपने बाग में ही सब्ज़ी-मंडी शुरू कर दी। लोग मेरे यहाँ से 20 रुपये किलो में आलू लेकर जाते हैं। अन्य सब्ज़ियों का दाम भी मैं बाज़ार के रेट से थोड़ा कम ही रखता हूँ। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब मेरे यहाँ ग्राहक न आएं,” उन्होंने बताया।

इसके अलावा, उन्होंने अपने यहाँ दो कामगार रखे हुए हैं जो फल और सब्ज़ियाँ गांवों में रेहड़ी पर रखकर बेच आते हैं और दिन की कमाई शाम को सुरेश को दे देते हैं। यही है उनका ‘डेली इनकम मॉडल,’ जिसके ज़रिए वह अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।

Promotion

उनकी सब्ज़ियों और फलों की बिक्री की एक वजह यह भी है कि वह जैविक खेती करते हैं। उनकी ज़मीन पर उगने वाली हर फसल जैविक तरीकों से पनपती है और इसका स्वाद बिल्कुल ही अलग होता है।

जैविक खेती के कुछ आसान तरीके:

सुरेश शुरू से ही जैविक खेती कर रहे हैं, उन्होंने अपने खेतों में कभी-भी केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया। खाद बनाने के लिए गोबर और सूखे पत्ते आदि तो हर कोई इस्तेमाल करता है, लेकिन सुरेश अपने खेतों से निकलने वाली खरपतवार को विशेष तौर पर खाद बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने अपने खेतों में ही एक गड्ढा बनाया हुआ है जहाँ पर खेतों से निकली खरपतवार को डाला जाता है और इससे बनी खाद का इस्तेमाल वह अपने खेतों में करते हैं।

फलों और सब्ज़ियों के पेड़-पौधों से कीटों को दूर रखने के लिए वह नीम के तेल का इस्तेमाल करते हैं जो एक प्राकृतिक पेस्टीसाइड है। इसके अलावा, वह अपनी फसल के चारों ओर कुछ फूलों के पेड़ लगाते हैं ताकि सभी कीट उनकी तरफ आकर्षित हों और फलों को खराब न करें।

उन्होंने अपने पूरे बाग में लाइटिंग की हुई है और हर एक बल्ब के नीचे गड्ढा कर दिया है। इस गड्ढे में वह पानी भर देते हैं ताकि कीट लाइट की रौशनी से आकर्षित होकर यहाँ आएं और इस पानी में गिर जाएं। साथ ही, उन्होंने अपने बाग में फ्रूटफ्लाई ट्रैप भी लगाए हुए हैं। पानी के संरक्षण के लिए उन्होंने ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगाया हुआ है और बहुत बार वह अपने घर की रसोई में इस्तेमाल किये हुए पानी को यहाँ सिंचाई के लिए फिर से इस्तेमाल कर लेते हैं।

गाँव की भलाई:

सुरेश के मॉडल की सबसे अच्छी बात यह है कि उन्होंने इसके ज़रिए अपने गाँव के लोगों के लिए रोज़गार बनाया है। उनके फल और सब्ज़ियों की फेरी लगाने के लिए उन्होंने गाँव के ही दो-तीन लोगों को रखा हुआ है, जिन्हें वह अच्छी पगार देते हैं। इसके अलावा, उन्होंने अपने बाग के रख-रखाव का काम गाँव के गरीब तबके की महिलाओं को दिया है।

उनके बाग में 22 महिलाएं काम करतीं हैं। सुरेश कहते हैं कि अगर उनकी वजह से किसी के घर का चूल्हा जल रहा है तो क्या बुरा है। इसलिए वह कभी भी खरपतवार हटाने के लिए किसी केमिकल या फिर तकनीक का इस्तेमाल नहीं करते। वह यह काम अपने गाँव की महिलाओं को ही दे देते हैं ताकि उन्हें मजदूरी के लिए कहीं बाहर न भटकना पड़े।

वह आगे बताते हैं कि उन्हें बच्चों से काफी प्रेम और लगाव है और इसलिए शाम को उनके बाग में आपको हमेशा बच्चे खेलते हुए दिखेंगे। ये बच्चे उनके बाग में पक कर नीचे गिरे हुए फलों को चुनते हैं और फिर इन्हें अच्छे से धोते हैं। बच्चों की यह टोली सुरेश के साथ बाग में ही बैठकर यह फल बड़े मजे से खाते हैं।

पिछले 7 सालों में सुरेश गोयल ने जैविक खेती, बागवानी के साथ-साथ और भी अन्य तकनीकों में अपना हाथ आजमाया है जैसे कि प्रोसेसिंग। हालांकि, फ़िलहाल वह आंवले की प्रोसेसिंग ही कर रहे हैं लेकिन इसमें उन्हें अच्छा मुनाफा मिल रहा है। वह बताते हैं कि उन्होंने अपनी आंवले की फसल को एक बार मंडी में भेजा लेकिन वहां उन्हें 12 रुपये किलो का दाम मिल रहा था।

“मैंने सारे आंवले वापस मंगवा लिए और उसकी प्रोसेसिंग करने की ठानी। सबसे पहले उसका पाउडर बनाया और फिर उसमें कई अलग प्राकृतिक चीजें मिलाकर एक खास नमक तैयार किया। आज मेरा यह नमक मेरे अपने गाँव के अलावा आस-पास के गांवों में भी जाता है। इसके अलावा, बाहर से आने वाले लोग भी इसे खरीदकर ले जाते हैं,” उन्होंने बताया।

सुरेश गोयल आज इस पूरे इलाके के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। न सिर्फ दूसरे राज्यों से बल्कि दूसरे देशों से भी लोग उनका बाग देखने और उनका मॉडल समझने के लिए आते हैं। सुरेश कहते हैं कि हमारे देश में जब खेतों में रोज़गार पैदा होना शुरू हो जाएगा, तब बेरोजगारी खत्म हो जाएगी और पलायन भी रुक जाएगा।

इसके लिए सिर्फ सरकार को नहीं बल्कि किसानों को सबसे पहले आगे बढ़कर मेहनत करनी होगी। सफल वही होता है जो अपने काम से प्यार करे, इसलिए किसानों को भी खेती को नौकरी की तरह लेना चाहिए। दिन में कम से कम 8 घंटे अपने खेतों को दें, जितनी बार किसान अपने खेतों पर जाएगा और अपनी फसल को देखेगा, उतना ही वह अपने खेत को जानेगा और समझेगा।

अंत में वह सिर्फ यही कहते हैं, “ज्यादातर किसान सोचते हैं कि आज पैसे बचाने हैं, मैं रोज ये सोचता हूँ कि आज पैसे कमाने हैं। जब तक खेत से रोजाना आमदनी का तरीका नहीं खोजा जाएगा, दुनिया की कोई स्कीम, कोई सरकार किसान का भला नहीं कर सकती है।”

अगर आपको सुरेश गोयल के मॉडल से प्रेरणा मिली है और आप उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो 9813079906 पर संपर्क करें!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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