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इस दंपति ने 26, 500 बेकार प्लास्टिक की बोतलों से बनाया पहाड़ों में होमस्टे!

दीप्ति और अभिषेक ने तय किया है कि जो भी यात्री यहाँ पर रुकेंगे और यहाँ घूमते हुए या फिर ट्रैकिंग के वक़्त प्लास्टिक वेस्ट को इकट्ठा करके वापिस लायेंगे, उन्हें वे 10 से 20% का डिस्काउंट भी देंगे!

हिमालय की तलहटी में बसा उत्तराखंड, घुमाकड़ों किसी जन्नत से काम नहीं है। यहाँ के पहाड़, वाइल्डलाइफ पार्क्स, धार्मिक स्थल, ट्रैकिंग रुट्स आदि न सिर्फ़ भारतीयों को बल्कि विदेशियों को भी अपनी और आकर्षित करते हैं। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2017 में ही लगभग 34.36 मिलियन घरेलू यात्री और 0.13 मिलियन से ज़्यादा विदेशी यात्रियों ने उत्तराखंड घूमने आ चुके हैं।

पहाड़ों पर घूमने या ट्रैकिंग करने तो सब पहुँच जाते हैं लेकिन प्रकृति से प्यार का दावा करने वाले यही लोग अनजाने में पहाड़ों की सांसे छीन रहे हैं। अपने पीछे न जाने कितना ही टन प्लास्टिक और अन्य तरह का कूड़ा-कचरा छोड़कर आने वाले यात्री एक पल के लिए भी यहाँ पर रह रहे लोगों के बारे में और पर्यावरण के बारे में नहीं सोचते हैं।

पर नोएडा के रहने वाले एक दंपति ने न सिर्फ़ इस समस्या पर गौर किया बल्कि उन्होंने 26, 000 से भी ज़्यादा प्लास्टिक की बोतलों को रीसायकल करके एक होमस्टे बनाया है!

एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका के तौर पर काम करने वाली दीप्ति शर्मा बताती हैं कि उन्हें और उनके पति, अभिषेक आनंद को ट्रैवेलिंग का बहुत शौक है। उन्हें सबसे ज़्यादा पहाड़ों पर ट्रैकिंग करना पसंद है।

“इसलिए हम हर 3-4 महीने में पहाड़ों पर घूमने का प्लान बना लेते। वहां अब कई ऐसे स्पॉट्स हैं जहाँ हमें ट्रैकिंग करके जाना अच्छा लगता है। इसी तरह खिर्सू एक जगह है जहाँ हम अक्सर जाते हैं। लेकिन एक बार जब हम वहां गए तो हमें प्लास्टिक के कचरे का एक बड़ा सा ढेर वहां मिला,” दीप्ती बताती हैं।

जिस जगह से हिमालय की अपार सुन्दरता दिखती है, उस जगह पर प्लास्टिक की बोतलों, रैपर, पॉलिथीन आदि का जमावड़ा देखकर दीप्ति और अभिषेक को बहुत बुरा लगा। थोड़ी छानबीन करने पर उन्हें पता चला कि पास के एक नाले से बहता हुआ यह कचरा यहाँ तक पहुंचा है।

दीप्ती कहती हैं, “बस उसी वक़्त हमने तय कर लिया कि यार कुछ तो करना है। ऐसा कुछ कि पहाड़ों पर फैले इस कचरे को प्रबंधित किया जाए और साथ ही लोगों को जागरूक भी किया जाए कि वे प्रकृति को तबाह कर रहे हैं।”

Deepti with her baby

दीप्ति आगे कहती हैं कि पहाड़ों में प्लास्टिक रीसाइक्लिंग यूनिट्स या फिर वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट्स शायद न के बराबर हैं। इसलिए यह हम आम नागरिकों और यात्रियों की ज़िम्मेदारी है कि हम अपने पीछे ये प्लास्टिक के ढेर न छोड़कर जाएँ।

नोएडा वापिस लौटकर उन्होंने प्लास्टिक रीसाइक्लिंग के विकल्पों पर रिसर्च करना शुरू किया। अमेरिका में रह रही दीप्ति की छोटी बहन ने भी उनकी काफ़ी मदद की। उन्होंने दीप्ति और अभिषेक का विदेशों में प्लास्टिक से बनाये जा रहे टॉयलेट्स, कियोस्क और दूसरी इमारतों के कॉन्सेप्ट से परिचय कराया।

“उसने हमें रवांडा जैसे अलग-अलग जगहों में रह रहे ऐसे लोगों के बारे में बताया, जिन्होंने बेकार पड़ी प्लास्टिक की बोतलों से कॉटेज बनाई हैं। तब हमें पता चला कि प्लास्टिक के कचरे के प्रबंधन का सबसे अच्छा तरीका है इसे कंस्ट्रक्शन मटेरियल की तरह इस्तेमाल करना। हमने इस बारे में और अधिक जानकारी इकट्ठा की,” उन्होंने आगे कहा।

शुरुआत में, दीप्ति और अभिषेक का प्लान था कि वे इस बारे में राज्य सरकार या प्रशासन को बताएंगे और उनकी मदद से इन पहाड़ी इलाकों में रीसाइकल्ड प्लास्टिक से टॉयलेट्स बनायेंगे। लेकिन जब उन्हें प्रशासन की तरफ से कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उन्होंने अपने प्रोजेक्ट पर काम किया।

“हम वैसे भी नैनीताल के आस-पास एक छोटी सी ज़मीन लेने की कोशिश कर रहे थे और इसलिए हमने सोचा कि क्यों न अपनी ही ज़मीन में कुछ बनाकर हम लोगों के लिए एक मिसाल पेश करें। इसलिए हमने प्लास्टिक की बोतलों और अन्य वेस्ट जैसे टायर वगैराह से एक छोटा-सा होमेस्टे बनाने का निर्णय लिया,” उन्होंने आगे कहा।

साल 2016 में उन्होंने नैनीताल के पास हरतोला गाँव में एक ज़मीन खरीदकर अपने प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। ज़मीन खरीदना और उसकी रजिस्ट्री करवाना तो फिर भी बहुत आसान था, लेकिन मुश्किलें तब हुईं जब उन्होंने होमस्टे का निर्माण शुरू किया।

One of the walls of the homestay, Iron frames has been usedin construction

“हमने कबाड़ी वालों से बोतलें इकट्ठा की और फिर उन्हें साईट तक पहुँचाया, जो कि बहुत ही मेहनत भरा काम था। क्योंकि यह जगह मेन रोड से लगभग 8-10 मिनट की ट्रैकिंग पर है। मेन रोड तक तो सामान पहुँच पा रहा था लेकिन वहां से इसे यहाँ तक लाने में बहुत मेहनत करनी पड़ी।”

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4 बेडरूम के उनके इस होमस्टे में 1 कमरा और 2 बाथरूम, पूरी तरह से वेस्ट प्लास्टिक का इस्तेमाल करके बने हैं। बाकी के कमरों की दीवारें प्लास्टिक वेस्ट से बनी हैं और बाकी कंस्ट्रक्शन के लिए फ्लाईएश की ईंटों का इस्तेमाल किया गया है।

“इस तरह से यह प्लास्टिक वेस्ट और सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले मटेरियल का मिक्स है। हमारा उद्देश्य तो इसे पूरी तरह प्लास्टिक से बनाना था लेकिन फिर परेशानी इतनी हो गयी कि हमें फ्लाईएश ब्रिक्स आदि का इस्तेमाल करना ही पड़ा,” दीप्ति ने बताया।

सबसे पहले तो स्थानीय मिस्त्रियों को यह समझाना बहुत मुश्किल था कि वे प्लास्टिक को कैसे निर्माण के लिए इस्तेमाल करें। फिर जैसे-तैसे उनके होमस्टे का निर्माण शुरू हुआ। लेकिन दीप्ति की प्रेगनेंसी की वजह से एक वक़्त के बाद पूरा काम उनके पति अभिषेक पर आ गया।

अपनी जॉब के साथ-साथ अभिषेक जैसे-तैसे इस प्रोजेक्ट को संभाल रहे थे कि फिर बीच में उनके मिस्त्री काम छोड़कर चले गये। क्योंकि पहाड़ों में लोग एक सीजन में मजदूरी करते हैं और फिर अपनी फसल का सीजन आते ही अपने-अपने गाँव चले जाते हैं।

इस तरह की बहुत-सी चुनौतियों को झेलते हुए, जैसे-तैसे उन्होंने लगभग डेढ़ साल में अपने होमस्टे का काम पूरा कराया। दीप्ति बताती हैं कि उन्होंने इस होमस्टे में 26, 500 प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किया है। दीवार का एक हिस्सा बनाने के लिए उन्होंने 100 प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल किया। इन बोतलों को साथ में तार की मदद से बांधा गया ताकि ये जुड़ी रहें। इसके अलावा, उन्होंने बेकार पड़े लगभग 200 टायर्स को फर्श और सीढ़ियों के लिए इस्तेमाल किया है।

खाली पड़ी व्हिस्की की बोतलों को खूबसूरत लैम्प का रूप दिया गया है और इन्हें सजावट के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इस होमस्टे में बेकार, फेंक दी गयी चीज़ों को एक नई ज़िंदगी देकर काम में लाया जा रहा है और यही वजह है कि उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट को ‘रि-निर्वाण’ नाम दिया है। उनके इस होमस्टे में रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम तो है ही और जल्द ही सोलर पैनल भी लग जाएंगे। इस तरह से यह पूरी तरह सस्टेनेबल होमस्टे हो जायेगा।

दीप्ति बताती हैं कि अभी उनका होमस्टे रजिस्टर नहीं हुआ है, लेकिन यात्रियों के लिए ओपन है। दीप्ति और उनके पति नोएडा रहते हैं तो इस होमस्टे को कौन संभाल रहा है?

इसके जवाब में वह बताती हैं कि उन्होंने गाँव के ही एक-दो परिवारों को यह ज़िम्मेदारी दी हुई है। इससे उन्हें भी रोज़गार मिल रहा है और यात्रियों को वह प्राकृतिक अनुभव जिसकी तलाश में वे पहाड़ो में जाते हैं। अगर आपको वाकई सिर्फ़ प्रकृति को एन्जॉय करना है, शांति से पहाड़ों के बीच किताब पढ़नी है या फिर अपने दोस्तों के साथ अच्छा वक़्त बिताना है तो यह जगह बिल्कुल आपके लिए है।

इसके अलावा, जो लोग यहाँ पर रुकेंगे और यहाँ घूमते हुए या फिर ट्रैकिंग के वक़्त प्लास्टिक वेस्ट को इकट्ठा करके वापिस लायेंगे, उन्हें वे 10 से 20% का डिस्काउंट भी देंगे। क्योंकि वे इसे कोई कमर्शियल प्रोजेक्ट नहीं बनाना चाहते। उनका मुख्य उद्देश्य लोगों को शिक्षित करना है न कि पैसे कमाना।

अंत में दीप्ति सिर्फ़ यही कहती हैं कि हमें प्रकृति को जीना चाहिए, न कि इसे बर्बाद करना चाहिए। बाकी, जो बदलाव आप दुनिया में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत खुद से करें। इसलिए प्लास्टिक-प्लास्टिक चिल्लाने की बजाय प्लास्टिक को कैसे मैनेज और कम किया जाए, इस पर काम करें।

यदि आप ‘री-निर्वाण होमस्टे’ के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो उनके फेसबुक पेज पर या फिर वेबसाइट पर देखें!

संपादन – मानबी कटोच 

Summary: This Noida based couple built a homestay in Hills with 26, 500 discarded/waste plastic bottles. They wanted to use this homestay as an example for authorities in Uttarakhand to recycle and reuse the plastic waste in constructing public toilets, kiosks, etc.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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