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E-स्त्री: कभी सिर्फ ब्रेड खाकर पूरी की पढ़ाई, आज चलाती हैं अपनी कंपनी!

एक बड़ी टीवी कंपनी में उन्हें जॉब भी मिली। पर जब उन्हें उनका काम समझाया गया तो वह दंग रह गयीं। काजल को असेंबली लाइन में खड़े होने का काम दिया जा रहा था, जहाँ 12वीं पास लोग भी काम कर रहे थे।

न 1911 में मनुताई बापट नामक एक महिला ने समाज से लड़ते हुए एक सपना देखने का साहस किया। सपना था महिलाओं को शिक्षित करने का। इस सपने को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर अकोला में नींव रखी गयी ‘मनुताई कन्या शाला’ की।

2020 में इसी विद्यालय से पढ़ी हुई एक लड़की, काजल राजवैद्य ने एक और सपना देखा। सपना था इस मराठी माध्यम स्कूल की 14 लड़कियों को अंतरराष्ट्रीय रोबोटिक्स प्रतियोगिता के लिए अमेरिका ले जाने का। ये सभी लड़कियां बेहद गरीब परिवार से आती हैं। किसी के पिता किसान हैं, तो किसी की माँ खेतो में मज़दूरी करके घर चलाती है। इन सभी लड़कियों को कुछ महीने पहले तक रोबोटिक्स का मतलब भी नहीं पता था। लेकिन जब मुंबई में राष्ट्रीय स्तर पर रोबोटिक्स प्रतियोगिता हुई, तो बड़े-बड़े अंग्रेजी माध्यम स्कूल के छात्रों से इन्हें जीतता देख किसी को यकीन ही नहीं हुआ।

अब ये लड़कियां अपनी मेंटर काजल के साथ, अमेरिका में भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी में दिन रात जुटी हुई हैं। पर वहां तक पहुँचने का खर्चा ये कहाँ से जुटाएंगी ये अब भी एक बड़ा सवाल है।

काजल का मानना है कि अगर उनकी लगन सच्ची है तो कहीं न कहीं से रकम जुटाने के लिए मदद जरूर मिलगी। और जब काजल हमें अपनी कहानी सुनाती हैं, तो हमें भी यकीन हो जाता है कि उनका विश्वास झूठा नहीं है।

कौन हैं काजल राजवैद्य?

काजल राजवैद्य (बाएं) इंडिया लीडरशिप अवार्ड लेते हुए

काजल प्रकाश राजवैद्य KITS कंपनी की फाउंडर और CEO हैं। 2018 में उन्होंने IETE द्वारा दिया जाने वाला बेस्ट एंटरप्रेन्योर अवार्ड जीता था। USA का टाइम्स रिसर्च अवार्ड और स्टार्टअप इंडिया द्वारा दिया जाने वाला एग्रीकल्चर इनोवेशन अवार्ड भी उनके नाम है। काजल की कंपनी KITS बच्चों को टेक्निकल व प्रैक्टिकल ज्ञान देती है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक सामान का सर्विस देना भी इस कंपनी का एक पार्ट है। आज उनकी कंपनी के क्लाइंट्स यमन, सिंगापुर और अमेरिका जैसे देशों में भी हैं। इतनी सफल उद्यमी आखिर एक मराठी स्कूल की छात्राओं में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही है? यह जानने के लिए हमें काजल के बचपन की कहानी जाननी होगी।

तो चलें, काजल के बचपन में?

काजल – अपने स्कूल के दिनों में

अकोला शहर में जन्मी काजल के पिता एक पानठेला चलाते थे। आमदनी ज़्यादा होती नहीं थी इसलिए उन्होंने जल्द ही एक निजी बैंक के रिकरिंग एजेंट (जो घर-घर जाकर ग्राहकों से पैसे लेते हैं और बैंक में जमा कराते हैं) की नौकरी कर ली। काजल की एक बड़ी बहन थी, एक छोटा भाई था और माँ घर संभालती थीं। ऐसे में अकेले की कमाई से घर चलाना मुश्किल तो था, पर काजल के पिता बच्चों को खूब पढ़ाना चाहते थे।
काजल भी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। चौथी तक जिला परिषद् के स्कूल में पढ़ने के बाद वह पास ही के एक अच्छे स्कूल में पढ़ना चाहती थीं, पर घर की परिस्थिति के कारण उनका दाखिला घर से 4 किमी दूर, ‘मनुताई कन्या शाला’ में करा दिया गया। केवल लड़कियों के लिया बना यह स्कूल एक निजी संस्था द्वारा चलाया जाता है और यहाँ छात्राओं से कोई फीस नहीं ली जाती।

“ये स्कूल मेरे घर से 4 किमी दूर था। मैं रोज़ वहां तक पैदल जाती थी,” काजल अपने बचपन के बारे में बताते हुए कहती हैं।

Manutai Kanya School, Akola (Picture credit – Ashish Gode)

ठीक इसी समय काजल ने दूरदर्शन पर रोबोट से जुड़ा एक शो देखा, जिसके बाद उनका एक ही सपना था कि वह भी एक दिन रोबोट बनाएंगी।

“रोबोट बनाने का भूत मुझ पर बचपन से ऐसा सवार था, कि जब मैं पॉलिटेक्निक में एडमिशन लेने गयी तो मैंने उनसे कहा कि मुझे वो वाली ब्रांच लेनी है, जिसमें रोबोट बनाना सिखाते है। और इस तरह मुझे इलेक्ट्रॉनिक्स में एडमिशन दे दी गयी,” काजल ने हँसते हुए बताया।

कई दिनों तक ब्रेड खाकर किया गुज़ारा

काजल अपने पिता के साथ

काजल पॉलिटेक्निक के आखिरी साल में थीं, जब वह बैंक बंद हो गया, जिसमें उनके पिता नौकरी करते थे। घर की हालत और भी खराब हो गयी। किसी तरह काजल की फीस के पैसे जुट पाते थे। ऐसे में काजल ने पैसे बचाने के लिए अपनी मेस बंद करवा दी। वह कई-कई दिनों तक केवल ब्रेड खाकर रहने लगीं। इस मुश्किल की घड़ी में काजल ने इंजीनियरिंग करने का इरादा भी छोड़ दिया। उन्होंने तय कर लिया कि पॉलिटेक्निक की डिग्री लेते ही वह नौकरी कर लेंगी और अपने घरवालों की आर्थिक मदद करेंगी।

“….पर मेरे बाबा ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया। उन्होंने कभी मुझे यह नहीं जताया कि वह कितनी तकलीफ में हैं। उन्होंने मुझसे कहा कि मुझमें काबिलियत है एक इंजीनियर बनने की और मुझे बिना कुछ सोचे बस आगे पढ़ना चाहिए,” अपनी कामयाबी का सारा श्रेय अपने परिवार को देते हुए काजल बताती हैं।

पहले जॉब ऑफर ने खोल दी आँखें

कुछ नया सीखने की लगन

काजल के पिता ने लोन लेकर उनका दाखिला इंजीनियरिंग कॉलेज में करवा दिया। काजल ने भी कड़ी मेहनत की और हर साल अच्छे नंबरों से पास होती रहीं। फिर जब कैंपस सिलेक्शन की बारी आयी तो उन्हें पूरी उम्मीद थी कि अब उन्हें एक अच्छी जॉब मिल जाएगी और उनके संघर्षों के दिन जल्द ही ख़त्म हो जायेंगे।

एक बड़ी टीवी कंपनी में उन्हें जॉब भी मिली। पर जब उन्हें उनका काम समझाया गया तो वह दंग रह गयीं। काजल को असेंबली लाइन में खड़े होने का काम दिया जा रहा था, जहाँ 12वीं पास लोग भी काम कर रहे थे। जब काजल ने पूछा कि उनके पास तो इंजीनियरिंग की डिग्री है तो उन्हें यहाँ क्यों खड़ा किया जा रहा है? तब उनके बॉस ने उनसे कहा कि बिना प्रैक्टिकल नॉलेज के ये डिग्री बेकार है। उन्होंने काजल से टीवी के पार्ट्स के बारे में भी पूछा, जिसका जवाब वह नहीं दे सकीं। बस! यही वह क्षण था जब उनकी समझ में आया कि जो कुछ भी किताबी ज्ञान वह पढ़कर आयी हैं, वह कितना बेमानी है।

“मैंने 3 लाख का लोन लिया था और मुझे 5 हज़ार की नौकरी दी जा रही थी। मैंने फैसला किया कि अब मैं तभी नौकरी के लिए अप्लाई करुँगी जब मेरे पास प्रैक्टिकल का भी ज्ञान होगा। आज मैं खुश हूँ कि उस वक़्त मैंने वो 5 हज़ार वाली नौकरी को न स्वीकार के अपने ज्ञान को बढ़ाने का फैसला किया था,” काजल बताती हैं।

एक बार नहीं, कई बार हारने के बाद मिली जीत

इस घटना के बाद काजल कुछ दिनों के लिए तो कुछ भी नहीं सोच पा रही थीं। पर फिर उनके दिमाग में आया कि उनकी तरह ऐसे लाखों-करोड़ों बच्चे इस देश में हैं, जो सोचते हैं कि डिग्री मिल जाने से नौकरी मिल जाती है, जिनके पास कोई प्रैक्टिकल नॉलेज नहीं है। इसी सोच पर काम करते हुए काजल ने सबसे पहले बेसिक कॉम्पोनेन्ट पढ़ना शुरू किया और इंटरनेट के ज़रिए सारा सिस्टम खुद बनाना सीखा।

“उस वक़्त मेरे पास न लैपटॉप था न ही महंगा फोन। मैं इंटरनेट कैफ़े में जा-जाकर सीखती रही और आखिर एक सिलेबस तैयार किया,” काजल ने आगे बताया।

2014 में इस सिलेबस को लेकर काजल पुणे चली गयीं और वहां हर कॉलेज में जाकर छात्रों को अपनी क्लासेस के बारे में बताने लगीं। कई दिनों की मेहनत के बाद मुश्किल से दो छात्र उनसे पढ़ने आये। पर सिलेबस में जो बेसिक एक महीने में ख़त्म हो जाना चाहिए था, वह तीन महीने तक भी ख़त्म नहीं हो पा रहा था। वजह थी कि इन छात्रों के न 12वीं के बेसिक क्लियर थे और न ही 10वीं के, जिनके आधार पर ही इंजीनियरिंग की पूरी पढ़ाई होती है। उधर छात्र भी बेसिक सीखने में इतना समय नहीं देना चाहते थे, क्यूंकि उन्हें तो मार्क्स से मतलब था।
इस तरह काजल को ये क्लासेस बंद करनी पड़ी। अब उन्होंने सोचा कि क्यों न दसवीं-बारहवीं के बच्चों को पढ़ाया जाए, पर वहां भी वही बात हो जाती। बोर्ड की परीक्षा होने की वजह से इन बच्चों का भी सारा ध्यान मार्क्स लाने में होता है, न कि प्रैक्टिकल का ज्ञान लेने में।
बहुत सोचने-समझने के बाद काजल ने तय किया कि वह पांचवीं के बच्चों को पढ़ाने से शुरुआत करेंगी।

“पांचवीं से ही साइंस की बेसिक की शुरुआत होती है। फ़ोर्स, मोशन, न्यूटन लॉ, इन सभी बेसिक चीज़ों को सिर्फ किताब में नहीं बल्कि आस-पास की चीज़ों में अप्लाई करके सीखने की ज़रूरत है, तभी जब ये बच्चे इंजीनियरिंग तक पहुंचेंगे तो रोबोटिक्स जैसे विषयों का प्रैक्टिकल सीखने के लिए पूरी तरह तैयार होंगे,” काजल कहती हैं।

महज़ 21 साल की उम्र में खोल ली अपनी कंपनी


पुणे में बिना काम के रह पाना मुश्किल था, इसलिए काजल अकोला वापस लौट आयी। यहाँ वह कभी-कभी छोटे-मोटे प्रोजेक्ट्स बनाके और कभी कोचिंग क्लासेस के पेपर चेक करके अपना खर्च चलाती थीं। बाकी जितना भी समय उनके पास बचता उसमें वह  इंटरनेट से रोबोटिक्स सीखती रहतीं। इसी तरह खुद सीख-सीखकर उन्होंने पांचवीं के बच्चों के लिए रोबोटिक्स का एक वर्कशॉप तैयार किया।

“मैंने देखा कि किसी भी रोबोटिक्स की क्लास में सिर्फ असेम्बलिंग पर ज़ोर दिया जाता है। सेंसर्स के बारे में तो पढ़ाया ही नहीं जाता। बच्चों के लिए रोबोटिक्स सीखना वैसे भी खेल जैसा होगा और अगर अभी से वे सेंसर्स के बारे में भी सीख जाए तो आगे जाकर कितना कुछ कर सकेंगे।” – काजल

अब वह हर स्कूल में जाकर अपने वर्कशॉप के बारे में बतातीं। कई दिनों तक घूमने के बाद उन्हें कहीं से वर्कशॉप करने की अनुमति तो नहीं मिली पर उनके मुताबिक इस दौरान स्कूल अधिकारियों या शिक्षकों द्वारा जो भी सवाल उनसे किये गए, उनकी वजह से उनका रिसर्च और पुख्ता हो गया।

मुश्किल यह थी कि, वह जब भी किसी स्कूल में अपने वर्कशॉप के लिए जाती तो उनसे उनकी कंपनी का नाम और बिज़नेस कार्ड के लिए पूछा जाता। ऐसे में काजल ने 2015 में महज़ 21 साल की उम्र में अपनी कंपनी Kajal innovation and technical solution-KITS की शुरुआत की।

काजल का परिवार, जिन्होंने उनके सफर में पूरा साथ दिया (बाएं से दाएं – काजल के पिता, भाई, दीदी, काजल और उनकी माँ )

इस सफर के दौरान उनसे विजय भटाड़ और अर्जुन देवराकर जैसे प्रतिभाशाली लोग भी जुड़ गए। विजय इससे पूर्व नासा में काम कर चुके थे और उन्होंने काजल की कंपनी में इलेक्ट्रॉनिक सर्विसेस देने का सेक्शन भी शुरू किया। वही अर्जुन रिसर्च और डेवलपमेंट में एक्सपर्ट थे और नई मशीनें बनाने का ज़िम्मा उन्होंने संभाल लिया। काजल ने अपना फोकस बच्चों को प्रैक्टिकल वर्कशॉप कराने पर बनाये रखा और धीरे-धीरे KITS ने दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करनी शुरू कर दी। साथ ही इस टीम ने अपने अविष्कारों के लिए कई अवार्ड भी जीते।

“इस कंपनी को यहाँ तक लाने के लिए मुझे बहुत सारे रिस्क लेने पड़े, मार्केट से बहुत सारा पैसा भी उठाना पड़ा क्यूंकि मेरे पास अपना तो कोई बैंक बैलेंस था नहीं। पर आज मुझे संतुष्टि है कि मैं यहाँ तक पहुँच पायी हूँ,” काजल कहती हैं।

ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट

अपनी कंपनी के काम से कभी मुंबई तो कभी बंगलुरु जाते-आते हुए भी काजल ने ‘मनुताई कन्या शाला’ की छात्राओं को गाइड करने का सिलसिला कभी नहीं छोड़ा।

“मैंने इन लड़कियों से कहा कि वे भी इस स्कूल की छात्राएं हैं और मैं भी, इसलिए वे मुझे ‘मैम’ नहीं ‘ताई’ (दीदी) कहा करें। बस यहीं से मैं उनकी ‘काजल ताई’ बन गयी।

एक बार जब काजल ‘मनुताई कन्या शाला’ में अपने वर्कशॉप के बारे में समझा रही थीं, तब उन्हें यहाँ की प्रिंसिपल ने समता फाउंडेशन के फाउंडर पुरुषोत्तम अग्रवाल के बारे में बताया। अग्रवाल ने अपनी पत्नी की याद में इस स्कूल में कंप्यूटर लैब बनवाया था। वह जब काजल से मिले तो उन्होंने काजल को एक प्रस्ताव दिया कि वह मुंबई आकर उनके पोते को VEX IQ रोबोटिक्स प्रतियोगिता के लिए तैयार करे।

“मैंने ज़िन्दगी में एक बात सीखी है कि कभी किसी चुनौती के लिए ना नहीं करनी चाहिए, यहाँ भी मैंने यह चुनौती स्वीकार कर ली। मुझे उस वक़्त पैसों की भी सख्त ज़रूरत थी इसलिए यह मेरे लिए एक सुनहरे मौके जैसा था,” काजल बताती हैं।

मुंबई पहुंचकर कुछ ही महीनों में उन्होंने दो टीम को इस प्रतियोगिता में जाने के लिए तैयार कर लिया और इनमें से एक टीम ने जीत हासिल की। इसके बाद तो जैसे काजल के पास ऑफर्स की बाढ़ आ गयी।
काजल चाहती तो मुंबई में ही रहकर अपने करियर को आगे बढ़ा सकती थीं लेकिन पिछले कुछ महीनों में उन्होंने देखा था कि मुंबई के सबसे शानदार इलाके, जुहू में रहने वाले ये बच्चे कितने खुशकिस्मत थे। वे अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ सकते थे, फर्राटेदार अंग्रेजी में बात कर सकते थे और उनके माता-पिता उन्हें कामयाब बनाने के लिए लाखों रूपये खर्च करके कोई भी कोर्स करा सकते थे।

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“…पर जहाँ से मैं आई थी? जहाँ से मैं आई थी उस ‘मनुताई कन्या शाला’ की लड़कियों के लिए आज भी स्कूल तक पहुंचना भी एक लड़ाई है। उनके माता-पिता के पास दो वक़्त की रोटी के बारे में सोचने से फुर्सत नहीं है, तो वे अपने बच्चे के भविष्य के बारे में कैसे सोच पाएंगे? इसलिए मैंने तय किया कि मेरे इस वर्कशॉप की ज़रूरत वहीं सबसे ज़्यादा है और यह मेरी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ,” काजल बताती हैं।

एक स्थानीय प्रतियोगिता की हार से पकड़ी विश्वविजेता बनने की ज़िद

साल 2017 में काजल ने अकोला में अपना एक ऑफिस खोल लिया। अब वह नियमित तौर पर अपने स्कूल में जाती रहती और वहां की गतिविधियों में भी शामिल होती थीं।
इसी तरह एक बार स्कूल की लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए काजल ने उन्हें एक नाटक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए तैयार किया था। पर शहर के अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के बच्चों के आगे इन मराठी भाषी लड़कियों को बिलकुल अहमियत नहीं दी गयी।
इस घटना के बाद काजल ने ठान ली कि वह अब इन लड़कियों को किसी स्थानीय प्रतियोगिता के लिए नहीं बल्कि विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के लिए तैयार करेंगी।
यह प्रतियोगिता और कोई नहीं बल्कि अमेरिका की प्रख्यात कंपनी ‘लेगो’ द्वारा आयोजित की जानेवाली रोबोटिक्स प्रतियोगिता First Lego League थी। भारत की तरफ से टीम भेजने के लिए इसकी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता मुंबई में 18 जनवरी 2020 को होने वाली थी और काजल ने 22 सितम्बर 2019 से इन लड़कियों को इसके लिए तैयार करना शुरू किया।

लड़कियों का चयन भी नहीं था आसान


“जब मैंने स्कूल में बताया कि मैं इन लड़कियों को इस कॉम्पीटीशन के लिए लेकर जाना चाहती हूँ, तो हर कोई हैरान था। मुझ पर लोग हँसते, कि जिन लड़कियों को बात तक करना नहीं आता, उन्हें मैं इतनी जल्दी तैयार कैसे करुँगी। इसके अलावा सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इन बच्चियों के माता-पिता एक लाख तो क्या एक हज़ार रूपये भी खर्च करने में असमर्थ थे,” काजल बताती हैं।

काजल ने इनका खर्चा उठाने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह अपने ऊपर ले ली। फिर ऐसी 50 लड़कियों का चयन हुआ जो इस प्रतियोगिता में जाना चाहती थीं। इन 50 लड़कियों को काजल ने एक छोटी सी समस्या का हल ढूंढने को कहा। समस्या थी – रास्तों पर होनेवाले गड्ढों को तुरंत भरना। 50 में से केवल 20 ही इसका हल ढूंढकर लायी थीं।
अब काजल ने इन बीस के अभिभावकों को बुलाया और उन्हें समझाया कि आनेवाले 3.5 महीने इन लड़कियों के लिए कितने कठिन हो सकते हैं। हो सकता है कि उन्हें रात-रात भर जागकर काम करना पड़े, हो सकता है कि वे रात को कई बार देर से घर लौटे, ये भी हो सकता है कि इन सब में उन्हें हज़ार रुपए तक का खर्च भी आये। इन बातों को सुनकर 6 लड़कियों के माता-पिता ने हाथ खड़े कर दिए। अब काजल के पास केवल 14 लड़कियां बचीं। ये सभी 14 बच्चियां इस प्रतियोगिता को जीतने के लिए अपनी जी-जान लगा देना चाहती थीं।

“प्रतियोगिता में सिर्फ 10 ही लड़कियां जा सकती थीं। पर इन 14 में से किसी को भी निकालना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। आम तौर पर हम एक या दो लड़कियों को बैकअप के तौर पर रखते हैं। मैंने इनसे साफ़-साफ़ कह भी दिया था कि इनमें से सिर्फ 10 ही असली प्रतियोगिता में हिस्सा ले पाएंगी। पर फिर भी इन सभी का जज़्बा ऐसा था कि इस शर्त के बावजूद ये मेरे साथ ट्रेनिंग के लिए तैयार हो गयीं। ” – काजल

काजल ने अपनी इन 14 लड़कियों की रोबोटिक्स टीम का नाम रखा ‘मनुताई किट्स एंजिल्स’!

बुफे में खाना खाने से लेकर गेट खुलने की तकनीक तक, हर चीज़ की हुई ट्रेनिंग

इसके बाद शुरू हुआ एक कड़ा संघर्ष। सिर्फ काजल ही नहीं बल्कि उनकी कंपनी की एक पूरी टीम अकोला में ही रहकर इन लड़कियों को ट्रेन करने लगी। जहाँ कंपनी के वाइज प्रेजिडेंट विजय भटाड़ ने इन बच्चियों को रोबोटिक्स के बेसिक्स समझाने के लिए स्कूल के गेट की तकनीक सिखाने से शुरुआत की, वही काजल इन लड़कियों को मानसिक तौर पर भी इस कॉम्पटीशन में भाग लेने के लिए तैयार कर रही थीं।

“हमने इन्हें अंग्रेजी टॉयलेट इस्तेमाल करने से लेकर बुफे में खाना खाने तक की ट्रेनिंग दी, ताकि कहीं भी जाकर ये लड़कियां अपने आप को किसी से कम न समझे। इन्होंने एक-एक घंटा बस इमेजिनरी बुफे में खड़े होकर खाना खाने की प्रैक्टिस भी की है,” काजल उन दिनों को याद करके मुस्कुराते हुए बताती हैं।

काजल ने इन लड़कियों को इस बात के लिए भी पहले से ही आगाह किया था कि मुंबई में जो बच्चे इनके साथ मुकाबला करने आएंगे, हो सकता है कि वो इनसे बहुत बेहतर अंग्रेजी बोलें, उनके कपड़े इनसे बहुत ज़्यादा महंगे हो और उनके माता-पिता इनके माता-पिता से बिलकुल अलग दिखते हों।

“लड़कियों ने कभी गाँव से बाहर कदम भी नहीं रखा था। उन्होंने अपनी माँ को हमेशा घूँघट में देखा था। मैं नहीं चाहती थी, कि मुंबई की मॉडर्न दुनिया को देखकर ये देखती ही रह जाएँ और अपने असली लक्ष्य से भटक जाएँ। इसलिए मैंने उन्हें इन सबके लिए तैयार करना भी ज़रूरी समझा।”

17 दिसंबर 2019 – प्रतियोगिता से केवल एक महीना पहले


लड़कियों को पूरी तरह ट्रेन करने के लिए अभी काफी कसर बाकी थी। काजल उस दिन इन्हें पढ़ाने के बाद अपनी स्कूटी से घर की तरफ निकली ही थी कि अचानक बैलेंस खो जाने से उनकी स्कूटी उनके पैर पर गिर गयी। डॉक्टर के मुताबिक उनका पैर फ्रैक्चर हो चुका था और उन्हें करीब दो महीने तक इस पैर को प्लास्टर चढ़ाए रखना था।
टीम में हाहाकार मच गया। “काजल ताई (काजल दीदी) का एक्सीडेंट हो गया है, वो चल नहीं सकती। अब क्या होगा?”
पर अगले ही दिन काजल व्हीलचेयर पर बैठकर ‘मनुताई कन्या शाला’ में इन लड़कियों के बीच हाज़िर थीं। अगले एक महीने तक काजल ने इसी तरह व्हीलचेयर पर बैठकर इन लड़कियों का प्रोजेक्ट पूरा किया।

“मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती जब दवाईयों के असर से मुझे उल्टी आ रही थी। मैं उठकर जा नहीं सकती थी और मैंने वहीं अपनी व्हीलचेयर पर उल्टी कर दी। इन 14 लड़कियों ने किसी से कोई मदद नहीं मांगी और खुद मुझे साफ़ किया। मैं इनका सेवाभाव देखकर रोने लगी तो इनमें से एक ने कहा, ‘दीदी ये तो उसके आगे कुछ भी नहीं है, जो आप हमारे लिए कर रही हैं, आपने हमें अपनी पहचान दी है, आपने हमें वो सपने दिए हैं, जिनके बारे में हमें पता भी नहीं था’,” ये किस्सा सुनाते हुए काजल फूटफूटकर रो देती हैं।

18 जनवरी 2020 – प्रतियोगिता का दिन – मुंबई

source –FLLIndia

काजल को कई लोगों ने मना किया कि उन्हें इस तरह व्हीलचेयर पर मुंबई नहीं जाना चाहिए। पर काजल कहाँ मानने वाली थीं? उन्होंने जो सपने इन लड़कियों को पिछले तीन महीने में दिखाए थे, अब उन्हें पूरा करने के समय वो उन्हें कैसे छोड़ देती?
पहला राउंड कोर वैल्यूज (Core Values) का था, जिसमें जजेस हर टीम से एक अलग कमरे में कुछ सवाल करने वाले थे। ‘मनुताई किट्स एंजिल्स’ से भी कई सवाल पूछे गए, जिसका उन्होंने ढृढ़ता से जवाब दिया। इसके बाद इन लड़कियों से स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के बारे में पुछा गया। जवाब में इन लड़कियों ने अपनी ताई (दीदी), मेंटर और गुरु काजल का उदाहरण दिया और बताया कि उन्होंने व्हीलचेयर पर होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और हमें यहाँ तक ले आयी, इससे बढ़कर स्पोर्ट्समैन स्पिरिट क्या हो सकती है?

दूसरा राउंड रिसर्च का था, जिसमें हर टीम को अपने-अपने शहर की किसी समस्या का समाधान करना था। इस राउंड के बाद रोबो गेम राउंड था, जहाँ सेंसर्स के पैसे न होने के कारण लड़कियों ने बहुत छोटा सा रोबोट बनाया था, लेकिन उसके फंक्शन्स ने जजेस का दिल जीत लिया। लड़कियां अपना रोबोट दिखाकर हटी ही थीं, कि उन्होंने देखा कि उनके बाद आनेवाली टीम का बड़ा सा रोबोट गिरने वाला था।

“मैंने लड़कियों से कहा भी नहीं, न ही उन्हें ये सब सिखाया गया था, पर उन्होंने तुरंत भागकर इस टीम की मदद की और उनके रोबोट को गिरने से बचा लिया। मेरे लिए ये सबसे ज़्यादा गर्व का क्षण था, “काजल इस घटना का ज़िक्र ख़ास तौर पर करती हैं।

नतीजे का समय!

सारे राउंड ख़त्म होने के बाद एक जश्न मनाया गया। बच्चों को एक दूसरे के साथ घुलने-मिलने का वक़्त भी दिया गया।
“मेरी बच्चियां सबसे अलग दिखाई पड़ रही थी। उनके कपड़े बाकी बच्चों के मुक़ाबले सस्ते थे। वे अंग्रेजी नहीं बोल सकती थीं। पर मुझे तसल्ली थी कि मैं उन्हें इन सब बातों के लिए तैयार करके लायी थी। फिर जब ये लड़कियां बाहर आयीं तो इनमें से एक ने कहा, ‘दीदी, कुछ बच्चे हमसे अंग्रेजी में सवाल कर रहे थे, जितना हो सका हमने जवाब दिया और जिनका जवाब नहीं दे सकते थे वहां मुस्कुरा दिया’,” – काजल

बच्चों के मनोरंजन के लिए एक डांस प्रोग्राम भी रखा गया था, जहाँ हर टीम को किसी गाने पर डांस करना था। हर टीम से 10 बच्चे ही आ रहे थे और फ़िल्मी गानों की धुन पर नाच रहे थे। वही, मनुताई किट्स एंजिल्स से 14 लड़कियां आयीं और ‘लेगो’ की थीम पर नाचने लगीं।
लोग हैरान थे कि ये बाकी की चार लड़कियां कौन हैं, जो प्रतियोगिता में न होने के बावजूद इतने जोश से नाच रही हैं।
जब सबको पता चला कि इन चार लड़कियों को भाग लेने का मौका नहीं मिलने के बावजूद ये सिर्फ बाकी 10 का साथ देने के लिए हमेशा उनके साथ होती हैं, तो सबकी नज़रों में उनकी इज़्ज़त और बढ़ गयी।

अब आखिर रिजल्ट की बारी थी। सबसे पहले टीम-वर्क के लिए एक विशेष पुरस्कार दिया गया, जिसमें कोर वैल्यूज में सबसे अधिक नंबर पाने की वजह से ‘मनुताई किट्स एंजिल्स’ को यह पुरस्कार मिला। इसके बाद बेस्ट मेंटर का अवार्ड भी काजल को मिला। पूरी टीम की खुशियों का ठिकाना नहीं था। लड़कियां इसी में संतुष्ट थी कि उनकी काजल दीदी को अवार्ड मिल गया था, जो उनके लिए किसी भी जीत से बढ़कर था। पर अब फाइनल अवार्ड्स की बारी थी।
फर्स्ट आनेवाले को अमेरिका, दूसरे को जापान, तीसरे को ग्रीस और बाकियों को सिंगापुर जाने का मौका मिलने वाला था।


“लड़कियां सोच रही थी कि इन सब बड़े-बड़े रोबोट के बीच उन्हें ये अवार्ड कहाँ मिलना था। पर मैं अंदर से श्योर थी कि अमेरिका, जापान न सही, मैं इन लड़कियों को सिंगापुर तो ले ही जाऊंगी,” काजल कहती हैं।

…..और जब पहले विजेता की घोषणा हुई तो सबके पैरो तले मानों ज़मीन ही खिसक गयी हो। एक मराठी स्कूल से आनेवाली, अनपढ़ माता-पिता की साधनहीन लड़कियां राष्ट्रीय विजेता बन गयी थीं। काजल की मनुताई किट्स एंजिल्स ने नेशनल रोबोटिक प्रतियोगिता जीत ली थी।

“लड़कियां स्टेज पर फूटफूटकर रोने लगी, जब जजेस ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है कि उन्हें इन लड़कियों को यह अवार्ड देने का अवसर मिला। लड़कियां मुझसे लिपटकर कहने लगी…..”दीदी हमने आपकी लाज रख ली न?”

अपने इस सफर की एक-एक बारीकियां बताते हुए काजल कई बार रोईं पर अपनी जीत की इस घटना का ज़िक्र करने के बाद उन्होंने एक गहरी सांस ली और कहा कि अब वह किसी भी हालत में …किसी भी कीमत पर इन लड़कियों को अमेरिका ले जाएँगी और दुनिया को दिखा देंगी कि 1911 में मनुताई ने जो लड़ाई लड़ी थी वह व्यर्थ नहीं गयी।

इन लड़कियों को इस प्रतियोगिता में ले जाने के लिए अब काजल को आपके साथ की ज़रूरत है। हर एक लड़की का खर्च कुल 2 लाख रूपये तक है। यदि आप इनकी मदद करना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक करके अपना योगदान दे सकते हैं

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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