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21 सालों से मिर्गी के रोगियों का मुफ्त इलाज करता है यह डॉक्टर!

डॉक्टरों की लापरवाही से बीमार पड़ी माँ की अंतिम इच्छा थी कि बेटा ऐसा डॉक्टर बने जो गरीब की गरीबी को समझे और पैसे के लिए पेशे का गलत इस्तेमाल न करे।

जो लोग डॉक्टर बनते हैं उनमें से कितने ऐसे होते हैं जो अपने इस नोबल पेशे में मरीज़ों की सेवा करते हैं। इस पर बहुत कम जवाब होंगे हमारे पास। लेकिन राजस्थान के जोधपुर में डॉ. नगेंद्र शर्मा नामक एक ऐसे डॉक्टर हैं जो वरिष्ठ न्यूरो सर्जन होने के बावजूद पिछले 21 सालों से मिर्गी के मरीज़ों की सेवा और चिकित्सा के लिए निःशुल्क सेवाएँ दे रहे हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए डॉ. शर्मा कहते हैं,

“मेरा बचपन बहुत ही गरीबी और अभावों में गुज़रा। साल 1955 को रतनगढ़-चूरू के समीप ही एक गाँव में मेरा जन्म हुआ। लगभग 5 साल तक एक असाध्य बीमारी से ग्रसित रहने के बाद मेरी माँ की मृत्यु हो गई।  पिताजी ने अपने जीवन की शुरुआत रेलवे मेल सर्विस (आरएमएस) में चपरासी की पोस्ट से की थी। उस समय उनकी तनख्वाह 25 से 50 रुपए के बीच थी, जिसके चलते हमारी गुज़र हो रही थी। “

मरीज़ों का इलाज़ करते डॉ. नगेंद्र शर्मा

5 साल तक बीमारी से जूझती रहने वाली उनकी माँ ने अपने अंतिम समय में उनके पिता और उन्हें अपने पास बुलाकर कहा कि डॉक्टरों की लापरवाही के चलते उनकी बीमारी का पता नहीं चल पाया। इसलिए, वह चाहती हैं कि पढ़ाई में होशियार नगेंद्र डॉक्टर बने और ऐसा डॉक्टर बने जो गरीब की गरीबी को समझे और किसी भी मरीज़ के साथ धोखाधड़ी न करे या पैसा बनाने के लिए पेशे का गलत इस्तेमाल न करे।

नगेंद्र बताते हैं, “चूंकि उस वक़्त हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि मैं डॉक्टरी का सपना देखूँ। मैंने यह सपना त्यागकर कोई नौकरी करने की सोची ताकि पिताजी का सहारा बन सकूँ। 1971 में ‛बैंक ऑफ बड़ौदा’ का एग्जाम देने के बाद मेरा सिलेक्शन हो गया। इसके बाद पुलिस में सब इंस्पेक्टर का एग्जाम दिया उसमें भी सिलेक्शन हो गया, पर पिताजी ने मुझे कहीं भी नौकरी जॉइन करने नहीं दी। कहा, ‘तेरी माँ के अंतिम बोल हैं, मैं तुझे डॉक्टर बनाऊं और तू डॉक्टर ही बनेगा। अपना लक्ष्य सिर्फ डॉक्टर बनने तक रख। मेडिकल की तैयारी कर, पैसा कहाँ से आएगा, मुझ पर छोड़ दे।’ आख़िरकार पिताजी के प्रोत्साहन और मेरी मेहनत के चलते मेडिकल में मेरा सिलेक्शन हो गया।”

साल 1987 में सेठ जीएस मेडिकल कॉलेज, केईएम हॉस्पिटल, मुंबई से एम सीएच (न्यूरोसर्जरी) करने के बाद डॉ. नगेंद्र वहीं असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर काम करने लगे। साल 1989 में पश्चिमी राजस्थान में पहली बार डॉ. नगेंद्र ने ही न्यूरोसर्जरी ब्रांच की स्थापना की।
साल 1999 आते-आते उन्हें मिर्गी के रोगियों के साथ हो रहे अत्याचारों के बारे में पता चला। इन रोगियों को जूती सुंघाई जाती थी, कोड़े मारे जाते थे। तब उन्होंने सोचा कि इन्हें राहत देने के लिए कुछ काम किया जाना चाहिए। गाँव से आए कुछ मिर्गी के रोगियों से जब उन्होंने बात की तो पता लगा इलाज महंगा होने की वजह से वे पूरा इलाज नहीं करा पाते हैं।

आज भी इलाज की बजाय टोने-टोटके को दी जाती है प्राथमिकता

डॉ. नगेंद्र बताते हैं कि इस रोग को पूर्ण रूप से मिटाने के लिए कम से कम 5 साल तक इलाज कराना पड़ता है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इस दौरान रोगी द्वारा एक भी गोली नहीं छोड़ी जानी चाहिए। दवाइयों और जांचों का खर्च मिलाएं तो करीब महीने का 1200 रुपये का खर्च है। ग्रामीण मरीज़ भोंपों (तांत्रिक बनकर इलाज करने वाले लोग) के पास जाकर 40-50 रुपए में झाड़-फूंक करवा लेते हैं क्योंकि 15-20 मिनट में इस दौरे के बाद मरीज़ खुद ही ठीक हो जाता है। एक दौरे से दूसरे दौरे के बीच का अंतराल 3 से 6 महीने का होता है इसलिए वे लोग नियमित इलाज नहीं करवाते। दूसरी बात उनमें अशिक्षा, आर्थिक तंगहाली व अंधविश्वास भी भरा पड़ा है।

और शुरू हुआ एक मिशन ‛एक सफ़र उम्मीद का’

डॉ. नगेंद्र ने 28 फरवरी, 1999 को निःशुल्क मिर्गी कैम्प की शुरुआत की। इसके बारे में बताते हुए वह कहते हैं,

“हमने विभिन्न कंपनियों से दवाइयाँ मांग-मांगकर इकठ्ठा की और पहला कैम्प किया। इस कैम्प में केवल 75 मरीज़ ही आए, जिसकी वजह से उन्हें थोड़ा अफ़सोस भी हुआ कि गंभीर बीमारी होने बावजूद भी लोगों में जागरूकता नहीं है।”

पहले एक कंपनी दवाएं दे रही थी, बाद में दूसरी कंपनियों से बात की। समझाया गया कि वे मरीज़ों को फ्री सैम्पल दें, बदले में उनकी कंपनी की दवाइयाँ महीने भर के लिए लिखी जाएंगी। 12-15 शिविरों के बाद हुए प्रचार प्रसार से उस वक़्त 12 कंपनियां जुड़ गई थीं, जो हर मरीज़ को एक महीने की निःशुल्क दवाई देती थी। इस प्रकार एक दवा कंपनी जो  दवाई बांटती थी, उसका नम्बर दुबारा एक साल बाद ही आता था।

8,000 से अधिक महिलाओं के घरों में गूंजी किलकारी

2000 से 2005 तक उन्हें शिविरों के संचालन में कई दिक्कतें आईं। सबसे बड़ी दिक्कत यह महसूस हुई कि मिर्गी से ग्रस्त महिला रोगी कभी माँ नहीं बन पाएंगी या उन्हें कभी माँ बनने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए क्यूंकि ऐसा करने से या तो बच्चा मर जाएगा या वे खुद भी मर सकती हैं। उस वक़्त शिविरों में आने वाली कम से कम 4500 महिलाएं ऐसी थीं, जो मातृत्व सुख प्राप्त तो करना चाहती थीं, लेकिन मिर्गी के चलते डर रहीं थीं। डॉ. शर्मा को यह बात बड़ी हैरान करने वाली और साथ ही चैलेंजिंग भी लगी। उन्होंने शहर के सबसे बड़े महिला अस्पताल (उमेद हॉस्पिटल) की सभी गायनोकॉलोजिस्ट और दूसरे डॉक्टरों से बात की लेकिन वे भी रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं थे।

लेकिन फिर बात आगे बढ़ी और शहर के राठी अस्पताल में 150 डिलीवरी डॉ. शर्मा के निर्देशन में निःशुल्क रूप से करवाई गईं। जब महिलाओं में ये बात आपस में फैली तो उनमें भी जागरूकता आई। आज तक डॉ. नगेंद्र शर्मा 8,000 से अधिक महिलाओं को मिर्गी से मुक्त करा चुके हैं और आज वो सभी मातृत्व का सुख ले चुकीं हैं।

22,000 बच्चों के लिए स्कूल एडमिशन के द्वार खुलवाए

उन्हें दूसरी समस्या यह आई कि मिर्गी से ग्रस्त बच्चों को स्कूलों में दौरों की वजह से प्रवेश नहीं दिया जाता। तत्कालीन शिक्षा मंत्री रहे घनश्याम तिवाड़ी से इस बारे में भी उन्होंने बात की। आसपास के सभी स्कूलों के अधिकारियों से बात कर उन्हें प्रवेश देने के लिए समझाया। भरोसा दिलाया कि वह बच्चों का इलाज करेंगे और एक भी बच्चा किसी भी स्कूल में मिर्गी का दौरा पड़ने की वजह से नहीं मरेगा। आज स्कूल जाने वाले इन बच्चों की संख्या 22,000 से भी अधिक है।

हर माह 400 मरीज़ों का निःशुल्क इलाज

निःशुल्क शिविरों के आयोजन के पूरे 21 साल में अब तक 260 कैम्प हुए हैं। इस दौरान 90,000 से अधिक मरीज़ मिर्गी जैसी बीमारी से पूर्ण रूप से स्वस्थ हुए हैं। अतिनिर्धन को आज भी एक माह की निःशुल्क दवा दी जा रही है। कुछ को 15 दिन की दवाई निःशुल्क दी जाती है। जो लोग मोटर साइकिल/कार से आते हैं, उन्हें दवा खरीदने को कहा जाता है। 400 में से हर महीने 100 नए मरीज़ों को इलाज के लिए शामिल किया जाता है।

जो मरीज़ ठीक हो जाते हैं वो अपनी ओर से आर्थिक सहयोग दवाइयों के लिए दे जाते हैं। इस प्रकार हर महीने 15000- 20,000 रुपयों की दवाई इन दानदाताओं की वजह से भी आ जाती है जिससे नए रोगियों को उसका लाभ मिलता है। अभी भी पश्चिमी राजस्थान में मिर्गी के लगभग 4,50,000 रोगी हैं। 1 लाख मरीज़ तो सीधे तौर पर डॉ. शर्मा के संपर्क में हैं। मान सकते हैं कि 50,000 रोगी कहीं और इलाज करवा रहे होंगे लेकिन शेष रहे मरीज़ अभी भी इलाज से कोसों दूर हैं।

डॉ. शर्मा बताते हैं, “हम इन मरीज़ों का न सिर्फ इलाज करते हैं, बल्कि उन्हें डिप्रेशन से निकालने के लिए प्रयास करते हैं। इन मरीज़ों के साथ हर त्योहार और नया साल मनाते हैं। दीवाली पर बच्चों को पटाखे देते हैं। जुलाई में स्कूल किट देते हैं। बालिग बच्चों के इलाज के बाद आईक्यू टेस्ट करने के लिए भी कॉम्पिटिशन करवाते हैं। शुरुआत में जो बच्चा एक स्लोगन तक नहीं लिख सकता, इलाज के बाद पूरी कविता लिख डालता है। 3 साल पहले इलाज के लिए आया एक बच्चा जहां कलर तक नहीं पकड़ पाता था, आज उसे पेंटिंग के लिए फर्स्ट प्राइज़ मिला है।”

अंत में डॉ. शर्मा आप सभी से अपील करते हैं कि जो लोग इस मुहिम में मददगार बनना चाहें, वे हर माह की 30 तारीख को आयोजित शिविर में दवाई बांटकर सहयोगी बन सकते हैं। कोई संस्था चाहे तो कुछ बच्चों को इलाज के लिए गोद भी ले सकती है।

आप डॉ. नगेंद्र शर्मा की मेल आईडी nagendra105@gmail.com पर लिख कर उनसे जुड़ सकते हैं, साथ ही आप उनके मोबाइल नंबर 09414121188 पर उनसे संपर्क कर सकते हैं। आप फेसबुक और वेबसाइट पर भी उनसे जुड़ सकते हैं।

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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