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200 बच्चों को मुफ्त पढ़ाता है ‘मिड डे मील’ बनाने वाली माँ का यह बेटा!

“बहुत से लोग मुझे पागल ही कहते थे क्योंकि मैं कचरा बीनते बच्चों को, बकरी चराते बच्चों को इकट्ठा करके एक टोली बना लेता और उन्हें अपने घर पर लाकर कुछ न कुछ पढ़ाना शुरू कर देता था। पर मेरी माँ तब भी मेरे साथ खड़ी रहीं।”

“ज़रूरी नहीं कि आपके पास बहुत सारा पैसा हो तभी आप कुछ अच्छा कर सकते हैं लोगों के लिए। अगर आप दिल में दूसरों के लिए कुछ करने की सच्ची भावना होना ज़रूरी है।”

पिछले डेढ़ साल से बनारस में गरीब दिहाड़ी-मजदुर और किसानों के बच्चों मुफ़्त में शिक्षा दे रहे मनोज कुमार यादव इसी सोच के सहारे आगे बढ़ रहे हैं। उनके इस अभियान में उनकी पत्नी भी बराबर उनका साथ दे रही हैं। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया,

“मैं एक बहुत ही गरीब परिवार से हूँ। बचपन से पढ़ाई में अच्छा था तो माता-पिता ने कैसे भी करके मेरी पढ़ाई जारी रखवाई। ख़ास कर कि मेरी माँ, वह एक स्कूल में मिड डे मील बनाती थीं, और उन्होंने ही मुझे मेट्रिक पास करायी, इंटर पास करायी। मुझे कॉलेज भेजा, हर कदम पर साथ देती हैं।”

मनोज ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से की है। इस यूनिवर्सिटी की नींव महान समाज सुधारक और शिक्षाविद मदन मोहन मालवीय जी ने रखी थी। मनोज कहते हैं कि उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा मदन मोहन मालवीय ही हैं। जिस तरह समाज में बदलाव की राह मालवीय शिक्षा के ज़रिए बनाना चाहते थे, उसी राह पर आज मनोज चल रहे हैं।

Manoj Kumar Yadav, Social Worker

कॉलेज के दिनों से ही उनके मन में ऐसे बच्चों को पढ़ाने की अलख जग गयी थी, जिन्हें स्कूल जाने का मौका नहीं मिलता। अपनी ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। उन्होंने बताया,

“जब मैं तैयारी कर रहा था तो एक हादसा हो गया। मेरे पिताजी का एक्सीडेंट हो गया और उनके इलाज के लिए हमें कर्ज लेना पड़ा। फिर बहनों की शादी करनी थी, कर्ज पहले ही था सिर पर, तो दिन-प्रतिदिन संघर्ष बस बढ़ रहा था।”

मनोज ने आगे बताया कि उनके पास खेती-बाड़ी के लिए भी बहुत कम ज़मीन है जिसमें परिवार का जीवनयापन मुश्किल था। उनके घर में इतनी दयनीय स्थिति हो गयी थी कि 3-4 महीने तक उनके घर में सब्ज़ी तक नहीं आई। ऐसे में, उनकी अपनी तैयारी और पढ़ाई भी छुट गयी और उन्हें रोज़गार के अवसर तलाशने पड़े। उन्होंने प्राइवेट स्कूल में शिक्षक के तौर पर नौकरी ले ली।

कुछ सालों तक उन्होंने ख़ूब काम किया और जैसे-तैसे अपने परिवार का सारा कर्ज उतारा। इस काम में उनकी बहनों ने भी उनका काफ़ी सहयोग किया। “फिर जब कर्ज वगैरह सब उतर गया तो हमें लगा कि बस अब मैं अपने सपनों के लिए काम करूँगा। मेरा सपना था कि जैसे मुझे गरीबी के कारण अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी, वैसा किसी और बच्चे के साथ न हो। अपने आस-पास देखते ही हैं कि कैसे छोटे-छोटे बच्चे स्कूल जाने की बजाय बकरियां चरा रहे होते हैं, कचरा बीन रहे होते हैं। मैंने धीरे-धीरे इन बच्चों से बात करना शुरू किया, उनके बारे में जानना-समझना शुरू किया,” मनोज ने बताया।

Manoj’s Mother Prabhawati, who works as Mid Day Meal Cook

उन्होंने जो राह चुनी, वह बिल्कुल भी आसान नहीं थी। क्योंकि आज भी ऐसा नहीं है कि उनका परिवार बहुत समृद्ध और संपन्न है। लेकिन उनके दिल में बस यह जुनून है कि उन्हें इन बच्चों को एक दिन स्कूलों से जोड़ना है।

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उनका परिवार और जानने वाले उनके इस फ़ैसले के खिलाफ़ थे। सभी लोग उन्हें एक ही बात समझा रहे थे कि यह सब उनका काम नहीं है। इस मौके पर भी उनकी माँ ने उनका पूरा साथ दिया।

“बाकी बहुत से लोग मुझे पागल ही कहते थे क्योंकि मैं कचरा बीनते बच्चों को, बकरी चराते बच्चों को इकट्ठा करके एक टोली बना लेता और उन्हें अपने घर पर लाकर कुछ न कुछ पढ़ाना शुरू कर देता। पर मेरी माँ तब भी मेरे साथ खड़ी रही। शुरू में, मेरे एक कॉलेज के दोस्त ने मुझे इस काम में सपोर्ट किया। वह अच्छी नौकरी कर रहा था तो वह बच्चों की कॉपी-किताब के लिए पैसे दे देता था।”

इस तरह जो उनका कारवां 4-5 बच्चों से शुरू हुआ, वह अब लगभग 200 बच्चों तक पहुँच गयी है। इनमें से ज़्यादातर बच्चों का नाम तो स्कूल में लिखाया ही नहीं गया है और जिनका नाम स्कूल में लिखा हुआ है, वे भी स्कूल नहीं जाते हैं।

Started with few kids, now he is teaching around 200 kids

मनोज दिन में 3 घंटे की क्लास लेते हैं। शाम को 3 बजे से 6 बजे तक का उनका समय है। बच्चों को फ़िलहाल तो बेसिक कोर्स ही कराया जा रहा है। इन बच्चों की कॉपी-किताब की देखरेख भी मनोज ही करते हैं। फंडिंग के बारे में बताते हुए वह कहते हैं,

“अब जैसे-जैसे लोगों को मेरी इस पहल का पता चलता है तो वे पहले तो देखने आते हैं कि अच्छा क्या पढ़ा रहे हैं। फिर जब उन्हें तसल्ली हो जाती है तो कोई कॉपी, कोई किताब तो कोई अन्य स्टेशनरी का सामना डोनेट कर देता है।,” उन्होंने आगे कहा।

अपने इस अभियान का नाम उन्होंने अपनी माँ के नाम पर ‘प्रभावती वेलफेयर एंड एजुकेशनल ट्रस्ट’ रखा है। इस ट्रस्ट के बैनर तले, उनकी पत्नी, अनिता यादव गाँव की गरीब 13-14 साल की उम्र की लड़कियों को मुफ़्त में सिलाई-कढ़ाई का काम भी सिखाती हैं। ताकि ये सब स्किल्स वह अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इस्तेमाल कर सकती हैं।

मनोज अपने परिवार के जीवन यापन के बारे में बताते हुए कहते हैं,

“मैंने और मेरी पत्नी ने कम में गुजारा करना सीख लिया है। थोड़ा-बहुत खेत है और गाय-भैंस आदि रखा हुआ है तो उससे थोड़ी मदद मिल जाती है। ऐसी कोई ज़्यादा ख्वाहिशें नहीं हैं कि हमारा पूरा न पड़े और फिर कुछ करने के लिए आपको त्याग तो करना ही पड़ता है।”

मनोज का सपना है कि वे आगे चलकर इन बच्चों के लिए अपना एक स्कूल खोलें। जिसके लिए वे दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। द बेटर इंडिया के पाठकों के माध्यम से वे सिर्फ़ इतना ही कहते हैं कि यदि कोई सज्जन इस नेक काम में उनकी मदद करना चाहते हैं तो उनसे 09451044285 पर संपर्क कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 

Article Summary: Manoj Kumar Yadav, a 29 year old man from Varanasi in Uttar Pradesh is teaching more than 200 underprivileged kids free of cost. He has started ‘Prabhawati Welfare and Educational Trust,’ through which, he is becoming an agent of social change and transformation in Varanasi.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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