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इनके प्रयासों से बना मध्य-भारत का पहला सोलर किचन, बदल दी हज़ारों महिलाओं की तकदीर!

जनक दीदी के सौर ऊर्जा से संचालित घर में अब तक 85,000 लोग आकर सस्टेनेबल लिविंग के गुर सीख चुके हैं।

ये कहानी उस औरत की है जिसने लाख परेशानियों को सहने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और डटी रही। वह समाज सेवा की एक ऐसी मिसाल बनकर उभरी की उन्हें भारत सरकार द्वारा साल 2015 में देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक अलंकरण सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

पद्मश्री सम्मान प्राप्त करती हुईं डॉ. जनक पलटा मगिलिगन

हम बात कर रहें हैं डॉ जनक पलटा मगिलिगन की, जो आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह इंदौर के सनवादिया गाँव में रहती हैं और सौर ऊर्जा पद्धति पर बने अपने घर में रहकर हज़ारों लोगों को ट्रेनिंग दे रही हैं। वह अपने वर्षों से संचित ज्ञान को दुनियाभर में निःस्वार्थ भाव से बांटने का काम कर रही हैं।

‛द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए वह बताती हैं, “मैं 72 वर्ष की हूँ और चंडीगढ़ में पली बढ़ी। साल 1985 में मैं आदिवासी महिलाओं के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर शुरू करने के लिए इंदौर गई। इस कार्य के लिए मुझे बहाई संस्था द्वारा भामोरी में 6 एकड़ जमीन दी गई। मैनें यहां 3 साल तक काम किया, जिसकी शुरुआत अकेली रहकर चारदीवारी निर्माण से हुई। धीरे-धीरे इंस्टीट्यूट बनकर तैयार हुआ और मैं इस दौरान गाँव में ही काम करती रही।”

इस इंस्टीट्यूट में 15 साल से अधिक उम्र की आदिवासी लड़कियां, महिलाएँ और जनजातीय क्षेत्र की महिलाएँ थी जो कभी स्कूल नहीं गई थीं।

इस इंस्टीट्यूट को 15 सालों बाद एक एनजीओ बनाने का अधिकार देते हुए पूरी स्वायत्तता दी गई। इसका नाम ‛बरली ग्रामीण महिला विकास संस्थान’ रखा गया। आदिवासी घर में छत के बीच में जो आधार स्तंभ होता है, उसे भिलाली (भील) बोली में ‘बरली’ कहते हैं। जनक दीदी का मानना है महिलाएँ ही परिवार और समाज की बरली हैं। उन्होंने 26 वर्षों तक बरली ग्रामीण महिला विकास संस्थान के निदेशक के रूप में सेवा दी। यहां गाँव की जरूरतें, गाँव की जीवन शैली, संस्कृति के आधार पर पाठ्यक्रम बनाए गए, जिसमें साक्षरता, स्वास्थ्य, अपना और अपने समुदाय का विकास, सिलाई-कढ़ाई और ब्लॉक प्रिंटिंग जैसे विषय थे।

जनक दीदी ने कुछ दिनों बाद उत्तरी आयरलैंड के बहाई सेवक जिम्मी मगिलिगन से शादी की। फिर वह भी इसी सेंटर में मैनेजर के रूप में जुड़ गए।

पति जिम्मी मगिलिगन के साथ जनक पलटा

जनक दीदी पर जब गाँव के लोगों का भरोसा बढ़ने लगा तो उन्होंने अपने घर की महिलाओं को ट्रेनिंग के लिए भेजना शुरू किया। धीरे-धीरे जब इंस्टीट्यूट की महिलाएँ साक्षर हुईं तो उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग के माध्यम से परीक्षाएं दीं। 6 महीने तक उन महिलाओं को निशुल्क खाना-पीना, ट्रेनिंग, रहने की व्यवस्था मुहैया कराई जाती थी। दानदाता संस्थाओं की सहायता से सब चलता रहा। 6 एकड़ के इस परिसर को कुछ ऐसे बनाया गया था कि अपनी जरूरत की सभी वस्तुएं वहीं उगाकर खानी थीं। पर्यावरण को ध्यान में रखकर 900 पेड़ लगाए गए थे। वहां कोई भी, किसी भी तरह का कोई कचरा नहीं करता था।

सोलर एनर्जी को बनाया लोकप्रिय…
जनक दीदी सोलर एनर्जी का इस्तेमाल रोजमर्रा के काम में करना चाहती थीं। धीरे-धीरे सोलर किचन बनाने में उन्हें और उनके पति जिम्मी को सफलता मिली। ये मध्य भारत का पहला सोलर किचन था। 150 लोगों के लिए सुबह-शाम सोलर किचन की मदद से भोजन बनता था। उस किचन को देखने के बाद महिलाओं में इच्छा जाग्रत हुई कि उनके घरों में भी ऐसा ही सोलर कुकर होना चाहिए। स्थानीय दानदाताओं के सहयोग से 500 ट्रेनी महिलाओं को सोलर कुकर दिए गए।

सोलर कुकर के उपयोग को लेकर जब महिलाओं की प्रतिक्रिया जानी गई तो उनमें से एक ने बताया कि प्रेग्नेंसी के एडवांस स्टेज में जब महिलाएं लकड़ी का बहुत बड़ा गट्ठर लेकर चलतीं थीं तो उनमें से कुछ का मिसकैरेज भी हो जाता था, ऐसे में सोलर कुकर वाकई फायदेमंद साबित हुआ। सोलर कुकर का इस्तेमाल कर महिलाओं ने पीने का पानी उबालकर पीना शुरू किया और बच्चों को भी पिलाया। इससे बच्चों को पानी से होने वाली दस्त-उल्टी की बीमारियों में बड़ी राहत मिली।

जनक दीदी ने पीएचडी की डिग्री भी हासिल की है। उन्हें ‛ग्लोबल फाइव हंड्रेड रोल ऑनर’ के लिए पहले पृथ्वी सम्मेलन में रियो डी जिनेरो बुलाया गया। वापसी पर उन्होंने मन बनाया कि अब से वह जो भी कार्य करेंगी, उसमें पर्यावरण संरक्षण मुख्य होगा।

स्तन कैंसर से लड़ी लड़ाई
जनक दीदी बताती हैं कि उन्हें 2007 में स्तन कैंसर हुआ था। 4 बार सर्जरी हुई। इस दौरान उन्होंने कैंसर के कारणों को समझने पर ज़ोर दिया। केमिकल, पॉल्युशन भी इसके कारण हैं, उन्हें ये बात समझ आई। अब कैंसर से जुड़े कारणों और जागरूकता पर बात करना उनकी प्राथमिकता बन गयी। उन्होंने ‛संगिनी संस्था’ के साथ मिलकर ब्रेस्ट कैंसर के मरीज़ों और पुनर्वास के लिए कार्य किया। महिलाओं को जागरूक करने के लिए कई गाँवों में कार्यक्रम भी किये।

गाँव को बनाया आशियाना…
इस दौरान उन्होंने हज़ारों महिलाओं को जागरूक किया। आगे चलकर इन्हीं में से चयनित महिलाओं को ट्रेनर बनाया। फिर रिटायर होने की सोची। रिटायरमेंट के पश्चात उन्होंने इंदौर के सनवादिया गाँव में घर बनाया। इस घर को बनाने के पीछे उद्देश्य रखा कि ऐसा जीवन जीना जहां गंदगी न हो। जहां सब प्रकृति की गोद से उगाकर खाएं। इस घर को उनके पति जिम्मी ने अपने हाथों से बनाया। घर में सोलर ऊर्जा पर काम किया गया। आज 13 प्रकार के सोलर कुकर्स को आप यहां देख सकते हैं। 10 जून, 2011 से अब तक 85,000 लोग यहां आकर सस्टेनेबल लिविंग के गुर सीख चुके हैं।

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इस घर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि इसमें दिन में किसी तरह की कोई ऊर्जा का उपयोग नहीं होता। हवा और रौशनी बहुतायत मात्रा में बनी रहती है। सबसे पहले यहां पवन चक्की और सोलर पावर स्टेशन बनाया गया। 50 परिवारों को 9 साल से सोलर और विंड पावर से चलने वाली 19 स्ट्रीट लाइट निःशुल्क दी जा रही है। इन्हीं परिवारों के बच्चे यहां निःशुल्क पढ़ने आते हैं।

साल 2011 में जनक दीदी को गहरा आघात लगा क्योंकि एक कार दुर्घटना में उनके पति जिम्मी उन्हें हमेशा के लिए छोड़ गए। भले ही जीवन ने उन्हें झटका दिया हो, पर वह प्रार्थनाओं और ईश्वर की दी हुई हिम्मत से फिर उठ खड़ी हुईं।

सेंटर में होने वाले कार्य पति को किए समर्पित…
अपने सारे कार्यों को जनक दीदी ने अपने पति को समर्पित किया। घर में बने सेंटर का नाम ‛जिम्मी मगिलिगन सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवेलपमेंट’ रखा।  पति की याद में वह उनके जन्मदिन पर वृक्षारोपण करती हैं जबकि पुण्यतिथि पर 7 दिन तक सस्टेनेबल कार्यक्रम आयोजित करती हैं। वह अपनी सालगिरह पर कार्यशाला करती हैं, जिसका विषय ‛शादी में कचरा नहीं करना’ होता है।

खेत में उगती है 65 प्रकार की उपज…
जनक दीदी अपने आधा एकड़ के फार्म हाउस में खाने की लगभग 65 प्रकार की वस्तुएं खुद उगाती हैं। सारे मसाले, सब्जियां, दाल, अनाज, फल उनके खेत से आते हैं। मूंगफली, जामफल से वह बटर बनाती हैं, फ़ूड प्रोसेसिंग करती हैं। 5 गायें हैं जिनकी वजह से दूध, दही, पनीर, घी, मलाई आसानी से मिल जाता है। कई मामलों में जनक दीदी का घर एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करता है। नमक, तेल, चाय पत्ती और शक्कर को छोड़ दें तो बाकी सभी कुछ फार्म पर ही उपजता है।

“मैं बाज़ार से कुछ नहीं खरीदती इसलिए कचरा भी घर में नहीं आता। मैं नीम की टहनी से दातुन करती हूँ, अलोवेरा से नहाती हूँ। अरीठे से कपड़े धोती हूँ। राख से बर्तन मांझती हूँ। केमिकलमुक्त, कचरामुक्त, प्लास्टिकमुक्त जीवन है। गैस का एक सिलेंडर 2 साल 5 महीने में खाली होता है क्योंकि मेरे पास सोलर एनर्जी है। अपने साथ हमेशा स्टील का गिलास और स्टील की बोतल रखती हूँ। पेपर नैपकिन का इस्तेमाल नहीं करती, रुमाल रखती हूँ। लोगों को सोलर एनर्जी से मिठाई, पनीर बनाना सिखाती रहती हूँ। इस प्रकार पूरी तरह आत्मनिर्भर हूँ।” – जनक दीदी

अब हैं मेंटर की भूमिका में…
जनक दीदी अब सस्टेनेबल डेवेलपमेंट के लिए किए जा रहे स्टार्टअप्स की मेंटर हैं। उनके यहां इंटर्नशिप कर चुके एक युवा वरुण रहेजा को हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में ‛स्टार्टअप मीट 2020’ में प्रथम स्थान मिला, साथ ही उनके स्टार्टअप को 1 लाख रुपये का कैश प्राइज़ मिला। उनके ‛अरुणोदय प्रोजेक्ट’ के लिए 20 लाख रुपये की ग्रांट भी मंजूर किया गया।

अंत में जनक दीदी कहती हैं, “यदि हम में ईश्वर का डर है तो हमें किसी तरह के सीसीटीवी कैमरों की कोई जरूरत नहीं। सीसीटीवी कैमरे डर पैदा करते हैं, मैं चाहती हूं कि हम एक दूसरे पर विश्वास पैदा करें। व्हाट्सएप कम करें, फोन के भरोसे ज्यादा नहीं रहें। मिलते जुलते रहें, बच्चों की बात सुनें।”

जनक दीदी से संपर्क करने के लिए आप उन्हें इमेल कर सकते हैं। फेसबुक या वेबसाइट के ज़रिए भी आप उनसे जुड़ सकते हैं। उन्हें पत्र लिखने या उनसे मिलने के लिए उनका पता है –  Dr. Janak Palta McGilligan, Director of Jimmy McGilligan Centre For Sustainable Development, Village Sanawadiya, Indore, MP- 452016

संपादन – अर्चना गुप्ता

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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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