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‘विन ओवर कैंसर’: कैंसर सर्वाइवर्स के लिए शुरू किया देश का पहला जॉब पोर्टल!

यह एशिया का पहला जॉब पोर्टल है जो खास तौर पर सिर्फ कैंसर सर्वाइवर्स के लिए है। उनके प्रयासों से अब तक लगभग 56 परिवारों को मदद मिली है।

कुछ समय पहले मैंने एक कैंसर सर्वाइवर और मैराथन रनर, अंजू गुप्ता की कहानी की थी। उनकी कही एक बात शायद हमेशा मेरे जेहन में रहेगी कि ‘”कैंसर कॉमा है, फुलस्टॉप नहीं!”

बिल्कुल! किसी को कैंसर होने से उनकी और उनके परिवार की ज़िंदगी रुक नहीं जाती, बल्कि चलती रहती है। पर लोगों का, समाज का नज़रिया ज़रूर उनके प्रति बदल जाता है। कैंसर का असर किसी व्यक्ति पर न सिर्फ़ शारीरिक और मानसिक रूप से बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी होता है।

‘विन ओवर कैंसर’ संगठन के संस्थापक अरुण गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने कैंसर के चलते होने वाली शारीरिक, मानसिक और फिर सामाजिक पीड़ा को बहुत करीब से देखा है। पेशे से सीए, अरुण गुप्ता अपने परिवार के साथ खुशनुमा ज़िंदगी जी रहे थे और फिर साल 2011 में उन्हें ब्लड कैंसर डिटेक्ट हुआ। हालांकि, यह बहुत शुरूआती स्टेज थी इसलिए डॉक्टर्स ने उन्हें तुरंत इलाज करने के लिए मना कर दिया। उन्हें साल 2015 से अपना इलाज शुरू करवाना था।

लेकिन अरुण की कैंसर के साथ जंग उसी दिन से शुरू हो गयी जब उन्हें इसका पता चला था। यह उनके और उनके परिवार के लिए काफ़ी मुश्किल समय था।

Arun Gupta, Founder of ‘Win Over Cancer’

उन्होंने बताया, “मैंने इस बारे में थोड़ा पढ़ना शुरू किया, खुद को मोटीवेटड रखने के लिए ब्लॉग लिखना शुरू किया। मेरे काउंसलिंग सेशन्स में मुझे कुछ अलग करने की प्रेरणा मिली और फिर साल 2013 में ‘विन ओवर कैंसर’ (Win Over Cancer) की शुरुआत की। जिसके ज़रिए कैंसर से पीड़ित लोगों के लिए कुछ करना मेरा उद्देश्य था।”

अरुण आगे बताते हैं कि इंडियन कैंसर रजिस्ट्री के 2013 के आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 42 प्रतिशत मरीज 25 से 55 वर्ष के होते हैं और जो अक्सर घर के अकेले कमाने वाले सदस्य होते हैं। इनमें से लगभग 75% मरीजों को इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाना पड़ता है। जहाँ परिवार का कोई पुरुष सदस्य उस व्यक्ति के साथ इलाज के दौरान रहता है।

अब जरा सोचिये कि एक परिवार का कमाने वाला सदस्य या तो खुद मरीज है या फिर उसे सब कुछ देखना पड़ रहा है, तो उस परिवार की परिस्थिति कैसी होगी? एक वक़्त के बाद उनकी आमदनी खत्म हो जाती है और खर्च बढ़ जाता है।कैंसर पीड़ितों को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है और अगर वे ठीक भी हो जाएँ, तब भी बहुत ही मुश्किल से उन्हें नौकरी मिलती है।

“खुद मुझे साल 2015 में जब अपने इलाज के लिए छुट्टी पर जाना था, तब मेरी कंपनी ने मुझे इस्तीफा देने के लिए कहा। वह वक़्त बहुत मुश्किल था, पर मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा रहा। और तब मुझे लगा कि हमें इस समस्या पर काम करना होगा।”

इसी सोच के साथ उन्होंने ‘प्रोजेक्ट सर्वाइव’ की शुरुआत की। विन ओवर कैंसर की टीम की मदद से उन्होंने अलग-अलग संगठनों से टाई-अप किया ताकि वे इन ज़रुरतमंद लोगों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ के मौके दे सकें। लेकिन कैंसर पीड़ितों के स्वास्थ्य संबंधित परेशानियों के चलते काम वक़्त पर पूरा नहीं हो पाता था। ऐसे में, यह प्रोजेक्ट उस समय सफल नहीं हो सका।

‘Survive’ Mobile App is available on Google Play Store

“हमने तसल्ली से बैठकर इस बात पर विचार विमर्श किया कि आखिर कहाँ कमी रह गयी? किस दिशा में हमें काम करना चाहिए? और तब हमारे सामने एक विकल्प आया कि क्यों न उनके परिवार के सदस्यों के लिए रोज़गार के अवसर तलाशे जाएँ। लेकिन ये लोग अलग राज्यों, शहरों और गांवों से बड़े शहरों में इलाज के लिए आते हैं। फिर ट्रीटमेंट के कुछ समय बाद वापिस चले जाते हैं तो ऐसे में एक रेग्युलर जॉब करना बहुत मुश्किल है,” अरुण ने बताया।

इसके बाद, उन्होंने अपनी टीम के साथ बैठकर एक दूसरे प्लान पर काम किया। उन्होंने तय किया कि वे कैंसर पीड़ितों के परिवारजनों को उनके अपने ही शहर या फिर जिले में स्किल सेंटर्स और संगठनों से जोड़ेंगे, जहां उन्हें कुछ बेसिक ट्रेनिंग कोर्स करवाकर नौकरी या फिर अपने किसी व्यवसाय के लिए तैयार किया जा सके।

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साल 2017 के अंत तक उन्होंने अपनी इस योजना पर काम कर लिया। उन्होंने भारत में लगभग एक लाख से भी ज़्यादा ट्रेनिंग सेंटर्स का डाटा निकाला, जो कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार या फिर किसी निजी संगठनों द्वारा चलाये जा रहे हैं। अब इस जानकारी के बलबूते पर उन्होंने अपना कोई ट्रेनिंग सेंटर खड़ा करने की बजाय पहले से ही उपलब्ध सेंटर्स से लोगों को जोड़ना शुरू किया।

“इस काम को आसान करने के लिए हमने एक मोबाइल एप ‘सर्वाइव’ तैयार की। यह एप्लीकेशन इंग्लिश, हिंदी, मराठी, तमिल, उड़िया और पंजाबी भाषा में उपलब्ध है। इसमें हमने लगभग 65, 000 नेशनल स्किल सेंटर्स और अन्य कुछ सेंटर्स को राज्य, जिला और पिनकोड आदि के साथ लिस्ट किया है।”

इस एप्लीकेशन के ज़रिये कैंसर पीड़ितों के परिवार के सदस्य ट्रेनिंग आदि के लिए अप्लाई कर सकते हैं। सरकार द्वारा चलाये जा रहे ट्रेनिंग सेंटर्स में उन्हें मुफ्त में कोर्स करवाया जाता है। बाकी यदि किसी अन्य स्किल सेंटर से वे जुड़ते हैं, जहां उन्हें कुछ फीस भरनी पड़ती है तो उसके लिए ‘विन ओवर कैंसर’ उन्हें 10, 000 रुपये की स्कॉलरशिप देता है।

Skill Development and Entrepreneurship program at DCAC

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद अरुण और उनकी टीम इन लोगों को अच्छी नौकरी दिलाने में भी मदद करती है। ‘सर्वाइव’ मोबाइल एप को डाउनलोड करने के लिए यहां पर क्लिक करें!

‘विन ओवर कैंसर’ ने कैंसर सर्वाइवर्स के लिए एक ऑनलाइन जॉब पोर्टल भी शुरू किया है। अरुण के मुताबिक यह एशिया का पहला जॉब पोर्टल है जोकि खास तौर पर सिर्फ कैंसर सर्वाइवर्स के लिए है। उनके प्रयासों से अब तक लगभग 56 परिवारों को मदद मिली है।

अपने इस काम में आने वाली चुनौतियों के बारे में बात करते हुए अरुण ने कहा कि फंडिंग एक परेशानी है। लेकिन प्राइवेट संगठनों के सीएसआर के चलते उनके कई प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक पूरे हुए हैं।

“इस प्रोजेक्ट में सबसे बड़ी परेशानी है जागरूकता। बहुत ही कम लोगों को इस प्लेटफार्म के बारे में पता है। हमारी कोशिश है कि देश में हम हर एक कैंसर पीड़ित के ज़रूरतमंद परिवार को इससे जोड़ पाएं।”

Kavita Gupta, Co-founder of Win Over Cancer

‘प्रोजेक्ट सर्वाइव’ के अलावा भी, विन ओवर कैंसर ने कई अन्य सफल प्रोजेक्ट्स किये हैं। अब तक यह संगठन 15, 000 कैंसर अवेयरनेस प्रोग्राम कर चूका है। 1872 कैंसर सर्वाइवर्स को मुफ्त में प्रॉस्थेटिक ब्रा मुहैया करा चूका है।

(अरुण गुप्ता की पत्नी और विन ओवर कैंसर की को-फाउंडर कविता गुप्ता ने ब्रेस्ट कैंसर पीड़ितों के लिए कम लागत की प्रॉस्थेटिक ब्रा बनाई और उन्हें मुफ्त में बांटी। उनकी इस पहल को द बेटर इंडिया ने एक कहानी की शक्ल देकर लोगों तक पहुँचाया और इसके बाद, उनके प्रयासों को देखते हुए ‘वीमेन इकोनॉमिक फॉरम’ ने उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा। इस बारे में विस्तार से आप यहां पढ़ सकते हैं)

यदि आप कैंसर सर्वाइवर हैं, किसी कैंसर पीड़ित के परिवारजन हैं या फिर अपने आस-पास ऐसे किसी परिवार को जानते हैं, तो बेहिचक किसी भी तरह की मदद के लिए ‘विन ओवर कैंसर’ की वेबसाइट या फिर फेसबुक के ज़रिये उनसे मदद मांग सकते हैं। ‘सर्वाइव’ एंड्राइड मोबाइल एप्लीकेशन गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध है!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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