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1 रुपये में इडली, 2.50 रुपये में दोसा खिला रही हैं ये दो दादियाँ!

“यह ग्रामीण इलाका है और यहाँ पर बहुत से ज़रूरतमंद लोग है। मैं बस उन्हें कम से कम कीमत पर खाना खिलाना चाहती हूँ।”

पिछले 30 सालों से, 80 वर्षीया कमलातल पाती की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं है। हर रोज़ सूरज उगने से घंटो पहले, जब घर में सब सो रहे होते हैं, तब वह उठ जाती हैं और रसोई में जाकर दिन की तैयारी शुरू कर देती हैं। बहुत ही सहजता से बड़े से आटुकल्लू (सिलबट्टा) पर, इडली बनाने के लिए चावल और दाल को पीसकर घोल तैयार करती हैं। हर दिन कमलातल पाती लगभग 1000 इडली के लिए घोल बनाती हैं।

साथ ही, वह कभी भी एक दिन पुराना घोल इडली बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं करतीं। शायद, यही उनकी मुलायम, फूली-फूली और स्वादिष्ट गर्म इडलियों का राज़ है। लेकिन सबसे ज़्यादा ख़ास बात है उनकी बनाई इडलियों की कीमत। जी हाँ, इतनी मेहनत और पूरे दिन से बनी इडलियों की कीमत मात्र 1 रुपया प्रति इडली है।

अक्सर लोगों को इस पर यकीन नहीं आता लेकिन यही सच है और इसलिए अब उन्हें देश में ‘इडली अम्मा’ कहा जाने लगा है।

Kamalathal with some of her regular customers

जब से उनकी एक रुपये में इडली की कहानी सोशल मीडिया पर पहुंची है, तब से कोयम्बटूर के छोटे से इलाके वादिवेलाम्पलायम में स्थित उनकी दूकान के चर्चे हर एक अख़बार, टीवी चैनल और न्यूज़ पोर्टल्स तक पहुँच चुके हैं।

हर दिन रसोई में उनकी मदद करने वाली उनके पोते की पत्नी, आरती ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया, “वह एक किसान परिवार में पली-बढीं हैं। उनके संयुक्त परिवार की रसोई में इडली बनाना रोज़मर्रा के कामों में शामिल था। इसलिए बहुत कम उम्र से ही उन्होंने भी इसमें महारथ हासिल कर ली। उनकी शादी हो गयी, लेकिन किसी कारणवश उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया।”

उस समय अपने बच्चे और अपना पेट भरने के लिए उन्होंने अपने इस हुनर को अपना रोज़गार बनाया। उन दिनों उन्होंने मात्र 50 पैसे प्रति इडली बेचना शुरू किया, जो कि उस समय के हिसाब से सही कीमत थी। फिर साल दर साल, इकॉनमी बदली, रुपये की कीमत बदली, 50 पैसे की कोई कीमत नहीं रह गयी। पर फिर भी अब से कुछ साल पहले ही कमलातल पाती ने अपनी इडली का दाम एक रुपये किया है, जो आज के समय में बहुत ही कम है।

अगर कोई उनसे थोड़े-से पैसे बढ़ाने और प्रॉफिट बढ़ाने के लिए कहता है तो  तुरंत मना कर देती हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी यह 1 रुपये की इडली बहुत से गरीब, बेसहारा, दिहाड़ी-मजदूरी करने वाले लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। क्योंकि ये लोग हर दिन सिर्फ़ नाश्ते के लिए 20-30 रुपये खर्च नहीं कर सकते।

कुछ समय पहले तक, वह मिट्टी के चूल्हे पर पारंपरिक इडली मेकर में इडली बनाती थीं। लेकिन फिर जब उनकी एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई और लाखों लोगों ने उनकी कहानी को जाना तो, इंडियन ऑइल एंड भारत पेट्रोलियम (कोयम्बटूर) ने उन्हें फ्री गैस स्टोव और सिलिंडर दिया। अब, वह बहुत ही आसानी से इडली बना सकती हैं।

हर सुबह, लगभग 7 बजे से लोग उनके घर के बाहर लाइन लगाना शुरू कर देते हैं। हर दिन वह सामान्य तौर पर 800 इडली बेचती हैं और कभी-कभी यह आंकड़ा 1000 इडली तक चला जाता है।

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“अगर वह दिन का 800 रुपये कमाती हैं, तो उसमें से आधे से ज़्यादा अगले दिन के लिए रसोई का सामान खरीदने पर खर्च हो जाता है। जो भी थोड़ा-बहुत वह बचा पाती हैं, उसे वह अपने पोते-पोतियों को दे देती हैं,” आरती ने कहा।

कुछ समय पहले उनके बेटे की मृत्यु हो गयी, जो इस सब काम में उनकी मदद करता था। उनके परिवार में अनगिनत परेशानियाँ रहीं और उनकी आय कभी भी स्थिर नहीं हुई। पर फिर भी कमलातल की इडली की दूकान चलती रही।

भले ही बीतते समय के साथ थकन और मेहनत उनके हाथों पर झुर्रियां बनकर उभरने लगे हैं, लेकिन ज़िंदगी के प्रति उनका जज़्बा कम नहीं हुआ है।

विशाखापट्टनम की कमलातल- सत्यवती 

65 वर्षीया सत्यवती, कमलातल की तरह बहुत मशहूर तो नहीं है लेकिन विशाखापट्टनम के पास सीतामपेट में उनकी दूकान के बारे में बताना बहुत ज़रूरी है। पिछले 15 साल से, सत्यवती 10 रुपये में चार दोसा और 2 रुपये में लोगों को इडली खिला रही हैं।

सत्यवती की बहु उनके काम में उनकी मदद करती हैं और फिर अपने घर में ही एक कोने पर वह स्टॉल लगाती हैं। जब उन्होंने शुरू किया था, तब वह 5 रुपये में 4 दोसा देती थीं, कुछ समय पहले ही उन्होंने दोसे की कीमत 10 रुपये की है। बाकी इडली की कीमत में कोई बदलाव नहीं आया है।

जब सत्यवती से यह पूछते हैं कि वह कितना बचा पाती हैं तो वह हंसते हुए कहती हैं, “हम मैनेज कर रहे हैं। हमें जीने के लिए बहुत ज़्यादा पैसों की ज़रूरत नहीं है। हमें लोगों को खाना खिलाकर ख़ुशी मिलती है।”

सत्यवती के पति छोटी-मोटी नौकरी करके घर का खर्च सम्भालते थे। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद से, सत्यवती पर अपने तीन बच्चों की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ 11 लाख रुपये का कर्ज भी था। ऐसे में, उन्होंने दोसा और इडली बेचने का काम शुरू किया।

Satyavati preparing Dosa in her kitchen

उन्होंने कीमत कम और क्वालिटी अच्छी रखकर, अपने रेग्युलर ग्राहक बनाये रखे। धीरे-धीरे उन्होंने न सिर्फ़ अपना कर्ज उतारा बल्कि अपने रहने के लिए घर भी बनवा लिया।

आज उनकी स्टॉल पर हर दिन 30 से 40 ग्राहक आते हैं और इनमें से ज़्यादातर लोग ज़्यादा मात्रा में खाना खरीदते हैं। उनके पास जगह की कमी है तो ग्राहकों के लिए बैठकर खाने की सुविधा नहीं है, इसलिए ज़्यादातर ग्राहक उनके यहाँ से पैक कराकर लेकर जाते हैं। दोसा और इडली के साथ-साथ ग्राहकों की मांग पर वह अपने शाम के मेन्यु में पुड़ी भी बनाती हैं।

“मैंने कभी भी बिज़नेस में बहुत ज़्यादा प्रॉफिट के बारे में नहीं सोचा। यह ग्रामीण इलाका है और यहाँ पर बहुत से ज़रूरतमंद लोग है। मैं बस उन्हें कम से कम कीमत पर खाना खिलाना चाहती हूँ,” सत्यवती कहती हैं।

बेशक, कमलातल और सत्यवती, दोनों ही मानवता की सच्ची मिसाल हैं। द बेटर इंडिया इन दोनों को सलाम करता है!

मूल लेख: सायंतनी नाथ

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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