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कामवाली की एक समस्या से शुरू हुआ सफर, आज घर पर ही बनातीं हैं 30 से ज़्यादा प्रोडक्ट्स!

उन्हें अपने पर्सनल, किचन और होम क्लीनिंग प्रोडक्ट्स बनाने के लिए जो-जो चीजें खरीदनी पड़ती थी, उन्हें अब घर पर ही बनाकर वह हर महीने लगभग 10 हज़ार रुपये बचा लेती हैं।

प्लास्टिक हमारी जीवन शैली में इस तरह रच-बस चूका है कि इसकी जगह पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाना हमारे लिए बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन यह काम मुश्किल भले ही है, पर नामुमकिन नहीं!

मुंबई की रहने वाली प्रीति सिंह इसका एक बेहतरीन उदहारण हैं। उन्होंने अपनी और अपने परिवार की आदतों को छोटे-छोटे बदलावों से प्लास्टिक मुक्त कर लिया है। जी हाँ, अब वह न सिर्फ प्लास्टिक मुक्त जीवन जी रही हैं बल्कि अपने घरेलू खर्च को भी उन्होंने 25% तक कम किया है।

सस्टेनेबल लाइफस्टाइल में विश्वास रखने वाली यह गृहिणी पर्यावरण को बचाने की तरफ अपना कदम बढ़ा चुकी हैं और इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभा रही हैं। प्रीति ने द बेटर इंडिया को अपने इस सफ़र के बारे में बताया।

फटी एड़ियां बनी प्रेरणा:

सही ही कहते हैं कि अक्सर बड़े-बड़े कामों की शुरुआत की वजह एक मामूली-सी घटना होती है। प्रीती के सफ़र की शुरुआत भी उनके घर पर काम करने वाली घरेलु सहायक की एक बात से हुई।

“उसने एक दिन अपनी फटी हुई एड़ियों के बारे में बात करते हुए कहा कि उसकी एड़ियों में बहुत दर्द होता है और कभी-कभी तो खून भी निकलने लगता है। उसने काफी-कुछ ट्राय किया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ और वह मुझे किसी अच्छी क्रीम के बारे में पूछ रही थी। उस वक़्त मेरी माँ मेरे घर आईं हुई थीं और उन्होंने मुझसे सरसो का तेल और एक मोमबत्ती देने के लिए कहा। अगले दस मिनट में उन्होंने इन दोनों चीजों को गर्म और मिक्स करके उसके लिए एक तेल तैयार कर दिया,” उन्होंने बताया।

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जब प्रीति की माँ ने उनकी घरेलु सहायक से पूछा कि उनके बनाये तेल से आराम मिला या नहीं तो उसने बहुतखुश होते हुए बताया कि उसे काफी राहत मिली है उस तेल से।

बस यही वह पल था, जहां से प्रीति का सफ़र शुरू हुआ। उसी दिन से प्रीति ने अपनी माँ से अलग-अलग तेल और क्रीम बनाने के बारे में पूछा। आज, वह अपने घर में ही डिटर्जेंट, हैंडवॉश, लिप बाम, फ्लोर क्लीनर्स, शैम्पू, कंडीशनर आदि की 30 से भी ज्यादा वैरायटी बना लेती हैं।

प्लास्टिक-फ्री ग्रोसरी शॉपिंग:

मुंबई की यह गृहिणी सिर्फ अपने घर पर क्रीम आदि ही नहीं बनाती हैं, बल्कि उन्होंने अपनी ग्रोसरी शॉपिंग को भी एकदम प्लास्टिक मुक्त कर लिया है। जिसकी शुरुआत उन्होंने सामान के लिए घर से ही कपड़े के थैले और डिब्बे आदि ले जाने से की।

“अगर मुझे साधारण ग्रोसरी खरीदनी होती है तो मैं बड़े मॉल या फिर हाइपरमार्किट नहीं जाती, बल्कि डिब्बे लेकर अपने आस-पास के किराने की दूकान पर ही जाती हूँ। जब मैंने ऐसा करना शुरू किया था तो बहुत बार मैं ज़रूरत के हिसाब से कम या ज्यादा डिब्बे लेकर जाया करती थी। लेकिन फिर इस मामले में मैंने खुद को और अनुशासित किया,” प्रीति ने बताया।

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अब उनके पड़ोस के किराना दूकान के मालिक हो या फिर बेकर, सभी को पता है कि प्रीति उनसे एक भी सामान पॉलिथीन में नहीं लेंगी। इसलिए वे खुद उनकी जिस तरह से भी मदद कर सकते हैं, करने की कोशिश करते हैं। अपने आस-पास की दुकानों से सामान लेने का यही फायदा है। आप सिर्फ अपने पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं कर रहे बल्कि लोगों से भी आपके सम्बन्ध अच्छे होते हैं।

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कचरा-प्रबंधन पर भी जोर:

प्रीति अपने घर के कचरे को भी उचित तरीके से प्लास्टिक, ग्लास और गीले कचरे में वितरित करती हैं। वह हफ्ते में सिर्फ एक बार अपने घर का कचरा फेंकती हैं।

“खट्टे फलों को मैं बायो-एंजाइम बनाने के लिए रख लेती हूँ। बाकी गीले कचरे को एक टोकरी में डम्प करके हर हफ्ते पास के एक स्कूल के माली को दे देती हूँ। उससे वह खाद बनाकर स्कूल के बगीचे में डालता है। इससे मेरे घर का कचरा लगभग आधा हो जाता है और इसलिए मुझे बाकी कचरा पांच या छह दिनों में एक बार ही बाहर डालना होता है। इसमें मेरी कोई खास मेहनत नहीं लगती है। वेस्ट-मैनेजमेंट में हम सबको सरकार की मदद करनी चाहिए। यह मेरा योगदान है,” उन्होंने हंसते हुए कहा।

इससे उन्हें क्या वापस मिलता है?

सबसे बढ़कर तो उन्हें संतुष्टि मिलती है कि वह समाज और पर्यावरण के लिए अपने स्तर पर कुछ कर रही हैं। इसके अलावा, उन्हें अपने पर्सनल, किचन और होम क्लीनिंग प्रोडक्ट्स बनाने के लिए जो-जो चीजें खरीदनी पड़ती थी, उन्हें अब घर पर ही बनाकर वह हर महीने लगभग 10 हज़ार रुपये बचा लेती हैं।

“सादी सी चीजें जैसे कि नारियल का तेल दूकान से खरीदने की बजाय, खुद नारियल ले जाकर किसी एक्सट्रैक्टर से तेल निकलवाना काफी सस्ता है। और मेरे दोनों बच्चे अब काफी बड़े हैं तो मैं इन सब चीजों के लिए वक़्त निकाल सकती हूँ। बाकी ऑनलाइन वीडियो और टुटोरिअल्स से मुझे काफी मदद मिली है,” उन्होंने आगे कहा।

बाकी, यह आप पर है कि आप अपनी ज़िन्दगी में किन बातों को प्राथमिकता देते हैं।

जब आप अपने वक़्त को अपने घर को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित बनाने में लगा सकते हैं, तो आपको बिल्कुल यह करना चाहिए। प्रीति को हर महीने हजारों रुपये बचाने से भी ज्यादा ख़ुशी तब होती है जब उनके दोस्त उनकी बनायी क्रीम और अन्य प्रोडक्ट्स उनसे मांगते हैं।

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“मेरे बेटे और बेटी को अभी भी प्लास्टिक की पैकेजिंग में आने वाले बिस्किट पसंद हैं और मैं उन्हें खाने भी देती हूँ। क्योंकि यह मेरी निजी सोच है और किसी और पर इसे थोपा नहीं जा सकता। मुझे पता है कि कुछ दिनों में उन्हें भी चीजें समझ आने लगेंगी। इसलिए मैं सिर्फ एक अच्छे और स्वच्छ भविष्य की उम्मीद करती हूँ,” उन्होंने अंत में कहा।

संपादन – मानबी कटोच 

मूल लेख: तन्वी पटेल

Summary: Preeti Singh, a Mumbai based homemaker, will happily tell you that boycotting plastic-packed personal and home products has reduced her expenses by 25 per cent! Yes, she has done it with her DIY tricks and small initiatives. Today, she has branched out to making 30+ varieties of detergents, handwashes, lip balms, floor cleaners, shampoo, conditioners right at her home.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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