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#हमराही: रिटायरमेंट के बाद झुग्गी के बच्चों की उठाई ज़िम्मेदारी, 15 साल बाद कोई सीए है तो कोई इंजीनियर!

हम रिटायरमेंट को अक्सर हर काम का अंत समझते हैं, पर यह तो एक सुनहरा अवसर है, जहाँ हमें अपनी मर्ज़ी का काम करके व्यस्त रहने के लिए ढेर सारा समय मिलता है।

“मुझे उसके ऐडजस्ट करने की क्षमता बहुत अच्छी लगती है। वो कोई सवाल नहीं करती और किसी भी परिस्थिति में ढल जाती है।”

“….और मुझे उनका हमेशा खुश रहने का स्वभाव अच्छा लगता है। बड़ी से बड़ी मुसीबत का हल वो हँसते-हँसते कर देते हैं।”

जब दादा-दादी एक दूसरे के बारे में शर्माते हुए ये कहते हैं, तो सुननेवाले के चेहरे पर मुस्कान आए बगैर नहीं रहती।
गुजरात के अहमदाबाद शहर में रहनेवाले 72 वर्षीय दीपक बुच और 65 वर्षीय मंजरी बुच भले ही, सिर्फ अपनी मुस्कान का श्रेय एक दूसरे को देते हो, पर सच तो यह है कि ये हमराही जोड़ा सैकड़ों बच्चों की मुस्कान की वजह भी है।

दीपक और मंजरी बुच (दादा-दादी)

साल 2004 में जब दीपक बुच रिटायर हुए, तब शायद ही उन्होंने और उनकी पत्नी मंजरी ने सोचा होगा कि उनकी ज़िंदगी की सेकंड इन्निंग इतनी जल्दी शुरु हो जाएगी। दोनों एक संयुक्त परिवार में रहते थे। 10 लोगों का भरा-पूरा परिवार था। एक बेटा था, जो सेटल हो चुका था और पोती के साथ मन बहलाने में सारा समय यूँही कट जाता था।
अहमदाबाद के व्यस्त इलाके में स्थित ‘सचिन टावर्स’ के उनके तीन बेडरूम, हॉल किचन वाले इस फ्लैट में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। लेकिन फिर एक दिन इसी फ्लैट की बालकनी से दिखने वाले एक खेल के मैदान पर दादा दीपक को कुछ नज़र आया और उन्हें किसी बात की कमी खलने लगी। कमी थी, ‘शिक्षा’ की।

“उस वक़्त हमारे अपार्टमेंट के आगे इतनी सारी इमारतें नहीं थी। AUDA की कॉलोनी (गरीबी रेशा के नीचे आनेवाले लोगों के लिए आवंटित सरकारी कॉलोनी) यहीं से दिखाई देती थी। इस कॉलोनी के 10×10 के घरों में ज़्यादातर सब्जी बेचने वाले, घरों में काम करने वाले, छोटे-मोटे कारीगर, या चपरासी का काम करने वाले लोग रहते हैं। इसके आगे पड़े खाली मैदान में अक्सर इनके बच्चे मुझे खेलते नज़र आते थे,” दादा ने बताया।

दादा के दिमाग में उस दिन एक बात आई कि यह वो तबका है, जो खुद तो न पढ़ सका, पर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता है। इनके बच्चे भी, पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहते हैं। कमी है तो सिर्फ साधन की, जानकारी की और सही शिक्षा की।

अगले ही दिन दादा ने तय कर लिया कि वह इन बच्चों को पढ़ाएंगे और 8 जुलाई 2005 को शुरू हुई ‘दादा-दादी नी विद्या परब’ !

राहगीरों के लिए रखे हुए पानी के घड़े (प्याऊ) को गुजरती में ‘परब’ कहा जाता है। दादा-दादी भी इसी तरह ज़रूरतमंद बच्चों के लिए विद्या की परब बनना चाहते थे।

दादा ने पहले कभी नहीं पढ़ाया था और दादी की तो बी.ए खत्म होते ही शादी कर दी गई थी। पर यह जोड़ा जानता था कि शिक्षा की ज्योत जलाने के लिए अनुभव की नहीं, बस ज्ञान के दीये की ज़रुरत है।

शुरुआत हुई दादा-दादी के घर पर ही काम करने वाली कृष्णाबेन रबारी के दोनों बच्चों से। साथ में, कृष्णा बेन के पड़ोस के तीन बच्चे और जम गये। दादा का सीधा सा नियम था कि ये ट्यूशन्स मुफ्त हैं तो क्या? केवल 5 बच्चे हैं तो क्या? यहाँ अलग-अलग क्लासेस के बच्चे एक ही साथ बैठकर नहीं पढ़ सकेंगे ऐसा सोचकर सुबह, दादी पहले तीसरी और फिर चौथी के बच्चों को अपने बेडरूम में एक-एक घंटे के लिए पढ़ाती। उधर, दादा ड्रॉइंग रुम में 5वीं, 6वीं, 7वीं को सुबह एक-एक घंटा और 8वीं, 9वीं और 10वीं के बच्चों को शाम को एक-एक घंटा पढ़ाते।

धीरे-धीरे बात पूरे AUDA की कॉलोनी में फैल गई और कुछ ही साल में दादा-दादी के पास लगभग 100 बच्चे आने लगे।

दादा-दादी अपने छात्रों के साथ

“अगर किसी को बाहर भी जाना होता, तो बच्चों से खचाखच भरे ड्रॉइंग रुम से गुज़र कर जाना पड़ता। पर हमारे परिवार ने हमारा पूरा साथ दिया। मेरे भाई-भाभी, उनके बच्चे, बेटे-बहु और मेरी माँ ने भी पूरा सहकार किया। सोसाइटी वालों ने भी कभी कोई शिकायत नहीं की, उल्टा मदद के लिए हमेशा हाथ बढ़ाया। मेरी पोती तो स्कूल से आते ही इन बच्चों के पास आकर बैठ जाती और कोई शोर मचाता तो उसे डांटती,” दादा उन दिनों को याद करके खूब हँसते हैं।

9 साल तक इसी तरह यह सिलसिला चलता रहा। बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही थी और अब बड़ी कक्षाओं के बच्चों के लिए भी जगह चाहिए थी। ठीक सामने वाला फैल्ट खाली तो था, पर इतना किराया देना संभव नहीं था। ऐसे में अमेरिका में रहने वाले इस फ़्लैट के मालिक जितिन और रमोना आनंद ने बहुत कम किराए पर यह मकान दादा-दादी को दे दिया। इधर ज्योतिंद्रभाई देसाई, दीपकभाई मोदी और दर्शकभाई पटेल ने मिलकर हर महीने किराए की रकम देने की ज़िम्मेदारी उठा ली।

इस फ्लैट के मिलने से दादा-दादी और बच्चों को काफी राहत मिल गयी। बोर्ड की परीक्षा देनेवाले छात्र अब रात-रात भर यहाँ रहकर पढ़ाई करते और दादी उन्हें चाय बना-बनाकर देती रहतीं।

पर अभी एक समस्या और थी! तीसरी कक्षा से दादा-दादी के पास पढ़नेवाले विद्यार्थी अब 12वीं में आ चुके थे। इन बच्चों को अब करियर गाइडंस की ज़रुरत थी।

इनके लिए दादा-दादी ने अलग-अलग क्षेत्रों में पढ़ानेवाले प्रोफेसरों से संपर्क किया, जो इन्हें करियर के बारे में बताने के साथ-साथ, अलग-अलग विषयों की ट्रेनिंग भी देते हैं।

श्रीमती यगना बेन मांकड़ बच्चों को उपग्रहों के बारे में पढ़ाते हुए

इन लोगों में शामिल हैं इसरो से रीटायर्ड साइंटिस्ट श्रीमती यगना बेन मांकड़, जिन्होंने दादा-दादी की क्लास को एक लैपटॉप और प्रोजेक्टर भी दान किया है। इसी प्रोजेक्टर पर वह बच्चों को कंप्यूटर और विज्ञान पढ़ाती हैं।
कॉमर्स की हफ्ते में 3 बार क्लास होती है, जो रीटायर्ड चार्टर्ड अकाउंटेंट परेश भाई बक्शी लेते हैं। हर रविवार यहाँ HRD की क्लास भी होती है, जिसके लिए IIM अहमदाबाद से एक प्रोफेसर आते हैं। इसके अलावा, संगीत सिखाने के लिए अमीबेन बुच, आर्ट्स और क्राफ्ट्स के लिए अमिताबेन उपाध्याय,  कहानियों से बच्चों का मनोरंजन करने के लिए रीटायर्ड शिक्षक रमेश भाई रावल और योगा सिखाने के लिए वैशाली शाह हर रविवार आती हैं। ये सभी शिक्षक बिना किसी फीस के बहुत ख़ुशी-ख़ुशी इन बच्चों को आनेवाले भविष्य के लिए तैयार करते हैं।

“हम रिटायरमेंट को अक्सर हर काम का अंत समझते हैं, पर यह तो एक सुनहरा अवसर है, जहाँ हमें अपनी मर्ज़ी का काम करके व्यस्त रहने के लिए ढेर सारा समय मिलता है। शायद हमारी सेहत का राज़ भी यही है,” दादा कहते हैं।

दादा-दादी की मानें तो उन्हें इस राह में कभी कोई मुश्किल आई ही नहीं। उलटा अपने आप ही कुछ ऐसे समागम बनते चले गए कि परिचित हो या अपरिचित, हर कोई उनकी मदद को आगे आता रहा।

जहाँ डॉ.आरती बेन नायक और के.वी शाह हर महीने बिना बोले ही इन बच्चों के लिए कॉपी-पेंसिल जैसी ज़रूरी चीज़ें ले आते हैं। वही इस जोड़े के साथ शिल्पिन भाई मजूमदार जैसे लोग भी जुड़े हैं, जो अब तक यहाँ के 75 बच्चों को साइकिल दान कर चुके हैं। साथ ही, विदेश में रहने वाले कई ऐसे लोग भी हैं, जो न दादा-दादी से मिले हैं, न ही इन बच्चों से, फिर भी इन बच्चों की उच्च शिक्षा की फीस भरने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।

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“अमेरिका से दर्शकभाई पटेल, कनाडा से कनुभाई पटेल, रिटायर्ड IAS वी. बी. बुच और CA उशीरभाई मशरूवाला, ये सभी हमारे बच्चों के हायर एजुकेशन के लिए नियमित तौर पर फीस भेजते हैं। मैं इनका जितना आभार प्रकट करूँ उतना कम है,” दादा कहते हैं।

आर्थिक मदद के लिए तो ये बच्चे दादा-दादी के आभारी है ही, पर और भी बहुत कुछ है जिसके लिए ये छात्र अपने दादा-दादी का एहसान मानते नहीं थकते।

दादा-दादी बच्चों को इसरो की सैर कराते हुए

12वीं में पढ़ने वाली तन्वी गोहेल का कहना है कि उन्हें पहले कभी कहीं बाहर जाने का मौका नहीं मिला था, पर दादा-दादी बच्चों को टूर पर भी ले जाते हैं, जहाँ इन्हें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

आगे MCA करने का इरादा रखने वाली तन्वी कहती हैं,
“हमें यहाँ सिर्फ स्कूल की किताबें ही नहीं पढ़ाई जाती बल्कि कैसे उठना-बैठना है, बड़ों से किस तरह बात करनी है और यहाँ तक कि ज़िन्दगी में आनेवाली चुनौतियों से भी लड़ना सिखाते हैं दादा-दादी। ”

इन बच्चों के घरों में कोई भी इमरजेंसी हो, सबसे पहला फ़ोन दादा-दादी को ही आता है। यहाँ पढ़नेवाली, मीता नाई की माँ को जब कैंसर हुआ तो दादा-दादी ने ही उनके इलाज के सारे खर्च का इंतज़ाम किया।

“अभी पैसे इकठ्ठा करना बहुत मुश्किल नहीं है, क्यूंकि हम फेसबुक और व्हाट्सएप के ज़रिए लोगों से अपील कर लेते हैं। पर तब मैं मदद के लिए लोगों को पोस्ट कार्ड लिखता था। फिर भी हमें हमेशा सही वक़्त पर मदद मिली है, ” दादा पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं।

ये दादा-दादी की कड़ी मेहनत का ही फल है कि आज उनकी सबसे पहली बैच के 26 बच्चे अच्छी-अच्छी नौकरियों में सेटल हो चुके हैं। कोई इंजीनियर है, तो कोई सीए, कोई मल्टिनैशनल कंपनी में काम करता है तो कोई अपने भाई बहनों को आगे पढ़ा रही है।

दादा-दादी की क्लास में आठवीं से पढ़नेवाली मोनिका भवसार के माता-पिता फूल बेचते हैं। माता-पिता के पढ़े-लिखे न होने की वजह से और ज़्यादातर समय रोज़गार के लिए बाहर रहने के चलते भी उन्हें किसी भी चीज़ का गाइडेंस नहीं मिल पाता था। ऐसे में इस बच्ची को दादा-दादी में एक ऐसा सहारा मिला, जिसकी वजह से वह आगे बढ़ पायी। मोनिका आज इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग करने के बाद एक जापानी कंपनी में नौकरी कर रही हैं। उनका मानना है कि आज वह जो कुछ भी हैं, दादा-दादी की बदौलत ही हैं।

“हम रास्ते पर कई बच्चों को देखते हैं, जिनका जीवन में कोई उद्देश्य नहीं होता। वो इसलिए क्यूंकि ये बच्चे ये जानते ही नहीं है कि सपने होते क्या हैं, सपने देखते कैसे हैं। हम भी उन्हीं बच्चों की तरह ही थे। दादा-दादी ने हमें सिखाया कि सपने देखना क्या होता है और उन्हें सच कैसे करते है,” मोनिका भावुक होते हुए कहती हैं।

दादा-दादी के साथ उनकी लाडली छात्रा मोनिका भवसार

इसी तरह आज से कुछ 15 साल पहले सागर खत्री भी दादा-दादी की क्लासेस का हिस्सा बने। सागर के पिता एक निजी कंपनी में क्लर्क का काम करते थे। उनकी मासिक आय सिर्फ 7-8 हज़ार रूपये ही थी, जिसमें परिवार का भरण-पोषण ही मुश्किल से होता था, फिर बच्चों को आगे पढ़ाने का सपने देखना तो नामुमकिन जैसा ही था। पर, सागर इंजीनियर बनना चाहते थे और उनकी बहन भी आगे पढ़ना चाहती थी।

“2005 में जब मैं दादा-दादी के पास पहुंचा तो वहां आठवीं की कोई क्लास ही नहीं थी। पर उन्होंने सिर्फ मेरे लिए आठवीं की क्लास शुरू की और दादा मुझ अकेले को एक घंटा और पढ़ाने लगे। इसके बाद से उन्होंने हम दोनों भाई-बहनों की सारी ज़िम्मेदारी उठा ली। मैं हमेशा से इंजीनियर बनना चाहता था। दादा ने कहा ‘तू पैसों की चिंता मत कर, बस अच्छे से पढ़’,” सागर बताते हैं।

सागर ने दादा की बातों का मान रखते हुए गवर्मेंट इंजीनियरिंग कॉलेज में सीट हासिल की और टेक्सटाइल इंजीनियरिंग कर, आज एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर के तौर पर काम कर रहे हैं।

अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए वह आगे बताते हैं, “हम AUDA की कॉलोनी में रहते थे। यहाँ हर मकान केवल 10×10 का एक कमरा होता है, जिसके अंदर ही किचन और बाथरूम भी होता है। किसी भी झुग्गी की तरह यहाँ इतना शोर होता था कि उसी कमरे में बैठकर पढ़ना मुश्किल हो जाता था। जब हमने दादा-दादी को ये बात बताई तो उन्होंने अपना बेडरूम हमें पढ़ने के लिए दे दिया। ऐसी कई बातें है उनकी, जिन्हें बताने में मुझे शायद पूरा दिन कम पड़े। ”

दादा-दादी इन बच्चों से एक वचन ज़रूर लेते हैं कि जब ये कुछ बन जाएँगे तो समाज का यह ऋण ज़रूर चुकाएंगे। इसलिए आज जो बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं, वो दादा-दादी के पास आई नई पीढ़ी के लिए हर महीने कुछ न कुछ योगदान ज़रूर करते हैं। ये योगदान बिलकुल स्वैच्छिक है, पर फिर भी यहाँ से पास हुआ हर छात्र यहाँ पर आनेवाले नये बच्चों को अपनी ज़िम्मेदारी समझता है।

“हमारा लक्ष्य इन बच्चों को सिर्फ अपने पैरों पर खड़े करना ही नहीं हैं, बल्कि इनके रूप में समाज को एक अच्छा नागरिक देने का भी है। हम इन्हें जितना हो सके दूसरों के काम आने की शिक्षा देते हैं। उनसे कहते हैं कि जब कुछ बन जाओ तो पहले अपने माता-पिता और परिवार को सम्भालों और फिर समाज ने जो तुम्हारे लिए किया है, वही तुम समाज को वापस लौटाओ। अगर ये सिलसिला यूँही चलता रहा तो हम समझेंगे हमारा जीवन सफल हो गया।”

दादा-दादी के इस विद्या परब से न जाने कितने ही बच्चों की शिक्षा की प्यास बुझी है और बुझती रहेगी। यदि आप भी उनके इस नेक काम में उनका साथ देना चाहते हैं तो उन्हें +91 94276 16511 पर संपर्क कर सकते हैं।
यदि आप अहमदाबाद में रहते हैं तो दादा-दादी से नीचे दिए पते पर मिलने ज़रूर जाएँ और उनका हौसला बढ़ाएं –

Deepak Buch and Manjari Buch
C/43,Sachin Towers,
Besides IOC Petrol Pump,
Anandnagar Road,
Satellite, Ahmedabad-15

दादा-दादी की ये प्रेरक कहानी आपको कैसी लगी, ये मुझे manabi@thebetterindia.com पर मेल करके ज़रूर बताएं। अभी के लिए आज्ञा!
– मानबी कटोच


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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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