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जैविक किसान ने बनायी गाजर की उच्च किस्म, पोती के नाम पर दिया नाम!

इस वैरायटी से किसान एक हेक्टेयर में 250-300 किलो क्विंटल गाजर का उत्पादन ले सकते हैं!

राजस्थान के मथानिया के रहने वाले 55 वर्षीय किसान मदन लाल देवड़ा को आज पूरे देश में किसान वैज्ञानिक के तौर पर जाना जाता है। शायद ही देश का कोई राज्य है जहां पर उनके खेत में उगाई गयी गाजर या फिर गाजर के बीज नहीं जाते।

दूर राज्यों से लोग उनके पास गाजर के बीज खरीदने आते हैं। क्योंकि ये कोई सामान्य बीज नहीं है बल्कि खुद मदन लाल द्वारा विकसित की गयी गाजर की एक खास वैरायटी है- दुर्गा 4। इस वैरायटी के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित भी किया गया है।

एक आम किसान से कृषि-वैज्ञानिक बनने का मदन लाल देवड़ा का सफ़र चुनौतियों भरा रहा। उन्होंने अपने पिता को बचपन में ही खो दिया था। पिता की मृत्यु के बाद, उनकी माँ ने उनकी और उनकी दो बहनों की ज़िम्मेदारी सम्भाली। उनका किसान परिवार था तो माँ ने खेती को जैसे-तैसे चलाए रखा और उन्हें दसवीं कक्षा पास करायी।

“दसवीं कक्षा पास करने के बाद मैं माँ का खेती में हाथ बंटाने लगा। इसके चलते पढ़ाई तो छूट ही गयी थी और फिर घर की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि मैं किसानी छोड़कर पढ़ाई जारी रख पाता,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए मदन लाल ने बताया।

Madan Lal Deora

जैविक खेती की तरफ कदम

उनके यहाँ पहले गेंहू और सरसों के साथ प्याज व मिर्च की खेती होती थी। लेकिन फिर धीरे-धीरे उनके इलाके में पानी की गुणवत्ता का स्तर गिरने लगा। इससे फसल पर काफी प्रभाव पड़ने लगा। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि वे ऐसे में क्या करें?

“संयोग से मुझे भारतीय किसान संघ से जुड़ने का मौका मिला। उस समय संघ के प्रदेश अध्यक्ष रतन लाल डागा जी हुआ करते थे। एक बार उनके कार्यक्रम में गये तो उनसे जैविक खेती के बारे में जानने-समझने को मिला। वे सभी किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर जैविक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते थे,” उन्होंने आगे बताया।

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साल 1985 से मदन लाल ने भी जैविक खेती की तरफ अपने कदम बढ़ाए। हालांकि, उन्होंने एक बार में ही पूरे खेत में जैविक तरीके नहीं इस्तेमाल किये क्योंकि उन्हें आगे की फसल के लिए भी पैसे बचाने थे। अपनी 35 बीघा ज़मीन में से सबसे पहले 2 बीघा ज़मीन पर उन्होंने जैविक खेती शुरू की।

फिर अगले साल उन्होंने 5 बीघा ज़मीन पर जैविक तरीके अपनाएं। धीरे-धीरे करके उन्होंने अपनी पूरी ज़मीन पर जैविक खेती करना शुरू कर दिया और इसकी शुरुआत के दो-तीन सालों में ही उन्हें मुनाफा होने लगा।

“यह सच है कि अगर हम एकदम रासायनिक से जैविक खेती पर शिफ्ट करते हैं तो हमें उत्पादन में नुकसान होगा। इसलिए आप धीरे-धीरे शुरुआत करें और यकीन मानिए 3 साल के भीतर आप पूरी तरह से जैविक हो सकते हैं। और आपको मुनाफा भी दिखने लगेगा।”

1995 से शुरू की गाजर की खेती:

In 1995, he started with the organic farming of carrot

मदनलाल आगे कहते हैं कि उनके आस-पास के इलाकों में कुछ किसान गाजर की खेती कर रहे थे। उन्होंने भी पास के गाँव के एक किसान से गाजर की एक स्थानीय वैरायटी के बीज ख़रीदे और अपनी थोड़ी सी ज़मीन पर बो दिए। उन्होंने गाजर की खेती भी जैविक तरीकों से ही की।

खुद के खेत पर बनाया जैविक खाद का इस्तेमाल किया और खुद ही उन्होंने फसलों के लिए आक, धतूरा, तुम्बा आदि का इस्तेमाल करके हर्बल पेस्टिसाइड बनाये। उन्हें पहली ही बार में गाजर का काफी अच्छा उत्पादन मिला। साल दर साल मदन लाल की जैविक खेती से तरक्की देखकर और भी किसान उनके पास आने लगे।

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मदन लाल न सिर्फ किसानों को तरीके सिखाते बल्कि उन्होंने खुद भी कई किसानों को जैविक प्रोडक्ट्स बनाकर दिए। क्योंकि जैविक उत्पाद खरीदना भी हर किसी किसान के लिए संभव नहीं। इसलिए वे किसानों को अपने खेतों पर ही खुद उत्पाद बनाने के लिए कहते। किसानों के प्रति उनकी मदद की भावना को देखते हुए उन्हें भारतीय किसान संघ का जिला स्तर प्रचारक बना दिया गया।

“मैंने बहुत से किसानों को रासायनिक छोड़कर जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्हें समझाया और फिर उनकी हर संभव मदद की। मुझे ख़ुशी होती है कि इन्हीं प्रयासों से आज हमारे मथानिया इलाके की जैविक गाजर पूरे भारतवर्ष में जाती है। हर बार गाजर के 250 से 300 ट्रक यहां से भरे जाते हैं,” मदन लाल ने कहा।

कैसे बनी दुर्गा-4:

Durga 4 Variety of Carrot

साल 1998 में जब मदन लाल ने अपने खेतों में गाजर की फसल लगायी तो उन्होंने नोटिस किया कि कुछ पौधे बाकी सभी पौधों से अलग हैं। उनकी गुणवत्ता, आकार आदि सभी गुण थोड़े भिन्न हैं। उन्होंने उन पौधों को बीज बनाने के उद्देश्य से बाकी सबसे अलग कर लिया। फिर उन बीजों को गोबर और गोमूत्र में मिलाया। एक दिन उसमें रखने के बाद, उन पर गुड़ का लेपन किया और फिर बोया। इस तरह से उनकी कवायद साल 2006 तक चलती रही।

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 “2006 में जब मेरे पास इतने बीज हो गए कि उन्हें पूरे खेत में लगाया जा सकता था तो मैंने उन्हें उत्पादन के लिए लगाया। इस बार जो गाजर हुई वो कमाल की थी। मैंने इन्हीं बीजों को और छह सालों तक अपने खेतों में बोया। और जब मैं इस गाजर की गुणवत्ता के प्रति बिल्कुल संतुष्ट हो गया तब मैंने इन बीजों की मार्केटिंग करने की सोची,” उन्होंने आगे कहा।

साल 2013 में उन्होंने अपने बीज कुछ अन्य किसानों को दिए। उन किसानों ने उनसे पूछा कि उनकी वैरायटी का नाम क्या है? तो उनका जवाब था –

“तो मैंने झट से कहा ‘दुर्गा-4’… फिर किसी के पूछने पर मैंने बताया कि दुर्गा मेरी पोती का नाम है और मुझे वह बहुत प्यारी है। उस समय वह चौथी क्लास में थी, तो मैंने ‘दुर्गा-4’ नाम रख दिया,” उन्होंने हँसते हुए कहा।

Madan Lal along with her granddaughter Durga

वह आगे बताते हैं कि साल 2015 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने उनसे सम्पर्क किया और उन्हें अपनी गाजर की वैरायटी के साथ दिल्ली बुलाया। यहां पर देश के अलग-अलग कोने से आये लोगों ने उनकी गाजर को देखा और चखा। हालांकि, उस बार उन्हें कोई अवॉर्ड नहीं मिला, लेकिन सराहना और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा सबसे मिली।

साल 2017 में एक बार फिर उनकी दुर्गा-4 वैरायटी नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड के लिए चुनी गयी और इस बार उन्हें खुद राष्ट्रपति ने एक लाख रुपये के चेक और सम्मान से नवाज़ा। इसके बाद, उन्हें 2018 में केंद्रीय कृषि मंत्री ने महिंद्रा एग्री अवॉर्ड से भी सम्मानित किया।

क्या है दुर्गा-4 की खासियत: 

उनकी वैरायटी की कुछ खास बातें हैं: इसकी लंबाई, जो कि 24 से 30 इंच तक जाती है। फिर इसका रंग गहरा लाल और मिठास बहुत ज़्यादा होती है। इसलिए हलवा और जूस बनाने के लिए उनकी गाजर की काफी मांग है। उन्हें होटल आदि से भी ऑर्डर्स आते हैं। इसके अलावा, इस गाजर की लम्बी पत्तियां जानवरों के लिए अच्छे चारे का काम करती हैं।

जोधपुर में मथानिया के अलावा और भी जिलों में यह वैरायटी उगाई जा रही है। मदनलाल के मुताबिक आप एक हेक्टेयर में इस वैरायटी से 250-300 किलो क्विंटल गाजर का उत्पादन ले सकते हैं।

मदनलाल बताते हैं कि उन्हें इस गाजर का दाम भी बाकी वैरायटी से अच्छा मिलता है। इसके अलावा, वह हर साल 10-12 क्विंटल बीज भी बेचते हैं। उनकी वैरायटी के बीज की बाजार में अच्छी मांग है। गाजर की वैरायटी में सफलता के बाद, अब वह बाजरे की एक नयी किस्म विकसित करने में जुटे हैं।

बाकी उन्हें उनकी गाजर और अन्य कुछ सब्ज़ियां जैसे कि प्याज, ग्वार आदि की जैविक खेती से हर साल लगभग 15 से 20 लाख रूपये की आय होती है।

युवाओं के लिए बन रहे हैं प्रेरणा:

मदन लाल की लगातार कोशिश है कि देश में खेती को फिर से वही मान-सम्मान मिले जो पहले मिला करता था।

“कभी हमारा देश कृषि प्रधान कहलाता था पर आजकल की स्थिति ऐसी हो गयी है कि किसानों के घर में लोग बेटी ब्याहना भी पसंद नहीं करते। हमें इस सोच को बदलना है क्योंकि असल तरक्की कृषि की तरक्की में है,” उन्होंने कहा।

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उन्हें देश के नामी-गिरामी कृषि संस्थानों और कृषि विद्यालयों में जैविक खेती पर ट्रेनिंग और लेक्चर के लिए बुलाया जाता है। यहां पर वह सभी किसानों और छात्रों को प्रकृति और पर्यावरण से प्रेम करने की समझ देते हैं। उन्हें बताते हैं कि कैसे हम लोगों को खाने में केमिकल परोस रहे हैं।

He has been awarded by President of India

उन्होंने मथानिया में किसानों को जैविक खेती से जोड़े रखने के लिए एक समिति शुरू की है जिससे लगभग 250 किसान जुड़े हुए हैं। ये सभी किसान एक-दूसरे की मदद करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उनका कहना है कि अगर हमारी खेती शुद्ध होगी तो पानी शुद्ध होगा, खाना शुद्ध होगा, मिट्टी उपजाऊ होगी और इस तरह से हम अपने रहन-सहन को केमिकल मुक्त कर पाएंगे।

वह युवाओं के लिए सिर्फ यही सन्देश देते हैं, “हमारे देश के छात्रों को अब कृषि को भी अपने करियर के तौर पर चुनना चाहिए। क्योंकि एक पढ़ा-लिखा किसान हमसे ज़्यादा अच्छे से जैविक और केमिकल के फर्क को समझेगा और फिर दूसरों को समझा पायेगा। इससे ही कृषि को फायदेमंद बनाया जा सकता है। और फिर जैविक खेती करने से हम अपने इको-सिस्टम को बचा सकते हैं।”

यदि आपको इस कहानी ने प्रभावित किया है और आप मदन लाल से सम्पर्क करना चाहते हैं तो 9413139830 पर कॉल कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 

Summary: Madan Lal Deora, an organic farmer from Mathaniya of Rajasthan has developed an improved variety of carrot. He named it as ‘Durga 4’ on the name of his granddaughter. Madan Lal has got recognition like the National Innovation Award and Mahindra Award for his innovative variety of Carrot. He is encouraging farmers to take up organic methods to grow their crops to save the ecosystem.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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