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लंदन की नौकरी छोड़ लौटे गाँव, शुरू की देश की पहली आदिवासी आईटी कंपनी!

अमिताभ 2003 में इंग्लैंड गए और ब्रिटिश सरकार के सोशल वेलफेयर बोर्ड लंदन में करीब 10 साल तक काम किया। इस सरकारी नौकरी से वह दुनिया का हर ऐशो-आराम हासिल कर सकते थे, लेकिन उनकी मंजिल कुछ और थी।

क तरफ जहां देश का युवा बेहतर भविष्य की चाह लिए विदेशों का रुख कर रहा है, वहीं अमिताभ सोनी ब्रिटेन सरकार की नौकरी छोड़ देश के वंचित और कमजोर तबके का भविष्य संवारने में लगे हैं। सोनी ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों में बच्चों की शिक्षा, पेयजल संकट और ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर काम कर रहे हैं, जिन पर सरकार की तरफ से ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता।

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि सोनी की पहल पर मध्यप्रदेश के केकडिया गाँव में आदिवासी बच्चों द्वारा सॉफ्टवेयर कंपनी संचालित की जा रही है, जो डेटा एंट्री जैसे प्रोजेक्ट संभालती है।

सोलर आईटी सेल के उद्घाटन के मौके पर कंप्यूटर इस्तेमाल करता बच्चा

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 23 किमी दूर स्थित इस गाँव को अमिताभ सोनी ने गोद लिया हुआ है और 2015 से इसके उत्थान में लगे हैं। उनका मानना है कि यदि देश को मजबूत करना है, तो समाज के सबसे कमजोर तबके को भी मजबूत करना होगा और यह अकेले सरकार की नहीं बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है। वह मूलरूप से इंदौर के रहने वाले हैं, लेकिन उनका ज़्यादातर समय भोपाल में ही गुजरा। इसीलिए उन्होंने अपनी नई कार्यस्थली के रूप में भोपाल के केकडिया गाँव को चुना।

 

इंग्लैंड के ऐशो-आराम को छोड़कर लौट आये गाँव 

अमिताभ 2003 में इंग्लैंड गए और ब्रिटिश सरकार के सोशल वेलफेयर बोर्ड लंदन में करीब 10 साल तक काम किया। इस सरकारी नौकरी से वह दुनिया का हर ऐशो-आराम हासिल कर सकते थे, लेकिन उनकी मंजिल कुछ और थी। लिहाजा वह 2014 में सबकुछ छोड़कर वापस भारत लौट आये। वापसी पर उन्होंने जमीनी हकीकत समझने के लिए मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों का दौरा किया और आदिवासी ग्राम पंचायत भानपुर केकडिया के उत्थान से अपने सोशल मिशन की शुरुआत की।

गांव में अमिताभ का दिन कुछ इस तरह गुजरता है.

अमिताभ के केकडिया पहुँचने से पहले वहां सरकारी स्कूल जैसी सुविधाएँ तो थीं, लेकिन उनका होना न होना बराबर था। इसलिए सोनी ने सबसे पहले शिक्षा पर जोर दिया, क्योंकि शिक्षित बच्चे ही अपना और देश का भविष्य बदल सकते हैं। उन्होंने स्कूल को जरुरी साजो-सामान उपलब्ध कराया, बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए उन्होंने बच्चों के परिवारों से मैराथन बातचीत की। आज स्थिति यह है कि स्कूल में सौ फीसदी उपस्थिति है। आदिवासी बच्चे भी आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, उन्हें कंप्यूटर चलाना आता है। अमिताभ ने कुछ बच्चों का शहर के अच्छे स्कूल/कॉलेजों में दाखिला भी करवाया है।

‘द बेटर इंडिया’ से बातचीत में अमिताभ सोनी ने कहा, “बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है, जिसे किसी भी रूप में ढाला जा सकता है। यदि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, तो वह अपने, अपने परिवार के साथ-साथ देश के लिए भी बहुत कुछ कर सकते हैं। मेरा यही प्रयास है कि आदिवासी बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा मिले। हमने उनके लिए कंप्यूटर लैब की व्यवस्था करवाई है, ताकि कंप्यूटर सी तेज दौड़ती दुनिया में वह कहीं पिछड़ न जाएँ। मेरा जोर उन्हें किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान देने पर भी रहता था। फ़िलहाल केकडिया के आदिवासी स्कूल में आपको बच्चों की सौ फीसदी उपस्थिति मिलेगी, जबकि पहले स्थिति बिलकुल अलग थी।”

देश की पहली आदिवासी सॉफ्टवेयर कंपनी

शिक्षा के साथ ही अमिताभ सोनी का फोकस गाँव में रोजगार उपलब्ध कराने पर भी रहता है, ताकि प्रतिभा पलायन को रोका जा सके। इसके लिए उन्होंने देश की पहली आदिवासी सॉफ्टवेयर कंपनी ‘विलेज क्वेस्ट’ शुरू की है। खास बात यह है कि इस कंपनी को आदिवासी युवा चलाते हैं।

गाँव में आईटी कंपनी की स्थापना कितना मुश्किल काम था, इस सवाल के जवाब में अमिताभ कहते हैं, “सच कहूँ तो बेहद मुश्किल था। सबसे बड़ी चुनौती थी, आदिवासियों को कंप्यूटर सिखाना और उनमें घंटों स्क्रीन के सामने बैठकर काम करने की आदत विकसित करना। दूसरी चुनौती थी, बड़ी आईटी कंपनियों से संपर्क साधना ताकि काम मिल सके। शुरुआत में मैंने अपने कुछ ऐसे दोस्तों एवं परिचितों से बात की जो आईटी कंपनी चला रहे थे और डेटा एंट्री जैसा काम मिलना शुरू हो गया। कंपनी के लिए कंप्यूटरों की ज़रूरत को हमने सेकंड हैंड कंप्यूटर से पूरा किया। जिसमें मेरे कुछ दोस्तों ने मदद की। सबकुछ सेटअप होने के बाद हमें बिजली कटौती की समस्या से निपटना था। जब शहरों में बिजली की आंखमिचौली आम है, तो आप गाँव की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। लिहाजा हमने फंड रेज अभियान चलाया और जो पैसा आया उससे सौर पैनल लगवाये गए।’

 

आदिवासियों को आत्मनिर्भर करना है उद्देश्य 

अमिताभ का जोर आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाने पर है न कि उनका सहारा बने रहने पर। यह उनकी मेहनत का ही नतीजा है कि आज आदिवासी अपनी समस्याओं और हक को लेकर सरकारी तंत्र के सामने आवाज़ बुलंद करने लगे हैं।

अमिताभ कहते हैं, “चाहे जिलाधिकारी कार्यालय जाना हो या किसी दूसरे ऑफिस आज हमारे गाँव के लोग हर काम में सक्षम हैं। जबकि पहले ऐसा नहीं था। मैं चाहता हूँ कि वे हर काम अपने दम पर करें, उन्हें किसी का इंतजार न करना पड़े कि कोई आएगा तब उनकी समस्या दूर होगी और बेहद खुश हूँ कि थोड़े से वक्त में उनमें काफी बदलाव देखने को मिला है।”

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आसान नहीं है यह सफर 

 

लंदन की नौकरी छोड़कर भोपाल के एक छोटे से गाँव से जुड़ना कितना मुश्किल था और परिवार ने इस फैसले को किस तरह से देखा?

इस सवाल के जवाब में सोनी कहते हैं, “सच कहूँ तो मेरे लिए बिलकुल भी मुश्किल नहीं था, क्योंकि मैं हमेशा से यही करना चाहता था। लंदन जाने की वजह सिर्फ यही थी कि मैं वहां कुछ ऐसा सीख सकूँ जो आगे चलकर मेरे अभियान में काम आये और मैंने काफी कुछ सीखा भी। जहां तक बात परिवार की है तो कौन चाहेगा कि उनका बेटा या पति विदेश की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गाँव में बसे। जब मैंने पहली बार अपनी पत्नी को इस बारे में बताया तो उसके लिए यह किसी सदमे की तरह था। उसका कहना था ‘तुम जाओ, यदि कुछ अच्छा कर पाए तब मैं वापस लौटने के बारे में सोचूंगी।’ मैं तीन बार भारत लौटा और हर बार निराश होकर वापस गया, लेकिन 2014 में मैंने आखिरी कोशिश की और इस बार सफल रहा। मैंने ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए लंदन नहीं जाऊंगा।”

अमिताभ आदिवासियों के जीवन को तो बेहतर बना रहे हैं, लेकिन उनका वैवाहिक जीवन अब पूरी तरह बदल चुका है। उनकी पत्नी ने भारत वापस न लौटने का फैसला लिया है।

 

फंड है सबसे बड़ी चुनौती 

अमिताभ को यूँ तो हर दिन अनगिनत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है फंड की। ग्रामीणों के उत्त्थान से जुड़ी परियोजनाओं के लिए उन्हें फ़िलहाल जैन समाज की तरफ से सबसे ज्यादा सहयोग प्राप्त होता है। इसके अलावा, कुछ दोस्त भी उनकी मदद करते हैं।

इस बारे में ‘द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए उन्होंने कहा, “बच्चों की शिक्षा हो, युवाओं के लिए रोज़गार की व्यवस्था करना या फिर पेयजल व्यवस्था दुरुस्त करना, हर काम के लिए पैसा चाहिए। उदाहरण के तौर पर सरकार द्वारा गांव में पानी की टंकी बनवाई गई थी, लेकिन घरों तक पानी कैसे पहुंचेगा इसकी कोई व्यवस्था नहीं थी। हमने इस काम को पूरा किया और इसमें भारी-भरकम खर्चा भी आया। फंड जुटाना बहुत बड़ी चुनौती है, लेकिन मुझे चुनौतियाँ पसंद हैं। वैसे भी जब आप दिल से कोई काम करते हैं तो रास्ते खुद ब खुद खुलते जाते हैं।”

 

‘अभेद्य’ से बदली तस्वीर 

अपने अभियान को व्यापक रूप देने के लिए अमिताभ ने ‘अभेद्य’ नाम से एनजीओ भी शुरू की है, जो केकडिया और आसपास के कुछ गांवों में काम करती है। संस्था मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों पर ध्यान देती है, शिक्षा, रोज़गार और जल प्रबंधन। इसके अलावा, साक्षर युवाओं को पंचायत के कामों में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही सिंचाई के लिए पानी की किल्लत का सामना करने वाले गांवों के साथ अमिताभ सोनी की संस्था अब छोटे-छोटे चेक डैम, स्टॉप डैम आदि की एक श्रृंखला बनाने की योजना का खाका तैयार कर रही है और जैविक खेती पर भी जोर दिया जा रहा है।

‘द बेटर इंडिया’ के माध्यम से अमिताभ कहना चाहते हैं कि, “आदिवासियों के पास भले ही हमसे कम संसाधन हों, लेकिन उनके जिंदगी जीने का तरीका हमसे लाख गुना बेहतर है। उन्होंने विकास के नाम पर इतने धोखे खाए हैं कि जल्द किसी पर विश्वास नहीं करते। शुरुआत में हमें काफी मुश्किल हुई, लेकिन हम उनका विश्वास जीतने में सफल रहे। हमने उनसे बहुत सीखा और बहुत कुछ सिखाया। ‘अभेद्य’ में हमारी कोशिश उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की है, ताकि कल उन्हें किसी ‘अमिताभ सोनी’ की राह न तकनी पड़े। हमने सामाजिक बदलाव की दिशा में छोटा सा कदम बढ़ाया है और उम्मीद करते हैं कि दूसरे भी किसी न किसी तरह से समाज की बेहतरी के लिए प्रयास करें। हमें यह याद रखना चाहिए कि हम हर जिम्मेदारी सरकार पर नहीं डाल सकते। बेहतर समाज के निर्माण के लिए हमारी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है।”

यदि आप भी अमिताभ सोनी के इस अभियान का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो उनसे 8959222777 पर संपर्क कर सकते हैं।

संपादन – मानबी कटोच 


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