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कभी दिव्यांग की लाठी, तो कभी बच्चों के शिक्षक बनते हैं ये डॉक्टर!

संस्था की तरफ से अब तक 120 निशुल्क चिकित्सा जांच शिविर लगाये जा चुके हैं।

‘अपने लिए जीए तो क्या जीए’, यह कहावत भोपाल के संस्कार सोनी और दिव्या भरथरे पर पूरी तरह लागू होती है। पेशे से डॉक्टर संस्कार और दिव्या गरीब बच्चों को शिक्षित करने का अभियान चलाते हैं, समय-समय पर हेल्थ चेकअप कैंप लगाते है, दिव्यांगों में निशुल्क कृत्रिम अंग वितरित करते हैं और ज़रुरतमंदों की हर संभव सहायता करते हैं। हाल ही में उन्होंने निर्धन परिवारों के लिए ‘एक जोड़ी कपड़ा’ मुहिम चलाई थी, जिसमें शहरवासियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके तहत शहर के स्कूलों और चुनिंदा स्थलों पर बॉक्स रखे गए थे, ताकि लोग अपने कपड़े वहां डोनेट कर सकें।

 

इसके बाद इन कपड़ों को ज़रुरतमंदों में बांट दिया गया। इसी साल अगस्त में दिव्या और संस्कार ने चेन्नई की एक संस्था के साथ मिलकर विकलांगों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल की। उन्हें व्हीलचेयर, बैसाखी आदि निशुल्क प्रदान किये गए। खास बात यह है कि यह सबकुछ दोनों अपने बलबूते करते हैं, यानी उन्हें सरकार की तरफ से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती। वैसे उन्होंने इसके लिए ज्यादा प्रयास भी नहीं किये, क्योंकि उनका मानना है कि ‘अच्छे कामों’ के लिए भगवान कोई न कोई रास्ता दिखा ही देता है।

चूँकि संस्कार एवं दिव्या डेंटिस्ट हैं, इसलिए वह दांतों से जुड़ी बीमारियों और उनके प्रति लोगों की लापरवाही को अच्छे से समझते हैं। यही वजह है कि दोनों समय-समय पर समाज के अलग-अलग वर्गों के लिए निशुल्क जांच शिविर लगाते रहते हैं। कभी आप उन्हें झुग्गी-बस्तियों में लोगों के दाँतों की जांच करते देख सकते हैं, तो कभी किसी पुलिस स्टेशन में। इतना ही नहीं वह स्कूलों में घूम-घूमकर भी बच्चों को इस विषय में जागरुक करते हैं। भीख मांगने वाले बच्चों का किताबों से रिश्ता जोड़ने में भी दोनों को दिलचस्पी है। बैरागढ़ सहित शहर के विभिन्न इलाकों में दिव्या और संस्कार बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। हाल ही में उनकी संस्था ‘दिव्यजीवन हेल्थ एवं एजुकेशन सोसाइटी’ की तरफ से ऐसे लोगों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने भीख मांगने वाले बच्चों के बारे में जानकारी दी थी। भोपाल के निजी मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने के दौरान ही दिव्या और संस्कार ने समाज सेवा शुरू कर दी थी। फिर अपने अभियान को व्यापक रूप देने के उद्देश्य से करीब तीन साल पहले ‘दिव्यजीवन हेल्थ एवं एजुकेशन सोसाइटी’ का गठन किया।

बच्चों का चेकअप करते हुए डॉ. दिव्या

सोसाइटी के अस्तित्व में आने के बाद से दिव्या और संस्कार ने एक जैसी सोच रखने वालों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। आज इस संस्था से 500 लोग बतौर वॉलंटियर जुड़े हुए हैं और राजधानी के साथ-साथ 36 शहरों में संस्था काम कर रही है। ‘दिव्यजीवन हेल्थ एवं एजुकेशन सोसाइटी’ की तरफ से ‘एक डिब्बा मुस्कान का’, ‘एक जोड़ी कपड़ा’ जैसे कई प्रोजेक्ट चलाये जाते हैं। ‘एक डिब्बा मुस्कान का’ मुख्यतः बच्चों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने के लिए। इसमें उनके लिए कपड़े, खाद्य पदार्थ और शिक्षा सामग्री होती है। इसके तहत अब तक 5000 से ज्यादा लोगों को लाभान्वित किया जा चुका है। इसी तरह ‘एक जोड़ी कपड़ा’ गरीबों की कपड़ों की ज़रूरत को पूरा करती है। इसके तहत 10 हजार से अधिक निर्धन परिवारों को कपड़े बांटे गए हैं।

इस बारे में डॉक्टर संस्कार कहते हैं, “हमें समाज से जो कुछ मिला है हम उसे किसी न किसी रूप में वापस करना चाहते हैं। एक डॉक्टर होने के नाते यह हमारी जिम्मेदारी है कि लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करें। इसलिए हम बस्तियों में घूम-घूमकर स्वस्थ रहने का संदेश देते हैं, बीमारों का मुफ्त इलाज करते हैं। हमारी संस्था ने तामिलनाडु की संस्था फ्रीडम ट्रस्ट के साथ मिलकर अब तक 300 से ज्यादा दिव्यांगों को कृत्रिम अंग वितरित किये हैं, जोकि अपने आप में बहुत बड़ी बात है।”

‘दिव्यजीवन हेल्थ एवं एजुकेशन सोसाइटी’ से वॉलंटियर के रूप में स्टूडेंट के साथ-साथ अलग-अलग प्रोफेशन के लोग जुड़े हुए हैं और सभी को अलग-अलग अभियान में शामिल किया जाता है। जैसे डॉक्टर हेल्थकैंप में भागीदारी करते हैं, जबकि इंजीनियर या अन्य प्रोफेशनल बच्चों को पढ़ाने में सहयोग देते हैं।

गरीबों में सामान वितरित करते संस्था के सदस्य

संस्था की तरफ से अब तक 120 निशुल्क चिकित्सा जांच शिविर लगाये जा चुके हैं। वैसे, दिव्या और संस्कार ने ‘दिव्यजन हेल्थ एवं एजुकेशन सोसाइटी’ का सपना भी कुछ साल पहले एक शिविर के दौरान ही बुना था।

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इस बारे में ‘द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए डॉक्टर दिव्या ने कहा, “कॉलेज के दिनों में हम चिकित्सा कैंप में सेवाएं देने जाते रहते थे, वहां हम देखते कि लोग किस तरह गंदगी के बीच जीवन गुजारते हैं। तभी हमने सोच लिया था कि इस दिशा में कुछ न कुछ करना है। हमने पहले स्वास्थ्य पर फोकस किया और फिर धीरे-धीरे अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करते गए। आज यह देखकर अच्छा लगता है कि हम समाज के एक बड़े तबके की मुस्कान की वजह हैं।”

दिव्या और संस्कार को हर रोज़ कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जिसमें भीख मांगने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती है। बच्चों के परिजनों को इस बात के लिए तैयार करना कि वो अपने बच्चों से भीख न मंगवाएं आसान काम नहीं है। लेकिन दिव्या, संस्कार और उनके वॉलंटियरों के प्रयास जारी हैं। इसी साल अप्रैल में ‘दिव्यजीवन हेल्थ एवं एजुकेशन सोसाइटी’ ने पहले ‘दिव्य जीवन चालित विद्यालय’ का शुभारंभ किया था। दिव्या और संस्कार की योजना ऐसे 300 विद्यालय चलाने की है, ताकि गरीब बच्चों को अच्छी शिक्षा मुफ्त प्रदान की जा सके।

स्कूल के बच्चों के साथ डॉक्टर संस्कार और दिव्या

संस्कार सोनी और दिव्या भरथरे हर रोज़ किसी न किसी इवेंट में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में अपने लिए वक्त निकालना कितना मुश्किल है?

इस सवाल के जवाब में सोनी कहते हैं, “हम जो कुछ कर रहे हैं, वो एक तरह से अपने लिए कर रहे हैं क्योंकि हमें इसमें ख़ुशी होती है, इसलिए अपने लिए अलग से समय निकालने की ज़रूरत कभी महसूस ही नहीं हुई। मैं और दिव्या बस इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहायता की जा सके। हम सभी गतिविधियों का खाका खुद तैयार करते हैं और फिर वॉलंटियर की मदद से उन्हें अमल में लेकर आते हैं। बेहतर समाज की दिशा में हमने एक छोटा सा प्रयास किया है, जिसे अभी काफी आगे ले जाना है।”

‘द बेटर इंडिया’ के माध्यम से दोनों लोगों से कहना चाहते हैं कि ख़ुशी बांटने से बढ़ती है, यदि आप किसी की ख़ुशी की वजह बनते हैं, तो निश्चित ही आपको खुश रहने के अनगिनत मौके मिलेंगे। इसलिए उन लोगों के चहरे पर मुस्कान बिखेरने का प्रयास करें, जिनके लिए ख़ुशी भी सोने जितनी महंगी है। अगर आप नए नहीं देना चाहते, तो कम से कम पुराने कपड़े ही गरीबों में बाँटें। सड़क पर भीख मांगते बच्चों को पैसे देने के बजाये शिक्षा के लिए प्रेरित करें। यदि हम सभी समाज के प्रति अपना-अपना दायित्व निभाएं तो एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।

यदि आप डॉक्टर संस्कार और दिव्या के अभियान में शामिल होना चाहते हैं, तो उनसे 7987531628 पर संपर्क कर सकते हैं या उनकी संस्था के फेसबुक पेज पर विजिट कर सकते हैं।

संपादन – मानबी कटोच 

 


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