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घर से शुरू किया पेपरलैंप बनाने का कारोबार, आज 80 महिलाओं को दे रहीं हैं रोज़गार!

यूथ बिज़नेस इंटरनेशनल अवॉर्ड्स ने उन्हें 2013 में ‘बेस्ट वीमेन एंटरप्रेन्योर’ के सम्मान से भी नवाज़ा!

हाराष्ट्र में पुणे की रहने वाली 39 वर्षीया गोदावरी सातपुते सिर्फ दसवीं पास हैं लेकिन पिछले एक दशक से वह बखूबी अपना व्यवसाय सम्भाल रहीं हैं। अपने व्यवसाय से उन्होंने न सिर्फ अपने घर की आर्थिक स्थिति को संभाला है, बल्कि उनके यहाँ काम करने वाली महिलाओं के घरों को भी उम्मीद की किरण दी है।

मूल रूप से नरी गाँव से आने वाली गोदावरी की 19 साल की उम्र में शादी हो गयी थी। उनके पति शंकर पुणे में सब्ज़ियों की दूकान चलाते हैं और उसी से उनके संयुक्त परिवार का खर्च चलता था। शादी के एक-दो सालों में ही उन्हें समझ में आ गया कि उन्हें भी कुछ न कुछ करना पड़ेगा क्योंकि उनके पति की आय इतनी नहीं कि परिवार का अच्छे से निर्वाह हो पाए।

“काम करने की चाह तो थी और मेरे परिवार का भी सपोर्ट था कि मैं घर पर ना बैठूं बल्कि कुछ करूँ। लेकिन तब भी मैंने कभी अपने किसी व्यवसाय के बारे में नहीं सोचा था। पर मुझे हमेशा से ही आर्ट-क्राफ्ट का काम अच्छा लगता था और इसलिए जब एक बार मैंने दिवाली पर बाज़ार में ये पेपरलैंप (मराठी में आकाशकंदील) देखा तो खुद घर आकर बना लिया,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए गोदावरी ने बताया।

Godavari Satpute

गोदावरी की कला को उनके पति ने आगे बढ़ावा दिया और उन्होंने उनके बनाये पेपरलैंप्स को बाज़ार तक पहुंचाने का ज़िम्मा उठाया। इसके बाद, गोदावरी घर पर ही वेस्ट मटेरियल से पेपरलैंप बनाने लगीं और इसमें उनका पूरा परिवार उनका साथ देता था। उनके पति और देवर ने मार्किट में दुकानदारों से बात की और वे गोदावरी के बनाये लैंप उन्हें सप्लाई करने लगे।

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शुरू में गोदावरी अपने घर से ही काम करती रहीं। जब उनके पास ऑर्डर्स बढ़ने लगे तो उन्होंने अपने आस-पास की औरतों को अपने साथ काम करने के लिए कहा।

“4-5 पड़ोस की महिलाओं को मैंने पहले काम सिखाया और फिर घर पर ही हम प्रोडक्ट्स बनाते थे। सभी को हमारे बनाये पेपरलैंप बहुत पसंद आते थे क्योंकि मेरे पास डिजाईन की कोई कमी नहीं थी। छोटा साइज़, मीडियम या फिर बड़ा, हर एक साइज़ में पेपरलैंप हमारे पास मिलता है,” उन्होंने कहा।

पेपरलैंप बनाने के बाद उससे जो भी कागज़ या फिर अन्य सामग्री बचती थी, उससे भी गोदावरी ने सजावट के सामान बनाना शुरू किया।

Godavari making the products, picture from the starting days of her business

कुछ साल बाद, जब उनका बिज़नेस गति पकड़ने लगा तो उन्हें और उनके पति को एक अलग जगह की ज़रूरत महसूस हुई। वह कहती हैं कि उनका घर इतना बड़ा नहीं था कि वहीं पर वे और भी कारीगरों को काम पर रख पातीं। ऐसे में, उन्होंने एक अलग जगह लेकर अपने बिज़नेस को बड़े पैमाने पर ले जाने की सोची।

“लेकिन बैंक ने हमें लोन नहीं दिया। कई बार मैंने और मेरे पति ने कोशिश की लेकिन नहीं हो पाया। ऐसे में हमने अपने एक रिश्तेदार से कुछ पैसे उधार लिए और अपने बिज़नेस में लगाये। फिर भारतीय युवा शक्ति ट्रस्ट ने 40 हज़ार रुपये दिए। उन्होंने मुझे बिज़नेस संभालने की कुछ बेसिक ट्रेनिंग भी करायी,” उन्होंने आगे कहा।

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साल 2009 में औपचारिक तौर पर गोदावरी ने अपनी कंपनी, ‘गोदावरी आकाशकंदील’ की शुरूआत की। पहले उनके प्रोडक्ट्स सिर्फ महाराष्ट्र में सप्लाई होते थे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने दूसरे राज्यों में भी अपना मार्किट बना लिया। सिर्फ 4 साल में उन्होंने अपनी कंपनी को एक अलग पहचान दे दी।

साल 2013 में उनका सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपये से ऊपर था। उसी साल उन्हें यूथ बिज़नेस इंटरनेशनल अवॉर्ड्स ने ‘बेस्ट वीमेन एंटरप्रेन्योर’ के सम्मान से भी नवाज़ा। इस सम्मान को लेने के लिए उन्हें लंदन बुलाया गया।

“बहुत अच्छा लगा जब हम लंदन गये। कभी नहीं सोचा था कि ऐसे भी जाने को मिलेगा। पर इसके बाद और अच्छा करने का हौसला बढ़ा।”

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Godavari Satpute in London

आज गोदावरी के साथ 80 महिलाएं काम कर रहीं हैं। गोदावरी बताती हैं कि वह खुद सभी महिलाओं को ट्रेनिंग देती हैं। उनके यहाँ सभी लोग मिलजुल कर काम करते हैं। 20 से भी ज्यादा डिजाईन के झूमर आज वे बेच रहे हैं। उनके यहाँ काम करने वाली महिलाओं के लिए रोज़गार के साथ अन्य बहुत सी सुविधाएँ भी उन्होंने दी हुई हैं।

उनके यहाँ काम करने वाली कारीगर, जिनके छोटे बच्चे हैं उनके लिए क्रेच की सुविधा है। इसके अलावा, उन्होंने एक डॉक्टर को खास तौर पर इन महिलाओं का रेग्युलर चेकअप करने के लिए भी नियुक्त किया है। साथ ही, यदि इन महिलाओं को अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किसी भी तरह की मदद चाहिए होती है तो भी गोदावरी उनकी मदद करने से पीछे नहीं हटती हैं।

“मैं खुद माँ हूँ तो समझ सकती हूँ कि महिलाओं पर कितनी ज़िम्मेदारी होती हैं। मेरे भी परिवार ने अगर मुझे सपोर्ट नहीं किया होता तो घर के साथ-साथ काम करना मेरे लिए भी मुश्किल होता। इसलिए मैं इन सभी कारीगरों की परेशानियों को समझती हूँ। हमारे यहाँ टाइम की कोई पाबन्दी नहीं है। ये सभी कारीगर अपने बच्चों को स्कूल छोड़कर आती हैं। फिर अगर बीच में बच्चों को लेने जाना है तब भी कोई परेशानी नहीं है,” उन्होंने कहा।

Godavari Satpute along with her paperlamps

उनके यहाँ काम करने वाली हर एक कारीगर महीने के लगभग 8 हज़ार रुपये तक कमा लेती हैं। इस कमाई के ज़रिये अब वे अपने पति या फिर किसी और पर निर्भर नहीं हैं। इस तरह से कहीं न कहीं आज गोदावरी की कंपनी ने इन सभी महिलाओं की आत्म-निर्भरता की कहानी को गढ़ा है। इसलिए उन्हें पुणे के स्कूल, कॉलेज और अन्य कई संगठनों में बच्चों को संबोधित करने के लिए बुलाया जाता है।

हालांकि, यहाँ तक का सफ़र बिल्कुल भी आसान नहीं था। गोदावरी बताती हैं कि उनके पास हुनर की कमी नहीं थी पर मार्किट में अपनी पहचान बनाना बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। उन्हें आगे बढ़ने के लिए सबसे अलग कुछ करना था।  झूमर के डिजाईन, उनका मटेरियल, फिर कहाँ से मटेरियल खरीदा जाये, ग्राहक को पसंद आयेगा या नहीं और भी न जाने क्या-क्या परेशानियाँ उनके सामने खड़ी ही रहती थीं।

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पर गोदावरी ने कभी हार नहीं मानी। उनका मानना है कि अगर वह हार मान लेती तो शायद घर पर बैठकर हर रोज़ यही सोच रही होती कि कैसे महीने का गुज़ारा होगा। क्योंकि आज के जमाने में 8 लोगों के परिवार का पालन-पोषण आसान नहीं है।

उन्हें जहां से सीखने का मौका मिलता वह सीखतीं और हर दिन बस मेहनत और लगन से काम करतीं क्योंकि उन्होंने ठान लिया था कि उन्हें अपने बिज़नेस को सफल बनाना है। आज गोदावरी एक सेल्फ-हेल्प ग्रुप की हेड भी हैं और इससे जुड़ी महिलाओं को छोटा-बड़ा जैसा भी, पर अपना कोई व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित करती हैं।

अंत में वह सिर्फ इतना ही कहती हैं, “हर एक महिला को काम ज़रूर करना चाहिए। अगर आप सिर्फ घर में बैठी रहेंगी तो परिस्थिति कभी नहीं बदलेगी। इसलिए अपने हुनर को पहचानिए। और मैं पुरुषों से यही कहूँगी कि अपनी पत्नी को कुछ करने के लिए प्रेरित करें। उन्हें खुद कमाने के लिए कहें ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके।”

गोदावरी सातपुते से सम्पर्क करने के लिए या फिर उनके बनाए प्रोडक्ट्स खरीदने के लिए  आप उन्हें 096576 17444 पर कॉल करें!

संपादन – मानबी कटोच 

Summary: Thirty-eight-year-old Godavari Satpute, who hails from Nari Village, Maharashtra, runs her own paper lamp manufacturing business – Godavari Akashkandil – which she founded in 2009. As a result of what she has achieved with her business and for her community in just four years, Godavari was named YBI Woman Entrepreneur of the Year in September 2013 by Youth Business International (YBI) and Barclays at the YBI Young Entrepreneur Awards in London.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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