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74 वर्षीय पूर्व सैनिक ने उगाए पहाड़ों पर सेब, रोका किसानों का पलायन!

इंद्र सिंह ने 20 हज़ार रुपए कर्ज लेकर सेब उगाना शुरू किया था। आज वे हर साल 8 से 10 लाख रुपए कमा रहे हैं।

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इंद्र सिंह बिष्ट।

क और हमारे पहाड़ के गाँव बदस्तूर पलायन से खाली होते जा रहे हैं, वहीं हमारे बीच कई ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो गांवों में रहकर ही किसी मिसाल से कम नहीं है। रोंग्पा घाटी भ्रमण के दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसी ही शख्सियत एप्पल मैन इंद्र सिंह बिष्ट से हुई। विगत 30 बरसों से वे पलायन के खिलाफ चट्टान की तरह अडिग हैं। जिस उम्र में अधिकतर लोग दवाइयों के सहारे जीवनयापन करते हैं उस उम्र में ये विषम परिस्थितियों में अपने एप्पल गार्डन की देखभाल करते हुए नज़र आते हैं।

उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली की रोंग्पा-नीति घाटी में बसा एक बेहद खूबसूरत गाँव है झेलम। इंद्र सिंह यहीं के रहने वाले हैं। 74 वर्षीय इंद्र सिंह ने अपनी मेहनत, दृढ इच्छा शक्ति, धैर्य, जज्बे से सीमांत की बंजर और बेकार पड़ी भूमि को ऐसा सींचा की बंजर भूमि भी सोना उगने लग गई।

इंद्र सिंह सेना में रहे हैं और 80 के दशक अपनी नौकरी छोड़कर गाँव आ गए थे। गाँव आने पर उन्होंने यहीं रहकर रोजगार के साधन तलाशने शुरू किए। वे एक बार 1983 में हिमाचल गए, जहाँ उनको वहाँ के सेब के बागानों ने बहुत प्रभावित किया और उसी दिन उन्होंने झेलम में भी सेब की खेती करने का मन बना लिया।

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अपने बगीचे में एप्पल के पेड़ के साथ इंद्र सिंह बिष्ट।

हिमाचल से वापस आने के बाद उन्होंने 1988 में क़र्ज़ लेकर 20 हज़ार रुपयों का बंदोबस्त किया। इन रुपयों से उन्होंने गाँव में अपनी बेकार और बंजर पड़ी भूमि पर 50 नाली में 100 सेब के पेड़ लगाए।

इंद्र सिंह ने कभी हार नहीं मानी और पहाड़ों पर रहकर 10 साल तक सेब के पेड़ों की रक्षा की। इतना लम्बा इंतज़ार भी उनके हौसले को डिगा नहीं पाया। जिसकी परिणति ये हुई की आज लोग उन्हें एप्पल मैन के नाम से जानते हैं।

कहानी को थोड़ी पीछे ले जाते हैं, इंद्र सिंह साल में छह महीने के लिए गाँव आया करते थे लेकिन 80 के दशक में जब वे गाँव आए और सेब उगाने शुरू किए तो गाँव वाले हैरान थे। गाँव वालों का सोचना था कि जब सारे लोग गाँव छोड़कर जा रहे हैं तब ये यहां सेब उगा रहे हैं और तो और छह महीने बाद उन सेब के पेड़ों की रक्षा कौन करेगा।

इंद्र सिंह कहते हैं, “जब मैंने सेब उगाना शुरू किया तो लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया। मुझसे कहा गया कि यहाँ पर सेब के पेड़ कैसे उग सकते हैं? लोगों ने इसे बेवकूफी भरा कदम बताया। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और 1988 से लेकर 1998 तक इन पेड़ों की हिफाजत खुद से भी ज्यादा की।”

इंद्र​ सिंह छह महीने बाद भी वापस नौकरी पर नहीं गए और वहीं बस गए। उन्होंने बिना कोई केमिकल उपयोग किए सेब उगाकर गांवों के उस भ्रम को तोड़ दिया जो कहता था कि बंजर पहाड़ पर सेब कैसे उगेंगे।

उनके सेब की खेती शुरू करने से पहले लोगों को सेब के पेड़ों की रक्षा का डर था क्योंकि प्राकृतिक आपदा आदि के चलते उन पहाड़ों पर सेब के पेड़ों की रक्षा बड़ा काम था। साथ ही लोग संशय में भी थे, उनका मानना था कि यह भूमि बंजर है इस पर सेब की खेती नहीं हो सकती है। लेकिन इंद्र सिंह इस बात की परवाह किये बिना सेब उगाने के लिए 10 साल तक डटे रहे। पेड़ों की रक्षा की, उनको सींचा और आज परिणाम सबके सामने है।

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पहाड़ी पर एप्पल पेड़ के पास से मिट्टी हटाते इंद्र सिंह बिष्ट।

10 साल बाद उन्हें पहली ख़ुशी तब मिली जब उनके लगाए गए सेब के पेड़ों ने फल देना शुरू किया। ऐसा लगा जैसे उनका देखा सपना सच हो गया। बस उसके बाद इंद्र सिंह ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

इंद्र सिंह के पहाड़ों पर सेब उगाने का परिणाम यह निकला कि लोगों ने उनको होते मुनाफे को देख अपनी बेकार पड़ी ज़मीन पर भी सेब की खेती शुरू कर दी। जो लोग कभी उनका मजाक बनाया करते थे वे लोग आज उन्हीं का अनुसरण कर अपने-अपने गांवों में सेब की खेती कर रहे हैं। जो युवा गाँव छोड़कर नौकरी की तलाश में समतल में जाते थे वे भी आज अपनी पहाड़ियों पर सेब उगा रहे हैं। आज घाटी में इंद्र सिंह पहाड़ों में रहकर भी स्वरोजगार करने का एक उदाहरण बनकर उभरे हैं। आसपास के कई गांवों के लोग आज उनसे सीखकर पहाड़ों पर सेब की खेती कर रहे हैं।

आज 28 साल बाद उनके पास सेब का एक पूरा बगीचा है। हर साल उनके पास सेब की बहुत मांग आती है। आज स्थिति यह है कि सीजन से पहले ही उनके पास सेब की पूरी डिमाण्ड आ जाती है। कभी-कभी लोगों की डिमांड भी पूरी नहीं हो पाती है। इंद्र सिंह के झेलम के सेब की मिठास व गुणवत्ता हिमाचल और जम्मू-कश्मीर से भी बढ़िया है।

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इंद्र सिंह बिष्ट की बंजर भूमि पर लगा एप्पल का पेड़।

उनके बगीचे में रॉयल डेलिसिस, गोल्डन, राइमर, स्पर और हेरिसन जैसी प्रजातियों के सेब हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने बगीचे में उच्च गुणवत्ता की नाशपाती और बादाम के पेड़ भी उगाए हैं, जो उन्हें अच्छी खासी आमदनी देते हैं।

उन्होंने इन सेबों को सबसे पहले लोकल मार्केट में बेचा और फिर धीरे-धीरे देहरादून, सहारनपुर, दिल्ली की मंडियों तक पहुँचाने लगे। आज वह हर साल अकेले ही करीब 100 क्विंटल सेबों का उत्पादन करते हैं। उनके हर साल की कमाई करीब 8 से 10 लाख रुपए है।

इंद्र सिंह ने गाँव से पलायन करने के बजाय वहीं पर स्वरोजगार कर इस बात को साबित किया कि पहाड़ में रहकर भी बहुत कुछ किया जा सकता है। उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने पलायन को आईना दिखाया है। वीरान पहाड़ों में जहाँ शीतकाल में आपको कोई भी नहीं दिखाई देता, वहीं इंद्र सिंह साल के 12 महीने अपने एप्पल गार्डन की देखभाल करते नजर आ जाएंगे।

एप्पल मैन के हौसले और जज्बे को सलाम, आज वे उन लोगों के लिए नज़ीर हैं जिन्हें पहाड़ केवल ‘पहाड़’ नज़र आते हैं।

 

संपादन – भगवती लाल तेली

 

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Written by Sanjay Chauhan

संजय चौहान, उत्तराखंड राज्य के सीमांत जनपद चमोली के पीपलकोटी के निवासी हैं। ये विगत 16 बरसों से पत्रकारिता के क्षेत्र में है। पत्रकारिता के लिए इन्हें 2016 का उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार (सोशल मीडिया) सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। उत्तराखंड में जनसरोकारों की पत्रकारिता के ये मजबूत स्तम्भ हैं। पत्रकारिता, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल करने वाले संजय चौहान नें लेखनी के जरिए कई गुमनाम प्रतिभाओं को पहचान दिलाई है। ग्राउंड जीरो से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और जनसरोकारों पर इनके द्वारा लिखे जाने वाले आर्टिकल का हर किसी को इंतजार रहता है। पहाड़ में रहकर इन्होंने पत्रकारिता को नयी पहचान दिलाई है। ये वर्तमान में फ़्री लांस जर्नलिस्ट्स के रूप में कार्य करते हैं।

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