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पिता की मृत्यु के बाद छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई, आज 70 बच्चों को पढ़ा रहा है यह शख्स!

16 दिसंबर 2016 को राजेंद्र ने 15 बच्चों के साथ ‘निशुल्क शिक्षा केंद्र’ की शुरुआत की और अब यह पहल 70 बच्चों तक पहुँच चुकी है!

ड़ीसा के संबलपुर में दलदलीपड़ा इलाके में पले-बढ़े राजेंद्र सतनामी हमेशा से ही अच्छा पढ़-लिखकर ज़िंदगी में कुछ बड़ा करना चाहते थे। पर उनके पिता के देहांत के बाद उनके कंधों पर आई परिवार की ज़िम्मेदारी में उनके अपने सपने न जाने कहाँ दबकर रह गये। माँ और तीन बहन-भाइयों के पालन-पोषण के लिए उन्होंने दिन-रात मेहनत की और आज भी कर रहे हैं।

अपनी ज़िम्मेदारियों में उलझे हुए लोग जहाँ खुद को भी नहीं संभाल पाते, वहां 35 वर्षीय राजेंद्र ने अपने इलाके के 34 गरीब बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा भी उठाया है। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया,

“हम अक्सर अपने मोहल्ले में बच्चों को ज़्यादातर खेल-कूद में ही लगा हुआ देखते थे। ये बच्चे स्कूल तो जाते हैं पर पढ़ाई नामभर के लिए करते हैं। इनके माता-पिता भी दिहाड़ी-मजदूरी में लगे रहते हैं तो ध्यान ही नहीं दे पाते कि उनके बच्चों की शिक्षा का स्तर क्या है?”

राजेंद्र सतनामी

कई बार राजेंद्र इन बच्चों से बात करते और उनसे पढ़ाई संबंधित प्रश्न पूछते। उन्हें समझ में आया कि पहली-दूसरी के बच्चों को अभी तक भाषा ज्ञान भी नहीं है। उन्होंने इस बारे में कुछ करने की ठानी और 16 दिसंबर 2016 से ‘निशुल्क शिक्षा केंद्र’ की शुरुआत की।

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‘निशुल्क शिक्षा केंद्र’ के ज़रिए हर शाम राजेंद्र इन बच्चों को मुफ़्त में ट्यूशन पढ़ाते हैं। 15 बच्चों से शुरू हुई उनकी पहल में आज कुल 70 बच्चे शामिल हैं। उन्होंने दलदलीपड़ा इलाके से अपनी पहल शुरू की, जहाँ वे 34 बच्चों को पढ़ाते हैं।

“हमारे यहाँ एक छोटा-सा क्लब है जो कि शाम में खाली ही पड़ा रहता है। हमने इलाके के लोगों से बात की कि अगर इस क्लब में बच्चों को कुछ समय पढ़ा लूँ तो? सभी ने हाँ कर दी और साथ ही, सभी ने कुछ न कुछ करके मदद ही की,” उन्होंने आगे कहा।

राजेंद्र कहते हैं कि उनकी खुद की पढ़ाई 12वीं कक्षा के बाद छूट गयी थी। इसलिए वे बड़ी कक्षाओं के गणित, अंग्रेज़ी जैसे विषय तो नहीं पढ़ा सकते थे, लेकिन उन्होंने बच्चों को मुलभुत विषय जैसे अक्षर ज्ञान, जमा-घटा, गुणा-भाग आदि करवाया। बहुत-से बच्चों को उनके पास आने से पहले ठीक से पढ़ना भी नहीं आता था। पर आज इन सभी बच्चों में काफ़ी बदलाव है।

बच्चों को सेंटर पर पढ़ाते हुए राजेंद्र

इन 34 बच्चों की उम्र 7 साल से 15 साल के बीच है और ये सभी बच्चे दूसरी कक्षा से लेकर 9वीं-10वीं कक्षा में पढ़ते हैं।  हर शाम लगभग ढाई-तीन घंटे तक बच्चों की कक्षाएं होती हैं जिसमें 2 घंटे अच्छे से पढ़ाई होती है और फिर बाकी समय में उन्हें कोई खेल खिलाया जाता है या फिर उनकी कोई एक्सरसाइज करवाई जाती है। मनोरंजन के चलते बच्चे पढ़ भी लेते हैं।

अपने इस काम में परेशानियों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा,

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“शुरुआत में बच्चों को थोड़ा केन्द्रित रखना मुश्किल था। पर फिर उनका यहाँ आना नियम बन गया। एक-दूसरे के बच्चों को देखते हुए, फिर और माँ-बाप ने भी बच्चों को यहाँ भेजना शुरू किया।” इसके बाद उन्होंने आर्थिक परेशानियों पर कहा, “नहीं, हमें नहीं लगता कि ऐसी कोई ख़ास आर्थिक परेशानी हुई क्योंकि इसमें बहुत कोई इन्वेस्टमेंट नहीं था। शुरू में, बच्चों के लिए कुछ कॉपी, पेन, पेंसिल वगैरा हम लेकर आये थे पर इसमें बहुत ज़्यादा खर्च नहीं हुआ। फिर जैसे जैसे लोगों को इसके बारे में पता चला तो किसी ने किताबें दे दीं तो कोई बैठने के लिए चटाई दे गया। सबकी मदद से काम अच्छा ही चल रहा है।”

राजेंद्र से प्रभावित होकर और भी तीन-चार लोग उनके साथ इस नेक काम में जुड़ गये। हफ्ते में दो-तीन दिन ये वॉलंटियर आकर बच्चों को पढ़ाते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने शहर के और दो इलाकों, गोविंदतुला और स्टेशनपड़ा में लोगों को गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। अब इन दो जगहों पर भी ‘निशुल्क शिक्षा केंद्र’ चल रहे हैं।

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गोविंदतुला में 18 तो स्टेशनपड़ा में 28 बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। इस तरह से एक छोटी-सी पहल से 70 बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल पा रही है।

कुल 70 बच्चो को मिल रही है शिक्षा

इन केन्द्रों पर अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे आते हैं। सभी बच्चों को उनकी कक्षा और सिलेबस के हिसाब से अलग-अलग ग्रुप्स में बिठाया जाता है। बड़ी कक्षाओं के बच्चों को वॉलंटियर पढ़ाते हैं तो छोटी कक्षाओं के बच्चों को कुछ विषय 9वीं-10वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे पढ़ाते हैं। इससे उनका आत्म-विश्वास बढ़ता है और उनके अपने कॉन्सेप्ट्स क्लियर होते हैं।

अपनी आगे की योजना के बारे में बात करते हुए राजेंद्र बताते हैं,

“हम सोच रहे हैं कि ऐसे लोगों को भी शिक्षा से जोड़ें जो कि ड्रॉपआउट हैं। कुछ कक्षा पढ़ने के बाद जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और किसी रोज़गार में लग गये। अगर ऐसे लोगों को भी फिर से पढ़ाई से जोड़कर उन्हें शिक्षा का महत्व समझाया जाये तो कम से कम वे अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य के प्रति तो जागरूक होंगे।”

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शिक्षा को लेकर हमेशा से जागरूक रहे राजेंद्र ने अपने तीन-बहन भाइयों की पढ़ाई में भी कोई कमी नहीं होने दी। उनकी एक बहन स्कूल की पढ़ाई के बाद आगे स्टिचिंग आदि का कोर्स कर रही है तो दूसरी बहन बी. कॉम करने के बाद सीएमए कर रही है। वह बताते हैं कि उनके भाई-बहन पढ़ाई के साथ-साथ कुछ न कुछ काम भी करते हैं और इस तरह से उनके पूरे परिवार का खर्च चल जाता है।

अंत में वह सिर्फ़ यही कहते हैं,

“हम हर पढ़े-लिखे इंसान से यही कहेंगे कि अगर आप वाकई समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं तो अपने आस-पास 5 गरीब और ज़रूरतमंद बच्चों को पढ़ाएं। दिन में, रात में, जब भी हो, मोबाइल चलाने या फिर यूँ ही घुमने-फिरने की बजाय इन बच्चों के भविष्य को बस एक घंटा दे दो। अगर हर कोई इंसान इस तरह करे तो यक़ीनन देश में कोई अशिक्षित नहीं रहेगा।”

यदि आपके पास कोई पुरानी किताबें हैं या फिर किसी भी तरह का स्टेशनरी सामान, जो कि आपके काम का नहीं है, लेकिन किसी और के काम आ सकता है तो ‘निशुल्क शिक्षा केंद्र’ पर पढ़ने वाले बच्चों के लिए भेज दें। इसके लिए आप राजेंद्र सतनामी से 9777776731 पर फोन करके संपर्क कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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