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मिट्टी से बना, लकड़ी से ढका और जूट में पैक; इन गर्मियों में खरीदें ये इको-फ्रेंडली बोतल!

IIT ग्रैजुएट संदीप के बनाए इस बोतल से 35 कुम्हारों को रोज़गार भी मिल रहा है!

क-दो दिन पहले मैं अपनी रूममेट से कह रही थी कि हमें गर्मियों के लिए एक मटका ले लेना चाहिए, क्योंकि फ्रिज का ठंडा पानी बहुत बार सूट नहीं करता है। मटके के पानी की बात ही अलग होती है, उसकी खुशबू, स्वाद, सब कुछ बहुत ही बढ़िया होता है। मेरे घर में आज भी सभी लोग गर्मियों में मटके का पानी पीना ही पसंद करते हैं।

मुश्किल यह है कि घर में तो मटके का पानी मिल जाता है, लेकिन ऑफिस में तो मटका नहीं मिल सकता। वहां तो वही वाटर कूलर से निकला हुआ ठंडा पानी ही पीना पड़ता है। ऐसे में क्या किया जाए?

इस सवाल का जवाब है- ‘क्ले बोतल’ यानी कि मिट्टी से बनी पानी की बोतल, जो आप कहीं भी ले जा सकते हैं!

अब आप सोच रहे होंगे कि क्या यह मुमकिन है। जी हाँ, बिल्कुल मुमकिन है। आप मिट्टी से बनी बोतल देख भी सकते हैं और खरीद भी सकते हैं, बस यहाँ पर क्लिक करें!

मिट्टी से बनी इस बोतल को डिज़ाइन किया है IIT मद्रास से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने वाले संदीप कुमार गंगाराम ने। ग्रैजुएशन के बाद संदीप को प्लेसमेंट तो मिली, लेकिन उनका दिल कोई रेग्युलर जॉब करने में नहीं था। उन्हें कुछ अलग करना था, लेकिन क्या? यह उस वक़्त उनकी समझ में नहीं आ रहा था।

साल 2015 में उन्होंने अपनी डिग्री पूरी की और फिर IIT मद्रास में ही अपने एक प्रोफेसर टी. प्रदीप के साथ प्रोडक्ट डिज़ाइनर के तौर पर पार्ट-टाइम जॉब ले ली। संदीप कहते हैं कि उन्होंने इसके साथ-साथ IIT मद्रास के ही सेंटर फॉर सोशल इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप को जॉइन किया।

“यहाँ पर काम करते हुए मुझे पता चला कि मुझे प्रोडक्ट डिज़ाइनिंग में दिलचस्पी है। साथ ही, मुझे धीरे-धीरे समझ में आया कि हमारे लिए ज़रूरी यह है कि हमारा किया हुआ काम उस तबके तक पहुंचे, जो गाँव में रहते हैं और गरीबी में अपनी ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं,” उन्होंने कहा।

साल 2016 की गर्मियां थीं और चेन्नई का हाल गर्मियों में क्या रहता है, यह हम सबको पता है। संदीप बताते हैं कि उन्हें फ्रिज का ठंडा पानी सूट नहीं करता है और सामान्य तापमान के पानी से गर्मियों में प्यास नहीं बुझती। ऐसे में उन्हें काफी परेशानी हो रही थी। वह हमेशा सोचते कि काश! उन्हें हर जगह उनके गाँव की तरह मटके का पानी मिल सकता।

“बचपन में जब हम गाँव जाते थे तो वहां मटके का ही पानी पीते थे। हमारे गाँव के कुम्हार परिवार ही वो मटके बनाते थे। पर जैसे-जैसे बड़े हुए और शहर पहुंचे तो यह सब पीछे ही छूट गया,” उन्होंने कहा।

संदीप अपने लिए कोई विकल्प ढूंढ ही रहे थे कि उन्हें एक दुकान पर मिट्टी की बनी बोतलें दिखीं। उन्होंने तुरंत एक बोतल खरीद ली।

“यह बोतल बहुत भारी थी और इसे अपने साथ ट्रैवलिंग में लाना-ले जाना थोड़ा मुश्किल था। इस बोतल के डिज़ाइन में भी बहुत-सी परेशानियाँ थीं। ऐसे में, मैंने अपने प्रोडक्ट डिजाइनिंग के हुनर का इस्तेमाल करके अपने हिसाब से एक मिट्टी की बोतल डिज़ाइन की।” – प्रशांत

यहाँ से संदीप के बिज़नेस आइडिया की नींव रखी गई। वह कहते हैं कि उनकी अपने गाँव से जुड़ी जड़ें, इनोवेशन का पैशन, प्लास्टिक के बारे में जागरूकता और ग्रामीण समुदायों के लिए कुछ करने की चाह- इन चार बातों ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वह अपने इस डिज़ाइन को हक़ीकत बनाएं!

उन्होंने अपनी बोतल का प्रोटोटाइप तैयार करवाने के लिए कुम्हार समुदाय ढूँढना शुरू किया। उनसे मिलने के लिए चेन्नई के आस-पास के गाँवों की यात्राएं की। अपने डिज़ाइन को थ्री-डी प्रिंट करके उन्हें दिखाया ताकि उन्हें समझा सकें। वह कहते हैं कि उनके वीकेंड्स इसी काम में गुजर जाते।

कई कुम्हार परिवारों से उन्होंने बात की, उन्हें समझाया। जैसे-तैसे अपनी जॉब से पैसे बचाकर अपने इस प्रोजेक्ट में लगाए। इस दौरान उनके पैसे भी डूबे क्योंकि एक बार एक कुम्हार ने उनसे पैसे लेकर कभी भी उनका काम नहीं किया। उसने उनका फोन तक उठाना बंद कर दिया और न ही उन्हें फिर मिला।

संदीप ने हार नहीं मानी और आखिरकार, उन्हें पुद्दुचेरी के कुम्हारों के बारे में पता चला, जो इस तरह का काम करते हैं। उन्होंने इन लोगों से संपर्क किया, उन्हें डिज़ाइन समझाया और कई ट्रायल्स के बाद उनके प्रोडक्ट का प्रोटोटाइप तैयार हुआ।

इस सबमें लगभग एक साल लगा और साल 2017 की शुरुआत में उनका प्रोटोटाइप तैयार था। टेस्टिंग के बाद उन्होंने इसके प्रोडक्शन पर काम किया।

“मेरी किस्मत थी कि उसी समय IIT मद्रास में इन्क्यूबेशन सेंटर शुरू हुआ और मुझे मेरे स्टार्टअप के लिए एक प्लेटफॉर्म मिला गया। मुझे प्यार से सब लोग सैंडी बुलाते हैं और इसी से प्रेरित होकर मैंने अपने प्रोडक्ट का नाम- कैंडी क्ले बोतल रखा,” उन्होंने बताया।

संदीप आगे बताते हैं कि शुरू में उन्होंने किसी बिज़नेस के बारे में नहीं सोचा था। उनकी कहानी सिर्फ अपने लिए बोतल डिज़ाइन करने से शुरू हुई थी। अपनी मंजिल तक पहुँचने के इस रास्ते में उन्हें बहुत से ऐसे अनुभव हुए जिसके बाद उन्होंने अपना स्टार्टअप शुरू किया।

लोगों को फिर से पारंपरिक तरीकों से जोड़ प्लास्टिक को हटाने की सोच तो थी ही। इसके अलावा, एक मुख्य उद्देश्य था – ग्रामीण भारत के कुम्हार समुदाय को आजीविका देना। वह बताते हैं, “मैंने इन कुम्हारों के पास जाकर उनसे बात की है, उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को देखा है। मुझे अहसास हुआ कि अगर हम इनके लिए रोज़गार नहीं बना सकते तो क्या फायदा हमारी बड़ी-बड़ी तकनीकों का।”

संदीप को समझ में आया कि हमारे देश के हस्तशिल्प कलाकारों के पास हुनर की कमी नहीं है बस उन्हें अपने हुनर को सही मार्केट दिलाना नहीं आता। वे कारीगर हैं और उन्हें ऐसे सेल्समैन की ज़रूरत है जो उनके काम को सही ग्राहकों तक, सही दाम में पहुंचा पाए।

आज उनके इस एक बिज़नेस आइडिया से 35 कुम्हारों को काम मिल रहा है। फ़िलहाल, मांग के हिसाब से उनकी कंपनी हर महीने 200 क्ले बोतल बना रही है।

उनकी मार्केटिंग की शुरुआत IIT मद्रास के इवेंट्स में स्टॉल लगाने से हुई थी, पर आज यह बोतल आपको कुछ रिटेलर्स के यहाँ और ऑनलाइन भी मिल जाएगी।

इस बोतल की कुछ खासियत हैं:

  • मिट्टी से बनी इस बोतल में गर्मी के दिनों में भी पानी का तापमान 23-26°C ही रहता है।
  • इसका डिज़ाइन इस तरह से है कि आप आसानी से इसे हाथ में पकड़ सकते हैं।
  • उन्होंने दो बोतल बनाई हैं- एक 950ml और दूसरी 650ml की क्षमता वाली। बड़ी बोतल का वजन 450 ग्राम है और छोटी बोतल का 350 ग्राम है।
  • बोतल का ढक्कन लकड़ी की कॉर्क का बना है और पूरी तरह से इको- फ्रेंडली है।
  • संदीप ने इन बोतलों को रखने के लिए एक जूट बैग भी बनाया है, जिससे बोतल को ट्रैवलिंग के दौरान सपोर्ट मिलेगा और यह टूटेगी नहीं।

अंत में संदीप सिर्फ इतना कहते हैं, “मैं सीधा इन कुम्हारों के साथ काम कर रहा हूँ और उनकी ज़िंदगी के लिए कुछ अच्छा करना चाहता हूँ। अगर आप हमारी एक बोतल भी खरीदते हैं तो इसका मतलब है कि आप भी एक बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं। एक तो इन कुम्हारों की मदद हो रही है, दूसरा हमारे पर्यावरण का संरक्षण हो रहा है।”

यदि आप भी संदीप का साथ देना चाहते हैं और कैंडी क्ले बोतल खरीदकर बदलाव लाना चाहते हैं तो यहाँ पर क्लिक करें!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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