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‘गीली मिट्टी’ के ज़रिए भूकंप और फ्लड-प्रूफ घर बना रही है यह युवती!

‘पक्के घर’ का कांसेप्ट हमारे यहां सिर्फ ईंट और सीमेंट से बने घरों तक ही सीमित है जबकि पक्के घर का अभिप्राय ऐसे घर से होना चाहिए, जो कि पर्यावरण के अनुकूल हो और जिसमें प्राकृतिक आपदाओं को झेलने की ताकत हो जैसे कि बाढ़, भूकंप आदि। नेपाल में आये भूकंप के दौरान सिर्फ़ इस तकनीक से बने घर ही थे जो गिरे नहीं!

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क्या बिना सीमेंट और ईंटों के घर बनाना सम्भव है? क्या सूरज, हवा और बारिश पर निर्भर रहकर हम अपनी मूलभूत ज़रुरतें पूरी कर सकते हैं? या फिर अपना खाना खुद जैविक तरीकों से उगाना सम्भव है और साथ ही, अपने घर के कूड़े-कचरे से खाद बनाना?

इन सब सवालों के जबाव में हम बहुत से लोग शायद ‘न’ ही कहें। पर आप ऐसा एक उदाहरण दिल्ली के वसंत कुंज की सिन्धी बस्ती में देख सकते हैं। यहाँ पर ज़रुरतमंद बच्चों के लिए एक छोटा-सा स्कूल बनाया गया और वह भी पूरी तरह से सस्टेनेबल। इस स्कूल को बनाने के लिए Earthen Bag Technique का इस्तेमाल किया गया है।

लक्ष्यम एनजीओ के साथ मिलकर इस स्कूल को बनाया है ‘गीली मिट्टी‘ की संस्थापक शगुन सिंह ने।

इस तकनीक में बैग्स को मिट्टी से भरा जाता है और इन्हें ईंटों की तरह इमारत बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक 60 के दशक में एक ईरानी-अमेरिकन आर्किटेक्ट नादेर खलीली द्वारा ईजाद की गयी थी। यह बहुत ही कम लागत और सस्टेनेबल घर-निर्माण की तकनीक है।

37 वर्षीया शगुन सिंह इसी तकनीक का इस्तेमाल करके, उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा के कुछ भागों में आज प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल घर और अन्य ज़रुरत की इमारतें बना रही हैं।

 

शगुन सिंह

 

मूल रूप से बिहार की रहने वाली शगुन ने अपनी पढ़ाई दिल्ली से की। लगभग 10 साल तक कॉर्पोरेट सेक्टर में काम किया और फिर अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर लौट आईं अपनी जड़ों की ओर।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए शगुन ने बताया,

“सब कुछ बढ़िया था- घर, गाड़ी, जायदाद- बहुत कम समय में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। लेकिन फिर भी एक सुकून नहीं था। हमेशा लगता था कि इतना सब कुछ किसके लिए कर रहे हैं, न साफ हवा है, न साफ पानी और न ही स्वस्थ खाना-पीना। इसलिए सोचती थी कि कुछ अलग करूंगी कभी। पर अच्छे काम का कोई शुभ मुहूर्त नहीं होता। इसलिए जब दिल में आ जाये तभी उस पर काम करना चाहिए, वरना हम कभी चीज़ों से बाहर नहीं निकल पाते हैं।”

बस इसी सोच के साथ शगुन ने अपनी नौकरी छोड़ी और बस खुद पर विश्वास किया। सबसे पहले तो उन्होंने नौकरी छोड़ने के बाद उन सब चीज़ों को सीखना शुरू किया, जो उन्हें पसंद थी। उन्होंने मार्शल आर्ट सीखा और आज बहुत जगह लड़कियों को आत्म-रक्षा के गुर भी सीखा रही हैं।

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इसके बाद उन्होंने आर्किटेक्चर में हाथ आज़माया। उन्होंने अलग-अलग तरह की आर्किटेक्चर वर्कशॉप लीं और जाने-माने लोगों से सस्टेनेबल घर बनाने की बहुत-सी तकनीक सीखीं। शगुन ने फैसला किया कि उन्हें शहर में नहीं रहना है और संयोग से उन्हें उत्तराखंड में नैनीताल से 14 किलोमीटर दूर पंगोत के पास एक गाँव, मेहरोरा में ज़मीन मिल गई।

 

लड़कियों को सिखाती हैं आत्मरक्षा के गुर

 

“मैंने शहर में जो भी मेरी प्रॉपर्टी थी, सभी कुछ बेच दी और गाँव में अपना घर खुद बनाने का निश्चय किया। इस दौरान में गाँव के ही किसी न किसी परिवार के साथ रहने लगी। सबसे अच्छी जान-पहचान हो गई। वहां के स्थानीय लोगों को मैंने अपने साथ काम में लगा लिया और यह उनके लिए भी रोज़गार हो गया। पर वहां जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा परेशान किया वह थी कि लोग अपने पुराने प्राकृतिक रूप से बने घरों को तोड़कर ‘पक्के घर’ बनाने में लगे थे,” शगुन ने बताया।

‘पक्के घर’ का कांसेप्ट हमारे यहां सिर्फ ईंट और सीमेंट से बने घरों तक ही सीमित है जबकि पक्के घर से अभिप्राय ऐसे घर से होना चाहिए, जो कि पर्यावरण के अनुकूल हो और जिसमें प्राकृतिक आपदाओं को झेलने की ताकत हो जैसे कि बाढ़, भूकंप आदि। अर्दन तकनीक से बने घरों में ये सभी खूबियां होती हैं। शगुन बताती हैं कि नेपाल भूकंप के दौरान सिर्फ़ इस तकनीक से बने घर ही भूकंप को झेल पाए थे और गिरे नहीं थे।

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इसलिए जब शगुन ने यहां इस तरह का चलन देखा तो उन्होंने इस विषय पर कुछ करने की ठानी। उन्होंने अपने घर को लोगों के लिए एक उदाहरण बनाने का फैसला किया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करके सस्टेनेबल के साथ-साथ मॉडर्न लुक वाला घर बनाया। इस घर की चर्चा इतनी हुई कि आज दूर-दूर से लोग इसे देखने आते हैं और यहीं पर साल 2015 में नींव रखी गई ‘गीली मिट्टी’ की।

शगुन के संगठन ‘गीली मिट्टी’ के दो हिस्से हैं- एक गीली मिट्टी फार्म और दूसरा गीली मिट्टी फाउंडेशन। गीली मिट्टी फार्म को शगुन ने शुरू किया है तो वहीं गीली मिट्टी फाउंडेशन में उनके सह-संस्थापक, ओशो कालिया भी शामिल हैं। गीली मिट्टी फार्म के ज़रिये वे लोगों को फिर से अपनी जड़ों और प्रकृति से जोड़ना चाहती हैं। वे इसे एक सेंटर के तौर पर विकसित कर रही हैं, जहां पर लोगों को प्राकृतिक भवन-निर्माण की तकनीक सिखाई जाएगी। साथ ही, यहां पर लोगों को सस्टेनेबल लिविंग के तरीके भी सिखाये जाएंगे जैसे कि खुद जैविक खेती करना, किचन गार्डन, खाद बनाना, सौर-ऊर्जा और वर्षा जल संचयन आदि।

 

Earthen Bag Technique

 

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हमारे देश में अगर इमारतों और किलों की बात करें तो हमारी विरासत बहुत ही समृद्ध है। आज भी वर्षों पुराने भवन ज्यों के त्यों खड़े हैं क्योंकि उन्हें बनाने के लिए स्थानीय तकनीकों का इस्तेमाल हुआ है। शगुन कहती हैं,

“लोगों को सिर्फ़ कच्चे मकान और सीमेंट के मकान के बारे में पता है। हर कोई पक्के और मॉडर्न घर के नाम पर ऐसी इमारत बनवा लेता है जहां दीवारें सांस तक नहीं ले पाती। इसलिए जब मैंने अलग-अलग आर्किटेक्ट की एकदम ज़मीनी तकनीकों को जाना तो लगा कि हमारा आर्किटेक्चर हमेशा से कितना आगे था, बस हम ही पिछड़ते जा रहे हैं।”

अगर हम चाहे तो सिर्फ आर्किटेक्चर के माध्यम से घर के तापमान को बहुत हद तक नियंत्रित कर सकते हैं। इसलिए शगुन ने अपने घर को लोगों के लिए एक प्रेरणा बनाया। वे बताती हैं कि मेहरोरा गाँव में मौसम की स्थिति बहुत ही ख़राब है, बहुत ठण्ड और हद से ज़्यादा बारिश, पर उनके घर को यह सब प्रभावित नहीं कर रहा। गोल आकार में बना यह घर आज यहां आकर्षण का केंद्र है और गाँव के लोगों ने इसे नाम दिया है ‘गोल घर’!

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यहीं पर शगुन अपनी टीम के साथ मिलकर लोगों के लिए आर्किटेक्चर तकनीक पर वर्कशॉप आयोजित करती हैं। उनकी वर्कशॉप 2 दिन से 45 दिनों तक की होती हैं। जो लोग अच्छे-खासे परिवारों से हैं और फीस दे सकते हैं, उनके लिए ये वर्कशॉप फीस के साथ होती हैं। पर कुछ ग्रामीण और गरीब लोग, जो पैसे नहीं दे सकते, उन्हें शगुन मुफ्त में सिखाती हैं।

 

 

इन वर्कशॉप से मिलने वाले पैसों से वे ‘गीली मिट्टी फाउंडेशन’ के सोशल प्रोजेक्ट्स को फंड करती हैं। शगुन बताती हैं कि वे खुद पर निर्भर होकर किसी के लिए कुछ करना चाहती हैं। उनका उद्देश्य है कि अपने प्रोजेक्ट्स को सेल्फ-सस्टेनेबल बनाएं ताकि उन्हें किसी से डोनेशन मांगने की ज़रुरत न पड़े।

इसके लिए, वे गाँव के लोगों को ट्रेनिंग देकर उन्हें इको-टूरिज्म और ऑर्गेनिक फार्मिंग के लिए तैयार कर रही हैं। क्योंकि अगर गाँव में ही अच्छे रोज़गार के साधन होंगे तो पलायन नहीं होगा। लोग सिर्फ चंद टूरिस्ट पैलेस देखकर लौटने की बजाय इन गांवों में आकर एक-दूसरे की संस्कृति से रू-ब-रू होंगे। फ़िलहाल, उनका जोर इको-फ्रेंडली होम-स्टे तैयार करने पर है ताकि घूमने आने वाले लोग होटल की बजाय इन स्थानीय लोगों के यहां रुके।

उनका एक और प्रोजेक्ट है स्कूल, कॉलेज और कॉर्पोरेट के लोगों को अपने यहां ट्रिप्स के लिए आमंत्रित करना। इससे छात्रों और युवाओं को इस तरह की संस्कृति के बारे में पता चलेगा और कहीं न कहीं हम आगे की पीढ़ी को हमारी पुरानी पीढ़ी की धरोहर के बारे में बता सकते हैं।

 

शगुन और उनकी टीम द्वारा बनाये गये घर

 

शगुन की टीम में गाँव के कुछ स्थानीय लोग, वर्कशॉप के लिए आने वाले छात्र-छात्राएं और कुछ ऐसे लोग हैं जो उनसे सीख चुके हैं और अब अपने-अपने क्षेत्र में इस काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए उत्तराखंड के अलावा, उनका एक ऑफिस हरियाणा के गुरुग्राम में भी है। यहां पर वे लड़कियों के लिए सेल्फ-डिफेन्स का ट्रेनिंग-सेंटर चलाते हैं, तो शगुन भी सरकारी स्कूल और स्थानीय पुलिस विभाग के साथ मिलकर, गांवों में लड़कियों को आत्मनिर्भर बना रही हैं।

अंत में शगुन सिर्फ इतना कहती हैं कि हमें अपने ही मिथकों से बाहर निकलने की ज़रुरत है। हमेशा से ही हमारी क्षमताओं को सीमित किया गया है, जैसे कि हमें लगता है कि हमनें जब आर्किटेक्चर पढ़ा ही नहीं तो हम कैसे कर सकते हैं? पर ऐसा नहीं है, आपमें बस कुछ सीखने की लगन होनी चाहिए, आप कोई भी काम कर सकते हैं।

और कुछ अच्छा करने के लिए आपको कुछ बहुत बड़ा करने की भी ज़रुरत नहीं है। बस आपकी जो लाइफस्टाइल है, उसी में ऐसे-ऐसे छोटे-छोटे बदलाव कीजिए जोकि हमारे समाज और पर्यावरण के हित में हो। इससे आप अपने दायरे में रहकर भी अपना योगदान एक अच्छे समाज की दिशा में दे सकते हैं।

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इस बार अगर नैनीताल घूमना हो तो मेहरोरा गाँव का टूर करना न भूलियेगा। यहाँ पर आप न सिर्फ़ गोल घर देख पाएंगे, बल्कि चाहे तो अपने दोस्तों और परिवार के साथ आर्किटेक्चर की एक वर्कशॉप भी अटेंड कर सकते हैं। इस बारे में अधिक जानने के लिए आप शगुन सिंह से 9540937144 पर या फिर geelimittiindia@gmail.com संपर्क कर सकते हैं और उनका पता है:

Geeli Mitti Farms
Mahrora Village, Pangot (Post Office)
Nainital, Uttarakhand
Pincode – 263001, India

संपादन – भगवती लाल तेली


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