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जंगल मॉडल खेती: केवल 5 एकड़ पर उगाए 187 किस्म के पेड़-पौधे, है न कमाल?

राजेंद्र अब तक 1170 किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग दे चुके हैं और उनका यह सफर अब भी जारी है!

चपन से ही घूमने और अलग-अलग किताबें पढ़ने के शौक़ीन रहे राजेंद्र बालकृष्ण भट 35 वर्ष के थे, जब उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर खेती करने का फैसला किया। दोस्तों-रिश्तेदारों ने उन्हें पागल कहकर उनका मज़ाक बनाया लेकिन उनके परिवार वालों ने उन पर विश्वास किया।

राजेंद्र भट ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया- “हमारा संयुक्त परिवार है और परिवारवालों ने खेती करने के फैसले पर कहा – ‘ठीक है करो तुम खेती, जो भी मदद चाहिए हम करेंगे।’ सबने मेरा साथ दिया क्योंकि हमारे पूर्वज किसान थे। मेरे दादाजी की ज़मीन महाराष्ट्र के कुल-कायदा एक्ट में चली गई थी। उसके बाद सबने पढ़ाई और नौकरी की तरफ रुख़ किया। घर के सदस्य ये भी चाहते थे कि कोई तो हो जो खेती करे।”

महाराष्ट्र के बदलापुर से चंद किमी दूर बेंदशील गाँव के रहने वाले 63 वर्षीय राजेंद्र भट ने आईटीआई से डिप्लोमा किया और फिर प्राइवेट नौकरी की। अपनी यात्राओं के दौरान उनकी मुलाकात किसानों से हुई और अपने पढ़ने के शौक के कारण उन्हें जैविक खेती के बारे में पता चला। उन्हें कृषि, पर्यावरण और इको-सिस्टम आदि के बारे में पढ़ना और लोगों को बताना बहुत ही अच्छा लगता है।

बंजर ज़मीन से की शुरुआत

Rajendra Bhat at his Farm

साल 1990 में उन्होंने डेढ़ एकड़ ज़मीन खरीदी। हालांकि, वह ज़मीन बंजर थी और खेत तक पहुँचने के लिए उन्हें दो नाले पार करने पड़ते है। यह नाला बारिश के मौसम में ओवर-फ्लो होने लगता था और इस वजह से बहुत बार उन्हें तैरकर भी आना-जाना पड़ता था।

“मैंने जो भी प्रकृति और जैविक खेती के बारे में पढ़ा था, उससे मुझे विश्वास था कि अगर सही देख-रेख की गई तो इस ज़मीन पर भी फसल उगा सकते हैं,” उन्होंने कहा।

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खुद पर उनका विश्वास और कड़ी-मेहनत रंग लाई। आज 30 साल बाद, उनकी पूरी पांच एकड़ ज़मीन है, जिस पर उनका घना, हरा-भरा फार्म है। जिसमें 187 तरह के पेड़-पौधे लगे हुए हैं। इनमें फल, सब्जियां, अनाज, और औषधीय पेड़-पौधे शामिल हैं।

 “हमारे घर में जो खाने की चीजें हैं उनमें से 80% मेरे अपने फार्म में उगती हैं। हम अपने घर में पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली फॉलो करते हैं,” उन्होंने बताया।

राजेंद्र ने देश भर में घूम-घूम कर जैविक खेती कर रहे किसानों से ट्रेनिंग ली और फिर उन्होंने अपनी ज़मीन पर खेती करना शुरू किया। उनका लक्ष्य अपने खेतों में सिर्फ खेती करना ही नहीं बल्कि एक इको-सिस्टम बैलेंस करना रहा। इसके लिए उन्होंने बहुत अलग-अलग तरीके अपनाए।

जंगल की खेती का है मॉडल:

वह बताते हैं कि उन्होंने अपने फार्म निसर्ग मित्र फार्म के लिए ‘जंगल की खेती’ मॉडल को अपनाया। “इसमें अलग-अलग लेवल पर अलग-अलग पेड़ लगाए जाते हैं। जैसे बाहरी लाइन में बड़े पेड़, फिर क्लाइम्बर, फिर छोटे पेड़, फिर उसके नीचे झाड़ियाँ, और फिर घास आदि। मैं क्यूबिक मेथड से खेती करता हूँ, जैसे कि मेरे आम के नीचे पांच फसलें हैं, अनानस, हल्दी, जिमीकंद जैसी और नारियल के नीचे 15 फसलें हैं जिसमें मसालों के पौधे हैं,” उन्होंने बताया।

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जंगल में भी इसी तरह अलग-अलग किस्म के पेड़-पौधे होते हैं और वे अपने विकास और पोषण के लिए प्रकृति और एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। जैसे कि किसी एक पौधे की जड़ों से मिलने वाला पोषण मिट्टी को उपजाऊ बनता है और इससे अन्य पेड़ों को पोषण मिलता है। इसी तरह बहुत से पेड़ों की औषधीय गुणवत्ता के चलते बहुत से कीट खेतों से दूर रहते हैं।

वह आगे बताते हैं कि वह अपने फार्म की पूरे साल में सिर्फ एक बार जुताई करते हैं, वह भी सिर्फ धान की फसल लगाने के लिए। बाकी सभी फसलें उनके यहां बिना जुताई के लगाई जाती हैं। फसलों से बचे अवशेष जैसे कि जड़ आदि को वह मिट्टी में ही सड़ने देते हैं ताकि यह प्राकृतिक खाद का काम करे।

मल्टी-क्रॉपिंग के साथ-साथ वह रिले क्रॉपिंग भी करते हैं। इसे समझाते हुए वह आगे कहते हैं – “इसमें एक फसल की पैदावार मिल रही होती है साथ ही दूसरी फसल की बढ़ रही होती है। इसमें एक पैदावार खत्म होने से पहले दूसरी शुरू हो जाती है। इसमें भी हम फसल को इस तरह से लगाते है जिससे ज़मीन की गुणवत्ता बढ़े, जैसे कि अरहर और दूसरी हल्दी जो ज़मीन के एंटी-बायोटिक गुण बढ़ाने का काम करती है।”

राजेंद्र इसी तरह से फसलें लगाते हैं जो कि एक-दूसरे के लिए गुणकारी हों न कि प्रतिद्वंदी। फसलों के अलावा, उनके यहां सभी तरह के कीट और पक्षी भी हैं जो कि इको-सिस्टम को बैलेंस करते हैं। इसके अलावा, वह बांस और टिंबर जैसी लकड़ियां भी उगाते हैं। इस तरह से उनका फार्म दो ज़ोन में बंटा है, पहला बफर जोन (जहां लकड़ियां आदि उगती हैं) और दूसरा कोर जोन (जहां वे फल-सब्ज़ियां आदि उगाते हैं)।

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पानी के संरक्षण पर काम:

राजेंद्र के मुताबिक उनके पूरे पांच एकड़ के फार्म में वर्षा जल संचयन होता है। उनके खेत में चार बोरिंग हैं, जिनमें से दो बोरिंग ग्राउंडवाटर रिचार्ज के लिए हैं। बाकी दो बोरिंग से वह ड्रिप इरीगेशन करते हैं ताकि पानी की बर्बादी न हो। साथ ही, सिंचाई को लेकर भी वह काफी सजग रहते हैं और ऐसी फसलें लगाते हैं जिनकी पूर्ति एक फसल के पानी में ही हो जाए।

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“हमारे फार्म के पास के नालों पर हमने दो बाँध बनाये हैं ताकि उनसे ग्राउंडवाटर लेवल बढ़े। इस तरह से एक प्राकृतिक सिस्टम हमने बनाया हुआ है कि सभी फसलें एक-दूसरे की मदद करें, हमारी तरफ से देख-रेख में कोई कमी न रहे”- राजेंद्र भट्ट

प्रशिक्षण और एग्रो-टूरिज्म:

निसर्ग मित्र फार्म में तीन चीज़ें होती हैं – खेती, प्रशिक्षण और एग्रो-टूरिज्म। खुद खेती करने के अलावा, राजेंद्र पिछले 6 सालों से दूसरे किसानों और खेती करने की चाह रखने वाले किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। अब तक उन्होंने 117 ट्रेनिंग सेशन किए हैं और हर एक सेशन में लगभग 10 लोग होते हैं।

साथ ही, उनके फार्म में उन्होंने एग्रो-टूरिज्म भी शुरू किया, जिसके ज़रिए कोई भी उनके फार्म में जाकर प्रकृति के बीच समय बिता सकता है। उनके यहाँ ट्रेनिंग के लिए आने वाले लोगों में किसानों के साथ-साथ पढ़े-लिखे आईटी सेक्टर के लोग भी शामिल हैं। एग्रो-टूरिज्म के लिए कृषि के छात्र, आयुर्वेद के छात्र और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर आते हैं।

राजेंद्र बताते हैं, “हमारी खेती से हमारे घर की सभी ज़रूरतें पूरी हो जाती है। उसके अलावा, जो भी हमारी उपज बचती है, उसमें से हम हमारे यहां ट्रेनिंग और टूरिज्म के लिए आने वाले लोगों को देते हैं।”

उनके फार्म में 55 किस्म के आम उगते हैं इसलिए वह ज्यादा फलों का ही व्यापार करते हैं। बहुत से फल विक्रेता उनसे सम्पर्क करते हैं और उनके यहां से फल लेकर जाते हैं। राजेंद्र का कहना है कि आमदनी से ज़्यादा वह लोगों को इको-सिस्टम के साथ एक बैलेंस्ड लाइफ जीने का तरीका दिखाना और सिखाना चाहते हैं।

वह कहते हैं कि उन्होंने अपने सफ़र की शुरुआत जैविक खेती से की, पर आज वह प्राकृतिक खेती की स्टेज पर पहुँच चुके हैं। आगे उनकी योजना अपनी खेती को सस्टेनेबल बनाने की है। इन तीनों के बीच के अंतर के बारे में वह कहते हैं कि जैविक खेती में आप अपनी ज़मीन को सिर्फ जैविक उत्पाद इस्तेमाल करके स्वस्थ और सेहतमंद बनाते हैं। एक फूड चेन बनाने की शुरुआत करते हैं।

फिर जैविक खेती करते-करते एक समय आता है कि आपके खेतों को किसी बाहरी उत्पाद जैसे कि खाद या कीटनाशक की ज़रूरत नहीं होती। बल्कि सभी कुछ आपके अपने खेत की फसलों से मिलता है। यह वह स्टेज है जब हमारी फ़ूड चेन बन जाती है। सस्टेनेबल खेती में आपको सिर्फ देख-रेख करनी होती है और मिलने वाली उपज का उपभोग करना होता है।

पर इस सफर में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बदलते मौसम और जलवायु हैं। वह कहते हैं कि पेड़-पौधों की भी याददाश्त होती है और सालों से मौसम को लेकर उनकी जो याददाश्त है वह आज के मौसम से बहुत अलग है। इसी कारण सिर्फ एक फसल लगाना घाटे का सौदा है। किसानों को मल्टी-क्रॉपिंग से ही फायदा मिल सकता है।

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अंत में वह लोगों से सिर्फ यही कहना चाहते हैं, “हमारे पुरखों ने हमारे लिए जो हवा, पानी और ज़मीन छोड़ा, सभी कुछ साफ़ और शुद्ध था। लेकिन हमने अपने स्वार्थ में सब कुछ खराब कर दिया। इसलिए अब हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम कम से कम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छा करके जाएं। मेरी सिर्फ यही कोशिश है कि जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, मैं लोगों को प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर जीने का तरीका सिखाऊं।”

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है तो आप राजेंद्र भट से 9324601272 पर सम्पर्क कर अपनी शुभकामनायें दे सकते हैं!

संपादन- अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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