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इंग्लैंड में अपनी ऐशो-आराम की ज़िन्दगी छोड़, भारत के गाँवों को बदल रहे है ये युवा दंपत्ति!

पंद्रह साल पहले की बात है। पुणे के रहनेवाले आशीष कलावार ने हाल ही में अपनी इंजीनियरिंग की पढाई पुरी की थी और एक बहुत अच्छी कंपनी में अपनी पहली नौकरी से बहुत खुश भी थे। कंपनी ने उनकी पहली पोस्टिंग बिहार के बोकारो शहर में की थी।

आशीष छुट्टियों में घर वापस आने के लिए बोकारो स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे। इतने में 10-12 साल का एक लड़का उनके करीब आया और उनसे उनके जूते पोलिश करने का आग्रह करने लगा। ये देखकर आशीष को झटका सा लगा। उन्होंने उस लड़के से कहा कि ये उम्र उसके स्कूल जाने की है न कि काम करने की। इस पर लड़का बोला कि वो स्कूल जाने के लिए ही काम करता है और इन पैसो से अपनी स्कूल की फीस भरता है।

इस बात से खुश होकर आशीष ने उसे अपने जूते पोलिश करने दिए और साथ ही उसे दुगने पैसे भी दिए। दस की जगह बीस रूपये का नोट देखकर मानो लड़के की आँखों में चमक सी आ गयी थी। वो ख़ुशी से उछल पडा।

“मेरे लिए ये सिर्फ दस रूपये ही थे पर उसे पाकर उस लड़के की आँखों में जो ख़ुशी मैंने देखी, वो आज तक मेरे लिए एक यादगार क्षण है। और उसकी ख़ुशी से जो संतुष्टि मुझे मिली वो मुझे पहले कभी नहीं मिली थी,” आशीष भावुक होकर बताते है।

इसके बाद आशीष फिर से एक बार अपनी नौकरी और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में व्यस्त हो गए पर कहीं न कहीं उनके मन में उस लड़के और उसके जैसे और बच्चो के लिए कुछ करने की चाह पनपती रही।

आशीष अपने जीवन में तरक्की पे तरक्की करते जा रहे थे और अब समय था घर बसाने का। ऐसे में वे रुता से मिले, जिनके विचार आशीष से काफी मिलते जुलते थे। रुता भी एक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजिनियर थी और अपने कार्यक्षेत्र में काफी तरक्की कर चुकी थी।

2006 में आशीष और रुता एक दुसरे के साथ शादी के बंधन में बंध गए और आशीष को अपना जीवन परिपूर्ण लगने लगा।

हर युवा की तरह इन दोनों का भी सपना था कि वे जीवन में और तरक्की करे। और इसी सपने को पूरा करने के लिए इस जोड़े ने 2009 में इंग्लैंड का रुख किया।

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दोनों अपने काम में काफी होनहार थे और इसलिए जल्द ही आशीष और रुता को वहां नौकरी मिल गयी।

समय बीता और अब इस दंपत्ति के पास सब कुछ था। इंग्लैंड जैसे देश में एक आलिशान घर, एक बढ़िया गाडी और जीवन के वो सारे साधन जिसे आम इंसान खुशियों का मापदंड समझता है।  पर कहीं कुछ अभी भी बाकी था।

आशीष और रुता ने इंग्लैंड की नागरिकता अपनाने के लिए भी अर्जी दे दी थी पर अब उनका मन कुछ बेचैन होने लगा था।

“हमारे पास सब कुछ था… वो सब कुछ जिसके बलबूते पर हम अपने आप को कामयाब कह सकते थे। हम खुश भी थे पर कहीं न कहीं हम सुकून ढूंड रहे थे,” – आशीष

सुकून की तलाश में आशीष और रुता साउथ वेल्स में स्थित स्कन्दा वेल मंदिर में जाने लगे। ये दोनों वहां खूब सारा समय बिताते, ध्यान लगाते और वहां आये लोगो की सेवा भी करते।  इन सब में उन्हें एक अजीब सी संतुष्टि मिलती।

“इस मंदिर में सेवा करते हुए मुझे अक्सर बोकारो के उस छोटे से लड़के की याद आती जिसने मेरे जूते साफ़ किये थे।  मैं अब अपने देश के लिए भी कुछ करना चाहता था,” आशीष याद करते हुए कहते है।

सांसारिक भौतिकता और आध्यात्मिक सुख की इस उधेड़ बून के बीच, 2012 में  आशीष और रुता का कुछ समय के लिए भारत आना हुआ।  यहाँ आकर उन्हें पता चला कि उन्ही के एक रिश्तेदार, अमोल सैनवार ने एक संस्था की शुरुआत की है जो एक गाँव को गोद लेकर उसे सुधारना चाहते है। ये गाँव था, महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में बसा लोनवड़ी गाँव!

आशीष और रुता को शायद इसी क्षण का इंतज़ार था। अमोल से सारी जानकारी लेने के बाद ये दोनों भी संस्था के और लोगो के साथ लोनवड़ी पहुँच गए।

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लोनवड़ी पहाड़ी पर बसा एक छोटा सा गाँव था जिसमें न बिजली थी, न पानी, न सड़के थी, न अच्छा स्कूल। तय किया गया कि सबसे पहले यहाँ पानी की समस्या को ख़त्म करने के लिए सोलार वाटर सिस्टम लगाया जायेगा। और इस वाटर सिस्टम को लगवाने की पूरी ज़िम्मेदारी आशीष ने अपने कंधे पर ले ली।

“मैंने और मेरे इंग्लैंड में बसे एक दोस्त, उन्मेष कुलकर्णी ने मिलकर इस वाटर सिस्टम को लगवाने के लिए करीब 90 फीसदी पैसो का इंतज़ाम कर दिया। पर इसके बाद हमारी छुट्टियाँ ख़त्म हो गयी और हमे इंग्लैंड वापस जाना पड़ा।“ – आशीष

अपने देश से दूर जाने के बाद भी रुता और आशीष का मन लोनवड़ी में ही बस गया था। वे दोनों समय समय पर वहां की खबर लेने लगे।

“मुझे पता चला कि पानी की समस्या दूर हो जाने की वजह से अब गाँववाले काफी खुश है। बच्चे अब स्कूल जाने लगे थे क्यूंकि अब उन्हें सुबह सुबह पानी लेने पहाड़ के निचे तक नहीं जाना पड़ता था। इस बात ने मुझे अपने देश के लिए कुछ करने की ओर और प्रेरित किया।“ – आशीष

आशीष और रुता ने गौर किया था कि रोज़मर्रा की इन समस्याओं के अलावा लोनवड़ी के लोग एक और समस्या से जूझ रहे है और वो थी नशे की समस्या। गाँव के ज़्यादातर मर्द खेती किसानी करते थे और तनाव और थकान की वजह से शाम को अक्सर तम्बाखू या दारु का नशा करते दिखाई देते थे। आशीष और रुता का मानना था कि कोई भी गाँव तब तक तरक्की नहीं कर सकता जब तक उसके लोग नशामुक्त न हो। और अब भारत के हर गाँव को नशामुक्त करना ही उनका उद्देश्य बन गया था।

जनवरी 2014 में एक ख़ूबसूरत भविष्य और एक बेहतरीन ज़िन्दगी को इंग्लैंड में ही छोड़ कर आशीष और रुता हमेशा-हमेशा के लिए अपने देश वापस लौट आये।

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भारत वापस आकर सबसे पहले इस दंपत्ति ने लोनवड़ी का रुख किया। वहां के लोगो को ध्यान और साधना के फायदे बताये और उनसे रोज सुबह थोडा वक़्त ध्यान और कसरत में लगाने को कहा।

रूता कहती है,“मैंने उनसे नशा छोड़ने को नहीं कहा। बस वैसे ही ध्यान शुरू करने को कहा जैसे वो है। पर जब आप ध्यान या साधना करते है तो आप में एक अजीब सी सकारात्मकता आती है जो आपको हर नकारात्मक वस्तु से दूर रहने को मजबूर कर देती है।”

ये रुता और आशीष की लगन ही थी कि केवल 6 महीनो में गाँव के 80% लोगो ने नशा करना बंद कर दिया।

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इसके अलावा इनकी संस्था, शिवप्रभा चैरिटेबल ट्रस्ट ने लोनवड़ी में काम जारी रखा और आज इस गाँव में बिजली, पानी, सड़क और यहाँ तक कि एक डिजिटल स्कूल भी है।

पर अभी भी इस गाँव में एक कमी है और वह कमी है, हर घर में शौचालय की। शिवप्रभा चैरिटेबल ट्रस्ट ने इस गाँव के स्कूल में दो तथा सभी गांववालों के इस्तेमाल के लिए गाँव में एक शौचालय बनवाया है। पर यह एक शौचालय पुरे गाँव के लिए काफी नहीं है। यदि हर घर में शौचालय बन जायेगा तो यह गाँव पूरी तरह से आदर्श ग्राम बन सकता है। और इस गाँव को आदर्श गाँव बनाने में हमे आप सब के सहयोग की ज़रूरत है।

इस विश्व शौचालय दिवस पर द बेटर इंडिया, शिवप्रभा चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिलकर लोनवड़ी के हर घर में एक शौचालय बनवाने की मुहीम चला रहा है। और इस मुहीम में आप भी हमारे साथ जुड़ सकते है। इस लिंक पर जाकर आप अपना सहयोग इस नेक कार्य में दे सकते है।

 

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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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