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स्ट्रेस से लेकर ऑटिज़्म तक, इन पेट् डॉग्स के प्यार ने सबको दे दी मात!

इनकी उपस्थिति की वजह से हम अवसाद जैसी गंभीर समस्या से भी बाहर निकल सकते हैं। 

ब बात हो रही हो आज की जीवनशैली की, तो तनाव, चिंता और अवसाद इसका अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं। यही वजह है कि लोगों को इससे जूझने के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाने पड़ते हैं। योग, ध्यान, सायकोलॉजिकल सेशन इन उपायों में से एक हैं। लेकिन रोज़ाना बढ़ते इस तनाव से बचने का एक उपाय और भी है और वह है पेट् थेरेपी।

यदि आप जानते हैं कि यह थेरेपी क्या है, तो आज आप शायद इसके बारे में और जान पाएंगे। लेकिन यदि आपने इसके बारे में कभी नहीं सुना है, तो हम बता दें कि पेट् थेरेपी आपको पालतू जानवरों से मिलती है। चाहे वो कोई डॉग हो या कैट, इन जानवरों को एक खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसकी मदद से ये पेट्स हमारे साथ समय बिताते हैं और उनके सकारात्मक रवैये से हमारा तनाव दूर हो जाता है। इनकी उपस्थिति की वजह से हम अवसाद जैसी गंभीर समस्या से भी बाहर निकल सकते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही व्यक्ति से मिलाने जा रहे हैं, जिसने अपने पेट् डॉग्स की मदद से इस काम की शुरुआत की है।

अनिमेष कतियार ने लोगों के तनाव को कम करने के लिए ‘फर बॉल स्टोरी’ नामक कंपनी की शुरुआत की है, जहां वे अपने पेट् थेरेपी डॉग्स को लोगों की मदद करने के लिए ट्रेन करते हैं।

 

ऐसे हुई फर बॉल स्टोरी की शुरुआत

अनिमेष कतियार

 

अनिमेष कतियार, दिल्ली के रहनेवाले एक ऐसे युवा हैं, जिन्होंने पेट् थेरेपी का असर स्वयं पर देखा है। बात उन दिनों की है, जब अनिमेष कॉलेज में पढ़ा करते थे। उस दौरान उन्होंने कॉलेज परिसर में रहनेवाले दो कुत्तों को कुछ समय के लिए अपने घर का हिस्सा बनाया था। अनिमेष टाइप वन डायबिटीज़ से जूझ रहे थे। लेकिन उनके कॉलेज पेट् डॉग की मदद से उनका तनाव कम होता गया और कुछ ही दिनों में उन्हें डायबिटीज़ में आराम दिखाई देने लगा।

इस फर्क को देख कर उन्होंने इस विषय में जानने की कोशिश की और तब उन्हें हॉवर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च मिली, जिसके अनुसार पेट् थेरेपी को स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने का ज़रिया बताया गया था। उस दौरान ही अनिमेष ने अपनी कंपनी ‘फर बॉल स्टोरी’ की शुरुआत करने का फैसला लिया। लेकिन उनका काम लोगों के बीच प्रचलित तब हुआ, जब उन्हें इन थेरेपी डॉग्स को मुंबई और दिल्ली एयरपोर्ट का हिस्सा बनाया गया। जहां वे सफर करनेवाले लोगों के तनाव को कम करने में मदद करने लगे।

 

मुंबई एयरपोर्ट ने ऐसे शुरू की पहल

 

 

अमेरिका का 9/11 आतंकी हमला आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है। उस दौरान कई लोगों ने अपनों को खोया था और लोग हवाई यात्रा करने से डरने लगे थे। उस दौरान हॉवर्ड ने एक रिसर्च पेश की थी, जिसमें बताया गया था कि इन डिस्ट्रेस लोगों की मदद थेरेपी डॉग्स कर सकते हैं। इसलिए अमेरिका के एयरपोर्ट्स पर थेरेपी डॉग्स को लाया गया। मुंबई से भी कई लोग इस दौरान यात्रा कर रहे थे और उनमें एनज़ाइटी अटैक्स और अवसाद की समस्या देखी गई। यही वजह थी कि मुंबई एयरपोर्ट ऑथोरिटी ने अनिमेष से संपर्क किया। उसके बाद से ही इन थेरेपी डॉग्स को मुंबई एयरपोर्ट पर लोगों से मिलने-जुलने दिया जाने लगा। इसका असर कुछ समय में ही साफ़ दिखाई दिया।

अनिमेष कहते हैं, “एयरपोर्ट से लोग अलग-अलग परिस्थितियों में सफर करते हैं। कोई अपने बीमार परिजन को देखने जा रहा होता है, कोई किसी अपने को खो चुका होता है और कोई किसी प्रकार का ऑपरेशन करवाने जा रहा होता है। ऐसे समय में उन्हें तनाव की स्थिति में देखा जाता है। ऐसे लोगों की मदद हमारे थेरेपी डॉग्स करते हैं।”

 

जब ऑटिज़्म को मात दी पेट् डॉग ने

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थेरेपी डॉग से जुड़े अनुभव की बात करते हुए अनिमेष कहते हैं, “हमने ऑटिज़्म से जूझ रहे बच्चे को कुछ दिनों के लिए थेरेपी डॉग के साथ समय बिताने दिया। वो बच्चा कभी लोगों के बीच जाना ही नहीं चाहता था और ना ही लोगों से घुलना-मिलना चाहता था। उसे हम अक्सर घर में बंद देखते थे। लेकिन थेरेपी डॉग के साथ कुछ समय बिताने के बाद ही उसके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखे गए। धीरे-धीरे उस बच्चे ने लोगों के साथ घुलना-मिलना शुरू कर दिया और सोशल एनज़ाइटी से दूर होता चला गया। यह एक ऐसा अनुभव था, जिससे मुझे महसूस हुआ कि हमारे ये प्यारे थेरेपी पेट्स लोगों की बेहद मदद कर सकते हैं। हमने खुद एक बच्चे को ऑटिज़्म को मात देते देखा है!”

 

डॉग्स की ट्रेनिंग से शुरू होती है यह प्रक्रिया

 

अनिमेष थेरेपी डॉग्स के बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं, “इन डॉग्स को चुनना भी एक चुनौती पूर्ण काम होता है। हमें बेहद संजीदगी से सही पेट् चुनना होता है। इसके बाद उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों के लिए तैयार किया जाता है। एयरपोर्ट में आते-जाते विमानों की आवाज़ों से उन्हें रू-ब-रू करवाया जाता है और अलग-अलग तरह के लोगों से मिलने के लिए उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। हमारे ये प्यारे पेट्स लोगों के लिए दिल से ट्रेनिंग लेते हैं और हमें इस काम के लिए इनका एहसानमंद होना चाहिए।”

 

इंसानों की ही तरह पेट्स का भी होता है अलग-अलग व्यक्तित्व

यदि आप सोचते हैं कि हर जानवर एक जैसा होता है, तो आप बिलकुल गलत हैं। इंसानों की ही तरह हर पेट् का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें उनके साथ बर्ताव करना चाहिए।

पालतू जानवरों को लेकर लोगों के रवैये के बारे में अनिमेष कहते हैं, “आज के समय में हम परिस्थितियों को लेकर क्रूर होते जा रहे हैं। हम सिर्फ ये देखते हैं कि कोई कुत्ता गुस्से में है, लेकिन हम ये कभी नहीं सोचते कि वो क्यों भौंक रहा है? हो सकता है कि वो भूखा है, हो सकता है कि उसे दर्द हो रहा है। जानवर बेज़ुबान होते हैं, उन्हें समझने की ज़रुरत पड़ती है। इसलिए अब हम बच्चों को इसकी सीख देते हैं। जब हम बच्चों को इन जानवरों के प्रति सहानुभूति सिखाएंगे, तो अपने आप उनमें बढ़ती उम्र में फर्क देखा जा सकेगा।”

हमारे लिए यह समझना ज़रूरी है कि इंसानों के साथ-साथ ये मासूम और बेज़ुबान जानवर भी इसी दुनिया का हिस्सा हैं। ये हमसे थोड़ी देखभाल और प्यार के अलावा कुछ नहीं मांगते और बदले में हमें ये चुनौतीपूर्ण जीवन गुज़ारने में मदद करते हैं। इसलिए हमें एक ऐसी भावी पीढ़ी बनानी है, जिनमें सहानुभूति और दया हो।

अनिमेष कतियार अपनी कंपनी ‘फर बॉल स्टोरी’ के ज़रिये लोगों में ऐसे ही बड़े बदलाव लाना चाहते हैं। साथ ही वे इन प्यारे फरी दोस्तों के लिए कई अनोखी योजनाएं बना रहे हैं।

यदि आप भी अनिमेष से जुड़ना चाहते हैं, तो आप info@furballstory.com पर ईमेल या 8130 819 609 पर कॉल कर सकते हैं। साथ ही फर बॉल स्टोरी से जुड़ी खास बातें जानने के लिए आप उनकी वेबसाइट पर विज़िट कर सकते हैं।

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by तोषिनी राठौड़

लेखन से गहरा जुड़ाव रखने वाली तोषिनी राठौड़ लंबे समय से मीडिया में कार्यरत है। संगीत से लगाव और अपने प्राणी-प्रेम के लिए लोगों के बीच पहचान रखती तोषिनी एक गायिका तो हैं ही , इसके साथ ही वह कई एनीमल एनजीओ के साथ काम भी करती हैं। बचपन से किताबी कीड़ा रह चुकी तोषिनी के लिए उनका लेखन एक मेडिटेशन की तरह काम करता है।

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