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पॉकेट मनी इकट्ठा कर गरीब बच्चों को जूते, कपड़े और स्टेशनरी बाँट रहे हैं ये युवा!

सरकारी स्कूल के बच्चों को ठंड में बिना स्वेटर और नंगे पैर स्कूल आता देख इन युवाओं ने उनके लिए कुछ करने की ठानी!

राजस्थान के उदयपुर में कुछ युवा मिलकर ‘सिद्धम’ नामक एक सेवा संगठन चला रहे हैं। इस संगठन के ज़रिए इन युवाओं की कोशिश गरीब तबके से आने वाले बच्चों को ज़रूरी और मूलभूत साधन उपलब्ध करवाना है। साल 2016 में उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्विद्यालय में पढ़ने वाले चंद छात्रों ने यह पहल शुरू की थी।

आज ये छात्र भले ही कॉलेज से पास हो गए हैं लेकिन उनकी पहल उसी तरह बरक़रार है। इन युवाओं में शामिल कुछ नाम हैं- सिद्धार्थ सोनी, अभिजीत सिंह, नरेन्द्र सिंह नरुका, गौरव वर्मा, हर्षवर्धन सिंह चौहान, प्रद्युम्न सिंह, भगवती लाल, प्रियांश सिंह और गजेन्द्र सिंह। इनसे प्रेरित होकर और भी बहुत से युवा उनसे जुड़कर काम कर रहे हैं।

हम सब जानते हैं कि उदयपुर भारत के प्रमुख टूरिज़्म शहरों में से एक है। उदयपुर शहर ऐसे तो मन-मोहक लगता है, लेकिन इसके आस-पास के गाँवों की स्थिति बदहाल है। अपने अभियान के बारे में 27 वर्षीय सिद्धार्थ बताते हैं कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वह अपने दोस्तों के साथ अक्सर उदयपुर के आस-पास की जगहों पर घूमने जाया करते थे। एक ट्रिप के दौरान वे सभी ढींकली गाँव गए थे।

Siddham Team in a school

“उस गाँव के सरकारी स्कूल में हम यूँ ही घूमते-घूमते पहुँच गए और बच्चों से बातें करने लगे। उस समय ठंड थी और हमने देखा कि ज़्यादातर बच्चों के पैरों में जूते तो क्या चप्पलें तक नहीं थी। बहुतों ने गरम कपड़े भी नहीं पहन रखे थे। हम जितने भी लोग थे, हमने तय किया कि हम लोग कुछ-कुछ पैसे जोड़ेंगे और इन बच्चों के लिए जूते और स्वेटर लेकर आएंगे,” उन्होंने बताया।

इस घटना के लगभग 2 महीने बाद सिद्धार्थ और उनकी टीम फिर से इस स्कूल में पहुंची। वे लोग अपने साथ 35 जोड़ी जूते लेकर गए थे। जब इन बच्चों को ये जूते मिले तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। बच्चों को इतना खुश देखकर इन युवाओं का जोश और बढ़ गया।

उन्होंने अपने इस अभियान को जारी रखने का फैसला किया और इसे ‘सिद्धम’ नाम दे दिया। इसके ज़रिए उनका उद्देश्य था ज़रूरतमंद बच्चों की मदद के लक्ष्य को सिद्ध करना यानी कि पूरा करना!

ढींकली गाँव से शुरू हुआ उनका यह अभियान आज लगभग 11 गाँवों तक पहुँच चुका है। इन 11 गाँवों में उन्होंने 20 से ज्यादा सरकारी स्कूलों तक अपनी पहुँच बनाई है।

They are distributing shoes, clothes and stationary, etc.

सिद्धार्थ बताते हैं कि जैसे-जैसे उन्होंने स्कूलों का दौरा किया, वैसे-वैसे उन्हें यहाँ पर बच्चों की और फिर जिन तबकों से वे आते हैं वहां रहने वाले लोगों की छोटी-बड़ी समस्याएँ समझ में आने लगीं।

“शुरू में हमने, इन बच्चों को यूनिफॉर्म, स्टेशनरी, जूते-चप्पल जैसी सुविधाएँ मुहैया करावाई। इसके बाद जब हम बच्चों से बात करते तो हमें और भी परेशानियों का पता चलता। जैसे कि पानी-बिजली की उचित व्यवस्था न होना। बहुत बार बच्चे मिड डे मील की भी शिकायत करते थे,” उन्होंने आगे कहा।

इन सब परेशानियों के लिए सिद्धम टीम ने पहले स्कूल प्रशासन से बात की और फिर ज़रूरत पड़ने पर उन्होंने ग्राम पंचायत को भी शामिल किया। उनके मुताबिक, सिद्धम के प्रयासों से लगभग 5 स्कूलों में बिजली व्यवस्था करवाई गई है। साथ ही, उन्होंने स्कूलों में मिड-डे मील की क्वालिटी को भी चेक करना शुरू किया और अपने स्तर पर स्कूल प्रशासन को बच्चों के खाने-पीने पर सही ध्यान देने के लिए जागरूक किया। समय-समय पर वे इन स्कूलों में हेल्थ चेक-अप कैंप भी लगवाते हैं।

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पिछले तीन सालों में, उनका काम स्कूलों से निकलकर गाँव की कच्ची बस्तियों तक भी पहुंचा है। वह कहते हैं कि बहुत बार वे इन बच्चों के घरों तक पहुंचकर उनके माता-पिता से बात करते हैं, ताकि उन्हें समझा सकें कि उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई को गंभीरता से लेना चाहिए। उन्हें स्कूल जाने से नहीं रोकना चाहिए।

ये बच्चे ऐसे तबकों से आते हैं जहां आज भी लोग सिर्फ जंगल से लकड़ियाँ चुनकर बेचते हैं और उसी में जैसे-तैसे घर चला रहे हैं। बच्चों को स्कूल भेजने का सिर्फ एक ही उद्देश्य है मिड डे मील। सिद्धम टीम की कोशिश है कि वे इन बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुझान बढ़ाएं ताकि यही बच्चे आगे कॉलेज आदि तक जा सकें।

“हमारी पूरी कोशिश है कि हम इन बच्चों को कॉलेज में पढ़ता हुआ देखें। इसके लिए हम खुद इन्हें प्रोत्साहित करते हैं और कहते हैं कि अगर ये पढ़ाई में अच्छे रहे तो हम कॉलेज में इनके दाखिले में मदद करेंगे,” सिद्धार्थ ने कहा।

अपने सभी कामों के लिए फंडिंग जुटाने के बारे में वह बताते हैं कि उनकी टीम के सभी सदस्यों ने सबसे पहले अपनी पॉकेट मनी इकट्ठा करके शुरूआत की। इसमें कोई सदस्य 100 रुपये देता तो कोंई 500 रुपये तक भी दे पाता है। अपनी टीम की फंडिंग के अलावा, उन्होंने क्राउडफंडिंग भी की है।

 

इसके अलावा, वे लगातार प्राइवेट स्कूल और कॉलेज आदि में जाकर वहां के बच्चों को उनकी पुराने यूनिफॉर्म, कपड़े, किताबें और बैग आदि डोनेट करने के लिए प्रेरित करते हैं। सिद्धम टीम का इरादा बहुत ही नेक है, लेकिन उनका रास्ता चुनौतीभरा है।

“कितने ही गाँवों में हमें अपने काम के दौरान गाँव के लोगों के विरोध का सामना करना पड़ता है। हर गाँव में कोई न कोई दबंग या नेता बने घूमते लोग होते हैं जिन्हें लगता है कि हमें अगर स्कूल के बच्चों की मदद करनी है तो उनसे अनुमति लें। बहुत बार तो सरपंच भी परेशान करते हैं कि अगर कुछ बाँटना है तो पहले हमें कार्यक्रम में बुलाइए और हमें सम्मान दीजिए।” – सिद्धार्थ

इन सब समस्याओं से बचने के लिए उन्होंने ‘सिद्धम सेवा संस्थान’ को एक एनजीओ के तौर पर रजिस्टर करा लिया है। ताकि उनकी टीम बिना किसी रोक-टोक के अपना काम कर सके।

सिद्धम टीम हर एक चुनौती को पार करते हुए सच्चे मन से लोगों की मदद कर रही है। उनका इरादा बहुत ही स्पष्ट है कि वे इन बच्चों को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं। यदि आप उनके इस नेक काम में मदद करना चाहते हैं तो अपने कपड़े, स्कूल बैग, किताब आदि उन तक पहुँचा सकते हैं।

सिद्धम टीम से सम्पर्क करने के लिए आप 8955335588 या 9649057572 पर कॉल कर सकते हैं! आप उनसे फेसबुक पर भी जुड़ सकते हैं।

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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