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“केश या नो केश, खूबसूरती सोच में होनी चाहिए!”

कुछ खास है एलोपीसिया को हर कदम पर हराती केतकी की कहानी।

मारे समाज में महिलाओं की खूबसूरती के कुछ मापतंड तय किये गए हैं, जिनमें गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श, छरहरी काया और हाँ, लंबे-घने बाल का होना बेहद ज़रूरी है। बस यही तो किसी भी लड़की को खूबसूरती के तय मापदंडों में ऊंचे नंबर दिलवा सकते हैं! पर तब क्या हो जब इनमें से एक में भी आपके नंबर कम हो जाएं? तब तो लोगों की नज़रों में आपकी खूबसूरती पर यह चांद पर लगे दाग सी बात हो जाएगी। घर से बाहर जब आप कदम रखते हैं, तो ऐसे कई किस्से आपकी नज़रों के सामने आते हैं या आपके कानों से टकराते हैं। कई बार आप लोगों को किसी लड़की की खूबसूरती में मीनमेख निकालते हुए देखते हैं। लेकिन क्या कभी कोई ये सोचता है कि यह मीनमेख निकालना किसी लड़की के आत्मविश्वास को बुरी तरह हिला सकता है? उसके ज़ेहन की शांति छीन सकता है या उसे हमेशा के लिए घर के कोने में बंद रहने के लिए मजबूर कर सकता है? आज आपके लिए मैं एक ऐसी ही कहानी लेकर आई हूँ, जो एक ऐसी महिला की है, जिसने मिसेस इंडिया पीजेंट में एक ख़ास ओहदा अपने नाम किया है और वो भी ‘बाल्ड एंड ब्लूटीफुल’ की तर्ज पर। आइये मिलते हैं केतकी जानी से।

एक आम महिला की ख़ास कहानी

गुजरात के अहमदाबाद में जन्मी और पुणे में बसी केतकी एक आम भारतीय महिला की ही तरह अपने पारिवारिक जीवन में खुश थी। दो बच्चे, पति और अपने काम में व्यस्त रहते हुए उन्होंने पुणे में ही रहने का फैसला किया। यहाँ बालभारती में विशेष अधिकारी के तौर पर कार्यरत केतकी को तब नहीं पता था कि जल्द ही लोग उन्हें एक ख़ास वजह से पहचानेंगे। साल 2010 की बात है, जब उन्हें पता चला कि वो एलोपीसिया नाम की एक गंभीर ऑटो इम्यून स्थिति से ग्रसित हैं, जिसमें धीरे-धीरे मात्र 10 महीने में वह पूरी तरह से अपने बाल खो चुकी थीं।

Ketki before getting affected by alopecia

जहां एक ओर वह घने और लम्बे बालों की वजह से जानी जाती थीं, वहीं अब उनके सिर पर एक भी बाल नहीं था।

केतकी बताती हैं, “मैंने कई नुस्खे अपनाए, कई तरह के इलाजों से गुज़री। हर शनिवार-इतवार एक नए डॉक्टर के क्लिनिक में बिताए, लेकिन मेरे केस में मैं हार गई और एलोपीसिया जीत गया।”

दवाईयों के साइड इफेक्ट से केतकी का वज़न बढ़ता जा रहा था

केतकी के मुताबिक, “एलोपीसिया का इलाज संभव नहीं है, लेकिन फिर भी डॉक्टर्स गिनी पिग की तरह ट्रीट करते हैं और हमें उम्मीद देते रहते हैं। लेकिन हर बार मरीज़ को उनके क्लिनिक से नाउम्मीद निकलना पड़ता है। ये बात उस मरीज़ के मन में हमेशा आती है कि ये ठीक हो सकता था, लेकिन शायद मेरे ही शरीर में कुछ कमी है, जो मैं इससे उबर नहीं पाई। ऐसी स्थिति मरीज़ को मानसिक तनाव और अवसाद या कहें डिप्रेशन की ओर ले जाती है। मैंने भी डिप्रेशन से लम्बी लड़ाई लड़ी है, जिसकी शुरुआत एलोपीसिया से हुई थी। हम ये कह सकते हैं कि एलोपीसिया और डिप्रेशन एक-दूसरे के पूरक हैं। एलोपीसिया है, तो डिप्रेशन भी ज़रूर होगा।”

 

डिप्रेशन से 5 साल लंबी लड़ाई

साल 2010 में हुए एलोपीसिया के साथ शुरू हुए डिप्रेशन ने आखिर 2015 में केतकी का पीछा छोड़ा। केतकी को आज भी वो दिन याद है जब उन्हने खुद की ज़िन्दगी को ख़त्म करने का फैसला लिया था।

वह सुबह से जानती थीं कि आज उनकी ज़िन्दगी का आखिरी दिन है। रोज़ की तरह उन्होंने खाना खाया, घर के काम निपटाए और बच्चों के साथ समय बिताया। क्योंकि वह जानती थीं कि वह कल का सूरज नहीं देखेंगी। छत पर जाने से पहले वह बच्चों के कमरे में गईं और उन्हें चैन से सोते हुए देखा।

“आज भी मैं खुद को अपने रूम में दुपट्टा पकड़े देख सकती हूँ। मैं पंखे से लटक कर जान देने को तैयार बैठी थी, लेकिन ऐसा करने से पहले अचानक मेरे मन में ये ख़्याल आया कि कल जब मेरे बच्चे मेरा छत से लटका शरीर देखेंगे, तो उन पर क्या गुज़रेगी। और फिर मैंने सोचा कि मैं आज तक अपने शरीर से लड़ती आई हूँ, लेकिन अब मैं शरीर से नहीं, बल्कि दुनिया से लड़ूंगी। मेरा शरीर मेरा अपना है, उसकी इज़्ज़त मुझे ज़रूर करनी चाहिए।”

उसके बाद केतकी ने खुद के हालातों को बदलने का प्रण लिया, लेकिन इसके लिए भी उन्हें समाज से दो-दो हाथ करने पड़े। उन्होंने खुद की काबिलियत साबित करने के लिए और खूबसूरती के मायनों को बदलने के लिए मिसेस इंडिया पीजेंट में भाग लेने का फैसला लिया।

समाज में खूबसूरती के मापदंडों को चुनौती

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“लोग अक्सर कहते थे कि बेचारी के बाल नहीं है। अब वो बदसूरत हो गई है, तो ज़िन्दगी कैसे जियेगी? इन बातों को सुन कर मैंने खूबसूरती के मापदंडों को ही चुनौती देने का फैसला किया। मैंने सोचा खूबसूरती का सबसे बड़ा ताज क्या है, मिसेस इंडिया पीजेंट। ये ही मेरे लिए एक नयी पहचान होगी। मैंने फॉर्म भरा, लेकिन ‘हेयर’ के कॉलम में, जिसमें आपको अपने बालों की व्याख्या करनी होती है, मैंने ‘नो हेयर’ लिखा।

मुझे तीसरे ही दिन फोन आया और मेरा सिलेक्शन मिसेस इंडिया कंटेस्टेंट के रूप में हुआ। इसके बाद दुबई में हमारा ग्रूमिंग सेशन हुआ। मैंने फाइनल 10 में अपनी जगह बनाई और अंत में मिसेस इंडिया की इंस्पिरेशनल कैटेगरी में मुझे मिसेस इंस्पिरेशन का खिताब मिला।

ये मेरे लिए एक जीत थी, उन लोगों के खिलाफ, जो अपने बनाए मापदंडों से किसी की खूबसूरती को तोलते हैं।” इस तरह केतकी ने सबसे पहले एलोपीसिया को अनकवर करने की शुरुआत की।

एलोपीसिया और सामाजिक दुर्व्यवहार!

केतकी खुद को सामाजिक हिंसा का शिकार मानती हैं। उनके गंजेपन की वजह से लोगों ने उनके साथ गलत व्यवहार किया और उन्हें कई सालों तक मानसिक परेशानियों से गुज़ारना पड़ा। इसकी वजह से वह खुद की ज़िन्दगी भी ख़त्म कर सकती थीं। ये वो स्थिति थी, जो समाज के एक कुरूप चेहरे को दिखाती थी।

केतकी बताती हैं, “दिल्ली में आयोजित एक ब्यूटी पीजेंट की थीम थी घरेलू हिंसा, जिसमें मैंने भाग लिया। यहां मैंने एलोपीसिया से ग्रसित उन महिलाओं की स्थिति को लोगों के सामने रखा, जो समाज और पारिवार के सदस्यों की हिंसा की शिकार हुई हैं। एलोपीसिया के मरीज़ों में औरतों को बेहद भुगतना पड़ा था, किसी के पति ने बगैर तलाक दिए दूसरा परिवार बसा लिया था, किसी को सालों से उसकी स्थिति की वजह से एक कमरे में बंद कर दिया गया था। इन सभी केसस में दुखद बात यह थी कि लोग उन औरतों को यह विश्वास दिला चुके थे कि इस स्थिति की ज़िम्मेदार वो खुद हैं। ये समाज का एक ऐसा कुरूप चेहरा है, जिसे सामने लाने की ज़रुरत है। मेरा अब यही काम है, लोगों में जागरूकता बढ़ाना और लोगों को एलोपीसिया से अवगत करवाना।”

 

बच्चों और पेट्स के साथ के बिना नहीं थी ये लड़ाई संभव

इस लड़ाई में केतकी का यदि किसी ने साथ दिया, तो वो थे उनके बच्चे। उनके दो बच्चे और दो पेट डॉग्स, जिन्होंने उन्हें इस लड़ाई को जारी रखने का साहस दिया और उन्हें इस पूरी लड़ाई में सकारात्मक बनाए रखा।

केतकी कहती हैं, “मेरे बच्चों ने मेरी मानसिक स्थिति को समझा और मुझे मानसिक रूप से ताकतवर बनाए रखा। इसके अलावा मेरे दो प्यारे पालतू डॉग्स ने मेरा भरपूर साथ दिया। मेरे डिप्रेशन के दौर में वे किसी थेरेपी डॉग्स की तरह मेरी देखभाल करते रहे, जो मेरी मानसिक स्थिति को संभालने के लिए ज़रूरी था। मैं अपने चारों बच्चों की हमेशा शुक्रगुज़ार रहूंगी।”

केतकी जानी की ये कहानी एक ऐसी मिसाल है, जो आपको शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि मन की खूबसूरती का महत्त्व समझाती है। सिर पर लम्बे-घने बाल होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन सिर के अंदर मौजूद सोच खूबसूरत हो, तो आप दुनिया जीत सकते हैं!

यदि आप भी एलोपीसिया के खिलाफ केतकी की इस लड़ाई में शामिल होना चाहते हैं, तो उन्हें tejujani@gmail.com  पर संपर्क कर सकते हैं।\

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by तोषिनी राठौड़

लेखन से गहरा जुड़ाव रखने वाली तोषिनी राठौड़ लंबे समय से मीडिया में कार्यरत है। संगीत से लगाव और अपने प्राणी-प्रेम के लिए लोगों के बीच पहचान रखती तोषिनी एक गायिका तो हैं ही , इसके साथ ही वह कई एनीमल एनजीओ के साथ काम भी करती हैं। बचपन से किताबी कीड़ा रह चुकी तोषिनी के लिए उनका लेखन एक मेडिटेशन की तरह काम करता है।

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