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Exclusive: सचिन तेंदुलकर का रिकॉर्ड तोड़ने वाली शेफाली से एक ख़ास मुलाक़ात!

वर्ल्ड कप में सिलेक्शन के साथ-साथ शेफाली अपने आइडल सचिन तेंदुलकर से एक बार मिलने की ख़्वाहिश रखतीं हैं।

क्टूबर 2013 में सचिन तेंदुलकर ने अपने क्रिकेट करियर का आखिरी रणजी मैच खेला। यह मैच हरियाणा के रोहतक के पास चौधरी बंसी लाल स्टेडियम में खेला गया। हज़ारों की तादाद में लोग इस मैच को देखने के लिए आये थे। उसी भीड़ में एक 9 साल की बच्ची, अपने पापा के साथ सचिन को खेलता हुआ देख रही थी।

लोगों की ज़ुबान पर बस एक ही नाम था – ‘सचिन सचिन सचिन’! और हो भी क्यों ना। पूरे विश्व में भारतीय क्रिकेट का परचम लहराने वाले खिलाड़ी जो रहे हैं वो। एक खेल की बदौलत किसी को इतना प्यार, इतनी इज्ज़त मिल रही है, यह देखकर उस बच्ची ने अपने पापा से सिर्फ एक सवाल किया,

“क्या मुझे भी इतने ही लोग देखने आएंगे, अगर मैं ऐसा क्रिकेट खेलूंगी तो?”

“हाँ, बिल्कुल। मेहनत करोगी और अच्छा खेलोगी, तो क्यों नहीं देखने आएंगे ,” उसके पिता ने जवाब दिया था।

इसके, लगभग छह साल बाद, साल 2019 में उसी बच्ची ने, सचिन तेंदुलकर का 30 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़कर नया इतिहास रचा। वह लड़की है शेफाली वर्मा, सिर्फ 15 साल की उम्र में अपना अंतर्राष्ट्रीय अर्धशतक बनाने वाली क्रिकेट खिलाड़ी। उनसे पहले, सचिन ने देश में सबसे कम उम्र, 16 साल 214 दिन में अपना अंतर्राष्ट्रीय अर्धशतक (23 नवंबर, 1989 को पाकिस्तान के खिलाफ 59 रन) बनाया था।

आज शेफाली ने मात्र 15 साल 285 दिन की उम्र में अपने आइडल के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 49 बॉल में 73 रन बनाए हैं।

Shafali Verma, The Young Cricketer

इतनी कम उम्र में देश में सभी के लिए प्रेरणा बनने वाली इस युवा क्रिकेटर का यहाँ तक का सफर कैसा रहा यह जानने के लिए, हमने शेफाली वर्मा, उनके पिता संजीव वर्मा और उनके कोच अश्विनी कुमार से बात की।

पिता बनें प्रेरणा 

साल 2004 में रोहतक में जन्मी शेफाली को इसी साल भारतीय टीम में एंट्री मिली, जब मिताली राज ने अपनी रिटायरमेंट के बारे में घोषणा की। उन्हें भारतीय महिला क्रिकेट टीम के ट्वेंटी-ट्वेंटी स्क्वाड में साउथ अफ्रीका के खिलाफ सीरीज़ के लिए शामिल किया गया। इसके बाद, उन्होंने साल 2019 में 24 सितम्बर को साउथ अफ्रीका के खिलाफ अपना अंतर्राष्ट्रीय डेब्यू किया।

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शेफाली बताती हैं कि यह किसी सपने से कम नहीं था और उनसे ज्यादा उनके आस-पास के लोग खुश थे। खासकर कि उनके पिता और उनके कोच, जिन्होंने शेफाली को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए दिन-रात एक कर दिया था।

With her family

क्रिकेट खेलने की प्रेरणा शेफाली को उनके अपने घर से मिली। उनके अपने पिता काफी अच्छा क्रिकेट खेलते थे और उन्हीं के मार्गदर्शन के साथ से शेफाली ने इस राह पर अपने नन्हें कदम बढ़ाए थे।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उनके पिता संजीव वर्मा ने बताया,

“बचपन से ही, मुझे भी बहुत शौक था खेलने का। स्कूल टाइम से ही इधर-उधर टीम बनी हुई थी तो जाया करते थे खेलने। लेकिन घर में कोई खास पढ़ा-लिखा नहीं था जो आगे कहीं ले जाता तो फिर बस घर की ज्वेलरी की दूकान पर बैठने लग गये। पर जब अपने बच्चे हुए और देखा कि उनको भी स्पोर्ट्स में अच्छी दिलचस्पी है तो उनको आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया।”

सबसे पहले शेफाली से लगभग एक-डेढ़ साल बड़े उनके भाई, साहिल ने खेलना शुरू किया और फिर उन्हीं के साथ शेफाली भी मैदान चली जाती। संजीव बताते हैं कि लगभग 8 साल की उम्र से ही शेफाली की प्रतिभा नजर आने लगी थी और इसलिए उन्होंने उसे कभी भी कहीं भी खेलने से नहीं रोका। शुरू में, वे उसे टेनिस बॉल से प्रैक्टिस कराते थे।

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लड़कों के साथ खेलने के लिए कटवा लिए बाल 

शेफाली कहती हैं, “मुझे जब गेम में मजा आने लगा तो मैं चाहती थी कि मैं अच्छे से खेलूं। अब सिर्फ लड़कियों की टीम तो होती ना, ऐसे में गली क्रिकेट हो या फिर कोई लोकल टूर्नामेंट, तो उसे लड़कों की टीम में ही खेलना पड़ता। बहुत बार वो मुझे खिलाने से मना कर देते कि चोट लग जाएगी, लड़की है, बाद में शिकायत करोगी।”

इस समस्या का हल निकाला गया कि उन्होंने अपने बाल, बिल्कुल लड़कों की तरह छोटे-छोटे करा लिए ताकि कोई भी आसानी से ना पहचान पाए कि वो लड़की है। उन्होंने आगे कहा कि अगले दिन जब वह खेलने गयी तो ज़्यादातर लोगों ने तो उन्हें पहचाना ही नहीं।

Shafali with other cricketers

इसी तरह, एक बार अपने भाई की तबियत खराब होने पर वह उनकी जगह एक टूर्नामेंट खेलने चली गयीं। यहाँ पर वह मैन ऑफ़ द मैच रहीं। लगभग 3 साल तक उनके पापा ने दिन-रात मेहनत करके उनकी तैयारी कराई और फिर वह वर्ल्ड लेवल पर आ सके, इसके लिए ‘राम नारायण क्रिकेट क्लब’ में उनका दाखिला करा दिया।

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मेहनत और विश्वास से मिली टीम में जगह

लगभग 12 साल की उम्र में शेफाली ने अकादमी ज्वाइन की और यहाँ पर वह कोच अश्विनी कुमार के मार्गदर्शन में तैयारी करने लगी। इस अकादमी के बहुत-से क्रिकेटर जैसे कि जितेंद्र सिंह, गौरव वशिष्ठ, तजिंदर मान आदि रणजी खेले चुके हैं। ये अनुभवी खिलाड़ी भी अक्सर आकर बच्चों को खेल के गुर सिखाते हैं।

“मैं सुबह साइकिल पर अपने स्कूल जाती और फिर घर आते ही बस 15 मिनट में खाना-वाना खाकर अकादमी के लिए निकल जाती। वहां पर शाम तक प्रैक्टिस करना और फिर घर आना। घर पर आकर भी खेल की ही बातें होती थीं,” शेफाली ने बताया।

अकादमी में शेफाली की प्रतिभा शुरू के दिनों में ही उनके कोच को समझ में आ गयी। उन्होंने बताया कि शेफाली में क्रिकेट के लिए स्किल्स पहले से ही थीं। उन्हें तो बस उसके हुनर को तराशना था और यह उन्होंने किया लगातार प्रैक्टिस करवाकर। अश्विनी कुमार ने शेफाली को अपनी उम्र से बड़े खिलाड़ियों के साथ खिलाया ताकि उसकी अपने गेम पर पकड़ बने।

Shafali with her coach, Ashwini Kumar and his wife

“बाकी एक तो इस छोटी उम्र में भी उसकी फिजिकल स्ट्रेंथ काफ़ी अच्छी है। दूसरा, सबसे खास यह है कि वह बेधड़क खेलती है। उसे डर नहीं है कि कौन उसे बॉल करा रहा है। कोई रणजी का प्लेयर है या फिर कोई कोच, उसका ध्यान सिर्फ अपने खेल पर होता है,” कोच अश्वनी ने बताया।

नेशनल टीम में सिलेक्ट होने से पहले शेफाली रणजी और हरियाणा के अन्य कई टूर्नामेंट में खेल रही थीं। इन्हीं टूर्नामेंट्स के दौरान कुछ नेशनल कोच और सिलेक्टर्स की नज़र उन पर पड़ी।

“भले ही मैं स्कोर बहुत ज्यादा नहीं कर पाती थी उन टूर्नामेंट्स में, लेकिन मेरा गेम सबको पसंद था। शायद इसलिए मुझे उन लोगों ने एक मौका दिया और मेरी सिर्फ यही कोशिश रही कि मैं अपनी टीम और देश के लिए कुछ करूँ।”

अश्विनी आगे बताते हैं कि शेफाली का खेल और फिर खेल के प्रति उनका समर्पण, ये दोनों ही टीम में जगह बनाने के लिए उनके काम आया। लेकिन नेशनल टीम में अपने चयन पर शेफाली कहती हैं, “उस समय भी मेरे दिमाग में यही बात आई कि मुझे अच्छा खेलना है, स्कोर करना है और अपनी टीम को जिताना है, चाहे फिर मैं कहीं भी खेलूं।”

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वर्ल्ड कप खेले शेफाली 

नेशनल टीम के साथ अपने अनुभव के बारे में शेफाली कहती हैं, “हमारी टीम की सबसे अच्छी बात है यूनिटी। सभी खिलाड़ी, चाहे छोटा हो या बड़ा, एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। मुझे कभी भी किसी ने यह महसूस नहीं कराया कि मैं उनसे बहुत छोटी हूँ, बल्कि हर कोई मुझे एक ही बात कहता कि अपने गेम पर फोकस रखो। वहां पर हमारे कोच रमन सर ने भी मुझे बस यही कहा कि तुम अपना गेम खेलो और तुम अच्छा करोगी।”

अपने कोच और अपनी टीम के भरोसे को शेफाली ने बरकरार रखा और दोनों ही टूर्नामेंट में बहुत अच्छा परफॉर्म किया।लेकिन अब शेफाली पर जिम्मेदारियां बढ़ गयी हैं और इस बारे में उनका कहना है, “थोड़ा तो रहता है दिमाग में कि अब इतने लोग बात कर रहे हैं, सबकी उम्मीदें हैं तो अच्छा करना है। लेकिन फिर मैं इस बात को पॉजिटिव तरीके से सोचती हूँ कि मेरा गेम मुझे यहाँ तक लेकर आया है और आगे भी गेम ही लेकर जायेगा तो बस अपने गेम पर फोकस करना है। मेरे लिए क्रिकेट सब कुछ है, उसके बिना मैं कुछ नहीं हूँ।”

शेफाली के साउथ अफ्रीका और वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ अच्छे प्रदर्शन के बाद हर किसी को बस यही उम्मीद है कि शेफाली का सिलेक्शन वर्ल्ड कप के लिए हो। संजीव वर्मा, अपनी बेटी की इस सफलता के लिए उनके कोच और अकादमी का शुक्रिया करते हैं कि उनके सपोर्ट के चलते उनकी बेटी के पंखों को उड़ान मिली है।

Indian National Women Cricket Team

वह सिर्फ़ एक ही बात कहते हैं, “मैं बस चाहता हूँ कि मेरी बेटी अपनी टीम, अपने देश के लिए कुछ करे। जिस खेल को बहुत मेहनत से हमारी बेटियों ने यहाँ तक पहुँचाया है, वह इसी तरह आगे बढ़ता रहे और ज़्यादा-से ज़्यादा लड़कियां क्रिकेट में आयें। इसलिए मैं हर एक माता-पिता से यही कहूँगा कि अपनी बेटियों का साथ दें, उनकी ताकत बनें।”

पिछले कुछ सालों में जिस तरह से भारतीय महिला क्रिकेट को उसकी सही पहचान और मंच मिलने लगी है, उससे उम्मीद है कि अब ज्यादा से ज्यादा लड़कियां क्रिकेट में आएंगी। पहले लोग महिला क्रिकेट के बारे में जानते भी नहीं थे पर अब मिताली राज, हरमनप्रीत कौर और शेफाली वर्मा जैसे नाम सबकी जुबान पर हैं।

वर्ल्ड कप में सिलेक्शन के साथ-साथ शेफाली अपने आइडल सचिन तेंदुलकर से एक बार मिलने की ख़्वाहिश रखतीं हैं। हमें उम्मीद है कि जल्द ही उनकी ये दोनों ख्वाहिशें पूरी हों और भारत की यह बेटी पूरी दुनिया में देश का नाम रौशन करे!

संपादन – मानबी कटोच 

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Summary: Shafali Verma from Haryana became the youngest cricketer to play for India in a T20 game when she made her debut against South Africa in October, scoring an impressive 46. Now she has broken Sachin Tendulkar’s 30-year-old record as the youngest player to make an international fifty for her country. Tendulkar was 16 years and 214 days when he made a half-century in a Test against Pakistan in Faisalabad in 1989. Verma did it at 15 years and 285 days.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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