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3 राष्ट्रपतियों से सम्मानित है मध्यप्रदेश का यह किसान!

प्रकृति में होने वाले बदलावों पर सूक्ष्मता से नज़र रखकर आप भी बन सकते हैं खेती के राजकुमार!

भारत एक कृषिप्रधान देश है। यह बात हम लोगों को शायद तब ही समझा दी गई थी जब हमने होश संभाला था और यह बात सच भी है कि हमारे देश का मूल आधार कृषि और किसानों की वजह से ही है।

हमारे देश में अन्नदाताओं की सफलता की ऐसी बेशुमार कहानियाँ हैं, जिनकी वजह से दूसरे किसानों में भी कुछ कर गुजरने का जज़्बा पैदा होता है। ऐसे ही एक किसान हैं मध्य प्रदेश के राजकुमार राठौड़। सीहोर जिले के जमोनिया तालाब गाँव के एक परंपरागत किसान परिवार में जन्मे राजकुमार को अरहर की उन्नत किस्में विकसित करने के लिए पूरे देश में जाना जाता है।

Rajkumar Rathore

द बेटर इंडिया से बात करते हुए वह कहते हैं –

“हमारे पूर्वज कई पीढ़ियों से किसानी करते आए हैं, इसलिए मैं मानता हूँ कि जो खेत मुझे विरासत में मिले हैं, वो सब दादाजी द्वारा सौंपी गई धरोहर है। मुझे यह भी लगता है कि दादाजी ने विरासत में न केवल ज़मीन सौंपी, बल्कि ज़मीन के साथ-साथ खेती और किसानी का वो परंपरागत ज्ञान भी सौंपा, जिसे उन्होंने कई सालों की तपस्या से अर्जित किया था।”

राजकुमार का मानना है कि खेती-किसानी एक अथाह सागर है, जिसे समझने के लिए एक जन्म भी कम पड़ता है। उनके दादाजी ने किसानी को बहुत महत्त्व दिया और उन्हें समझाया कि किसानों को अपनी धरती और प्रकृति का आदर करते हुए ही किसानी करनी चाहिए। पेड़-पौधे, मधुमक्खी, जमीन के अंदर मौजूद खेती के सहायक सूक्ष्म जीव, यहां तक कि जमीन में उगने वाली घास या खरपतवार का भी आदर-सम्मान करते हुए खेती-किसानी करनी चाहिए। खेत में कभी भी 3 से 5 इंच से अधिक गहरी जुताई नहीं करनी, वरना जमीन के सहायक जीव मिट जाएंगे। दादाजी की बताई इन बातों का राजकुमार के बालमन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

दादाजी की दी गयी शिक्षा की राह पर 

दादाजी से किसानी के गुर बारिकी से सीखने के बाद राजकुमार ने कृषि विज्ञान की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान उन्हें यह अहसास हुआ कि जो ज्ञान वह अब हासिल कर रहे हैं, वह बचपन में दादाजी से मिले ज्ञान के बिल्कुल विपरीत है। उन्हें हमेशा यही लगता रहा कि कहीं वह कुछ गलत तो नहीं पढ़ रहे? जैसे-तैसे 11वीं के बाद फर्स्ट ईयर में दाखिला लिया। साल भर में लगने लगा कि इससे अच्छी दादाजी की बायोडायवर्सिटी वाली शिक्षा ही थी। आखिरकार वह 18 वर्ष की आयु में अपने खेतों में लौट आए।

राजकुमार बताते हैं, “आम किसान के बेटे की तरह ही मैंने भी अपने खेतों की बागडोर संभाली। किसानी के साथ ही अपनी 18 एकड़ भूमि में आम, नारियल, लीची, चीकू, कटहल, नींबू, संतरे, मौसमी और अंगूर इस उद्देश्य से लगाई ताकि फलदार वृक्षों से अतिरिक्त सालाना आमदानी तो होती रहे।”

शुरुआत हुई सीड सिलेक्शन से और फिर बदल गई ज़िंदगी

राजकुमार ने उन्नत किस्म के बीजों का चयन करना शुरु किया। जैसा कि उन्हें बचपन से ही  सिखाया गया कि सूर्य और चंद्रग्रहण के समय काले चींटे व मधुमक्खियां फसलों पर अधिक परागण करतीं हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए वह सूर्य और चंद्रग्रहण के बाद अपनी फसलों पर गहरी नजर रखने में जुट गए। इसे म्यूटेशन भी कहा जाता है। अपनी कहानी को आगे बढ़ाते हुए वह कहते हैं,

“1997 में एक दिन सूर्यग्रहण हुआ। अपने खेत में लगी तुअर की फसल के एक अनचाहे पौधे ने अचानक मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। उस पौधे की लम्बी पत्तियों और अंदर से पीले सुंदर बंसती रंग लिए उन बड़े-बड़े फूलों ने मेरा मन मोह लिया। थोड़े इंतजार के बाद इस अनचाहे पौधे में फलियां भी आईं, वह भी पौधे के ऊपरी डेढ़ फ़ीट की शाखाओं में घने गुच्छों के रूप में। मैंने पौधे की सुरक्षा हेतु उसमें लोहे की गोल जाली लगा दी। इस अनचाहे पौधे में 756 फलियां थीं और इसमें किसी भी तरह के किसी कीट आदि का कोई प्रकोप नहीं था। मैंने पौधे के सभी बीजों को परिपक्व अवस्था में अगले साल के लिए निकाल लिया।”

पूरे खेत की फसल सूखकर कट चुकी थी, किन्तु प्रकृति कुछ और चमत्कार करने वाली थी। राजकुमार ने जिस अनचाहे पौधे की फलियां तोड़ी थीं, केवल उसका ही गुच्छा परिपक्व हुआ। पौधा और पौधे की पत्तियां नहीं सूखीं थीं इसलिए उन्होंने उसे वैसे ही छोड़ दिया।

पत्नी ने सफलता में निभाई अहम भूमिका

राजकुमार ने पौधै से चयनित इन फलियों को अपनी पत्नी आशा को सौंप दिया। चुनी गई फलियों में से उनकी पत्नी ने दो अंजुरी भर बीज निकाले। एक अंजुरी भर बीज उन्हें देती हुईं बोली कि इनको खेत की मेड़ों पर लगाना। राजकुमार द्वारा सवाल पूछने पर उन्होंने कहा- 

“एक अंजुरी भर बीज आपको लगाने दिए हैं, दूसरी अंजुरी बीज एक सूती कपड़े में अपने पास सुरक्षित रखूंगी। कभी-कभी किसानी में मौसम साथ नहीं देता, ये बीज खराब होने पर दूसरे बीज तो सुरक्षित रहेंगे न? मेड़ों पर घास ज्यादा तेजी से उगती है, क्योंकि बरसात में खेत के तत्त्व बहकर मेड़ों पर जमा हो जाते हैं। तुअर के जो बीज हम लगाएंगे, बिना फर्टिलाइजर के ही वो अच्छी गुणवत्ता लिए होंगे।”

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राजकुमार अपनी पत्नी संग

पूरे मनोबल से राजकुमार वो बीज खेत की मेड़ों पर लगाते गए। सभी बीजों ने उगने के बाद अच्छी बढ़वार ली, अच्छे गुच्छे लगे। सड़क किनारे खेत की मेड़ पर लगे होने की वजह से, दूर-दूर से आने वाले राहगीरों का ध्यान इस किस्म के गुच्छों ने खींचा। राहगीर किसान आश्चर्यचकित होकर इस किस्म को बगैर पलक झपकाए देखते और पूछते तुअर की यह कौन सी किस्म है? मेड़ों पर लगाए अंजुरी भर बीजों से रबी-खरीफ दोनों सीजन मिलाकर 87 किलो बीज मिले। राजकुमार ने एक एकड़ में एक किलो बीज की दर से बीजों की पुनः बुवाई खेत में की। रबी-खरीफ दोनों का उत्पादन मिलाकर 24 क्विंटल 700 ग्राम हुआ।

पेटेंट को लेकर आई परेशानी

इस सफलता के बाद देश की जानी-मानी पत्र-पत्रिकाओं में इनकी सफलता की कहानियाँ पते और नम्बर के साथ छपीं। देश के कोने-कोने से कई कृषि विभागों, विश्वविद्यालयों और किसानों ने बीज के लिए संपर्क किया। समस्या यह थी कि राजकुमार के पास इस किस्म का ना तो रजिस्ट्रेशन था ना ही पेटेंट। उस समय तक देश में ऐसा कोई कानून भी नहीं था कि किसान की वैरायटी को भी पंजीकृत किया जाए। सारी उलझनों के बाद आखिरकार फरवरी 2015 में इन्हें अपनी किस्म के लिए पेटेंट प्राप्त हुआ।

राजकुमार आगे बताते हैं – “साल 2000 आने वाला था। बहुत से पत्रकारों द्वारा अरहर की इस सदाबहार किस्म का नाम पूछे जाने पर मैंने अपनी बेटी रिचा के नाम पर इसका नाम ‛रिचा 2000’ रख दिया। मेरे पास इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (IFFCO) के महाप्रबंधक डॉ. एसपी शुक्ला का फोन आया। उन्हें गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के इफ्को द्वारा चयनित किसानों के लिए ‛रिचा 2000’ का बीज चाहिए था। मैंने अपना बीज इफ्को को प्रदर्शन हेतु दिया। इसके बाद इफ्को महाप्रबंधक ने इसके अच्छे उत्पादन होने की जानकारी पत्र से भेजी।”

किस्में और भी हैं

‘रिचा-2000’ में लगातार कुछ न कुछ प्रयोग करते रहने की उनकी इस धुन ने उन्हें हर साल कुछ न कुछ नई कामयाबी दिलवाई। अब तक उन्होंने पौधों के आकार, ऊंचाई, टहनियों के रंग, फलियों के रंग और बीज के रंग को लेकर कई वैरायटियां तैयार की हैं। जिनमें काली फली वाली पीली अरहर भी है जिसे उन्होंने ‘रिचा-2001 ब्लैक ब्यूटी’ नाम दिया है। इसकी हरेक फली में 5-6 दाने होते हैं। फली का रंग तो काला है, लेकिन दाल पीली है। हुई न हैरत की बात। उन्होंने अमरुद की ‘सिद्धि विनायक‘ किस्म भी तैयार की, जिसमें एक फल के तीन स्वाद होते हैं। हरा रहने पर नारियल, पीला होने पर नाशपती और अंत में पकने पर अनानास का स्वाद देता है।

 

सपने और भी हैं

खेती किसानी में गरीब किसान भाइयों को अच्छे कृषि यंत्र उपलब्ध कराने की दिशा में भी राजकुमार ने काम किया। उन्होंने भोपाल के कृषि अभियांत्रिकी संस्थान से प्रेरणा लेकर सोयाबीन की खेती में पैर से दबाने वाला ‘कुलथा’ बनाने में कामयाबी हासिल की। ये पुरानी फोर्ड जीप के कबाड़ से छड़ को निकालकर मोटरसाइकिल में ‘अटैच’ करके बनाई जाती है। ये तकनीक किसानों की मेहनत को कई गुना कम करने में कारगर है।

नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की मदद से लगी सम्मानों की झड़ी
साल 2007 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (NIF) के अवार्ड के लिए राजकुमार का नाम चयन हुआ। NIF द्वारा संचालित प्रदर्शनी के तहत साल 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और  2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति  प्रतिभा पाटिल ने उन्हें सम्मानित किया। साल 2011 में केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार द्वारा भी वह सम्मानित किए गए। इसके बाद 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी प्रगतिशील किसान राजकुमार को सम्मानित किया।

अगर आप भी इस प्रगतिशील किसान से संंपर्क करना चाहते हैं तो इस पते पर लिखिए- राजकुमार राठौड़, ऋषभ वाटिका, गाँव जमोनिया टैंक, जिला-सीहोर (मध्यप्रदेश) 466001. साथ ही आप इनसे मोबाइल नंबर 09406528391 ईमेल- pigeonpea2000@gmail.com पर जुड़ सकते हैं। फ़ेसबुक पर जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://www.facebook.com/rajkumar.rathore.984786

संपादन – अर्चना गुप्ता


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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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