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अवॉर्ड विनिंग ट्रांसलेटर हैं केरल के यह दिहाड़ी-मज़दूर!

सुबह से शाम तक, वह सिर्फ एक मज़दूर हैं। दिन भर की मेहनत के बाद घर आकर वह अपनी डेस्क पर बैठकर निबंध, कहानियां और कभी-कभी पूरी किताब ट्रांसलेट करते हैं!

केरल के कन्नूर जिले के रहने वाले शफी चेरुमविलाई, 80 के दशक में बंगलुरु में एक चाय की दूकान पर काम करते थे और दिन भर ग्राहकों को चाय और स्नैक्स परोसते थे। इन ग्राहकों को तमिल में बात-चीत करते हए सुनकर उनकी भी इच्छा होती कि वे भी तमिल सीखें।

“पर मेरे पास इतने साधन नहीं थे कि मैं कोई कोर्स कर सकूँ। इसलिए, हर रात, काम के बाद, मैं इकट्ठे किये हुए तमिल फिल्मों के पोस्टर पढ़ता था। साथ ही, दूकान पर ग्राहक जो भी तमिल में किताब, पम्फलेट, अखबार आदि लाते, वह सब भी मैं पढ़ता था,” चेरुमविलाई ने याद करते हुए बताया।

आज यही, 56 वर्षीय दिहाड़ी-मजदूर, एक अवॉर्ड विनिंग ट्रांसलेटर हैं, जिन्होंने तमिल के 9 उपन्यासों और सैंकड़ों लघु कथाओं को अपनी मातृभाषा मलयालम में ट्रांसलेट किया है।

भले ही चेरुमविलाई की साहित्यिक दक्षता कमाल की है लेकिन उनके मुताबिक, उनका लेखन और अनुवाद करने का काम उनका घर नहीं चला सकता। इसलिए अब वे कन्नूर में ही अपने 5 सदस्यी परिवार को पालने के लिए लोगों के घर-निर्माण में मिस्त्री का काम करते हैं।

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लेकिन कोई भी मुश्किल, ट्रांसलेशन के लिए उनके पैशन को कम नहीं कर पायी। सुबह से शाम तक, वे सिर्फ एक मजदूर हैं। दिन भर की मेहनत के बाद घर आकर वे अपनी डेस्क पर बैठकर निबंध, कहानियां और कभी-कभी पूरी किताब ट्रांसलेट करते हैं।

संघर्ष भरा जीवन 

कन्नूर में पले-बढ़े शफी चेरुमविलाई ने एक अच्छी आय कमाने के लिए बहुत संघर्ष किया है और आज भी उनका संघर्ष जारी है। एक गरीब परिवार से आने वाले चेरुमविलाई के लिए शिक्षा भी किसी लक्ज़री से कम नहीं थी। उन्होंने दसवीं तक पढ़ाई की और फिर आर्थिक परेशानियों के चलते शिक्षा छूट गयी।

कम उम्र में ही वे काम की तलाश में पुणे चले गये और वहां से बंगलुरु आकर एक चाय की दूकान पर काम करने लगे। उसके बाद, वे तीन साल गल्फ में भी रहे और वहां पर मजदूर के तौर पर काम किया।

Shafi with his books

साल 1997 में जब वे वापस बंगलुरु आये तो वहां उन्हें एक टेक्सटाइल आउटलेट में काम मिल गया। यहाँ पर उन्होंने लगभग एक दशक तक काम किया और यही वह वक़्त था जब उनकी तमिल पर बहुत अच्छी पकड़ बनी।

उन्होंने सबसे पहला अनुवाद, गल्फ जाने से पहले एक रशियन कहानी का किया, जो कि तमिल में थी और उन्होंने उसे मलयालम में ट्रांसलेट किया। उनकी ट्रांसलेट की हुई कहानी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की केरल राज्य समिति के एक दैनिक मलयालम अखबार, जनायुगोम में छापी गयी।

ट्रांसलेशन का पैशन 

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साल 2008 में, जब वे फिर एक बार बंगलुरु में थे, तो उन्हें मशहूर तमिल लेखक तोप्पिल मोहम्मद मीरान के बारे में पता चला। उनकी लिखी हुई किताबें पढ़कर वे काफी प्रभावित हुए और उन्होंने मीरान को पत्र लिखकर उनकी लघु कथाओं को तमिल से मलयालम में ट्रांसलेट करने की इच्छा जताई।

मीरान ने तुरंत उन्हें हाँ कर दी, और चेरुमविलाई ने अनंतासैनम कॉलोनी को मलयालम में अनुवादित किया, जिसके लिए उन्हें बाद में नल्ली-थिसाई एत्तुम अवॉर्ड मिला।

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चेरुमविलाई गर्व से बताते हैं, “मैंने तोप्पिल मोहम्मद मीरान को मलयालम से परिचित करवाया है।”

2011 के बाद से, चेरुमविलाई, तमिलनाडु के तिरुची में केंद्र साहित्य अकादमी के साथ उनके मलयालम ट्रांसलेटर के रूप में काम कर रहे हैं। साहित्य अकादमी के साथ उनका सबसे पहला असाइनमेंट, सा. कंदासामी के उपन्यास ‘विसारणै कमीशन’ का अनुवाद था जो कि मलयालम में ‘अन्नावेशाना कमीशन’ के नाम से प्रकाशित हुआ।

उनके दूसरे कार्यों में, चेरुमविलाई ने पेरूमल मुरुगन की ‘अर्धनारी,’ आईपीएस अफसर जी. तिलकवती की ‘कलमरम’ और साहित्य अकादमी विजेता मेलणमई पोन्नुसामी की ‘मिन्सारपू’ का अनुवाद किया है। ट्रांसलेशन के अलावा उन्होंने खुद की भी कुछ लघु कहानियां लिखी हैं, जो कि अभी तक प्रकाशित नहीं हुई हैं।

“ट्रांसलेशन मेरा पैशन है, लेकिन इसमें पैसे नहीं है,” चेरुमविलाई कहते हैं। लेकिन अगर उनके हाथ में एक बार पेन आ जाये तो उन्हें चंद पल लगते हैं तमिल साहित्य के अथाह सागर में खोने में।

मूल लेख: सायंतनी नाथ

संपादन – मानबी कटोच 

 

Summary: Shafi Cherumavilayi, a native of Kerala’s Kannur district is an award winning translator of Tamil literature to Malayalam. By day time, he is a construction labor and in night he does his translation work. Cherumavilayi has translated Perumal Murugan’s ‘Ardhanaari,’ IPS officer G Thilakavathi’s ‘Kalmaram’ and Sahitya Akademi winner Melanmai Ponnusamy’s ‘Minsarapoo.’ He has got the Nalli Thisai Ettum award.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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