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शिक्षक की एक पहल ने बचाया 3 लाख प्लेट खाना, 350 बच्चों की मिट रही है भूख!

चंद्र शेखर अपने बेटे के जन्मदिन की पार्टी से लौट रहे थे, जब रास्ते में उन्होंने दो बच्चों को डस्टबिन में से चावल खाते देखा था।

साल 2016 में पश्चिम बंगाल के असानसोल में रहने वाले एक शिक्षक, चंद्र शेखर कुंडू ने फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया से ‘सूचना के अधिकार’ के तहत भोजन की बर्बादी के बारे में जानकारी मांगी। जवाब आया, “भारत में हर साल 22, 000 मीट्रिक टन खाद्यान्नों की बर्बादी होती है।” अगर इस भोजन को बचा लिया जाए तो 1 करोड़ से ज्यादा आबादी का पेट भरा जा सकता है।

RTI डालने का ख्याल चंद्र शेखर को कैसे आया? इस बारे में पूछने पर वह बताते हैं,

“मेरे बेटे, श्रीदीप के जन्मदिन पर हमने एक पार्टी रखी थी। पार्टी के बाद जो खाना बच गया उसे मैंने होटल के स्टाफ को दे दिया। इसके बाद भी काफी खाना बचा हुआ था जिसे फेंक दिया गया। उस वक्त मुझे नहीं पता था कि मैंने कितनी बड़ी गलती की है। जब हम घर लौट रहे थे और मैं पैसे निकालने के लिए एक एटीएम पर रुका, तभी मैंने वहां देखा कि पास में रखे डस्टबिन से दो बच्चे कुछ चुनकर खा रहे हैं। उन बच्चों को इस हालत में देखकर मुझे बहुत बुरा लगा और मैंने सोचा कि अभी-अभी हम कितना सारा खाना बर्बाद करके आ रहे हैं और यहाँ इन बच्चों को कूड़े से उठाकर खाना खाना पड़ रहा है।”

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चंद्र शेखर उन बच्चों को अपने घर लेकर गए, उन्हें खाना खिलाया और फिर कुछ और खाने-पीने की चीजें देकर भेजा। उस पूरी रात उन्हें नींद नहीं आई। इस घटना को उन्होंने अपनी ज़िंदगी के लिए एक संदेश समझा और अपने स्तर पर कुछ करने की ठानी।

उन्होंने अपने कॉलेज की कैंटीन और आस-पास की ऐसी जगहों का पता किया जहां हर रोज ज्यादा मात्रा में खाना बनता है। इन जगहों पर जाकर उन्होंने लोगों से बात की और बचे हुए खाने को गरीब-जरूरतमंदों में बाँटने की अनुमति मांगी।

Chandra Shekhar Kundu

उन्होंने बचे हुए खाने को इकट्ठा करके बांटने के लिए बर्तन खरीदे। हफ्ते में चार दिन वह जरूरतमंदों में खाना बांटने लगे। वह कॉलेज के बाद शाम में खाना बांटने का काम करते थे। अपने इस अभियान के बारे में उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। वह बताते हैं कि सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के पीछे उनका उद्देश्य महान बनना नहीं था बल्कि, उन्हें अपने काम को लोगों तक पहुंचाना था। उन्होंने लोगों को भोजन की बर्बादी को रोकने और इसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए जागरूक किया।

लोगों की प्रतिक्रिया काफी अच्छी रही और उनका कारवाँ आगे बढ़ता रहा। अपने इस काम को बड़े स्तर पर ले जाने के लिए उन्होंने 2016 में एक सामाजिक संगठन, फ़ूड, एजुकेशन एंड इकॉनोमिक डेवलपमेंट (FEED) की स्थापना की। इसके ज़रिए उन्होंने असानसोल और कोलकाता के बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थानों से सम्पर्क किया और उन्हें अपने हॉस्टल, कैंटीन में बचने वाले खाने को जरूरतमंदों तक पहुंचाने का आग्रह किया।

“हमने अपने संगठन के तहत अलग-अलग प्रोजेक्ट शुरू कर दिए जैसे कि ‘कमिटमेंट 365 डेज,’ ‘प्रोटीन क्लब’ आदि। ‘कमिटमेंट 365 डेज’ प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने सीआईएसएफ बैरक, आईआईएम, कोलकाता और कुछ अन्य दफ्तरों से साझेदारी की है। हमारे वॉलंटियर्स यहाँ से खाना इकट्ठा करके जरूरतमंदों में बांटते हैं,” उन्होंने बताया।

‘प्रोटीन क्लब’ के ज़रिये उनका उद्देश्य बच्चों को कुपोषण से मुक्त करना है। चंद्र शेखर और उनकी टीम ने अपने काम के दौरान समझा कि रात का भोजन काफी ज़रूरी होता है। हमारे यहाँ अक्सर स्लम, फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को रात को कुछ खाने को नहीं मिल पाता और इसलिए वे कुपोषित होते हैं।

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“हम रात को कहीं से बचा हुआ खाना मिलने पर निर्भर नहीं हो सकते थे। किसी बार खाना मिलता, कभी नहीं मिलता। ऐसे में हमने सोचा कि क्यों न रात को हम बच्चों को खुद खाना बनाकर खिलाएं। इसके लिए हमने दो-तीन जगहों पर अलग-अलग लोगों को नियुक्त किया। उन्हें पूरा सामान संगठन की तरफ से दिया जाता है और वे लोग खाना बनाकर बच्चों को खिलाते हैं।”

‘कमिटमेंट 365 डेज’ प्रोजेक्ट से 4 जगहों पर 190 बच्चों का पेट भर रहा है और ‘प्रोटीन क्लब’ से रात में 3 जगहों पर  180 बच्चों को खाना मिल रहा है। उनके मुताबिक अब तक वे लगभग 3 लाख प्लेट खाना बचा चुके हैं।

बच्चों तक अच्छा खाना पहुँचाने के अलावा चंद्र शेखर ने और भी कई पहल शुरू की है। उन्होंने इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए संध्या स्कूल भी शुरू किए हैं। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे शाम को अपना थोड़ा सा वक़्त निकालकर जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाएं। देखते ही देखते आज 7 जगहों पर ये स्कूल चल रहे हैं और 9 शिक्षक इन बच्चों को पढ़ाते हैं।

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“एक बार कोलकाता में मैंने देखा कि एक बच्चे को बहुत बुखार है पर माँ-बाप उसको लेकर अस्पताल ही नहीं जा रहे थे। जब मैंने उनसे बात की तो समझ में आया कि उनके लिए उनकी एक दिन की दिहाड़ी बहुत मायने रखती है। अगर वे एक दिन निकाल कर डॉक्टर के यहाँ कतार में लगेंगे तो उनके घर में रात का खाना नहीं होगा। मुझे उन लोगों की बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया,” उन्होंने कहा।

इस बारे में चंद्र शेखर ने अपने कुछ दोस्तों से बात की, जिनमें कई डॉक्टर थे। जिन्होंने खुद आगे बढ़कर, इस काम में अपना योगदान देने की इच्छा जताई। पिछले साल, उन्होंने डॉ. अतुल भद्र के साथ मिलकर ‘फुटपाथ डिस्पेंसरी’ की नींव रखी। डॉ. भद्र ने अपने जैसे और भी कई नेकदिल डॉक्टरों को इससे जोड़ा।

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इस प्रोजेक्ट के तहत ये डॉक्टर्स महीने में एक-दो दिन का वक़्त निकालकर इन गरीब बच्चों का इलाज करते हैं। लोगों का चेकअप, उन्हें दवाइयां देना, इंजेक्शन लगाना, सभी कुछ ये डॉक्टर फ्री में करते हैं। अब तक ये लोग लगभग 150 बच्चों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा चुके हैं।

“साथ ही, हमने जगह-जगह पर ‘भगवान की दुकान’ के नाम से कपड़े, स्टेशनरी, बैग आदि के लिए भी स्टॉल लगाए हुए हैं। यहाँ पर समर्थ लोग अपनी पुरानी लेकिन इस्तेमाल करने लायक चीजें दे सकते हैं और जिन्हें ज़रूरत है, वे यहाँ से ले जा सकते हैं,” चंद्र शेखर ने बताया।

आज उनके अलग-अलग अभियान आसनसोल और कोलकाता के लगभग हज़ार बच्चों की ज़िन्दगी संवार रहे हैं। अब उनकी ये सारी पहल दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु जैसे शहरों में भी पहुँच रही हैं। उन्होंने अलग-अलग इलाकों में काम कर रहे सामाजिक संगठनों को अपनी पहल बताई और उन्हें अपने यहाँ ये प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए कहा।

फंडिंग के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि शुरू में उन्होंने खुद अपना अभियान फंड किया और फिर धीरे-धीरे उन्हें अपने साथियों, परिवारजनों और रिश्तेदारों से भी मदद मिली। सोशल मीडिया के ज़रिए उन्हें बहुत से लोग फंडिंग के लिए सम्पर्क करते हैं, लेकिन इस पैसे को खुद लेने की बजाय, वह उनसे उनके किसी एक प्रोजेक्ट को स्पॉन्सर करने के लिए कहते हैं। इस तरह से उनकी पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहती है और उन्हें मदद भी मिल जाती है।

चंद्र शेखर कहते हैं कि अक्सर लोगों को लगता है कि किसी की मदद करना बहुत बड़ा और मुश्किल काम है। काम बड़ा तो है लेकिन मुश्किल नहीं, क्योंकि जब साथ मिलकर कुछ किया जाता है तब कुछ मुश्किल नहीं रह जाता।

“किसी की ज़िन्दगी में बदलाव लाने की सोचने से पहले आप अपने रहन-सहन के तरीकों में थोड़े बदलाव करें। यदि आपको कहीं से आयोजन का निमंत्रण है और आप वहां नहीं जा पाएंगे तो उन्हें पहले से बता दें। इससे सामने वाला उसी हिसाब से खाने का ऑर्डर देगा और खाना बर्बाद नहीं होगा। यह एक छोटा-सा कदम है पर बड़ा बदलाव ला सकता है,” उन्होंने अंत में कहा।

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यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप चंद्र शेखर कुंडू से संपर्क करना चाहते हैं तो 9647627616 पर कॉल करें। उनके अभियानों के बारे में जानने के लिए उनका फेसबुक पेज देख सकते हैं!

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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