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पुणे: कैंसर से लड़ते हुए शहर की 100 दीवारों को बना रहे हैं ख़ूबसूरत!

पहले शहर की गन्दगी की ओर लोगों का रवैया बेहद उदासीन था, लेकिन उनकी खूबसूरत पेंटिंग्स ने वो कमाल कर दिखाया है कि अब लोग अपनी मर्ज़ी से इन खूबसूरत दीवारों के आसपास साफ़-सफाई रखने लगे हैं।

पने सुना होगा ‘सपने देखने से ही काम नहीं चलता, उन्हें पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत और लगन की ज़रुरत पड़ती है।’

इस बात पर असल में अमल कर रहे हैं पुणे के कार्तिकेय शर्मा, जिन्होंने अपने शहर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक खूबसूरत बनाने का प्रण लिया है। आज चाहे वो कोई गाँव हो, शहर हो, या हो महानगर, लोग अपने परिसर की स्वच्छता की ओर खास ध्यान रखने लगे हैं। इसी अभियान को लेकर एक नयी और खूबसूरत पहल की है कार्तिकेय ने, जो पुणे की बदसूरत दीवारों को अपने सपनों की ही तरह खूबसूरत रंगों में रंग रहे हैं।

पुणे की 100 दीवारों को रंगों से सजाने के लक्ष्य की शुरुआत कर चुके कार्तिकेय पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए अग्रसर हैं। आइये जानते हैं कैसे कार्तिकेय ने इस खूबसूरत लेकिन कठिन काम की शुरुआत की है।

 

क्या है क्लीन एंड पेंट पुणे प्रोजेक्ट

 

पुणे की बदसूरत और गन्दी दीवारों को साफ़ कर उन्हें पेंट करना इस आर्टिस्ट का काम है। चाहे वो दहाड़ता शेर हो या अपनी चमकीली आँखों से लोगों को निहारती बिल्ली, ऐसी कई सुन्दर पेंटिंग अब आपको पुणे की दीवारों पर दिखाई दे सकती है। कार्तिकेय ने पुणे की 100 दीवारों को पेंट करने के लिए क्लीन एंड पेंट प्रोजेक्ट की शुरुआत की है। साल 2014 में कॉलेज के दौरान कार्तिकेय ने अपनी कलाकारी से शहर को खूबसूरत बनाने का सपना देखा था, जो आज इस प्रोजेक्ट के रूप में सामने आया है।

 

जुम्बिश क्रिएशन‘ नामक कंपनी और ‘ओपन डोर’ नामक आर्ट स्कूल की नींव रखनेवाले कार्तिकेय की ज़िन्दगी भी कई उतार-चढ़ावों से गुज़री है। जिसकी कहानी बेहद प्रेरणादायी है।

कैंसर से जंग, लेकिन पेंटिंग से राहत

कार्तिकेय शर्मा

 

इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके कार्तिकेय को साल 2009 में कैंसर ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। हालांकि वे तब ठीक हो चुके थे। लेकिन एक बार फिर साल 2016 में उन्हें कैंसर होने की जानकारी हुई, जिसके बाद करीब 2 साल तक वे इस बीमारी से दो-दो हाथ करते रहे। लेकिन इस लड़ाई में उनका साथ दिया पेंटिंग ने, जिसकी मदद से उन्हें मानसिक तनाव में राहत मिली। पेंटिंग के प्रति कार्तिकेय का जूनून ही है, जिसने उन्हें इस स्थिति में भी क्लीन एंड पेंट पुणे प्रोजेक्ट शुरू करने का हौंसला दिया।

“मैं एक-एक कर पुणे की दीवारें पेंट कर रहा हूँ। आने वाले कुछ महीनों में मैं 100 दीवारें पेंट करना चाहता हूँ। दरअसल एक दिन यूँही मैंने एक दिवार पर पेंटिंग बनायी और इस कला से मुझे प्यार ही हो गया। कुछ समय तक तो हालातों की वजह से मुझे इससे दूर रहना पड़ा। पर अब मैं वापस आ गया हूँ… अपने स्प्रे पेंट्स और दीवारों के पास। मैं ये तो नहीं कह सकता कि मुझे अपने आप पर नाज़ है, पर हाँ! मैं यह ज़रूर कह सकता हूँ कि मुझे अपनी टूटी हुई हड्डियों पर ज़रूर नाज़ है, जो मेरी दी हुई ऐसी मुश्किल चुनौतियों को झेल जाती हैं,” कार्तिकेय मुस्कुराते हुए कहते हैं!

एक मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखनेवाले कार्तिकेय के मन में जिस तरह अपने शहर को इंद्रधनुषी रंगों से रंगने का सपना है, उसी तरह अपना एक व्यक्तिगत सपना भी उनकी आँखों में हमेशा चमचमाता रहता है। वे अपने आर्ट को पैरिस के लूव्र आर्ट गैलेरी में जगह देना चाहते हैं।

 

लोगों में बदलाव का कारण बने रंग

 

कार्तिकेय लोगों के नज़रिये और रवैये में बदलाव करने में सफल हो रहे हैं

कार्तिकेय की क्लीन एंड पेंट पुणे की पहल लोगों के मन को बदलने में धीरे-धीरे कामयाब हो रही है। पहले शहर की गन्दगी की ओर लोगों का रवैया बेहद उदासीन था, लेकिन उनकी खूबसूरत पेंटिंग्स ने वो कमाल कर दिखाया है कि अब लोग अपनी मर्ज़ी से इन खूबसूरत दीवारों के आसपास साफ़-सफाई रखने लगे हैं। लोग इन जगहों पर अब कूड़ा नहीं डालते और डस्टबिन का इस्तेमाल करते हैं। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन कार्तिकेय लोगों के नज़रिये और रवैये में बदलाव करने में सफल हो रहे हैं।

साथ ही, इन पेंटिंग्स के ज़रिए अब कार्तिकेय ऐसे विषयों को भी उजागर कर रहे हैं, जिन्हें अक्सर समाज में गैर ज़रूरी समझा जाता है। हाल ही में उन्होंने अपनी एक पेंटिंग से दिव्यांग जनों के लिए हर जगह को और सुविधाओं को उनके मुताबिक बनाने की अपील की है।

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“मैं खुद थोड़ा सा लंगड़ा कर चलता हूँ। इसलिए मेरे लिए इस मुद्दे को समझना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था। फिर मुझे एकांश एनजीओ से अनिता अय्यर जी का कॉल आया। एकांश दिव्यांग जनों के लिए चीज़ें आसान बनाने के लिए काम करती है। उन्होंने अपने एक प्रोजेक्ट के बारे में मुझे बताया जहाँ उन्होंने इस तरह के कपड़े डिज़ाइन किये हैं, जिन्हें कोई भी दिव्यांग व्यक्ति बिना किसी की मदद के आसानी से पहन सकेगा। इस प्रोजेक्ट ने मुझे बेहद उत्साहित किया। कहने को तो यह एक छोटी सी बात लगती है, लेकिन किसी की मर्यादा की रक्षा के लिए यही छोटी सी बात कितनी ज़रूरी है न?”

 

हौसला है तो मुमकिन है 

कार्तिकेय के मुताबिक ऐसे बहुत से दिन हैं, जो उनके लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं होते। जब उनके हड्डियों के ज़ोर पर कैंसर हावी हो जाता है। जब बिस्तर से उठना भी किसी माउंट एवेरेस्ट पर चढ़ने की चुनौती जितना बड़ा लगता है। जब उन्हें लगता है कि अब वो हिम्मत हार जायेंगे!

“हाँ! ऐसे कई दिन होते हैं जब मैं सुबह उठता हूँ और मेरी हार्ट-बीट इतनी तेज़ हो गयी होती है कि मुझे लगता है जैसे अभी मेरा दिल उछलकर बाहर आ जायेगा। उल्टियों का सिलसिला दिन भर नहीं रुकता। मैं नहीं जानता ऐसा क्यों होता है, मैं इसे कण्ट्रोल तो नहीं कर सकता, पर हाँ अब मैं इस डरावनी हकीकत को संभाल ज़रूर सकता हूँ। मैं लम्बी सांसे लेता हूँ, अपने पेट में कुछ डालता हूँ, किसी दोस्त को कॉल करता हूँ जो आकर मेरा ध्यान रखते हैं, मैं रोता हूँ…. चीखता हूँ…. काँपता हूँ…पर मैं कोशिश करता हूँ…मैं कोशिश ज़रूर करता हूँ,” कार्तिकेय कहते हैं!

 

“कभी कभी मन करता है कि बस बिस्तर पर पड़ा रहूं। पर इस तरह तो कहीं नहीं पहुंचा जा सकता न? पहुंचा जा सकता है क्या? इसलिए मैं किसी तरह अपने आप को दीवारों तक पहुंचाता हूँ। मैं जानता हूँ कि मैं एक बार वहां पहुँच जाऊंगा तो ठीक हो जाऊंगा। बस! फिर मेरी दीवारें होती हैं, मेरे पेंट्स और मेरे ख्याल! यही वो जगह है जो मुझे ख़ुशी देती है। ये मुझे सुकून देती है। मुझे एहसास दिलाती है कि मेरी ज़िन्दगी का भी कोई मकसद है। ये दीवारें कहतीं हैं कि मैं ठीक हो जाऊंगा। ये मुझे उम्मीद देती हैं। इस काम को देखकर लगता होगा कि ये मैं इस शहर के लिए कर रहा हूँ, पर सच तो यह है कि ये मैं अपने आप के लिए कर रहा हूँ, इस कला के लिए अपनी मोहब्बत के लिए कर रहा हूँ!”

 

डायरी लिखने जैसी है पेंटिंग

कार्तिकेय के लिए पेंटिंग डायरी लिखने जैसा है। वे रोज़ाना दिन में कई बार पेंट करते हैं और इस काम से उन्हें बेहद राहत मिलती है। पेंटिंग को अपने जीवन का लक्ष्य बना चुके कार्तिकेय आर्थिक रूप से अपने बूते पर ही ये प्रोजेक्ट चला रहे हैं। लेकिन अब लोग उनके इस सफर में जुड़ने लगे हैं। जहां एक ओर पुणे म्युन्सिपल कॉर्पोरेशन ने उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए मंज़ूरी दे दी है, वहीं लोग उनके इस प्रोजेक्ट को स्पांसर करने लगे हैं।

अगर आप भी कार्तिकेय की इस पहल में उनका साथ देना चाहते हैं और किसी भी दिवार को स्पांसर करना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर उनकी मदद कर सकते है!

रंगों से सजे भविष्य की पहल

 

कार्तिकेय लोगों के सामने सिर्फ इन बोलों को रखना चाहते हैं, “If you are not building a future, you don’t believe it exists.” (यदि आप भविष्य का निर्माण नहीं कर रहे, तो ये रहेगा या नहीं, ये आप नहीं कह सकते)
अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए हमें आज से ही शुरुआत करनी होगी। हो सकता है हमारा कोई काम अगली पीढ़ी के लिए एक सुखद भविष्य का पैगाम लेकर आए!’

इस खूबसूरत सोच के साथ कार्तिकेय अपने रंगों में आप सभी की दुनिया को रंगना चाहते हैं। कैंसर से लड़ते हुए भी अपने पर्यावरण और परिसर को और भी खूबसूरत बनाने की उनकी यह पहल वाकई प्रेरणादायी है।

अगर आप भी कार्तिकेय की इस पहल में उनका साथ देना चाहते हैं और किसी भी दिवार को स्पांसर करना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर उनकी मदद कर सकते है!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by तोषिनी राठौड़

लेखन से गहरा जुड़ाव रखने वाली तोषिनी राठौड़ लंबे समय से मीडिया में कार्यरत है। संगीत से लगाव और अपने प्राणी-प्रेम के लिए लोगों के बीच पहचान रखती तोषिनी एक गायिका तो हैं ही , इसके साथ ही वह कई एनीमल एनजीओ के साथ काम भी करती हैं। बचपन से किताबी कीड़ा रह चुकी तोषिनी के लिए उनका लेखन एक मेडिटेशन की तरह काम करता है।

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