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आज़ादी से अब तक के हर चुनाव के रोचक किस्‍सों की बानगी दिखाता, देश का पहला ‘इलेक्‍शन म्‍युजि़यम’

यह इलेक्‍शन म्‍युजि़यम राजधानी दिल्‍ली के कश्‍मीरी गेट इलाके में 1890 में बनी उस इमारत में खोला गया है जिसमें 1940 तक सेंट स्‍टीफंस कॉलेज चलता रहा था।

संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रयोग होने जा रहा था। यह अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 का दौर था। इससे पहले चुनाव आयोग एक अजब परेशानी से जूझ रहा था। मतदाता सूची में दर्ज सैंकड़ों-हजारों नहीं बल्कि लाखों महिला वोटरों की पहचान ही नहीं हो पा रही थी। सूची में मतदाताओं के कॉलम में कुछ इस तरह का ब्योरा दर्ज था – ”छज्जू की मां, नफे सिंह की पत्नी, बलदेव की पत्नी, चंदरमोहन नेगी की सुपुत्री” … वगैरह, वगैरह।

 

यह आज़ाद हिंदुस्तान की उन महिला वोटरों की कहानी थी जो वोटर सूची बनाने उनके घर पहुंचे चुनाव कर्मियों को अपना नाम नहीं बताना चाहती थी। किसी अजनबी के सामने अपना नाम उद्घाटित न करने के अपने ऊसूल पर कायम रही स्‍वतंत्र भारत की पहली पीढ़ी की महिला वोटरों की इस अजब दास्तान से जूझते चुनाव आयोग को आखिरकार निर्देश जारी करना पड़ा कि अपनी सही पहचान बताने वाली महिलाएं ही मतदाता रह सकती हैं। इसके बाद एक बार फिर से उन महिलाओं का नाम वोटर सूची में जोड़ने की कवायद शुरू हुई, जो रजिस्टर्ड वोटर होते हुए भी मतदान करने की हकदार नहीं थी। ऐसी ज्यादातर महिलाएं बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और विंध्य प्रदेश से थीं।

 

मतदाता सूची में संशोधन किए गए और 8 करोड़ महिला वोटरों में से करीब 80 लाख महिलाएं अपनी पहचान ज़ाहिर न करने के चक्कर में देश में लोकतंत्र के उस पहले पर्व का हिस्सा बनने से चूक गई थीं।

इलेक्‍शन एजुकेशन सेंटर-कम-म्‍युज़‍ियम

 

 

देश में अपनी तरह के इकलौते इलेक्‍शन एजुकेशन सेंटर-कम-म्‍युज़‍ियम (चुनाव शिक्षा केंद्र-सह-संग्रहालय) में ऐसे कितने ही किस्‍से करीने से संवार कर रखे गए हैं। यह इलेक्‍शन म्‍युजि़यम राजधानी दिल्‍ली के कश्‍मीरी गेट इलाके में 1890 में बनी उस इमारत में खोला गया है जिसमें 1940 तक सेंट स्‍टीफंस कॉलेज चलता रहा था। 1915 में कॉलेज में गाँधीजी भी आए थे और इमारत को उनके जीवन से जुड़े महत्‍वपूर्ण स्‍थलों में गिना जाता है।

आज इसी इमारत में दिल्‍ली चुनाव आयोग का दफ्तर है।

इंडो-इस्‍लामिक शैली में 1890 में बनी इसी इमारत में कई वर्षों तक रहा था सेंट स्‍टीफंस कॉलेज

 

आज़ादी के आंदोलन में गाँधीजी की भूमिका को प्रदर्शित करने वाली एक गांधी गैलरी इस इलेक्‍शन म्‍युजि़यम का हिस्‍सा है। म्‍युज़‍ियम में एक आर्ट गैलरी भी है जिसमें स्‍कूल-कॉलेज के छात्र इलेक्‍शन थीम पर पेंटिंग्‍स, कार्टून, कैरीकैचर के जरिए अपने मन की बात कह सकते हैं।

इलेक्‍शन म्‍युजि़यम की इस आर्ट गैलरी में स्‍कूल-कॉलेज के छात्र दर्ज कर सकते हैं अपने मन की बात – कला के माध्‍यम से

 

म्‍युज़‍ियम की निर्वाचन दीर्घा (इलेक्‍शन गैलरी) में ठिठकना बनता है। एक नहीं कई-कई जगह। लाल किले की बैकड्रॉप वाला वो ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फोटोग्राफ आपको ज़रूर उलझाएगा जिसमें आम चुनाव के नतीजे देखने के लिए भीड़ जमा है।

यह तस्‍वीर आपको उस दौर में ले जाएगी जब एक-एक वोट हाथों से गिना जाता था और रफ्ता-रफ्ता नतीजे सामने आया करते थे।

मतगणना का ताज़ा हाल कुछ यों बताया जाता था

एक-एक बैलट पेपर को खोलना, गिनना कोई मखौल नहीं था, बल्कि यह प्रक्रिया घंटों और दिनों तक जारी रहती थी। वैसे कभी सोचा है आपने कि इस धीमी रफ्तार का धीमापन कितना हो सकता था? इलेक्‍शन म्‍युजि़यम की निर्वाचन दीर्घा में ही आपको यह जानकारी भी मिल जाएगी।

यह भी पहले आम चुनावों का ही किस्‍सा है जब उत्‍तर प्रदेश में कुल जमा दो सदस्‍यों वाली संसदीय सीट के लिए मतगणना में पूरे बीस दिन लग गए थे!

मतगणना 1971 का आम चुनाव

और भी बहुत कुछ है इस निर्वाचन दीर्घा यानी इलेक्‍शन गैलरी में। मसलन, बैंगनी रंग की उस स्‍याही की कहानी जो हर वोटर के बाएं हाथ की तर्जनी पर वोट डालने के बाद लगायी जाती है। वोटिंग में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए 1951 में सीएसआईआर के वैज्ञानिकों ने ईजाद की थी यह नायाब स्‍याही जिसे बनाने का लाइसेंस 1962 से कर्नाटक स्थित मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड के पास है।

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और हां, सिर्फ भारत के चुनावों तक ही सीमित नहीं है इस अमिट स्‍याही (इनडेलिबल इंक) का प्रयोग बल्कि कनाडा, घाना, नाइजीरिया, मंगोलिया, तुर्की, नेपाल, मालदीव समेत दुनिया के 25 और देशों को भी हम इसका निर्यात करते हैं।

 

दिल्‍ली अभिलेखागार, भारत के निर्वाचन आयोग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा फोटो डिवीज़न एवं फिल्‍म डिवीज़न अभिलेखागारों से जुटायी दुर्लभ तस्‍वीरों, कतरनों, पत्रों वगैरह से तैयार हुआ है भारत का अनूठा इलेक्‍शन म्‍युजि़यम। पहले आम चुनाव के बैलेट बॉक्‍स से लेकर अस्‍सी के दशक में इस्‍तेमाल हुई कनस्‍तरनुमा मतपेटियों, मतपत्रों, चुनाव चिह्नों को देखकर आप निश्चित ही हैरत में पड़ जाएंगे।

हैरानगी का सबब वो बाबा आदम के ज़माने की मतपेटियां हैं जिन्‍हें देखकर यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि चुनाव जैसी जटिल और नाजुक प्रक्रिया को अंजाम देने वाले तंत्र में इनका भी रोल हुआ करता था।

 

वैसे इलेक्‍शन म्‍युजि़यम में ही इन बैलेट बॉक्‍सों का पूरा अतीत दर्ज है, कि कैसे आज़ादी के बाद पहले चुनाव के लिए गोदरेज समेत कुल पांच कंपनियों के स्‍टील के बैलेट बॉक्‍सों को चुना गया था और कुल 25,84,945 मतपेटियों का इस्‍तेमाल उस ऐतिहासिक चुनावी प्रक्रिया में किया गया था। और तो और, वो भीमकाय मतपेटी भी यहां प्रदर्शित है जिसे अब तक के सबसे बड़े बैलेट बॉक्‍स का दर्जा हासिल है। यह 1996 के चुनाव में बाहरी दिल्‍ली चुनाव क्षेत्र के लिए इस्‍तेमाल की गई थी जहां से दस-बीस नहीं बल्कि 87 उम्‍मीदवार चुनाव मैदान में थे!

और बात जब उम्‍मीदवारों की चली है तो हम आपको यह भी बताते चलें कि देश में एक चुनाव ऐसा भी था जिसने चुनाव आयोग के सामने बहुत बड़ी आफत खड़ी कर दी थी। यह 1996 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की कहानी है।

चेन्‍नई में मोदाकुरिचि विधानसभा क्षेत्र से उस दफे चुनावी दौड़ में उतरे प्रत्‍याशियों की गिनती हज़ार का आंकड़ा पार कर गई थी और तब आयोग को मतपत्र छपवाने के लिए बाकायदा किताबें छपवनी पड़ी थी।

 

आखिर ऐसा क्‍या हुआ कि एक सीट से एक साथ इतने ढेर उम्‍मीदवार चुनाव लड़ने चले आए थे? दरअसल, किसानों की समस्‍याओं की तरफ से आंखे मूंदे पड़े स्‍थानीय प्रशासन के रवैये पर विरोध दर्ज कराने के लिए 1033 किसानों ने पर्चे भर दिए थे। और भी दिलचस्‍प वाकया तो तब सामने आया जब नतीजे घोषित हुए और पता चला कि 88 उम्‍मीदवारों के पक्ष में एक भी वोट नहीं पड़ा था। यानी उन्‍होंने खुद भी खुद को वोट नहीं दिया था!

ऐसे कितने ही रोचक किस्‍सों की बानगी दिखाता है इलेक्‍शन म्‍युजि़यम। स्‍टील की मतपेटियों से वोटिंग मशीन (ईवीएम) तक के दिलचस्‍प सफर पर भी ले जाता है।

देश में 68 साल पहले संपन्‍न चुनावों की दुर्लभ फुटेज दिखाने वाली फिल्‍म ”द ग्रेट एक्‍सपेरीमेंट” भी यहां दिखायी जाती है।

और तो सब ठीक है, बस तकलीफ का सबब यही है कि इतनी विविधता वाले देश में, अभी जुम्‍मा-जुम्‍मा दो साल पहले खुले इस आधुनिक संग्रहालय में व्‍हीलचेयर यूज़र का कोई ख्‍याल नहीं रखा गया है और न ही मूक-बधिरों, नेत्रहीनों या अन्‍य शारीरिक सीमाओं से जूझने वाले आगंतुकों को यहां लाने की कोई नीयत दिखायी देती है।

प्रवेश के लिए दिल्‍ली चुनाव आयोग की वेबसाइट पर बुकिंग करवाएं।

वेबसाइट- https://ceodelhi.gov.in/electionmuseum/
ईमेल- ceomuseum.delhi@gov.in
फेसबुक- https://www.facebook.com/ceodelhioffice/
फोन- 011-23946414/ 011-23946416
समय- सवेरे 11 बजे से शाम 4 तक (सोमवार से शुक्रवार/ केवल कार्यदिवसरों पर)
प्रवेश मुफ्त


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Written by अलका कौशिक

अलका कौशिक की यात्राओं का फलक तिब्बत से बस्तर तक, भूमध्यसागर से अटलांटिक तट पर हिलोरें लेतीं लहरों से लेकर जाने कहां-कहां तक फैला है। अपने सफर के इस बिखराव को घुमक्कड़ साहित्य में बांधना अब उनका प्रिय शगल बन चुका है। दिल्ली में जन्मी, पली-पढ़ी यह पत्रकार, ब्लॉगर, अनुवादक अपनी यात्राओं का स्वाद हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने की जिद पाले हैं। फिलहाल दिल्ली-एनसीआर में निवास।

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