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शूटर दादी: मिलिए दुनिया की ओल्डेस्ट शार्प शूटर चंद्रो तोमर से!

87 साल की उम्र में भी चंद्रो तोमर आपको गाँव के बच्चों को शूटिंग की ट्रेनिंग करवाते हुए मिलेंगी!

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जिस उम्र में अक्सर कामकाजी लोग रिटायरमेंट लेते हैं और ज़िंदगी भर की थकान उतारने की तैयारी में होते हैं, उस उम्र में एक महिला ने ‘नारी सशक्तिकरण’ की एक नई कहानी लिखी। नाम है चंद्रो तोमर यानी कि हमारी सबकी प्यारी ‘शूटर दादी’ (Shooter Dadi)!

भारत में तो क्या विदेशों में भी हमारी ‘शूटर दादी’ के चर्चे हैं। 87 साल की उम्र में भी वह आपको गाँव के बच्चों को शूटिंग की ट्रेनिंग करवाते हुए मिलेंगी।

पर हमेशा से ऐसा नहीं था। ज़िंदगी भर घूँघट के पीछे रही दादी ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उनका चेहरा बड़े-बड़े अख़बारों के फ्रंट पेज पर तस्वीर बनकर छपेगा।

“65 साल की उम्र तक तो मैं एक साधारण सी ‘दादी’ ही थी। मैं अनपढ़ हूँ और जाट परिवार से हूँ, जहाँ औरतें चारदिवारी में ही रहती हैं और सिर्फ़ घर का काम करती हैं। अब इसे किस्मत कहें या कुछ और पर साल 1998 में जब मैंने अपनी पोती शेफाली के साथ शूटिंग रेंज में कदम रखा तो मेरी ज़िंदगी ही बदल गयी,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए शूटर दादी ने बताया।

Shooter Dadi
शूटर दादी चंद्रो तोमर

गाँव में युवाओं को शूटिंग के लिए प्रोत्साहित और ट्रेन करने के लिए जोहरी राइफल क्लब के प्रेसिडेंट डॉ. राजपाल सिंह ने इस शूटिंग रेंज की स्थापना की थी। शूटर दादी की पोती शेफाली, शूटिंग रेंज में अपने अनुभव को याद करते हुए बताती हैं,

“मुझे याद है कि मैं शूटिंग रेंज में बहुत डरती थी। वहां सिर्फ़ लड़के थे और मुझे लगता था कि मैं कभी शूटिंग नहीं कर पाउंगी। हर रोज़ मैं मन मारकर वहां जाती थी। दादी मेरे साथ शूटिंग रेंज जाती थीं और एक दिन जब मैं राइफल लोड नहीं कर पा रही थी, तो वो मेरी मदद करने के लिए आगे आयीं। वो दादी की एक नई ज़िंदगी की शुरुआत थी। मैं दादी के लिए चीयर कर रही थी और सिर्फ़ हमें देख-देख कर ही उन्होंने अपने जीवन का पहला निशाना लगाया, जो सीधे ‘बुल्स आय’ पर लगी।”

उनका निशाना देखकर डॉ. राजपाल को उनकी प्रतिभा का अंदाजा हो गया और उन्हें पता था कि अगर दादी को मौका दिया जाये तो वह इस खेल में माहिर हो जाएंगी। उन्होंने दादी से शूटिंग सीखने और करने के लिए कहा। लेकिन समस्या थी परिवार का समर्थन, जो मिलना मानो नामुमकिन सा था। दादी बताती हैं कि उनके घरवाले इसके बिल्कुल खिलाफ़ थे। किसी ने उनका साथ नहीं दिया।

“मैं इस बात को घर पर बताने में भी डर रही थी। पर डॉ. राजपाल ने भरोसा दिलाया कि इस बारे में घर में किसी को पता नहीं चलेगा, इसके बाद ही मैं प्रैक्टिस करने के लिए तैयार हुई। मेरे पति ने न तो कभी प्रोत्साहित किया और न ही कभी रोका। वह बस चुपचाप देखते रहे। पर आज कहानी एकदम अलग है। अब सब खुश हैं और मुझे आगे बढ़ने का हौसला भी देते हैं। पर तब कोई साथ नहीं था सिवाय मेरे दृढ़ निश्चय के।”

Shooter Dadi
शूटिंग रेंज में प्रैक्टिस करते हुए

अपनी पहली शूटिंग प्रतियोगिता के अनुभव को याद करते हुए उन्होंने बताया कि पहली बार वह अपनी पोती शेफाली के साथ ही प्रतियोगिता में गयी थीं। उनका रजिस्ट्रेशन बुजूर्ग श्रेणी में हुआ था और उस मैच में उन्हें और शेफाली, दोनों को ही मेडल मिले। दूसरे ही दिन उनका फोटो सभी स्थानीय अख़बारों में था। फोटो देखकर दादी इतना डर गयीं कि घर में अगर किसी ने देख लिया तो.. और उन्होंने अखबार छिपा दिया। पर उन्हें नहीं पता था कि अखबार की तो न जाने कितनी प्रतियां छपती हैं।

जब उनके परिवार को पता चला तो उन्हें काफ़ी कुछ सुनाया गया। उन्हें शूटिंग रेंज जाने से रोक दिया गया और सब ने उन्हें बहुत हताश करने की कोशिश की। लेकिन यही वक़्त था जब दादी ने ठान लिया कि वह अपनी प्रैक्टिस जारी रखेंगी। इसलिए वह घर पर ही प्रैक्टिस करने लगीं।

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शेफाली बताती हैं,

“भले ही दादी को अंग्रेजी नहीं आती, पर उन्हें पता है कि खुद को कैसे सम्भालना है। उनकी खूबी है कि वह बहुत जल्दी चीज़ें सीखती हैं। उन्हें लोगों से मिलना और बातें करना बहुत पसंद है।” वे आगे कहती हैं कि अब दादी ने अंग्रेजी के भी कई शब्द सीख लिए हैं क्योंकि प्रतियोगिताओं के लिए उन्हें अलग-अलग जगह जाना पड़ता है। एक बार वह चेन्नई में थीं और उन्होंने किसी से पानी माँगा, ‘भाई पानी दे दे,’ पर वो उनकी बात समझ ही नहीं पाए। इसके बाद से उन्होंने कुछ शब्द जैसे पानी को ‘वॉटर,’ चम्मच को ‘स्पून’ और नाश्ते को ‘ब्रेकफ़ास्ट’ आदि सीख लिए।”

अब तो दादी विदेशियों से भी बात करना मैनेज कर लेती हैं। उनके सीखने की लगन उन्हें कभी भी बुढ़ा नहीं होने देती, क्योंकि वे दिल से जवान हैं।

जो भी दादी से मिलता है, वो यही पूछता है कि आख़िर क्या राज़ है जो वह इस उम्र में भी इतनी एक्टिव हैं? इस सवाल के जवाब में वह हंसकर सिर्फ़ एक ही बात कहती हैं,

“शरीर बुढ़ा होता है पर मन बुढ़ा नहीं होता।”

अब उनकी ज़िंदगी के इस संघर्ष को बड़े परदे पर फिल्म के रुप में उतारा जा रहा है। फिल्म का नाम है ‘सांड की आँख’ और इस फिल्म में उनकी भूमिका अभिनेत्री भूमि पेडनेकर निभा रही हैं।

शूटर दादी न सिर्फ़ अपने गाँव की लड़कियों के लिए बल्कि पूरे देश की लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं। द बेटर इंडिया उनके हौसले और जज़्बे को सलाम करता है।

मूल लेख – विद्या राजा 
संपादन – मानबी कटोच 


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