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केवल 10 रूपये में दवा भी और इलाज भी, यह 79 वर्षीय डॉक्टर नहीं हैं किसी मसीहा से कम!

“मैंने गरीबी देखी है और मुझे पता है कि कुछ बहुत ज़रूरी दवाइयों के भी पैसे ना जुटा पाना कैसा होता है।”

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पिछले 50 सालों में ईएनटी स्पेशलिस्ट डॉ. अनप्पा एन. बाली की दिनचर्या में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। वह सुबह 10:30 बजे अपना क्लिनिक खोलते हैं और फिर शाम में 6:30 बजे बंद करते हैं। एक ब्रेक के बाद फिर 8 बजे से एक-दो घंटे के लिए मरीज़ों को देखते हैं।

अपनी तीन सदस्यी टीम की मदद से वह हर दिन अपने शहर और आसपास के गाँवों से आने वाले 80 से 100 मरीज़ों को देखते हैं। पर उनकी खास बात यह है कि वह मरीज़ों से फीस के तौर पर सिर्फ 10 रुपये लेते हैं। यह उनकी कंसल्टेशन और दवाइयों की फीस है। अगर कोई यह फीस भी नहीं दे सकता तो उनका इलाज वह मुफ्त में करते हैं।

कर्नाटक के बेलगावी जिले में ‘हत्ता रुपई डॉक्टर’ के नाम से मशहूर डॉ बाली को उनके संयम, धैर्य और अपने काम में क्वालिटी के लिए जाना जाता है और इसी वजह से लोग उनके पास आते हैं।

उनके क्लीनिक में कितने भी मरीज़ आएं, डॉ बाली किसी को वापिस नहीं भेजते। अगर उन्हें एक-दो घंटे अतिरिक्त रुककर भी उनका इलाज करना पड़े तो भी वह करते हैं। दिहाड़ी मज़दूरों से लेकर घरों में काम करने वाले ज़्यादातर गरीब लोग उनके पास आते हैं।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए इस 79 वर्षीय डॉक्टर ने बताया, “पहले फीस 7 रुपये थी पर फिर लोगों को छुट्टे पैसे वापस देने में दिक्कत होती थी तो हमने फीस 10 रुपये कर दी।”

पर आखिर क्यों डॉ. बाली बने हत्ता रुपई डॉक्टर?

डॉ बाली अपनी ज़िंदगी एक उसूल पर जीते हैं। उनका मानना है कि एक अच्छे काम से दूसरे अच्छे काम की शुरुआत होती है। उन्हें याद है कि कैसे उनके माता-पिता ने आर्थिक समस्याएँ झेली। उनके पास उन्हें पढ़ाने तक के लिए पैसे नहीं थे। वह कहते हैं, “मैंने गरीबी देखी है और मुझे पता है कि कुछ बेसिक दवाइयों तक के भी पैसे ना जुटा पाना कैसा होता है।”

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मेडिकल प्रोफेशन के ज़रिए लोगों के लिए कुछ करने की सोच रखने वाले डॉ बाली ने हमेशा पढ़ाई पर जोर दिया। अपने कुछ रिश्तेदारों की मदद से उन्होंने हुबली यूनिवर्सिटी के कर्नाटक इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस से एमबीबीएस पूरी की।

उन्होंने सरकारी डॉक्टर के तौर पर कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में और फिर बेलगावी जिले में चीफ मेडिकल अफसर के तौर पर काम किया। साल 1998 में उन्होंने अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस जिले के अंतर्गत बैलहोंगल में शुरू की।

“सालों तक पब्लिक हेल्थकेयर सेक्टर में काम करके मेरा नज़रिया काफी बढ़ा। पोषण की कमी के चलते प्रदेशीय समुदायों में एनीमिया (खून में हीमोग्लोबिन की कमी) होना बहुत आम बात है। वे लोग अच्छा और भरपूर खाना नहीं जुटा पाते हैं और इस वजह से उन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ होती हैं। इसके अलावा उन्हें दवाइयों के लिए पैसे भी चाहिए होते हैं। ये एक पूरा चक्र है और मैं इसे तोड़ना चाहता हूँ,” उन्हें आगे कहा।

रिटायरमेंट के बाद डॉ. बाली एक अच्छी आरामदायक ज़िंदगी गुजार सकते थे पर उन्होंने गरीबों के लिए अपने हुनर का इस्तेमाल करना शुरू किया। बैलहोंगल के 56 वर्षीय स्कूल टीचर, रामकृष्ण ने द बेटर इंडिया को बताया, “बुढ़ापे की वजह से मुझे अक्सर जुकाम और बुखार होता रहता है। मैं दवाइयाँ खरीद सकता हूँ पर डॉ. बाली जितना अच्छा डॉक्टर मिलना मुश्किल है। इसलिए मैं पिछले एक दशक से उनके पास ही जाता हूँ।”

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लोगों का डॉ. बाली पर इतना विश्वास है कि बेलवाड में रहने वाली एक 16 वर्षीय लड़की रश्मि को जब भी बुखार या फिर कोई अन्य बीमारी होती है तो वह 7 किमी दूर उनके पास बैलहोंगल आती हैं।

डॉ. बाली कहते हैं, “रश्मि की माँ मेरे पास कुछ साल पहले खांसी और बुखार के चलते आयी थी। उसे एड्स था लेकिन इतने पैसे नहीं थे कि वह अपने लिए इंजेक्शन खरीद सकें। मैंने कुछ महीनों तक उसकी दवाइयों और इंजेक्शन का खर्च उठाया था और फिर 56 साल की उम्र में उसकी मौत हो गयी। शहर में परिवार का कोई और सदस्य न होने की वजह से रश्मि बेलवाड में अपने रिश्तेदार के यहां चली गयी। मुझे लगता है कि उसे मुझ पर भरोसा है और इसलिए वह मेरे पास आती है।”

डॉ. बाली की अपील:

भारत में एक सर्वेक्षण के मुताबिक, “देश के 90% लोगों के पास प्राइवेट या सरकारी, किसी भी तरह का हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है।”

दूसरे शब्दों में कहें तो ज़्यादातर नागरिक अपनी बचत के पैसे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर खर्च करते हैं और फिर बहुत बार कर्ज भी लेते हैं। अगर फिर भी पैसे न जुटा पाए तो वे अपना ट्रीटमेंट ही नहीं कराते। फिर प्राइवेट क्लिनिक्स और डॉक्टरों ने बेसिक हेल्थकेयर को भी इतना महंगा बना दिया है कि हर कोई उनके पास नहीं जा सकता। सरकारी अस्पतालों की बात करें तो चंद अस्पताल हैं जहां सही और गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराई जाती हैं।

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ऐसे में, डॉ. बाली जैसे कुछ चंद नाम लोगों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं। अपने सामर्थ्य से भी परे जाकर वे लोगों का इलाज कर रहे हैं। अपनी फीस के बारे में वह कहते हैं, “अगर मैं लोगों का एकदम मुफ्त में इलाज करूँगा तो वे अपने स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लेंगे। वे दवाई तभी सही से लेंगे जब वे उसके लिए पैसे दें।”

अंत में वह लोगों से बस यही अपील करते हैं, “हर किसी के पास हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है और हर कोई मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं करवा सकता। कुछ मरीजों का फ्री में इलाज करने से किसी भी डॉक्टर की कमाई में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बल्कि अगर आपकी फीस कम है तो ज्यादा मरीज़ आपके पास आयेंगे। अगर प्राइवेट डॉक्टर दिन में 1-2 भी ऐसे मरीज़ों का इलाज करें तो बेशक गरीबों की स्वास्थ्य समस्याएँ कम हो सकती हैं। बस डॉक्टर को थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी होगी।”

संपादन- अर्चना गुप्ता

मूल लेख: गोपी करेलिया


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