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गुमशुदा और बिछुड़े हुए लोगों को उनके घर तक पहुंचाता है नोएडा का यह युवक!

“अगर हमारे छोटे से प्रयास से किसी के घर की खुशियाँ लौट सकती हैं तो आपको वह प्रयास ज़रूर करना चाहिए।”

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लगभग 7.5% लोग मानसिक रोगों से पीड़ित हैं और इतने लोगों पर भारत में मात्र 4000 मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल हैं। इसके अलावा, भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता की कमी स्थिति को और गंभीर बना देती है।

लेकिन अगर कोई मानसिक रोगी अपने परिवार से बिछुड़ जाये या फिर उन्हें सम्भालने के उनके आगे-पीछे कोई न हो तो परिस्थितियां बद से बदतर होने लगती हैं। ऐसा ही कुछ, बिहार में पटना के रहने वाले विकास उर्फ़ पप्पू यादव के साथ हुआ। अपने माता-पिता की मृत्यु के बाद पप्पू अपना मानसिक संतुलन खो बैठे और घर से निकल गये। भटकते-भटकते हुए वह उत्तर-प्रदेश के नोएडा शहर आ पहुंचे।

इन हालातों में वह दिनभर एक जगह पर कूड़े के ढेर पर पड़े रहते। अगर कोई कुछ दे देता तो खा लेते, वरना भूखे-प्यासे वहीं पड़े रहते। आने-जाने वाले लोग, उन्हें देखते और फिर अनदेखा करके निकल जाते। यूँहीं कई दिन निकल गए लेकिन उनकी मदद को कोई नहीं आया। लेकिन फिर एक शख्स के नेक कदम ने मात्र 9 घंटों में उन्हें उनके परिजनों से मिलवा दिया।

यह नेक शख्स थे नोएडा के रहने वाले 30 वर्षीय सुनील नागर, जो ‘होम्स मंत्रा’ नामक अपना एक स्टार्टअप चला रहे हैं। सुनील, किस्मत से एक दिन उसी रास्ते से जा रहे थे जहां पप्पू निढाल होकर पड़े रहते थे। जैसे ही, सुनील की नजर पप्पू पर पड़ी, उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी और तुरंत उनके पास पहुँच गये।

Sunil Nagar

द बेटर इंडिया से बात करते हुए सुनील ने बताया, “मैंने जब उनसे बात करना शुरू किया तो वह कुछ भी बताने को तैयार नहीं थे। लेकिन फिर भी मैं वहीं बैठा रहा, कुछ न कुछ कहता रहा। धीरे-धीरे उन्होंने मेरी बातों का जवाब देना शुरू किया। मैं समझ तो गया था कि इनकी मानसिक हालत ठीक नहीं है। पर मैं उन्हें वहां सबकी तरह छोड़ नहीं सकता था।”

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बातों-बातों में जैसे-तैसे सुनील ने पप्पू से उनके घर-परिवार के बारे में पूछा तो उन्हें पता चला कि वह पटना से हैं। फिर उन्होंने घर का कोई नंबर पूछा तो बहुत देर तक कई गलत नंबर बताने के बाद, एक नंबर उन्होंने पूरे दस अंको का बताया। और यह किस्मत ही थी कि वह नंबर पप्पू के परिजनों का निकला।

“मैंने फ़ोन किया तो पता चला कि वह नंबर उनके फूफा का है। जब मैंने थोड़ी जानकारी दी तो उनके फूफा ने मुझसे वीडियो कॉल पर बात करने को कहा। वीडियो कॉल पर अपने फूफा को देखते ही पप्पू रोने लगे। मुझे उनके फूफा ने बताया कि उनके परिवार को पप्पू के जीवित या मृत होने की कोई खबर ही नहीं थी।”

Vikas Yadav aka Pappu yadav, Sunil got him admitted in the hospital

इस बारे में पप्पू यादव के फूफा, कैलाश प्रसाद यादव ने बताया, “लगभग 4-5 महीने से हम लोग उसे ढूंढ रहे थे और फिर अचानक से एक दिन सुनील नागर जी का फ़ोन आया। उन्होंने न सिर्फ हमारे बच्चे की खबर हम तक पहुंचाई बल्कि हमारे कुछ रिश्तेदारों के पहुँचने तक उसका पूरा-पूरा ख्याल भी रखा। आज की दुनिया में जहां लोग सिर्फ स्वार्थी हैं और बेईमानी में जी रहे हैं, वहां कोई इंसान दूसरे के दर्द को महसूस करके इतना कुछ करे तो वह हम सबके लिए मिसाल है।”

पप्पू यादव को उनके परिजनों तक पहुँचा कर सुनील की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। तो वहीं दूसरी तरफ कैलाश प्रसाद के मुताबिक अब सुनील उनके परिवार के सदस्य की तरह हैं।

“मैं 73 साल का हूँ और सुनील अब मेरे बेटे जैसा है। मैंने उससे सीखा है कि जहां भी सम्भव हो लोगों की मदद करनी चाहिए और अब मैं भी यही करने की कोशिश करता हूँ,” कैलाश ने कहा।

Handing over Pappu to his relatives

हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब किसी बिछुड़े हुए को सुनील ने उनके परिवार से मिलवाया है। पिछले एक साल में सुनील ऐसे 9 लोगों को उनके घर-परिवार तक पहुंचा चुके हैं। अपने इस सफ़र की शुरुआत के बारे में बताते हुए सुनील ने कहा, “जब भी मैं ऑफिस से लौटता था तो अक्सर एक बुजुर्ग को मैं रास्ते में बहुत ही असहाय अवस्था में फिरते हुए देखता था। मैं बस उनकी मदद करना चाहता था और इसलिए फिर एक दिन मैंने उनसे बात करने की कोशिश की। मुझे बात करने पर समझ में आया कि उनकी मानसिक हालत ठीक नहीं है।”

ऐसे में, सुनील ने पुलिस को फ़ोन मिलाया और उनसे उस व्यक्ति की मदद करने के लिए कहा। लेकिन उन्हें पुलिस अधिकारियों ने जो जवाब दिया, उससे वह हैरान रह गये।

“उन्होंने कहा कि ये तो पागल है। आप क्यों इसके चक्कर में पड़ रहे हो। उनकी बात सुनकर मुझे अजीब तो लगा, लेकिन फिर भी मैं उनके पीछे पड़ा रहा कि वे उसे कम से कम अस्पताल में तो भर्ती करवा दें,” उन्होंने आगे कहा।

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सुनील के बार-बार कहने पर पुलिस उन बुजुर्ग व्यक्ति को अपने साथ ले गयी। लेकिन दो दिन बाद ही सुनील ने उन बुजुर्ग की मौत की खबर एक अखबार में पढ़ी।

“पुलिस ने उन्हें अस्पताल ले जाने की बजाय यूँ ही छोड़ दिया था। मैंने उनकी तस्वीरें ली थीं और इसलिए अख़बार में खबर देखते ही मैं उन्हें पहचान गया। इस घटना ने मुझे बहुत प्रभावित किया कि अगर प्रशासन भी इन गुमशुदा, मानसिक रूप से पीड़ित लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं लेगा तो स्थिति कभी बदलेगी ही नहीं।”

इसके बाद, सुनील ने तय कर लिया कि अगर उन्हें आगे इस तरह से कोई व्यक्ति मिलेगा तो वह खुद उसे उसके परिवार तक पहुंचाने में मदद करेंगे। इस कड़ी में पिछले साल नवंबर में, उन्होंने पंजाब के रहने वाले अंग्रेज़ सिंह को उनके घरवालों से मिलवाया। सुनील कहते हैं कि जब उन्हें अंग्रेज सिंह मिले तो वह कुछ भी बताने की हालत में नहीं थे। एक एक्सीडेंट की वजह से उनके पैर की हड्डी भी टूट चुकी थी। ऐसे में, उन्होंने बहुत ही धैर्य से काम लिया। उन्हें खाना खिलाया और अस्पताल लेकर गये। फिर जैसे-तैसे उनके जिले का नाम उनसे पता चला तो उन्होंने उनकी फोटो लेकर फेसबुक और ट्विटर पर एक पोस्ट लिखी।

Sunil Nagar helped Angrej Singh (In inset) to reunite with his family

“सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने हर सम्भव तरीके से मदद करने की कोशिश की। फेसबुक पर ही हमें उनके गाँव का नाम पता चला और फिर वहां के सरपंच का नाम और नंबर भी कई नेक लोगों ने निकाल कर दिया। मेरे पोस्ट करने के सिर्फ 15 घंटों के भीतर ही अंग्रेज़ सिंह के परिवार का पता चल गया।”

सुनील कहते हैं कि उन्हें उनके परिवार से पता चला कि अंग्रेज सिंह लगभग 5 महीने से लापता थे और उनकी दो छोटी-छोटी बच्चियां भी हैं। अंग्रेज सिंह के पिता ने जब सुनील का धन्यवाद करने के लिए उन्हें गले से लगाया तो उनकी आँखे नम हो गयीं।

Angrej Singh with his daughters

“इन सभी वाकयों से मुझे एक चीज़ समझ में आई कि यदि हमारा प्रशासन थोड़ी भी ज़िम्मेदारी से काम करें तो न जाने कितने ही लापता लोगों को आसानी से उनके घर पहुँचाया जा सकता है। इसी तरह, हम नागरिकों पर भी सजग रहने की ज़िम्मेदारी है। ज़्यादातर लोग जो कि बहुत बार मदद करना चाहते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता कि करना क्या है? इसलिए ऐसा एक सिस्टम होना चाहिए कि यदि किसी को इस तरह से कोई पीड़ित मिलता है तो वे वहां कॉल करके उसे सही इलाज के लिए भेज सकें,” उन्होंने आगे कहा।

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सुनील ने इस संदर्भ में उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय और नोएडा के जिला अधिकारी को कई बार पत्र लिखा है। लेकिन उन्हें कहीं से भी कोई जवाब नहीं मिला। हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम है जिसके मुताबिक भारत में मानसिक रोग के पीड़ितों को बेहतर इलाज और देख-रेख प्राप्त करने का अधिकार है और साथ ही, इन लोगों को बिना किसी भेदभाव और हिंसा के अपना जीवन पूरे सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है। लेकिन यह अधिनियम कितना सफल है, यह कह पाना मुश्किल है।

Sunil Nagar with Aditya

हाल ही में, सुनील ने लखनऊ के रहने वाले एक बीकॉम ग्रेजुएट लड़के, आदित्य को भी उसके परिवार से मिलवाया है।

अंत में सुनील सिर्फ यही कहते हैं, “कोई हीरो बनना मेरा मकसद नहीं है। अकेला सुनील पूरे एक साल में सिर्फ 9 लोगों को उनके घर तक पहुंचा पाया जबकि पूरे देश में न जाने कितने हजारों लोग यूँ ही गुमशुदा फिर रहे हैं। मैं सिर्फ लोगों से यही कह सकता हूँ कि अगर हमारे छोटे से प्रयास से किसी के घर की खुशियाँ लौट सकती हैं तो आपको वह प्रयास ज़रूर करना चाहिए।”

इसके अलावा प्रशासन के रवैये के बारे में उनका सिर्फ इतना कहना है, “प्रशासन को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराना भी हम आम नागरिकों का ही काम है। किसी भी अच्छे और नेक काम के लिए, जिसमें प्रशासन की मदद की ज़रूरत है, आप बेहिचक उन्हें फ़ोन करिए। जवाब न मिलने पर बार-बार उन्हें परेशान करिए ताकि हारकर उन्हें भी अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करनी ही पड़े। क्योंकि ये बेसहारा, ‘पागल’ जैसे फिरने वाले लोग भी किसी के अपने हैं, जिन्हें हम अपनी एक कोशिश से नई ज़िन्दगी दे सकते हैं।”

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यदि आपको इस कहानी को पढ़कर प्रेरणा मिली है और आप सुनील नागर के इस काम में उनकी किसी भी तरह से मदद करना चाहते हैं तो उनसे फेसबुक के ज़रिये सम्पर्क कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 

Summary: Sunil Nagar, a resident of Greater Noida in Uttar-Pradesh has helped 9 mentally ill and missing people in the last one year. Due to his kind efforts, Angrej Singh from Punjab has been able to meet his daughters and in another incident, a young B. Com graduate named Aditya reunited with his family in Lucknow. Sunil, who is an MBA graduate is running his startup, Homes Mantra and doing this social and good work as well.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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