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इन दिव्यांगों के बनाए बल्ब से रौशन हो रहे घर, युवक की पहल ने बदली तस्वीर!

डीजीएबल्ड के साथ काम कर रहे लोगों में से बहुत से दिव्यांग ऐसे भी हैं, जिन्हें उनकी ज़िंदगी की पहली कमाई यहीं से मिली है!

भारत में लगभग 2 करोड़ 70 लाख दिव्यांगों की आबादी है। इनमें से 70% लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और लगभग 72% दिव्यांगों को कभी कोई रोजगार नहीं मिलता।

देश को आज़ाद हुए इतने दशक बीत गए, लेकिन आज भी हमारे देश में समानता का अधिकार पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। समाज के न जाने कितने ही तबके बिना सही अधिकारों के अपना जीवन बिता रहे हैं और दिव्यांग उन्हीं तबकों में से एक हैं।

हम करोड़ों लोग जहां इन तथ्यों को अनदेखा कर आपकी रफ्तार से ज़िंदगी जी रहे हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी गति को धीमा किया है ताकि इन दिव्यांगों को उनका सही हक दे सकें। छत्तीसगढ़ के दुर्ग में रहने वाले 38 वर्षीय कुनाल गुप्ता भी इन चंद लोगों में से एक हैं!

कुनाल ने अपनी पत्नी, अदिति गुप्ता के साथ मिलकर ‘डीजीएबल्ड‘ नामक एक सोशल एंटरप्राइज शुरू किया है ताकि वे ग्रामीण इलाकों में रहने वाले दिव्यांगों को स्किल ट्रेनिंग देकर, उन्हें रोजगार दिलाने में मदद कर सकें। अपनी इस पहल के बारे में कुनाल ने द बेटर इंडिया से बात की।

Kunal Gupta along with Digiabled (Divyaangon) associates

उन्होंने बताया, “हमने साल 2012 में अपना स्किल ट्रेनिंग का बिज़नेस शुरू किया था। इसके अंतर्गत हम ग्रामीण इलाकों के कम पढ़े-लिखे और बेरोजगार बच्चों को इंडस्ट्री के हिसाब से स्किल ट्रेनिंग कराकर, उनकी प्लेसमेंट करवाते हैं। हमारा उद्देश्य बच्चों के टैलेंट को निखार कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना है।”

कुनाल का ट्रेनिंग सेंटर आईटी, रिटेल, हॉस्पिटैलिटी और टेलेकॉम आदि के क्षेत्र में छात्रों को स्किल ट्रेनिंग देता है। ट्रेनिंग के बाद उन छात्रों की प्लेसमेंट की ज़िम्मेदारी भी वही लेते हैं। वह आगे बताते हैं कि उनका संगठन ज़्यादातर सरकारी स्किल प्रोग्राम या फिर सीएसआर स्पॉन्सर्ड स्किल ट्रेनिंग प्रोजेक्ट्स करता है।

उन्होंने अब तक 3, 500 बच्चों को स्किल ट्रेनिंग दी है और लगभग 3 हज़ार को प्लेसमेंट दिलाने में कामयाब रहे हैं।

“हमारा काम अच्छा चल रहा था फिर साल 2016 में हमें जशपुर जिले में एक स्किल ट्रेनिंग का प्रोजेक्ट मिला। इसमें हमें कुछ दिव्यांगों को ट्रेन करना था और उनकी प्लेसमेंट करवानी थी। यह हमारे लिए बिल्कुल ही नया अनुभव था,” उन्होंने कहा।

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अपने इस प्रोजेक्ट के दौरान उन्हें समझ में आया कि दिव्यांगों का जीवन कितना मुश्किल है। हर दिन उन्हें मेहनत करता देख, कुछ न कुछ नया सीखता देख, उन को बहुत ख़ुशी होती थी। कुनाल और उनकी टीम ने उन्हें कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स जैसे कि एलईडी बल्ब असेम्बल करना सिखाया। वह उन्हें सभी ज़रूरी सामान दे देते और उन्हें बताते कि कैसे इस सामान से बल्ब बनाना है।

(Divyaangon) Differently Abled people learning skills

बल्ब की तरह ही उन्होंने दिव्यांगों को सोलर लैंटर्न और पॉवर बैंक आदि बनाना सिखाया। ट्रेनिंग कर रहे सभी लोगों को काम में मज़ा आ रहा था इसलिए करण और उनकी टीम भी उनके ग्रोथ से काफी खुश थे।

“मुझे धक्का तब लगा, जब मैं ट्रेनिंग के बाद इन लोगों की प्लेसमेंट नहीं करा पाया। किसी कंपनी ने इन्हें हायर नहीं किया क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके उत्पादन पर फर्क पड़ेगा। इसके बाद, हमने भारत में दिव्यांगों की स्थिति के बारे में गंभीरता से पढ़ा,” कुनाल ने बताया।

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दिव्यांगों की स्थिति के बारे में पढ़कर और जानकर, कुनाल और अदिति को समझ में आ गया कि उन्हें अपने स्तर से हटकर कुछ करना होगा। उन्होंने किसी भी तरह इन दिव्यांगों को रोजगार दिलाने की ठान ली और यहीं से ‘डीजीएबल्ड’ का आइडिया जन्मा।

साल 2018 में उन्होंने अपनी खुद की फंडिंग लगाकर इस सोशल प्लेटफॉर्म को शुरू किया। इसके ज़रिए, वे दिव्यांगों को मुफ्त में स्किल ट्रेनिंग कराते हैं और फिर उन्हें अपने ही साथ काम करने के लिए हायर करते हैं। इन लोगों को सभी ज़रूरी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है, जिससे ये लोग एलईडी बल्ब, पॉवर बैंक और सोलर लैंटर्न जैसे प्रोडक्ट्स बनाते हैं।

They are making LED Bulbs, Solar Lanterns, and power banks.

प्रोडक्ट्स तैयार होने के बाद उनकी क्वालिटी टेस्ट की जाती है और फिर इन्हें बाज़ार में बेचा जाता है। कुनाल के मुताबिक उनका यह प्रोजेक्ट अभी जशपुर और सुकमा, दो जगहों पर चल रहा है। इन जगहों पर उनके ज़रिए 41 दिव्यांगों को रोजगार मिल रहा है। इनमें से बहुत से लोगों को उनकी पहली कमाई डीजीएबल्ड से ही मिली है।

इन्हें एक बल्ब असेम्बल करने के 5 रुपये, सोलर लैंटर्न के 20 रुपये और पॉवर बैंक के लिए 40 रुपये मिलते हैं। एक दिन में एक दिव्यांग की क्षमता 100 बल्ब या 30 लैंटर्न या फिर 20 पॉवर बैंक असेम्बल करने की है। ऐसे में, एक दिव्यांग यहाँ पर दिन के 500 से 800 रुपये कमा लेता है।

डीजीएबल्ड के साथ काम करने वाली अम्बिका बचपन से ही पैरों से दिव्यांग हैं। वह कहती हैं, “बचपन में दूसरे बच्चों को खेलते देख बहुत बार बुरा लगता था। स्कूल में मेरा सपना था कि मैं इंजीनियर बनूँ, लेकिन कुछ कारणवश मैं बन नहीं सकी। यहाँ इनके साथ काम करके मैं बल्ब, लैंटर्न बनाती हूँ तो लगता है कि मेरा सपना पूरा हो गया क्योंकि ये भी एक तरह से इंजीनियरिंग ही है।”

Ambika working on solar lantern

हालांकि, डीजीएबल्ड अभी भी इन दिव्यांगों के लिए एक सशक्त मॉडल बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है। “अभी भी मैं नहीं कहूँगा कि हमने एक सस्टेनेबल मॉडल बना लिया है क्योंकि बहुत सी समस्याएं हैं जिनका सामना हम कर रहे हैं। फिलहाल, हम स्थानीय बाजारों में ही अपने प्रोडक्ट्स बेच पा रहे हैं। बहुत बार होता है कि ग्राहक न मिलने की वजह से हमारे पास काम नहीं होता है,” कुनाल ने बताया।

इस समस्या की वजह से कई बार वह इन दिव्यांगों को काम नहीं दे पाए हैं। अगर उन्हें अपने प्रोडक्ट्स के लिए सही तरह से ग्राहक मिलते रहें तो वह अपना प्रोजेक्ट और भी जगह फैला सकते हैं।

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“इन चुनौतियों को पार करने के लिए हमें फंडिंग की ज़रूरत है और साथ ही, ऐसे कुछ प्लेटफॉर्म्स की, जहां पर हमारे प्रोडक्ट्स को अच्छी मार्केटिंग मिल सके। यदि कोई हमारी इसमें मदद कर सकता है तो बहुत ही अच्छा रहेगा। हम ज्यादा से ज्यादा लोगों की ज़िन्दगी में बदलाव ला पाएंगे,” कुनाल ने कहा।

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप उनकी मदद करना चाहते हैं तो कुनाल गुप्ता से सम्पर्क करने के लिए 9893682444 पर कॉल करें!

संपादन – अर्चना गुप्ता

 

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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