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तेज़ बुखार में दी UPSC की परीक्षा और पहली ही बार में हासिल की 9वीं रैंक!

“ब्रेक टाइम में मुझे कार में ही आईवी ड्रिप दी गयी,” यह कहना है सौम्या शर्मा का। सुनने की क्षमता न होते हुए भी उन्होंने परीक्षा में किसी तरह का आरक्षण नहीं लिया!

साल 2018 बैच की IAS अफ़सर, सौम्या शर्मा की कहानी, ऐसे बहुत-से प्रतिभागियों के लिए प्रेरणा है जो अक्सर मुश्किल की घड़ी में अपने लक्ष्य से पीछे हट जाते हैं। सौम्या बचपन से ही बहुत होनहार और प्रतिभाशाली छात्रा रहीं, लेकिन उनके लिए जीवन आसान नहीं रहा।

सौम्या अपने स्कूल में थीं, जब उनकी सुनने की क्षमता बिल्कुल ही चली गई, लेकिन फिर भी UPSC की परीक्षा में उन्होंने आरक्षण का कोई फायदा नहीं उठाया। बल्कि सामान्य वर्ग में परीक्षा देकर पहले ही प्रयास में पास कर ली और वह भी 9वीं ऑल इंडिया रैंक के साथ।

हालांकि, दिल्ली में पली-बढ़ी सौम्या ने कभी भी नहीं सोचा था कि वे एक दिन IAS अफ़सर बनेंगी। दे बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया, “मेरे माता-पिता डॉक्टर हैं और मेरा भाई मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली में अपने फाइनल ईयर में है। दसवीं कक्षा के बोर्ड एग्जाम के बाद, मैं भी इसी राह पर थी पर फिर मैंने लॉ करने का फ़ैसला किया। बेंगलुरु के नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलने के बावजूद मैंने दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया।”

सौम्या बहुत ही मेधावी छात्रा थीं और लगातार अपनी क्लास में टॉप करती थीं। लेकिन अगस्त, 2010 में एक दिन अचानक उन्होंने अपनी सुनने की क्षमता खो दी। यह उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं था।

सौम्या शर्मा

वह बताती हैं कि उनकी सुनने की क्षमता अचानक से गई और एक पॉइंट ऐसा आया कि उन्हें अपनी आवाज़ तक सुनना बंद हो गई। “शुरुआत में इस नए सच को अपना पाना बहुत मुश्किल था। मेरी नौवीं कक्षा ज़्यादातर अस्पताल के चक्कर काटने में ही चली गई। लेकिन कहते हैं न कि दोस्तों की ज़रा-सी मदद से हम आगे बढ़ जाते हैं। मेरे परिवार, दोस्त और आधुनिक तकनीक का शुक्रिया कि मैं इससे बाहर आ पाई।”

सौम्या को सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस है और एक हियरिंग इम्प्लांट कंपनी MED-EL के मुताबिक, यह अक्सर “कोक्लीआ में सेंसरी सैल (हेयर सैल) न होने के या फिर क्षतिग्रस्त होने के कारण होता है और यह परमानेंट है।” इसे ‘नर्व डेफनेस’ भी कहते हैं और निर्देशों के अनुसार इसमें हियरिंग ऐड या फिर मिडिल ईयर इम्प्लांट करवाया जाता है। 

“आधुनिक तकनीक बहुत तेजी से आगे बढ़ी है और अब हियरिंग ऐड की मदद से मैं अच्छे सुन और बात कर पाती हूँ। ये 2010 में संभव नहीं था पर अब चीज़ें काफ़ी बेहतर हुई हैं। बिल्कुल, बहुत बार होता है जब कई चीज़ें नहीं सुन पाती हूँ, लेकिन ये हियरिंग ऐड बहुत अच्छा काम कर रही हैं,” सौम्या ने कहा।

प्रशासनिक सेवा जॉइन करने का ख्याल उनके मन में लॉ स्कूल में कानून की पढ़ाई के दौरान आया।

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सौम्या शर्मा

“जब आप कानून की पढ़ाई करते हैं तो प्राकृतिक तौर पर ही आपका झुकाव सामाजिक मुद्दों की तरफ होने लगता है। आप संवैधानिक कानून, मानवीय अधिकार और भी बहुत-सी चीज़ों के बारे में पढ़ते हैं, जो आपको समाज  के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित करती हैं। मैंने फरवरी 2017 से प्रशासनिक परीक्षा देने के बारे में गंभीरता से सोचा, तब उस साल का प्रीलिम्स चार महीने बाद होना था। लेकिन प्रशासनिक सेवाओं में जाना लोगों के लिए कुछ करने का सबसे अच्छा मौका है, “उन्होंने कहा।

अपने कॉलेज के आख़िरी साल में उन्होंने बिना किसी कोचिंग के परीक्षा की तैयारी शुरू की। अपने स्कूल के दिनों से ही करंट अफेयर्स पढ़ने वाली सौम्या को अपना रुटीन बनाने में बहुत वक़्त नहीं लगा। उनके कॉलेज का आख़िरी पेपर 2 जून 2017 को था और इसके सिर्फ़ 16 दिन बाद उन्होंने UPSC की प्रीलिम्स परीक्षा दी।

हालांकि, यहीं पर उनके लिए चुनौतियाँ खत्म नहीं हो गई। प्रीलिम्स क्लियर करने के बाद मेन्स की परीक्षा के लिए महीनों पढ़ने के बाद, परीक्षा के समय उन्हें बहुत तेज बुखार हो गया। सौम्या ने बहुत ही मुश्किल से सिर्फ़ 3 घंटे की नींद लेकर निबंधात्मक परीक्षा दी। परीक्षा देकर जब वे घर लौटीं तो उनका बुखार 102 डिग्री तक जा चूका था।

“जनरल स्टडीज के पेपर के लिए रिवाइज करने की सारी प्लानिंग बेकार गई। मैं बिस्तर में पड़ी थी और बहुत मुश्किल से उठ पा रही थी और मुझे आईवी ड्रिप दी गई क्योंकि मेरा बुखार 102 डिग्री हो गया था। हर कोई मेरे परिवार में परेशान था कि मैं सुबह परीक्षा के लिए उठ भी पाऊँगी या नहीं, लेकिन किसी तरह मैंने मैनेज किया। जनरल स्टडीज के पेपर्स के बीच ब्रेक में मुझे कार में ही आईवी ड्रिप लगी, यह बहुत ही बुरा अनुभव था। जनरल स्टडीज के दूसरे पेपर के दौरान तो बुखार और थकान के चलते मैं लगभग बेहोश ही हो गई थी,” जैसा कि उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरे माता-पिता ने स्थिति को बहुत अच्छे से संभाला। मैंने ठान लिया था कि अब मैं और किसी शारीरिक परेशानी के कारण पीछे नहीं रहूंगी। मैं नहीं चाहती कि बुखार मेरी इतने महीनों की मेहनत के रास्ते में आए। मैं बहुत खुश हूँ कि इतनी परेशानी के बाद भी मैंने अपने पहले प्रयास में अच्छा किया और अच्छी रैंक हासिल की।”

आज, वह असिस्टेंट कमिश्नर हैं और फिलहाल, साउथ-वेस्ट दिल्ली में जिला मजिस्ट्रेट के साथ अपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कर रही हैं।

हम सौम्या के जज़्बे और हिम्मत को सलाम करते हैं। उम्मीद है कि उनकी कहानी बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा बनेगी।
संपादन: भगवती लाल तेली
मूल लेख: रिनचेन नोरबू वांगचुक 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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