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इंजीनियर ने चीकू से बनाए 21 तरह के प्रोडक्ट, 1 करोड़ है सालाना कमाई!

68 वर्षीय महेश चूरी के इस ब्रांड की फ्रेंचाइजी लेने के लिए कतार लगी है लेकिन महेश के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है किसानों को अतिरिक्त आय का साधन और आदिवासी महिलाओं को रोज़गार देना।

हाराष्ट्र के पालघर जिले के दहाणु तहसील में समुद्र तट पर बसा बोर्डी गाँव अपनी प्राकृतिक खूबसूरती की वजह से एक बेहतरीन टूरिस्ट स्पॉट है। इसके साथ-साथ यह गाँव एक और वजह से मशहूर है- चीकू।

जी हाँ, चीकू, मैं आज भी इस फल को बीमारी वाला फल कहती हूँ, क्योंकि बचपन में बीमार पड़ने पर मम्मी हमेशा चीकू खिलाती थीं। कहती थीं कि चीकू में बहुत ताकत होती है।

बोर्डी में ज़्यादातर लोग चीकू उत्पादन पर ही निर्भर हैं और यहाँ से यह फल देश-विदेशों में निर्यात होता है। यदि आप कभी बोर्डी या इसके आस-पास इलाके घूमने जाएंगे तो आपको यहाँ पर चीकू से बने तरह-तरह के प्रोडक्ट्स भी मिलेंगे, जैसे कि चीकू के चिप्स, अचार आदि। इतना ही नहीं, बोर्डी में हर साल चीकू फेस्टिवल का आयोजन भी होता है।

साल 2016 में भारत सरकार ने इस इलाके को चीकू के लिए GI टैग देकर, राष्ट्रीय स्तर पर एक पहचान दिलाई। बोर्डी की खासियत सिर्फ यहीं खत्म नहीं हो जाती है, बल्कि यहाँ से तो कहानी शुरू हुई है।

यह कहानी है इसी गाँव के एक व्यवसायी, महेश चूरी की, जिनका उद्देश्य अपने गाँव के लोगों के लिए कुछ करना है। यहाँ के किसानों को एक अतिरिक्त आय का साधन देना और महिलाओं को रोज़गार देकर उन्हें सशक्त बनाना है!

Mahesh Churi, Founder of Chikoo Parlour in Bordi

कैसे हुई शुरुआत:

68 वर्षीय महेश चूरी का जन्म एक किसान परिवार में हुआ। “मुझे हमेशा से पता था कि पढ़ाई ही एकमात्र ज़रिया है, जिससे मैं अपने परिवार का स्तर ऊँचा उठा सकता हूँ। इसलिए मैंने दिन-रात मेहनत की और स्कूल के बाद इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की,” उन्होंने बताया।

मुंबई में कुछ दिन प्राइवेट नौकरी करने के बाद उन्होंने साल 1983 में अपने गाँव में ही खुद की कंपनी, सूमो इलेक्ट्रिकल्स की नींव रखी। अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने इस कंपनी को सफल बनाया। वह कहते हैं कि बचपन से ही उनकी परवरिश इस तरह से हुई कि जो काम हाथ में लो, उसे पूरा करके ही दम लो।

“मैं रिसर्च और डेवलपमेंट का बन्दा हूँ। हमारे यहाँ जो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बनते हैं वह भी लोगों की डिमांड पर हम खुद डिज़ाइन करते हैं। यही मेरा हुनर है और मैं अपने इस हुनर को अपने गाँव के लोगों के लिए इस्तेमाल करना चाहता था,” उन्होंने आगे कहा।

इसी सोच के साथ उन्होंने ऐसा कुछ करने की ठानी, जिससे कि उनके गाँव को वैश्विक स्तर पर जाना जा सके। इसके लिए उन्होंने तय किया कि वह चीकू में ही वैल्यू- एडिशन करके यहां के लोगों को नए मौके देंगे। चूरी ने अपने स्तर पर काम किया।

खुद बनाई मशीन

हर तरह की संभावना को जांचने-परखने के बाद उन्होंने चीकू से पाउडर बनाने की सोची, जिससे मिल्कशेक आदि बनाया जा सके। लेकिन इसके लिए उन्हें तकनीक भी चाहिए थी क्योंकि बिना ग्राइंडिंग मशीन के चीकू से पाउडर बनाना मुमकिन नहीं था।

“सबसे पहले मैंने अपनी ही लैब में चीकू के ग्रैनुअल साइज आदि के हिसाब से एक ग्राइंडिंग मशीन तैयार की। इस मशीन की मदद से आसानी से चीकू पाउडर/रवा तैयार किया जा सकता है, जिससे आप मिठाई बना सकते हैं। यह हमारी पहली उपलब्धि थी,” उन्होंने बताया।

Mr. Churi has developed the equipment for the processing of Chikoo

उनका चीकू पाउडर गुणवत्ता के मामले में तो एक नंबर था लेकिन बाज़ार में इसे ख़ास अच्छी प्रतिक्रिया नहीं मिली। इस पाउडर में किसी भी तरह के केमिकल या फिर प्रेज़रवेटिव का इस्तेमाल नहीं किया गया था और इस वजह से इसकी कीमत थोड़ी बढ़ गयी। साथ ही, इसे बनाने की प्रक्रिया भी काफी मुश्किल और जद्दोज़हद भरी थी।

चीकू पाउडर की बिक्री न होने से उन्हें घाटा भी हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। चूरी ने एक बार फिर सोचना शुरू किया कि अब वह क्या कर सकते हैं?

चीकू पार्लर- सब कुछ चीकू 

“जब आप रिसर्च करते हैं तो एक बार में आपको सफलता नहीं मिलती, लेकिन सबक ज़रूर मिलता है। मैंने फिर सोचा कि अब और क्या किया जा सकता है, क्योंकि मैं पीछे तो हटने वाला नहीं था।” उन्होंने हँसते हुए कहा।

They have 4 outlets and 21 kind of products

ऐसे में, उन्होंने अन्य प्रोडक्ट्स जैसे कि कुल्फी, मिठाई, रवा आदि बनाने पर काम किया और इसके साथ ही, उन्होंने बोर्डि में अपना खुद का आउटलेट शुरू किया- चीकू पार्लर, जिसकी टैग लाइन है, ‘सब कुछ चीकू’!

सितंबर, 2016 से शुरू हुए उनके इस आउटलेट में आज चीकू से बने 21 तरह के प्रोडक्ट्स मिलते हैं। उनका यह आउटलेट हाईवे पर है, फिर भी उन्हें लोगों से बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली। पहले आउटलेट की सफलता के बाद, उन्होंने अपना दूसरा पार्लर, मुंबई-अहमदाबाद को जोड़ने वाले NH-8 हाईवे पर खोला।

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फिलहाल, उनके 4 चीकू पार्लर हैं और सभी को काफी अच्छी सफलता मिल रही है।

गाँवों को ध्यान में रख बनाया मॉडल

चूरी के दिमाग में एक बात स्पष्ट थी कि उनका यह व्यवसाय सिर्फ पैसा कमाने के लिए नहीं है। उनका उद्देश्य इस व्यवसाय के ज़रिए गाँव के लोगों को रोज़गार देना और ग्राहकों को स्वस्थ और शुद्ध प्रोडक्ट देना है। उन्होंने अपनी फैक्ट्री गाँव के पास ही स्थापित की है, जहां पर सभी स्थानीय लोग ही काम करते हैं।

पूरे साल उनके यहाँ चीकू से पाउडर बनते हैं, फिर इससे अन्य प्रोडक्ट्स बनाए जाते हैं। सभी प्रोडक्ट्स एकदम शुद्ध चीकू से बनाते हैं, इनमें कोई एडीटिव, केमिकल नहीं होता। सुगर भी बहुत ही कम मात्रा में इस्तेमाल होती है। हर एक चीज़ की पैकिंग और पैकेजिंग फैक्ट्री में ही होती है और टेस्टिंग के बाद इसे आउटलेट्स पर ले जाया जाता है।

वह बताते हैं, “हमने अपनी फैक्ट्री में काम करने के लिए यहाँ की आदिवासी महिलाओं को ट्रेनिंग दिलाई। आज हमारे साथ 20 महिलाएं काम कर रही हैं। सुबह साढ़े आठ बजे से दिन के दो बजे तक ही उनकी शिफ्ट होती है, लेकिन हम उन्हें सैलरी पूरे दिन के हिसाब से ही देते हैं।”

उन्होंने अपने आउटलेट्स में 15 स्थानीय युवकों को ही स्टाफ के लिए रखा है। इसके अलावा, वह चीकू के मौसम में प्रतिदिन लगभग 300 किलोग्राम चीकू खरीदते हैं और इसके लिए उन्होंने 25 किसानों से संपर्क कर रखा है। इन किसानों को चीकू का एक निश्चित भाव दिया जाता है।

“मंडी में चाहे उन्हें चीकू का भाव कम मिल रहा हो लेकिन हमारा भाव उतना ही रहता है। एक खास बात यह है कि पेड़ से जो चीकू पूरी तरह पककर नीचे गिर जाते हैं, हम उन्हें किसानों से खरीद लेते हैं,” उन्होंने आगे कहा।

अक्सर किसान अधपके चीकू को तोड़ने के बाद उसे आर्टिफीशियल तरीकों से पकाकर मंडी में बेचते हैं। जो चीकू खुद पककर नीचे गिर जाते हैं, उन्हें अक्सर किसान फेंक देते हैं क्योंकि इन्हें मंडी में कोई नहीं खरीदता। लेकिन चूरी अपने पार्लर के लिए प्राकृतिक रूप से पके हुए चीकू ही लेते हैं। ऐसे में, किसानों के लिए यह एक अच्छी आय का साधन बन गया है।

बनाना है ब्रांड नाम

महेश चूरी का लक्ष्य है कि वह धीरे-धीरे अपना एक ब्रांड नाम बनाएं। आगे उनकी योजना और भी अलग-अलग जगह आउटलेट खोलने की है। इसके लिए, उनकी सोच थोड़ी अलग है। वह चाहते हैं कि देशभर में चीकू की खेती कर रहे किसान उनसे जुड़कर फ़ूड प्रोसेसिंग में आगे बढ़ें।

“हमसे बहुत से लोग हमारे ब्रांड की फ्रेंचाई मांगते हैं, लेकिन मैं चाहता हूँ कि चीकू की खेती करने वाले किसान इस सेक्टर में आगे बढ़ें। वे खुद चीकू उगाएं और उसकी प्रोसेसिंग के लिए हम उनकी मदद करेंगे और फिर वे अपने इलाके में खुद अपना पार्लर खोलें,” उन्होंने कहा।

इन 4 आउटलेट्स से आज उनका बिज़नेस 1 करोड़ रुपये तक का हो रहा है। वह कहते हैं कि उन्हें मुनाफे से ज्यादा इस बात की फ़िक्र है कि उनके ग्राहक उनसे संतुष्ट रहें। जो एक बार उनका प्रोडक्ट खाए, वह दोबारा उनके पास ज़रूर आए।

“मैंने बहुत धीरे-धीरे इस व्यवसाय को जमाया है, कभी हड़बड़ी नहीं की और आज भी मुझे एकदम से कोई फेम नहीं चाहिए। मैं चाहता हूँ कि यह ब्रांड नाम हमारे लिए नहीं बल्कि गाँव के लोगों के लिए बनें। अलग-अलग जगह से किसान इसे एक पहचान दें,” उन्होंने अंत में कहा।

द बेटर इंडिया के माध्यम से वह सिर्फ यही संदेश देना चाहते हैं कि यदि कोई किसान फ़ूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है, तो बेझिझक उनसे संपर्क कर सकता है।

महेश चूरी से संपर्क करने के लिए आप 9224592529 पर कॉल कर सकते हैं!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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