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प्राकृतिक खेती से 6 महीने में हुआ 2 लाख रुपये का मुनाफ़ा, व्हाट्सअप से की मार्केटिंग!

यूट्यूब पर आप इनसे फ्री क्लासेस भी ले सकते हैं!

गुजरात के भावनगर जिले में जुनावदार गाँव में  परिवार में जन्मे वनराज सिंह को लगता था कि उनकी किस्मत पहले से ही तय की जा चुकी है।

“मैं एक किसान परिवार में पैदा हुआ और फिर मुझे पता था कि मुझे भी यही करना था,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया।

साल 2012 में अपनी 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अपनी पारिवारिक कपास की खेती से जुड़ गये। वैसे तो उन्हें अपने काम से कोई शिकायत नहीं थी लेकिन फिर भी उन्हें पारम्परिक खेती के तरीके पसंद नहीं आते थे।

“नए पौधों पर रसायन का इस्तेमाल करना मुझे नहीं भाता था। मैं फसलों पर स्प्रे के बाद उनके बदले रंग और आकर में फर्क देख सकता था। पर मेरे परिवार में किसी के भी पास किसी और सुरक्षित विकल्प की कोई जानकारी नहीं थी,” उन्होंने बताया।

कोई और विकल्प न होने पर वनराज और कुछ सालों तक रासायनिक खेती करते रहे। लेकिन फिर साल 2016 में उनकी मुलाक़ात अपने एक दोस्त से हुई। वह भी किसान है और  जब दोनों दोस्त बात करने लगे तो वनराज ने उन्हें अपनी समस्या बताई।

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उनके दोस्त ने उनकी परेशानी समझकर उन्हें कृषि के क्षेत्र में पद्म श्री प्राप्त कर चुके सुभाष पालेकर के बारे में बताया। पालेकर को अक्सर लोग ‘कृषि का ऋषि’ कहते हैं। उन्होंने ही किसानों के लिए ‘जीरो बजट फार्मिंग’ या ‘सुभाष पालेकर नेचुरल फार्मिंग’ तकनीक को ईजाद किया है। इस तकनीक से खेती करने के लिए आपको किसी एक्स्ट्रा इन्वेस्टमेंट की ज़रूरत नहीं रहती।

फसल को प्राकृतिक रूप से केमिकल की बजाय पर्यावरण के अनुकूल खाद का इस्तेमाल करके उगाया जाता है। इसके एक साल बाद, वनराज ने अहमदाबाद में हो रही पालेकर की ‘जैविक खेती’ ट्रेनिंग के लिए रजिस्टर किया।

Vanraj Singh Gohil

“छह दिनों तक चली उस ट्रेनिंग में मैंने बहुत से किसानों से बातचीत की और उनकी कहानियों ने मुझे बहुत प्रेरित किया। मैंने पालेकर सर से किसानी की जानकारी ली और अब मुझे बस नैचरल फार्मिंग तकनीक इस्तेमाल करनी थी,” उन्होंने बताया।

एक मॉडल फार्म विकसित किया 

वनराज का परिवार पारम्परिक खेती पर ही विश्वास करता था और इस तरह की खेती के लिए वे तैयार नहीं हुए। उनकी 40 बीघा ज़मीन पर प्राकृतिक खेती करने के लिए उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया।

31 वर्षीय वनराज बताते हैं, “उन्हें डर था कि पेस्टिसाइड न डालने से फसल ख़राब हो जाएगी। उनके लिए मुझ जैसे गैर-अनुभवी किसान पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल था पर फिर किसी तरह मेरे पिता आधे एकड़ ज़मीन पर प्रयोग करने के लिए तैयार हो गए।”

उन्होंने सब्ज़ियाँ और फल उगाने के लिए दोनों तरीके- मल्टी-लेयर क्रोपिंग और प्राकृतिक खेती, को अपनाया। मल्टी लेयर क्रोपिंग करने से ज़मीन का भरपूर इस्तेमाल होता है क्योंकि इससे बहुत पास-पास, लेकिन अलग-अलग ऊंचाई पर दो फसल लगाई जा सकती हैं।

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इसके फायदे बताते हुए उन्होंने कहा, “पौधों को अलग-अलग लगाने की बजाय इस तकनीक से लगाने पर रौशनी और पानी का अच्छा इस्तेमाल होता है। इनके बीच कम दूरी होने से कीड़े भी नहीं लगते।”

उन्होंने बाहरी लाइन में देशी पपीते के बीज लगाए और अंदर की तरफ बैंगन, करेला, हल्दी, चौली, मुंग, मिर्च जैसी सब्जियों के बीज लगाए।

प्लास्टिक शीट की जगह मल्चिंग के लिए उन्होंने सूखे पत्तों का इस्तेमाल किया। मल्चिंग बागवानी की एक तकनीक है जो खरपतवार नहीं होने देती और फसल उत्पादन में पानी को बचाती है। उन्होंने मल्चिंग शीट पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर 3 फीट गहरे गड्ढे किये, जिसमें उन्होंने बीज बोये।

“गहरे गड्ढे होने से फसल को भारी बारिश में कोई नुकसान नहीं हुआ। ये ज़्यादा पानी को सोख लेते हैं और ग्राउंडवाटर को रिचार्ज करते हैं,” वनराज ने कहा।

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उन्होंने गौमूत्र, गोबर और गुड़ से एक प्राकृतिक पेस्टिसाइड, ‘जीवामृत’ बनाया। अपने आधे एकड़ ज़मीन पर वे हर 15 दिन में 200 लीटर जीवामृत का इस्तेमाल करते थे।

“पालेकर के मुताबिक, एक ग्राम गोबर में लगभग 300-500 करोड़ सूक्ष्मजीव होते हैं जो मिट्टी में बायोमास को डीकंपोज़ करके इसे पौधों के लिए पोषण में तब्दील कर देते हैं। यह प्राकृतिक पेस्टिसाइड कीड़े-मकोड़ों को तो रोकता ही है साथ ही ज़मीन की उर्वरकता शक्ति भी बढ़ाता है,” उन्होंने कहा।

इस सबके साथ वनराज ने सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम को चुना और इससे उनका पानी का इस्तेमाल 70% तक कम हुआ है।

मिला फायदा 

प्राकृतिक खेती अपनाने के छह महीने बाद उन्होंने सब्ज़ियों को काटा और सब्जियों को बेचने के लिए दो लोगों को रखा। इन्होंने जिले के एक छोटे कस्बे पलिताना में इन सब्जियों को बेचने के लिए एक स्टॉल लगाया।

उन्होंने बाज़ार के भाव के मुताबिक अपनी सब्जियों का रेट लगभग 30% बढ़ा भी दिया और फिर भी उनकी सभी सब्ज़ियाँ एक हफ्ते में बिक गयीं। क्योंकि उन्होंने अपनी सब्जियों की मार्केटिंग स्वस्थ और 100 प्रतिशत प्राकृतिक के तौर पर की थी। इसके अलावा उन्होंने उन ग्राहकों का एक व्हाट्सअप ग्रुप भी बनाया जो उनके खेत से सब्ज़ियाँ खरीदना चाहते थे।

उन्होंने बताया, “जैसे ही सब्ज़ियाँ खेत से स्टॉल के लिए चली जाती, मैं ग्रुप में मेसेज कर देता ताकि जिसे खरीदनी हो वे ताज़ा सब्ज़ी खरीद लें।”

अगले तीन महीने तक वनराज ने यह प्रक्रिया जारी रखी और फिर अपनी कपास की खेती पर ध्यान केंद्रित किया।

लेकिन फिर उनके रेग्युलर ग्राहकों को ताज़ा सब्ज़ियाँ मिलनी बंद हो गयीं तो उन्होंने वनराज को फिर से स्टॉल खोलने के लिए कहना शुरू कर दिया। साथ ही, उन्होंने अलग-अलग सब्ज़ियाँ उगाने की भी डिमांड की।

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“मैं प्राकृतिक खेती का प्रभाव देखकर हैरान था। बिना एक पल भी गंवाए, मैंने गाँव के दूसरे किसानों से बात की जो कि जैविक खेती कर रहे थे। मैंने और दो किसानों को अपने साथ जोड़ लिया और स्टॉल को फिर से खोला,” उन्होंने बताया।

वक़्त के साथ, उपज, गुणवत्ता और ग्राहक बढ़ने से वनराज की आय भी बढ़ने लगी।

“सिर्फ़ 6-8 महीने में मैंने दो लाख रुपये का प्रॉफिट कमाया। मेरे मॉडल फार्म की सफलता के बाद मेरे परिवार ने भी मेरा साथ दिया,” उन्होंने आगे कहा।

सफलता तो उन्हें मिल गयी, पर वनराज बताते हैं कि शुरुआत में प्राकृतिक खेती में उन्हें बहुत-सी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा।

“मैं पूरा दिन खेत पर बिताता था ताकि फसल के बढ़ने की प्रक्रिया को समझूं और जीवामृत के प्रभाव को देखूं। कुछ बीज फेल हो गये लेकिन इससे मुझे पौधों को समझने में मदद मिली। फिर कुछ समय बाद, बीजों को प्राकृतिक खाद की आदत पड़ गयी। मैं हर एक किसान को यह तरीका अपनाने का सुझाव दूंगा।”

जैविक खेती में सफलता पाने के बाद अब वे कपास की खेती में जीरो बजट फार्मिंग तकनीक को लगा रहे हैं। साथ ही, अपने आधे एकड़ खेत में जैविक सब्ज़ियाँ उगा रहे हैं। इसके अलावा वे एक युट्यूब चैनल शुरू करने पर भी काम कर रहे हैं।

“मैं दूसरे किसानों को भी यह तकनीक अपनाने की सलाह देता हूँ पर हर किसी के पास पालेकर सर की ट्रेनिंग लेने का वक़्त नहीं है। इसलिए मैं युट्यूब से ऐसे लोगों को फ्री-क्लास दूंगा।”

अगर आप वनराज गोहिल से बात करना चाहते हैं तो Vanraj111988@gmail.com पर क्लिक करें!

मूल लेख: गोपी करेलिया

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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