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सूखाग्रस्त क्षेत्र में सालाना 200 टन अंगूर उगा रहा है यह किसान, 4 लाख/एकड़ है कमाई!

“जब मैंने किसानी शुरू की थी, तब मैं साइकिल से आता-जाता था। आज मेरे पास 2 कार और 7 मोटरसाइकिल हैं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पानी बचाने से मेरी ज़िंदगी बदल जाएगी। यह वाकई अनमोल है।”

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पिछले साल महाराष्ट्र के नासिक जिले में 10 हज़ार किसानों ने प्रदर्शन किया ताकि सरकार उनकी समस्याओं पर ध्यान दे। गैर-मौसम बारिश और पानी के घटते स्तर से जिले में सूखे के हालात थे और इस वजह से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

दुर्भाग्य की बात है कि यहाँ बहुत से गांवों को अभी भी पानी की कमी से जूझना पड़ रहा है। इनमें से वडनेर भैरव गाँव एक अपवाद है।

इस गाँव के लगभग 80% लोग कृषि से जुड़े हुए हैं और यह गाँव अपने रसीले और मीठे अंगूरों के मशहूर है। यहाँ के किसानों पर जिले के हालातों का कोई खास असर नहीं पड़ा और उनकी उपज भी अच्छी हुई- इस बात का श्रेय जाता है अंगूर की खेती करने वाले एक किसान बापू भाऊसाहेब सालुंके को।

पिछले 15 सालों से यह 37 वर्षीय किसान अपने 22 एकड़ के फार्म में वर्षा जल संचयन कर रहा है और हर साल लगभग 2 करोड़ लीटर बारिश का पानी बचा रहा है। इससे पानी की कमी दूर होने के साथ-साथ, उनके खेतों की फसल भी अच्छी होती है।

Jaivik Kisan Nashik
Bapu Bhausaheb Salunke

बारिश के पानी को बर्बाद होने से रोकना, भूजल को फिर से रिचार्ज करना और तालाब को भरना- इस तीन-स्टेप की प्रक्रिया से सालुंके कभी भी अपने खेतों से पानी कम नहीं होने देते।

सालुंके के काम को देखकर उनके गाँव के अन्य किसान भी प्रेरित हुए और आज इस गाँव में सभी बारिश के पानी को संचित करने में विश्वास करते हैं।

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खेती करते हुए खेती से सीखना:

सालुंके को स्कूल की पढ़ाई छोड़नी पड़ी, लेकिन उन्होंने इस बात को दिल पर नहीं लिया। उन्होंने इसे खेती करने के अपने सपने को पूरा करने का एक मौका समझा। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा,

“हमारे परिवार का मुख्य काम किसानी है और इसलिए मैं फसल, बीज, और मिट्टी के बीच पला-बढ़ा। मेरे पिता खेत को अकेले नहीं सम्भाल पाते थे और मैंने 2004 से उनकी मदद करना शुरू किया। पहली बार मुझे समझ में आया कि एक सूखाग्रस्त क्षेत्र में किसान क्या-क्या समस्याएं झेलता है।”

उस समय, सालुंके का परिवार अनाज और दालें उगाता था और अंगूर एक छोटे से हिस्से पर बोये जाते थे।

ओलावृष्टि इस इलाके में बहुत सामान्य बात है और इस वजह से फसल कई बार खराब हो जाती है। इसके बाद, कम बारिश स्थिति को और बिगाड़ देती है।

 

“हमें ज़मीन के और वाटरशेड के विकास के बारे में कुछ नहीं पता था। हमें यह भी नहीं पता था कि मिट्टी में कौन-से बीज सही रहेंगे,” उन्होंने बताया।

एक रिश्तेदार के कहने पर उन्होंने महाराष्ट्र के वाटर एंड लैंड मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट, औरंगाबाद से 2004 में पांच दिन का एक ट्रेनिंग प्रोग्राम किया। इस प्रोग्राम में उन्हें वर्षा जल संचयन, माइक्रो-इरिगेशन और ज्यादा उपज देने वाले बीजों की पहचान करना आदि सिखाया गया। सालुंके को यह प्रोग्राम काफी अच्छा लगा और बाद में भी अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए उन्होंने यहाँ पर ट्रेनिंग ली।

वह अपनी सफलता का श्रेय प्रोफेसर बीएम शेते को देते हैं जिन्होंने पिछले 35 वर्षों में 1 लाख किसानों को ट्रेनिंग दी है।

“यहाँ पर लाखों किसान हैं जिनके पास ज़मीन की कोई कमी नहीं है, लेकिन फिर भी उन्हें अच्छी उपज लेने में परेशानी होती हैं। इंस्टिट्यूट में हम उन्हें पहले से उपलब्ध साधनों को सही से इस्तेमाल करना सिखाते हैं। सालुंके का खेत इसका उदहारण है। माइक्रो-इरीगेशन करके वह अंगूर की अच्छी उपज ले रहा है बिना इसका पोषण खोए,” प्रोफेसर शेते ने बताया।

 

कम पानी में ज्यादा खेती:

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ट्रेनिंग के बाद, वह अब ज्यादा अच्छे से और आत्म-विश्वास से खेती कर रहे हैं। साल 2007 में उन्होंने अपनी एक एकड़ ज़मीन पर वाटरशेड तालाब बनवाया, जिसकी लागत छह लाख रुपये आई। यह उनके लिए बहुत बड़ा कदम था। उन्होंने अपने खेत में एक कुआं भी खुदवाया है।

“तालाब की गहराई 275×155 फीट है और इसमें 2 करोड़ लीटर पानी इकट्ठा हो सकता है। दो महीने की लगातार बारिश में तालाब और कुआं, दोनों भर जाते हैं। इस साल मैंने फार्म की ज़्यादातर सिंचाई बारिश के पानी से ही की,” सालुंके ने बताया।

इसके बाद उन्होंने आधे एकड़ में एक और वाटरशेड तालाब बनवाया, जिसमें 50 लाख लीटर पानी इकट्ठा हो सकता है। उन्होंने अपने खेतों के चारों तरफ ऊँची मेंढ़ भी बनाई हैं ताकि सिंचाई के बाद पानी बाहर न बह जाए। इससे मिट्टी का कटाव रुकता है, बारिश का पानी संचित होता है और भूजल स्तर बढ़ता है।

“ये मेंढ़ दूसरे किसानों के लिए भी मददगार हैं क्योंकि इनकी वजह से आस-पास के इलाके में भी भूजल का स्तर बढ़ता है,” उन्होंने बताया।

उन्होंने अपने फार्म के लिए माइक्रो-इरिगेशन सिस्टम बनाया है। इसमें पेड़ों की जड़ों के पास बूंद-बूंद करके पानी दिया जाता है। इससे पानी भाप बनाकर उड़ता नहीं है और अंगूरों में पोषण भरपूर होता है।

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अपने बढ़ते फायदे को देखकर सालुंके ने दूसरी फसले उगाना छोड़ दिया और आज उनका फार्म, अंगूर के फार्म में तब्दील हो चूका है।

“मैंने अंगूर की खेती के लिए बहुत से जैविक तरीके भी अपनाए हैं, जैसे कि मल्चिंग के लिए पॉलिथीन की जगह मैं मिट्टी को गन्ने के छिलकों से ढकता हूँ। इनमें नमी होती है और यह मिट्टी की गुणवत्ता को बढाते हैं। यह खाद के लिए भी एक बेहतर विकल्प है,” उन्होंने कहा।

केमिकल का प्रयोग कम से कम हो इसलिए वह गाय का गोबर भी इस्तेमाल करते हैं।

वह बताते हैं कि पहले उनके 3 से 5 एकड़ फार्म की सिंचाई भी मुश्किल से हो पाती थी। अब जब से उन्होंने पानी के लिए नयी तकनीकें इस्तेमाल करना शुरू किया है, उनके 22 एकड़ फार्म के लिए आसानी से आपूर्ति हो जाती है।

उनके खेत में 8 किस्मों के अंगूरों के 22 हज़ार पेड़ हैं। उनका सालाना उत्पादन 200 टन होता है, जिसे वह भारत में और बाहर के देश जैसे कि रूस, चीन, बांग्लादेश और श्रीलंका में बेचते हैं। वह कहते हैं कि अभी भी अंगूर की फसल का सही दाम मिलना मुश्किल है क्योंकि बिचौलिए बहुत ज़्यादा हैं। इससे बचने के लिए वह अपनी उपज ज़्यादातर बाहर एक्सपोर्ट करने की कोशिश करते हैं।

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उनका आर्थिक स्तर भी काफी बढ़ा है क्योंकि अब उनकी लागत कम होती है और कमाई ज्यादा। उनकी कमाई 4 लाख रुपये प्रति एकड़ है।

अंत में वह कहते हैं, “जब मैंने किसानी शुरू की थी, तब मैं साइकिल से आता-जाता था। आज मेरे पास 2 कार और 7 मोटरसाइकिल हैं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि पानी बचाने से मेरी ज़िंदगी बदल जाएगी। यह वाकई अनमोल है।”

उनसे संपर्क करने के लिए आप +91 99707 20031 पर फ़ोन कर सकते हैं!

मूल लेख: गोपी करेलिया

संपादन – मानबी कटोच 

 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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