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IIT इंदौर के दो छात्रों का आइडिया, ‘ऑन द स्पॉट’ कचरा निपटाने की अनोखी तकनीक!

‘स्वाहा’ की इस ‘मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ सुविधा से शहर में जो छोटे होटल या रेस्टोरेंट हैं उन सबका कचरा उसी स्थान पर ही प्रोसेस हो सकता है।

29 वर्षीय रोहित अग्रवाल और 27 वर्षीय ज्वलंत शाह ने IIT इंदौर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएशन किया।फिर दोनों ने अपने मेंटर समीर शर्मा के साथ मिलकर एक स्टार्टअप शुरू किया। इस स्टार्ट का नाम उन्होंने रखा ‛स्वाहा’ (स्वाहा रिसोर्स मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेड)!

ज्वलंत शाह और रोहित अग्रवाल

‛द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए इस स्टार्टअप के मेंटर समीर शर्मा कहते हैं, “कचरा और कचरा प्रबंधन एक दूसरे के साथ इस तरह जुड़े हैं, जैसे इंसान के साथ भोजन। जहां इंसान हैं, वहां कचरा होगा ही लेकिन अब जहां कचरा होगा, वहां पर इन बच्चों की कंपनी ‛स्वाहा’ होगी!”

29 जून, 2016 को इस स्टार्टअप की नींव रखी गई थी। यह वो वक्त था, जब इंदौर शहर में कचरा प्रबंधन को लेकर ठोस नीति बन रही थी। रोहित और ज्वलंत ने सोचा कि वे एक ऐसा प्लांट लगाएं, जहां शहर से गीले कचरे को लाकर खाद बनाया जा सकें। जब प्लान लेकर वे इंदौर नगर निगम ऑफिसर के पास गए तो उन्होंने सुझाव देते हुए कहा, ‘आप लोग कचरे का ट्रांसपोर्टेशन ही क्यों करना चाहते हैं? आप IIT से पढ़े हैं, कुछ नया और बड़ा सोचें! कचरे का उसी स्थान पर कैसे निपटान किया जाए? विकेन्द्रीकृत कचरा प्रबंधन कैसे किया जाए? इस बारे में सोचें।’

इन दोस्तों ने कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का विचार त्याग दिया और एक ऐसी मशीन बनाने के बारे में सोचा जिससे कचरा उसी जगह पर प्रोसेस हो जाए जहां वो जमा होता है!

मेंटर समीर शर्मा(बायें)

उन्होंने ‛मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ बनाई और तत्कालीन निगम कमिश्नर मनीष सिंह को दिखाया, जिसे देख वह बड़े प्रसन्न हुए। इस वैन का सबसे पहला ट्रायल इंदौर की ‛56 दुकान’ जैसे इलाके में किया गया।

क्या खास है इस वैन में लगी मशीनरी में?
यह ‛मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ कचरे को रॉ कंपोस्ट में बदलती है। पहले जहां ट्रांसपोर्टेशन के लिए 4 गाड़ियां लगती थीं, अब यह काम इसी एक गाड़ी से हो जाता है। ‛स्वाहा’ द्वारा बनाई गई यह गाड़ी पूरी तरह से बन्द है। इससे किसी तरह का कोई लीकेज नहीं होता और कचरे के ट्रांसपोर्टेशन में भी किसी तरह की कोई बदबू नहीं आती। मान लीजिए आप मेन रोड से गुज़र रहे हैं या वहीं खड़े हैं, आपके बगल से यह गाड़ी गुज़र भी गई तो भी आपको पता नहीं चलेगा कि आपके आसपास से कचरे की कोई गाड़ी निकली है।

वेस्ट (कचरा) से कंपोस्ट बनाने में 10 से 12 दिन का समय लगता है। कंपोस्ट का पहला प्रोसेस क्लाइंट के ही लोकेशन पर किया जाता है। ‛स्वाहा’ का खुद का एक कंपोस्टिंग सेंटर भी है, जहां यह प्रोसेस किया जाता है।

कचरा एक ही जगह किया जाता है निस्तारित…
शहर के छोटे होटल या रेस्टोरेंट जो भीड़भाड़ वाले इलाकों में हैं वहां कचरा बहुत होता है, पर इन दुकानदारों के पास जगह और टेक्नोलॉजी नहीं है उस कचरे को प्रोसेस करने की। अब एक ही गाड़ी अगर उस पूरे मार्केट को कैटर करे तो हर कोई अपना कचरा अपने स्थान पर ही प्रोसेस करवा सकता है। इसे Decentralized Waste Management कहा जाता है। ‛स्वाहा’ की यह ‛मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ इन दुकानदारों को यही सुविधा मुहैया कराती है।

वैन रोज रात को लगभग 8:30 बजे मार्केट जाती है। जैसे-जैसे दुकानें बंद होती जाती हैं, कचरे को दुकानदारों द्वारा गाड़ी के पास लाकर छोड़ दिया जाता है। उनके कचरे का वजन करते हुए उसे वहीं प्रॉसेस किया जाता है। चाहे रात के 2 ही क्यूँ न बज जाए, अंतिम दुकान के बन्द होने और कचरे के आने का इंतज़ार किया जाता है। ज्वलंत बताते हैं, “मान लीजिये एक डस्टबिन में 100 किलो कचरा आता है तो हम उसका 60% वॉल्यूम कम कर देते हैं। इसे श्रेडिंग (Shredding) कहा जाता है। यहीं पर हम इसी कचरे में बैक्टीरिया और लकड़ी का बुरादा मिला देते हैं जिसके बाद यह मिश्रण कच्ची खाद में तब्दील हो जाता है। फिर हम इसे कम्पोस्टिंग सेंटर में ले जाकर डी-कंपोस्ट करते हैं।”

आज हमारा माइंडसेट इस तरह का बना हुआ है कि हम लोग अपने कचरे का निस्तारण अपने सामने नहीं होने देना चाहते। आज ‛56 दुकान’ जैसे इलाके के 56 दुकानदार अपने लिए 56 मशीनों को लगाने से बच गए। ‛मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ हमेशा के लिए किसी एक जगह पर इंस्टॉल नहीं की गई है। यह काम होते ही चली जाती है और इस सुविधा के लिए दुकानदारों से 70 पैसे प्रति किलो कचरे से लेकर ढाई रुपए प्रतिकिलो कचरे तक चार्ज किया जाता है। छोटे दुकानदारों को 1000-1500 रुपए और बड़े दुकानदारों को 4000-4500 रुपए प्रति महीने का खर्च उठाना पड़ता है।

जीरो वेस्ट मैनेजमेंट वाले इवेंट्स की बढ़ती डिमांड
इसी ‛मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ को अब इवेंट्स में भी लगाया जाने लगा है। 2018 में इंदौर में एक बहुत बड़ा इवेंट ‛अशरा मुबारक़’ हुआ था जिसमें पूरी दुनिया से लोग आए थे। करीब डेढ़ लाख लोग सुबह, दोपहर, शाम भोजन करते थे। उनके खाने के बाद बचे वेस्ट को वहीं प्रोसेस किया गया था। 12 से 22 सितंबर के बीच कुल 250 टन वेस्ट को प्रोसेस किया गया जिसके लिए ‛गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ द्वारा ‛स्वाहा’ को वर्ल्ड रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट भी मिला।

इसी तर्ज पर ‛जतरा’ फ़ूड फेस्टिवल और गुरुनानक देवजी की 550वीं जयंती के मौके ख़ालसा कॉलेज में भी सेवाएं दी गईं। इसी तरह गोवा के ‛लोकोत्सव’ इवेंट में भी 700 फ़ूड स्टॉल के वेस्ट को भी स्वाहा द्वारा मैनेज किया गया था।

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इन इवेंट्स में पहले कचरा लैंडफिल होता था, लेकिन अब यह समस्या नहीं रही। लोगों की मानसिकता थी कि छोटे इवेंट के लिए कचरे से निपटने की कोई मशीन क्यों लगाई जाए? स्वाहा वेस्ट मैनेजमेंट की ‛मोबाइल वेस्ट प्रोसेसिंग वैन’ के आने पर सभी लोगों में जागरूकता आई है। इंदौर, उज्जैन, भोपाल और गोवा में काम करने के बाद अब ‛स्वाहा’ को पुणे से भी सर्विस देने के लिए प्रस्ताव आ चुके हैं। बंंगलुरु और गुड़गांव में भी काम किया जाना है, जिसके लिए बातचीत जारी है।

बढ़ रहा है हर साल टर्न ओवर

शुरुआत में जो पहली गाड़ी तैयार की गई थी, उसके लिए इन दोनों दोस्तों ने अपने घर से 7-7 लाख रुपये लेकर 14 लाख रुपये लगाए थे। एक वैन की मैन्युफैक्चरिंग कीमत 22-25 लाख रुपए आती है। आज ‛स्वाहा’ के पास ऐसी 4 वैन है। ‛स्वाहा’ द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए लिया गया सर्विस चार्ज ही फ़िलहाल कंपनी की कमाई का मुख्य ज़रिया है। कंपनी का पिछले 3 सालों का टर्न ओवर क्रमश: 2016-17 में 51,352 रुपए, 2017-18 में 19,45,083 रुपए, 2018-19 में 1,01,08,120 रुपए था। इस वित्तीय वर्ष में टर्न ओवर करीब 1,25,00,000 तक जाने की संभावना जताई जा रही है।

बढ़ता दायरा

इंदौर रेलवे स्टेशन पर औसतन 2 से सवा दो टन तक कचरा होता है। इसमें 250 किलो गीला और 1700-1800 किलो सूखा कचरा होता है। जीरो वेस्ट रेलवे स्टेशन का मतलब है कि जो भी कचरा निकल रहा है, उसे एक साइंटिफिक तरीके से प्रोसेस किया जाए, कहीं कोई भी लैंडफिल न हो। इसी कारण स्टेशन पर ही खाद बनाने की एक मशीन लगाई गई और यहीं सारा सूखा कचरा अलग अलग श्रेणियों में छांटा जाता है। इसमें कागज, कार्डबोर्ड, प्लास्टिक, मेटल, ग्लास, एल्युमिनियम कंटेनर और सिल्वर फॉइल होते हैं। सबसे ज्यादा चप्पलें होती हैं। इन सबको रिसायकल करने के लिए भेजा जाता है। पहले रेलवे 2000 किलो कचरे को लैंडफिल में भेजता था,  लेकिन अब सिर्फ 200 किलो ही भेजा जा रहा है।

‛स्वाहा’ आज इंदौर शहर की 15 टाउनशिप्स, 7 बड़े होटल और 4 एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में अपनी सेवाएं दे रही है। इंदौर गत 3 सालों से स्वच्छता के मामले में पूरे देश में नम्बर वन पोजीशन पर है, जिसके लिए यह टीम जनता को धन्यवाद देती है जिन्होंने अपनी आदतों में भारी बदलाव किया। इतना सब प्रोसेस होने पर ‛स्वाहा’ को अंत में रोज़ाना 800 किलो जैविक खाद मिल रही है जिसे किसानों को निःशुल्क दे दिया जाता है।

शुरुआत थी चुनौती भरी

मेंटर समीर कहते हैं, “जब कंपनी शुरुआती दौर में थी तो हमारे सामने चुनौती थी कि इस आइडिया को किस तरह शहर के साथ-साथ पूरे देश में स्वीकार्यता मिले? आइडिया को किस तरह सर्विस में बदला जाए? स्टार्टअप को किस तरह प्रॉफिटेबल स्टार्टअप में बदला जाए? कचरा प्रबंधन में समय, पैसा और ह्यूमन रिसोर्स लगते हैं और उसके लिए एक वाजिब दाम तय होना ही चाहिए ये बात लोगों को समझाना चुनौती भरा था।”

लेकिन वाज़िब दाम तय होने पर एक चीज़ यह हुई कि लोगों में जागरूकता आ गई कि यदि कचरे के भी पैसे देने पड़ेंगे तो क्यों न हम कचरा ही कम करना शुरू करें? आज यह तीनों लोग इस आइडिया को लोकल से ग्लोबल बिज़नेस बनाने के लिए काम कर रहे हैं। साथ ही यह बात भी उन्होंने सीखी की किस तरह बिज़नेस डिवेलपमेंट के साथ साथ हम अपने संबंधों को कॉरपोरेट जगत, अर्बन लोकल बॉडीज़ और नागरिकों के साथ बनाएं ताकि यह सस्टेनेबल  रह सकें।

अगर आप भी ‘स्वाहा’ की टीम से जुड़ना चाहते हैं तो  वेबसाइट, मेल और फेसबुक पर जुड़ सकते हैं। इसके अलावा आप इन नंबरों पर कॉल कर जानकारी ले सकते हैं: ज्वलंत शाह –  08871749707 , रोहित अग्रवाल 09753818887, साथ ही आप  इस पते पर भी संपर्क भी कर सकते हैं – SWAAHA RESOURCE MANAGEMENT PRIVATE LIMITED, 201, Bansi Plaza, MG Road, Indore- 452001

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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