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8वीं पास किसान ने बनाई ऐसी मशीन, ऑटोमैटिक ही हो जाएगी संतुलित बुवाई!

घर की आर्थिक स्थिति ख़राब होने के चलते वे 8वीं के बाद से ही मज़दूरी करने लग गए थे।

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गोपाल दवे।

फलता की यह कहानी जोधपुर जिले के सालावास गाँव के प्रगतिशील किसान गोपाल दवे की है, जिन्होंने एक ऐसी मशीन बनाई है जिससे आप बीजों की बुवाई भी कर सकते हैं और खाद भी डाल सकते हैं। इस मशीन की सहायता से किसानों को अब यह सुविधा हो गई है कि वे सभी किस्म के बीजों और दो से तीन किस्म के मिश्रित व संतुलित बीजों की बुवाई भी इससे एक साथ कर सकते हैं।

गोपाल दवे कहते हैं, “मैं बड़ी विकट परिस्थितियों में बड़ा हुआ हूँ। वैसे तो किसान परिवार से हूँ पर खेत के नाम पर ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा ही था, जो पूरे परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं था। चूँकि ब्राह्मण कुल से हूँ, इसलिए पिताजी खेती के साथ-साथ शिव मंदिर में पूजा पाठ का काम भी करते थे। 8वीं पास करते-करते मैंने घर के माली हालातों को ध्यान में रखते हुए मजदूरी करना शुरू कर दी थी। एक समय आया जब खेती से घर का खर्च पूरा नहीं पड़ा तो हमने गाँव छोड़ शहर का रूख किया।

ये उन दिनों की बात है, जब वे उनके पिताजी के साथ खेतों पर जाया करता थे। किसानों को मरते-परेशान होते देखते थे। उन्होंने तभी निर्णय कर लिया था कि कुछ ऐसा करेंगे कि उनके किसान भाइयों को खेती-बाड़ी की रोजमर्रा की समस्याओं से मुक्ति मिल जाए। शहर में आकर 19 साल की उम्र में उन्होंने प्लास्टिक के आइटम बनाने की एक हाथ से संचालित होने वाली मशीन लगाकर काम शुरू किया। 1991 में कास्टिंग लाइन से भी जुड़े। कास्टिंग को इंजीनियरिंग की नींव माना जाता है।

 

फिर उन्होंने सोचा कि शहर में कुछ करने की बजाय अपने पूर्वजों की माटी पर ही जाकर कुछ करूं और कामयाब होऊं तो उनकी आत्मा को भी खुशी मिलेगी और वे गाँव आ गए।

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प्रगतिशील किसान गोपाल दवे।

गोपाल के मन में शुरू से ही किसानों के लिए कुछ नया करने की सोच पल रही थी पर वे समझ नहीं पा रहे थे आखिर करें क्या? एक दिन ऐसे ही बैठे-बैठे मन में ख्याल आया कि किसानों के लिए हल पर बैठकर बुवाई करना बड़ी समस्या है। फिर बहुत सोच विचार के बाद पाया कि बुवाई के लिए उपयोग में आने वाले बीजों की मात्रा की समस्या बड़ी है।

हल पर बैठकर बीज डालने से कहीं बीज ज्यादा गिर जाते हैं तो कहीं कम गिरते हैं। हल पर बैठे किसानों के लिए यह तालमेल बैठाना बड़ा जोखिम भरा होता है कि वे या तो बीजों के बराबर गिरने पर ध्यान दे या खुद का बैलेंस बनाए रखें, खुद को गिरने से बचाएं। इन सबके चलते बुवाई भी ठीक-ठाक नहीं होती है और फसल भी असंतुलित होती है।

1993 की बात है, उन्होंने लकड़ी का एक जुगाड़ देखा जिसकी सहायता से कई किसान बिजाई करते थे। लेकिन समस्या तो यहां भी यही थी, वो कोई यंत्र तो नहीं था, था तो जुगाड़ ही, इससे भी बिजाई ठीक से नहीं होती थी।

गोपाल ने इसी जुगाड़ के सहारे एक तकनीक विकसित करने की सोची। उन्होंने सबसे पहले एल्युमिनियम कास्ट में एक मॉडल तैयार किया। मशीन की मदद से बीजों को आठों हलों में गिरने की स्थिति को बराबर किया। उन्होंने सबसे पहले 2 ही मशीनें बनाई, जिसे दो किसानों को देकर उपयोग में लेने के लिए कहा। किसानों के लिए वे मशीनें उपयोगी सिद्ध हुई।

 

मशीनों की सहायता से अच्छे से बुवाई होने लगी तो उन्होंने अगले वर्ष 30 मशीनें बनाई और मात्र लागत कीमत पर किसानों को इस्तेमाल करने के लिए दी।

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बाईं मशीन पहले उपयोग होती थी जिस पर बैठकर बुवाई करते थे। दाईं ओर की नवीन मशीन, जिससे ऑटोमैटिक बुवाई होती है।

गोपाल बताते हैं कि उनके द्वारा सृजित बुवाई के इन यंत्रों को मात्र लागत कीमत पर किसानों को दिए जाने की वजह से काफी प्रसिद्धि पाने लगे।

2004 में ऑटो पावर व रॉड की मदद से ट्रैक्टर के पीटोओ सॉफ्ट से मशीन को चलाया, लेकिन स्पीड ज्यादा होने के कारण बीजों के टूटने की समस्या उत्पन्न हो गई। फिर भी बीजों का वितरण ऑटोमैटिक रूप से होना सफल रहा। इसके बाद मशीन को जमीन से पावर देकर बीज तोड़ने की समस्या का निपटारा किया गया। इस कार्य को सफलता तक लाने का जुनून इतना था कि गोपाल ने बाकी सारे काम बंद कर दिए थे, वे कास्टिंग के जरिये इसे उन्नत करने में जुट गए थे।

और फिर एक दिन वह भी आया जब अनेकों परिवर्तनों के बाद उनकी यह मशीन कामयाब हो गई। उनकी मेहनत का नतीजा रहा कि 2007 में 80 किसानों ने इसे सफल मानते हुए इसकी सराहना की। यही वह समय था, जब गोपाल ने दिन-रात एक कर दिए थे।

 

किसानों के खेतों में जा जाकर वे मशीन की सेटिंग अपने हाथों से करते। कन्धे से कन्धे मिलाकर बिजाई में किसानों के साथ जुटे रहते थे।

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मशीन देने के बाद किसानों के साथ गोपाल।

उनका एक ही सपना था कि वे एक ऐसा यन्त्र विकसित करने में कामयाब हो जाएं जो सभी तरह के बीजों की बिजाई विशिष्ट मात्रा में समान्तर और जरूरत के मुताबिक कर सकने में सक्षम हो, जिससे निम्न दर्जे के किसानों को कम कीमत में बुवाई की अच्छी प्रणाली और मशीन मिल जाए। कुछ ऐसा हो जिसकी वजह से किसानों के समय और पैसे की बचत हो।

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लगातार जद्दोजहद करने के बाद वे कामयाब हुए थे। उन्होंने ‘ऑटोमैटिक सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर मशीन’ बनाने में सफलता हासिल की थी। आज की तारीख में इस मॉडल के हजारों पीस बन रहे हैं। देश भर के करीब 5 हज़ार किसान उनकी बनाई मशीन का उपयोग कर रहे हैं।

इस मशीन में 6, 7, 8 और 9 हल की सुविधा है। इसकी खूबी यह है कि जैसे ही मशीन का पॉवर व्हील मिट्टी के सम्पर्क में आता है, उसके ऊपर लगे स्टॉक ड्रम से विशिष्ट अनुपात में बीज गिरने लगते हैं। एक फायदा यह भी है कि जब ट्रैक्टर खेत में मुड़ता है तो एक भी बीज बेकार नहीं होता।

 

मशीन में फ्लेक्सिबल रॉड लगी है, जिसके चलते खेत की ऊँची-नीची जमीन में भी मशीन संतुलित रहते हुए चलती है।

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गोपाल दवे की बनाई ‘ऑटोमैटिक सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर’ मशीन।

इस मशीन से मिक्सर बीजों की बुवाई के साथ-साथ बाजरा, सरसों, रायड़ा, तिलहन, मूंग, मोठ, ज्वार, गेहूं, चंवला, मक्की, मूंगफली और अरण्डी आदि बीजों की बुवाई भी संतुलन के साथ हो सकती है।

मशीन की मुख्य बॉडी एल्युमिनियम से बनी है, जिसकी वजह से बरसाती सीजन में मशीन को जंग भी नहीं लगता। मशीन की एक ख़ूबी यह भी है कि हल पर लगी ड्रिल के साथ लगा चक्र जमीन के सम्पर्क में आते ही घूमता है। हल से जुड़ी 16 नलियों से बीज और खाद मिट्टी में दब जाते हैं।

फलस्वरूप किसान भाईयों को बुवाई से पूर्व खाद-बीज डालने के लिए बार-बार मेहनत नहीं करनी पड़ती। इस मशीन से आप 50 ग्राम बीजों की भी बुवाई कर सकते हैं। जोधपुर संभाग स्तर सहित प्रदेश के कई जिलों के किसान इसे अपना चुके हैं। अब गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक सहित कई राज्यों के किसानों ने भी इसे अपनाया है। उनके इस शोध के लिए उन्हें अनेक सम्मान मिल चुके हैं।

राजस्थान सरकार के कृषि विभाग द्वारा इस पर 50 प्रतिशत अनुदान भी दिया जा रहा है। ‘ऑटोमैटिक सीड कम फर्टिलाइजर मशीन का मूल्य 22,000 रुपए है तो केवल बीज बुवाई के लिए सीड ड्रिल की कीमत 14,000 रुपए है। प्रोग्रेसिव फार्मर गोपाल दवे ने इस मशीन का पेटेन्ट भी करवा लिया है। गोपाल दवे ने इस वर्ष 12-13 लाख का रिटर्न फाइल किया। काम ज्यादा होने पर उन्होंने 20 से 25 लाख रुपए भी साल के कमाए हैं। ‛श्री आर्ट एंड एग्रीकल्चर उद्योग’ के नाम से उनकी फर्म है। आप इस ई-मेल के माध्यम से उनके प्रोडक्ट्स के बारे में जानकारी ले सकते हैं।

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पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार को अपनी बनाई मशीन की जानकारी देते गोपाल।

यह खूबियां भी हैं मशीन में

इस मशीन की सहायता से किसान छोटे-छोटे बीजों की जरूरत अनुसार बुवाई कर सकते हैं, क्योंकि सीड ड्रिल में साधारण मैकेनिकल सिस्टम के तहत एक टेपर बर्मा लगा हुआ है, जिसे ज्यों-ज्यों नीचे उतारते हैं, अनाज की मात्रा में वृद्धि होती रहती है। इसी प्रकार बर्मा ऊपर उठाने पर अनाज की मात्रा में कमी भी होती है। जैसे एक बीघा भूमि में 1 किलो बाजरे की बुवाई करने वाले किसान 500, 600, 700, 800 और 900 ग्राम 3 नम्बर से 4 नम्बर तक किलो की मात्रा निश्चित कर सकते हैं। इस नवीन तकनीक से मिश्रित (भेलिया) मसलन बाजरा, मोठ, तिल आदि की बुवाई एक साथ सरल रूप से हो सकती है, जबकि दूसरी मशीनों में ऐसा नहीं होता।

Automatic seed dril cum fertilizer machine
‘ऑटोमैटिक सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर’ मशीन।

इस मशीन से कम मात्रा के बीजों की बुवाई भी संभव है। मात्र 100 ग्राम बीज डालने पर भी मशीन पूरी तरह से काम करती है। जबकि दूसरी मशीनों में कम से कम 10-20 किलो बीज डालने होते हैं। इतना ही नहीं, बुवाई के बाद भी 2-4 किलो बीज रह जाता है, जिसे निकालने में किसानों को अधिक मेहनत लगती है। इससे अपनी जरूरत अनुसार बुवाई कर सकते हैं। जबकि दूसरी मशीनों में फिक्स हॉल होते हैं, जैसे 3 नम्बर पर चलाने से एक बीघा में एक किलो बीज ही निकलता है। किसान चाहकर भी उसे किलो से सवा या डेढ़ किलो नहीं कर सकते। इस मशीन में खेत के बॉर्डर पर (माट) बीज ऑटोमैटिक न गिरने का सिस्टम है, जिसके चलते किसानों के कीमती बीज व्यर्थ नहीं जाते, दूसरी मशीनों में संभवत: ऐसी कोई सुविधा नहीं है। इस मशीन की स्टॉक क्षमता 50 किलो बीज व 50 किलो तक खाद की है।

 

अगर आपको गोपाल दवे की यह कहानी अच्छी लगी और आप उनसे संपर्क करना चाहते हैं तो उनसे 09460249145, 09660811148 नंबर पर बात कर सकते हैं। आप उन्हें ई-मेल भी कर सकते हैं।

 

संपादन – भगवती लाल तेली


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Written by मोईनुद्दीन चिश्ती

देशभर के 250 से ज्यादा प्रकाशनों में 6500 से ज्यादा लेख लिख चुके चिश्ती 22 सालों से पत्रकारिता में हैं। 2012 से वे कृषि, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर कलम चला रहे हैं। अब तक उनकी 10 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पर्यावरण संरक्षण पर लिखी उनकी एक पुस्तक का लोकार्पण संसद भवन में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के हाथों हो चुका है।

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