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हर रविवार जरूरतमंदों की मदद करते हैं ‘यंग गार्डियन्स ऑफ़ मणिपुर’!

ये युवा हर महीने 100-100 रुपये इकट्ठा करके किसी ज़रूरतमंद की मदद करते हैं!

“बदलाव आपसे शुरू होता है। अगर आप किसी के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो मदद छोटी हो या बड़ी, इससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि आप किसी के लिए निःस्वार्थ कुछ करना चाहते हैं,” यह कहना है 28 वर्षीय महेश निंगथौजम का।

मणिपुर के इम्फाल में पले-बढ़े महेश के माता-पिता, दोनों ही शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और वे अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं। मैनेजमेंट में मास्टर्स करने वाले महेश, प्रिंटिंग, डिजाइनिंग और पेपर बैग मेकिंग का अपना व्यवसाय करते हैं। इसके साथ-साथ वे एक सामाजिक संगठन, ‘यंग गार्डियंस ऑफ़ मणिपुर’ के संस्थापक भी है।

‘यंग गार्डियंस ऑफ़ मणिपुर’ के ज़रिए वह गरीब और ज़रूरतमंद लोगों की मदद करते हैं। उनका उद्देश्य समाज के उस तबके की मदद करना है, जो गरीबी, भुखमरी और न जाने किन-किन परेशानियों में अपना जीवनयापन कर रहा है। इस संगठन से आज 35 मणिपुरी युवा जुड़े हैं, जो हर महीने 100-100 रुपये इकट्ठा करके किसी ज़रूरतमंद की मदद करते हैं और जब कभी उन्हें लगता है कि उन्हें ज़्यादा फंड्स की ज़रूरत है तो वे क्राउडफंडिंग कैंपेन भी करते हैं।

Mahesh Ningthaujam

जुलाई 2016 में शुरू हुए इस संगठन ने एक तीन साल की बच्ची के दिल का इलाज कराने में मदद की है, एक परिवार के लिए शौचालय बनवाया है, एक बेसहारा दादी को शेल्टर दिया है और न जाने कितने परिवारों के घरों का चूल्हा उनकी छोटी-छोटी मदद से जल रहा है। इसके अलावा, वह पिछले एक साल से 5 बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं।

हालांकि, महेश की ज़िन्दगी हमेशा से ऐसी नहीं थी। बंगलुरु में अपनी ग्रैजुएशन और मास्टर्स के दौरान वह गलत संगत का शिकार हो गए थे। द बेटर इंडिया से बात करते हुए वह बताते हैं, “मैं क्लास बंक करता था। ड्रिंक-स्मोकिंग, पार्टी करना तो जैसे आम-सी बात हो गई थी। मेरी ज़िन्दगी में सब कुछ था पर सुकून नहीं था। हर दिन मैं इन बुरी आदतों में फंसता ही जा रहा था।”

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ऐसे में, महेश के लिए उनके स्कूल के दोस्त उनकी प्रेरणा बने जो कि अपनी मेहनत से अच्छी जगहों पर प्लेसमेंट्स ले रहे थे। कोई सरकारी नौकरी में जा रहा था तो कोई अच्छी कंपनी में। तब उन्हें लगा कि ये सभी बच्चे स्कूल में उनसे पीछे हुआ करते थे और आज वे उनसे कहीं ज्यादा आगे हैं।

उन्होंने अपनी आदतें बदलने की ठानी। उन्होंने पढ़ाई पर फोकस किया और धीरे-धीरे अपने कॉलेज ग्रुप से दूर हो गए। पर इसके साथ ही, वह अकेले भी हो गए थे क्योंकि अब उनके पास कोई दोस्त नहीं था। ऐसे में, अपने मन की शांति के लिए उन्होंने अनाथ-आश्रम, वृद्धाश्रम में जाना शुरू किया। वहां लोगों से मिलकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था। उन्हें लगता कि वह भी किसी तरह उनकी मदद करें।

“शुरू में, मैंने अपनी पॉकेट-मनी से कुछ पैसे बचाकर और फिर अपने ही परिवार के सदस्यों से थोड़े पैसे इकट्ठा करके लोगों की मदद करना शुरू किया। फिर जैसे-जैसे कुछ दोस्तों को पता चला तो वे भी साथ आ गए। ऐसे करते-करते, हमारे ‘यंग गार्डियन्स ऑफ़ मणिपुर’ ग्रुप की शुरुआत हुई।”

पहले-पहले वह और उनके साथी किसी अनाथ-आश्रम या फिर वृद्धाश्रम जाकर लोगों की मदद करते थे। फिर एक बार, संयोग से उनकी मुलाक़ात एक 85 साल की वृद्धा, इबेम्पिशक से हुई, जो अपनी तीन पोतियों के साथ रह रही थीं।

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उनके बेटे की मृत्यु एक रोड एक्सीडेंट में हो गयी थी और उनकी बहू, बिना कुछ कहे तीनों बेटियों को छोड़कर चली गई थी। ऐसे में वह प्लास्टिक बीनकर और उसे बेचकर, जैसे-तैसे अपनी पोतियों को पाल रही थीं। मुश्किल से उन्हें दिन के 30-35 रुपये मिलते थे।

“जब हम उनके यहाँ गए तो उनकी हालत बहुत ही खराब थी। ढंग से कुछ खाने-पीने को नहीं था। घर के नाम पर भी बस एक शेल्टर जैसा ही था, जिसमें शौचालय तक नहीं था। उनके खाने-पीने, कपड़ों आदि का इंतजाम तो हमने किया। पर उनके घर की दशा सुधारने के लिए हमें और पैसों की ज़रूरत थी,” महेश ने बताया।

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Along with Ibmepishak and her granddaughters

तब पहली बार, उन्होंने मिलाप के ज़रिए एक क्राउडफंडिंग अभियान चलाया। महेश हंसते हुए बताते हैं कि उन्हें लगा था कि इससे उन्हें शायद और दो-चार हज़ार रुपये की मदद मिल जाएगी। पर उनकी सोच से कहीं ज्यादा कुल ढाई लाख रुपये इकट्ठा हुए। इससे इबेम्पिशक और उनकी पोतियों के जीवन को एक अच्छा आधार मिल गया।

इस अभियान के बाद, उन्हें मणिपुर के अलग-अलग जगहों से बहुत सारे फोन आए। लोगों ने उन्हें काफी सराहा और उनकी पहल से जुड़ गए। इबेम्पिशक की ही तरह, उन्होंने एक और बेसहारा दादी, मोइरंग हुइद्रोम के लिए क्राउडफंडिंग करके पैसा इकट्ठा किया और शेल्टर बनवाया।

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इसके अलावा, एक सिंगल मदर के बारे में बताते हुए महेश कहते हैं – “उनके पति को शराब की लत थी, इसलिए वह जैसे-तैसे एक होटल में नौकरी करके अपना और अपनी तीन बेटियों का पेट पाल रही थीं। पर फिर उनके पति की मृत्यु हो गई और उसके बाद, अपनी बेटियों को अकेले छोड़कर जाना उनके लिए सम्भव नहीं था तो उनकी नौकरी छूट गई।”

महेश आगे बताते हैं कि जब वह उस महिला से मिले तो उन्होंने कई दिनों से ठीक से खाना भी नहीं खाया था और घर में पानी तक भी नहीं था। महेश और उनके साथियों ने न सिर्फ उनके घर में खाने-पीने के लिए राशन दिया बल्कि पानी के लिए स्टोरेज कंटेनर भी दिया।

हालांकि, अब उनकी कोशिश यह है कि वह इन लोगों के लिए एक सस्टेनेबल लिविंग का विकल्प ढूंढें। इन लोगों को खुद अपने पैरों पर खड़ा कर कोई सम्मानजनक रोज़गार से जोड़ सकें। क्योंकि ज़रूरी नहीं कि हर बार वह इन लोगों की मदद कर पाएं।

“लोगों की मदद करने में कोई बुराई नहीं है। परेशानी यह है कि वे उस मदद पर निर्भर हो जाते हैं। हम बच्चों की फीस स्पॉन्सर करते हैं तो उनके परिवार वालों को लगता है कि उनकी अन्य सुविधाओं का ज़िम्मा भी हम ही उठा लें। ऐसा नहीं हो सकता है। बहुत बार इन सब मांगों की वजह से लोग मदद करना ही छोड़ देते हैं। पर मेरा उद्देश्य है कि मैं इन लोगों में व्यवहारिक बदलाव लाकर, इन्हें कमाने के लिए प्रेरित करूँ,” उन्होंने बताया।

‘यंग गार्डियन्स ऑफ़ मणिपुर’ धीरे-धीरे एक शेल्टर होम बनवाने के लिए काम कर रहा है ताकि किसी भी बेसहारा को सर्दी और बरसात में भटकना न पड़े। इसके साथ ही ये लोगों को सरकार की योजनाओं के बारे में भी जागरूक कर रहा है और रोज़गार के लिए उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग से जोड़ने का काम कर रहा है।

अंत में वह बस यही कहते हैं, “आप किसी की मदद करने के लिए सच्चे रहो, आप देखना बदलाव ज़रूर आएगा।”

यदि इस कहानी ने आपके दिल को छुआ है और आप इनकी मदद करना चाहते हैं तो ‘यंग गार्डियन ऑफ़ मणिपुर’ का फेसबुक पेज देख सकते हैं। साथ ही, महेश को सम्पर्क करने के लिए 7795631713 पर कॉल करें!

संपादन: अर्चना गुप्ता


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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