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जब ‘मानव कंप्यूटर’ शकुंतला देवी ने पति के लिए लड़ी समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई!

समलैंगिकता पर लिखी किताब में उन्होंने लिखा है, “इस किताब को लिखने के लिए मेरी योग्यता सिर्फ यही है कि मैं एक इंसान हूँ।”

‘मानव कंप्यूटर’ और ‘मेंटल कैलकुलेटर’ जैसे उपनामों से मशहूर भारतीय गणितज्ञ शकुंतला देवी सिर्फ़ 3 साल की थीं, जब उनकी गणित की संख्या और अंकों के साथ दोस्ती हुई। सर्कस में करतब दिखाने वाले उनके पिता, अक्सर उनके साथ जादू का खेल खेलते थे। उन्हें लगता था कि उनकी नन्हीं सी बेटी को उनकी मैजिक ट्रिक्स समझ नहीं आएँगी, लेकिन उन्हें हैरानगी तो तब हुई जब शकुंतला ने उन्हें उनके ही खेल में मात दी।

शकुंतला के पिता एक कन्नड़ ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे, लेकिन सर्कस में काम करने के अपने सपने को पूरा करने के लिए वे घर से भाग आये थे। यहाँ पर जैस ही सर्कस के परदे गिरते तो शकुंतला के पिता उनके साथ वक़्त बिताते और कार्ड्स का खेल खेलते।

इस खेल में जब शकुंतला ने उन्हें हराया तो पहले-पहले उन्हें लगा कि ज़रूर शकुंतला ने चुपके से कार्ड्स देख लिए हैं। पर फिर उन्हें एहसास हुआ कि उनकी बेटी बहुत ख़ास है क्योंकि वह कितनी भी संख्याओं को सिर्फ़ एक बार देख कर याद कर सकती है।

तब उन्हें पता चला कि उनकी बेटी में गणित के विषय में विलक्षण गुण है। इसके बाद, उन्होंने अपना काम छोड़कर अपनी बेटी की योग्यता को और निखारने पर काम किया।

शकुंतला देवी

उन्होंने सबसे पहले रोड शो से शुरू किया, जहाँ शकुंतला बड़ी से बड़ी संख्याओं को बिना किसी कैलकुलेटर की मदद से अपने दिमाग में ही हल करती और सेकंड्स में जबाव दे देती। शकुंतला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हुई, पर फिर भी अपने ज्ञान से वे बड़े-बड़ों को चौंका देती थीं।

गणित के सवालों को हल करने में वे सिर्फ़ 5 साल की उम्र में एक्सपर्ट बन गयीं और फिर छह साल की उम्र में, यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसूर में उनका बड़ा शो हुआ। साल 1980 में लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में उन्होंने 13-13 अंकों की दो संख्याओं को बिल्कुल सही गुणा किया और मात्र 28 सेकंड्स में जवाब दे दिया। अचम्भे की बात यह थी कि इन 28 सेकंड्स के भीतर उन्होंने 26 अंकों की संख्या के इस परिणाम को बता भी दिया था।

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ये संख्या थे – 7,686,369,774,870 और 2,465,099,745,779 जिनको कंप्यूटर द्वारा रैंडमली सेलेक्ट किया गया था और इन्हें गुणा करने पर 18,947,668,177,995,426,462,773,730 संख्या मिलती है!

इसके बाद उन्हें गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स के 1982 एडिशन में जगह मिली और साथ ही, ‘ह्यूमन कंप्यूटर’ (मानव कंप्यूटर) का नाम मिला।

साभार: फेसबुक

गणित के विषय में शकुंतला की इस अद्भुत प्रतिभा और सवालों को हल करने की उनकी गति का कोई सानी नहीं। लेकिन सिर्फ़ एक यही वजह नहीं है उन्हें याद रखने की और उनका सम्मान करने की।

गणित की इस विदुषी को एक और बड़ी वजह से याद किया जाता है और वह है समलैंगिकता के समर्थन में उनका संघर्ष।

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60 के दशक के मध्य में शकुंतला लंदन में अपनी प्रतिभा साबित करके भारत लौटीं और यहाँ आकर उन्होंने कोलकाता के एक आईएएस अफ़सर, परितोष बैनर्जी से शादी की। उनकी ज़िंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था, जब तक उन्हें अपने पति की सेक्शुयालिटी के बारे में पता नहीं चला था।

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आज भी हम इस विषय पर खुलकर बात नहीं कर सकते तो सोचिये साल 1970 में क्या स्थिति होगी?

कोई भी इस बात का अंदाज़ा लगा सकता है कि जब उन्हें पता चला होगा कि उन्होंने एक ‘गे’ (समलैंगिक) आदमी से शादी की है तो उनकी ज़िंदगी कैसे बदल गयी होगी। बेशक यह किसी सदमे से कम नहीं था, पर शकुंतला इस सबसे ऊपर उठीं और उन्होंने न सिर्फ अपने पति को समझा बल्कि भारत में इस समुदाय के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज़ भी उठायी।

उन्होंने अपने स्तर पर समलैंगिक समुदाय के लोगों से बात करके, उनके बारे में जानना शुरू किया। सेम-सेक्स दंपत्तियों के बारे में, जो यहां रह रहे हैं या फिर बाहर, उनसे बात की, उनसे पूछा कि वे समाज से क्या चाहते हैं और उनके अनुभवों को लिखा।

सेक्शन 377 भले ही कुछ समय पहले हटा, पर शकुंतला ने अपनी रिसर्च के बाद साल 1977 में ही इसे हटाने की मांग की थी।

अपनी रीसर्च और अपने साक्षात्कारों को उन्होंने अपनी किताब, ‘द वर्ल्ड ऑफ़ होमोसेक्शुअल्स‘ में लिखा है। इस किताब के ज़रिये उन्होंने समलैंगिकों के संघर्ष को समाज के सामने रखने की कोशिश की। भले ही उस समय उनकी बातों और विचारों को ज़्यादा तवज्जो नहीं मिली, लेकिन आज उनका नाम उन लोगों में शामिल होता है, जिन्होंने देश में समलैंगिक अधिकारों के लिए लड़ाई शुरू की।

उन्होंने लिखा, “इस किताब को लिखने के लिए मेरी योग्यता सिर्फ यही है कि मैं एक इंसान हूँ।”

इसके साथ ही, उन्होंने समलैंगिकता के लिए किसी सहानुभूति की नहीं बल्कि पूर्ण रूप से स्वीकृति की बात की है।

यह किताब साल 1977 में आयी और इसके दो साल बाद शकुंतला और उनके पति ने तलाक के लिए अर्जी दी। इसके बाद, शकुंतला ने अपना सारा समय अपने गणित की प्रैक्टिस को दिया। उन्होंने बच्चों के लिए इस विषय को दिलचस्प बनाने के लिए खास टेक्सट-बुक भी लिखें।

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आज जब हम उन्हें गणित के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए याद करते हैं तो ज़रूरी है कि हम समलैंगिकता पर उनके काम के लिए भी उन्हें याद करें।

शकुंतला देवी के प्रेरणात्मक किरदार को अब अभिनेत्री विद्या बालन बड़े परदे पर निभाने जा रही हैं। बॉब हेयर कट और प्यारी-सी मुस्कान और उतने ही कॉन्फिडेंस वाले अंदाज़ के साथ वह बिल्कुल शकुंतला देवी की छवि लग रहीं हैं। यह फिल्म तो साल 2020 में रिलीज़ होगी, लेकिन शकुंतला देवी के फैन्स को अभी से इसका बेसब्री से इंतजार है।

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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