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कभी फीस के लिए नहीं होते थे पैसे, आज 4 हज़ार बच्चों को निशुल्क पढ़ा चुके हैं यह शख्स!

सेंटर चलाने के लिए संजय किसी से भी आर्थिक मदद नहीं लेते हैं और न ही उन्होंने कोई एनजीओ बना रखा है। सेंटर का सारा खर्च संजय अपनी सैलरी से खुद उठाते हैं।

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संजय लुणावत।

“मैं शुरुआत में बच्चों से कोचिंग के बाद कुछ पैसे विशेष क्लास के लेता था। एक दिन एक बच्चा सिक्के इकट्ठा करके लाया। मैं हँसा और मुझे उस पर गुस्सा भी आया। मैंने उससे पूछा ऐसा क्यों, तो बोला कि माँ दूसरों के घर झाड़ू-पोछा करती है। उनकी बचत में से पैसे लाया हूँ । वह दिन था और आज का दिन है, मैंने उसके बाद कभी किसी बच्चे से पढ़ाने के पैसे नहीं लिए।”

यह शब्द है एक ऐसे अध्यापक के जो पिछले 4 साल से उन गरीब, जरूरतमंद बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहे हैं, जिनमें काबिलियत तो है लेकिन घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं कि किसी बड़े कोचिंग संस्थान पर मोटी फीस देकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर सके।

संजय लुणावत नाम के यह शख्स आज मेवाड़-वागड़ (दक्षिणी राजस्थान) के लिए सुपर 30 के किसी आनंद कुमार से कम नहीं हैं। इनके पास अब तक राजस्थान के 13 जिलों के बच्चे पढ़ चुके हैं। कभी 20 बच्चों से शुरू होने वाले इनके ‘माय मिशन’ कोचिंग सेंटर से अब तक 4 हज़ार बच्चे पढ़कर निकल चुके हैं।

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बच्चों को पढ़ाते संजय।

उस बच्चे के फीस में सिक्के देने वाले किस्से ने भले ही संजय को अंदर तक झकझोर दिया हो और उन्होंने फ्री में कोचिंग देने का फैसला किया हो, लेकिन संजय को मानवता की सेवा के संस्कार बचपन से ही मिल गए थे।

संजय बताते हैं, “मेरे पिता ने नेत्रदान किया था। उनके आँखों का कॉर्निया दो व्यक्तियों को लगाया गया। आज पिताजी नहीं है, लेकिन वे दो लोग उनकी बदौलत दुनिया को देख पा रहे हैं। मेरे पिता को सरकार ने मरणोपरांत सम्मानित किया। उन्हीं से मैंने लोगों की सेवा के भाव सीखे थे।”

मूलतः बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ के रहने वाले संजय सेकंड ग्रेड मैथेमेटिक्स टीचर बनने के बाद 2013 में प्रधानाध्यापक परीक्षा की कोचिंग के लिए उदयपुर आए थे। वे यहाँ ऐसे कोचिंग सेंटर की तलाश करते हैं जहाँ अच्छी पढ़ाई भी होती हो और फीस भी कम हो। लेकिन संजय को उदयपुर में ऐसा कोचिंग सेंटर नहीं मिलता है। ऐसे में वे खुद पढ़ने के बजाय किसी कोचिंग सेंटर पर पढ़ाने लग जाते हैं।

कोचिंग सेंटर पर पढ़ाने के दौरान वे देखते हैं कि कोचिंग सेंटर पर कोर्स को पूरा करवाने की जल्दी रहती है। किसी भी सब्जेक्ट को ज्यादा समय देकर अच्छे से नहीं पढ़ाया जाता है। ऐसे में बच्चों को अच्छी कोचिंग नहीं मिल पाती है, साथ ही कोचिंग सेंटर की फीस इतनी ज्यादा होती है कि एक आम बच्चा वहां कोचिंग ही नहीं कर सकता है।

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सेंटर पर बच्चों के साथ संजय।

इधर, कोचिंग सेंटर पर अच्छी कोचिंग नहीं होने के चलते कुछ बच्चे संजय के पास अलग से पढ़ने आते थे। जिसके बदले संजय उनसे कुछ रुपए अलग से लेते थे। संजय इस बात को स्वीकार करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते हैं कि बाकी लोगों की तरह उनमें भी शुरू-शुरू में पैसे कमाने की भूख थी। लेकिन एक दिन ऐसे ही कोचिंग के बाद बच्चे उनको फीस दे रहे होते हैं और एक बच्चा फीस के लिए सिक्के इकट्ठे कर लाता है और पूरी कहानी पलटकर रख देता है।

बच्चे के फीस में सिक्के लाने की बात करते हुए संजय अपने बचपन के दिन बताने लगते हैं, “मेरे पिताजी अनाज का व्यापार ज़रूर करते थे लेकिन कई बार ऐसी नौबत भी होती थी कि हमारे पास फीस भरने के पैसे नहीं होते थे। मेरा एडमिशन स्कूल में इसलिए जल्दी करवा दिया गया ताकि मेरे भाई के कपड़े और किताबें मेरे काम आ सके।”

अपने बचपन के दिन बताते हुए संजय ठहर से जाते हैं। कुछ पल के बाद वे नॉर्मल होते हैं और बात को आगे बढ़ाते हैं।

वर्ष 2014-15 में संजय का चयन प्रधानाध्यापक के लिए हो जाता है और उनकी पहली पोस्टिंग उदयपुर जिले के महाराज की खेड़ी में होती है। चयन के कुछ ही समय बाद वे उदयपुर के सवीना में किराये का मकान लेकर 20 बच्चों के साथ ‘माय मिशन’ नाम से निशुल्क कोचिंग सेंटर शुरू कर देते हैं। उनके सेंटर पर धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगती हैं और सेंटर चल पड़ता है।

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सेंटर पर बच्चों को पढ़ाते संजय।

2016 में संजय का ट्रांसफर शहर के पास ही कानपुर गाँव में होता है। संजय वहां पर भी निशुल्क कोचिंग सेंटर शुरू करते हैं और बच्चों को पढ़ाने लगते हैं। यहाँ उनके पास करीब 150 से ज्यादा विद्यार्थी कोचिंग के लिए आते हैं, इनमें गृहणियां तक शामिल होती हैं। सेंटर ग्राम पंचायत के एक कमरे में लगता है।

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कानपुर में कोचिंग के कुछ महीनों बाद सेंटर पर एक ऐसा वाकया होता है जो दिल जीत लेता है। गुरु पूर्णिमा के दिन सेंटर के बच्चे गुरु दक्षिणा में संजय को कुछ गिफ्ट देने की बात करते हैं। इस पर संजय खुद के लिए नहीं बल्कि समाज को कुछ देने के लिए कहते हैं। काफी सोच-विचार के बाद बात नेत्रदान पर आकर खत्म होती है। बच्चे गुरु दक्षिणा में नेत्रदान का निर्णय लेते हैं।

संजय बताते हैं, “सेंटर के बच्चे नेत्रदान करना चाह रहे थे। उन्होंने मेरे पिता के नेत्रदान करने की बात सुन रखी थी। मैंने बच्चों से उनके माँ-बाप से अनुमति लेने के लिए कहा, बच्चे अनुमति ले आए। अगले दिन सेंटर के 80 बच्चों ने आई बैंक वालों के समक्ष नेत्रदान का संकल्प लिया। यह मेरे और सेंटर के लिए बड़ी उपलब्धि थी। यह फीस से कहीं ज्यादा था मेरे लिए।”
संजय की पहल ‘माय मिशन’ से अब 10 लोग और भी जुड़ चुके हैं। पहले वे अकेले ही पढ़ाते थे लेकिन अब नए लोग जुड़ने से बच्चों को ज्यादा फायदा हुआ है। सेंटर पर प्रशासनिक सेवा, पटवारी, राजस्थान पुलिस, शिक्षक भर्ती, क्लर्क आदि की तैयारी करवाई जाती है। ‘माय मिशन’ पर सुबह 5 बजे से लेकर रात 8 बजे तक कक्षाएं चलती हैं। वर्तमान में उनके पास 150 बच्चे पढ़ने आ रहे हैं। इनके पास पढ़ने आने वाले अधिकतर बच्चे गांवों और गरीब परिवारों से हैं। सेंटर से अब तक करीब 400 बच्चे विभिन्न सेवाओं के लिए चयनित हो चुके हैं।
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माय मिशन सेंटर पर पढ़ते बच्चे।

संजय वर्तमान में उदयपुर के मनवा खेड़ा स्थित उमावि में प्रिंसिपल है। सेंटर का प्रबंधन उनके भाई शुभम देखते हैं। शुभम भी IAS की तैयारी कर रहे हैं और बच्चों को राजस्थान का इतिहास, संस्कृति, कला और रीजनिंग पढ़ाते हैं। शुभम के अलावा लवलीत सोनी, मनीषा शर्मा, लव वर्मा, वैभव पितलिया, आफ़रीन बानो भी निशुल्क सेवाएं दे रहे हैं।

‘माय मिशन’ पर सुपर 30 की तर्ज़ पर एक बैच में 30 बच्चों को ही लिया जाता है। हालाँकि कभी-कभार यह संख्या अधिक भी हो जाती है, क्योंकि बच्चे पढ़ने की ज़िद करते हैं और संजय उनको मना नहीं कर पाते हैं। लेकिन उनकी कोशिश रहती है कि बड़ी परीक्षा की तैयारी के लिए सीमित बच्चे ही हो। संजय का बच्चों के चयन करने का और कक्षा में टेस्ट लेने का तरीका भी अलग है।

संजय कहते हैं, “हम बच्चों में सिर्फ योग्यता नहीं, उनका जज़्बा देखते हैं। बच्चा अगर योग्य होगा तो वह कैसे भी, कहीं भी पढ़ लेगा। हम कक्षा में टेस्ट लेते वक्त एक खेल खेलते हैं। हम बच्चे से सवाल पूछते हैं, बच्चा सही जवाब दे देता है तो हम उसे एक-एक रुपए के तीन सिक्के देते हैं और अगर गलत जवाब देता है तो हम उससे एक रुपया लेते हैं। हमारा मक़सद उनसे पैसा कमाना नहीं, बल्कि उनको प्रतियोगी परीक्षा के लिए तैयार करना है।”

‘माय मिशन’ पर बच्चों को एक-एक रुपए के तीन सिक्के देने और एक रुपया लेने की कहानी प्रतियोगी परीक्षा में नम्बर्स से जुड़ी है। बच्चे को सही जवाब पर रुपए देने का अर्थ तीन नंबर से है और गलत जवाब पर एक रुपया लेने का अर्थ माइनस मार्किंग से है। संजय क्लास में जो भी पढ़ाते हैं उसकी ऑडियो रिकॉर्डिंग की जाती है। रिकॉर्डिंग को व्हाट्सअप के जरिये ग्रुप्स में भेजा जाता है। ऑडियो रिकॉर्डिंग करने की वजह उन गृहणियों और बालिकाओं की मदद करना है जो घर के काम के चलते कोचिंग सेंटर नहीं आ पाती हैं लेकिन सरकारी नौकरी के लिए तैयारी करना चाहती है। यहाँ पढ़ने आने वाले बच्चे भी इनकी पहल से खुश नज़र आते हैं।

डूंगरपुर से आई सुगमा परमार बताती हैं, “मैं उदयपुर में बीएड करने आई थी। व्हाट्सअप पर संजय सर और ‘माय मिशन’ के बारे में सुना। मेरी बीएड हो गई है। अब मैं संजय सर के पास पटवारी परीक्षा की तैयारी कर रही हूँ। मेरे पापा गाँव में खेती करते हैं, ज्यादा फीस नहीं दे सकते हैं। माय मिशन जैसे कोचिंग सेंटर से हम जैसे ज़रूरतमंद बच्चों को मदद मिलती है।”

संजय पढ़ाई के नोट्स बनाकर भी विभिन्न ग्रुप्स में भेजते हैं, जिनकी पहुंच 50 हज़ार छात्रों तक हैं। संजय अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी बच्चों का मार्ग दर्शन करते हैं। सेंटर चलाने के लिए संजय किसी से भी आर्थिक मदद नहीं लेते और न ही उन्होंने कोई एनजीओ बना रखा है। सेंटर का सारा खर्च संजय अपनी सैलरी से खुद उठाते हैं।

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संजय लुणावत।

“प्रिंसिपल के रूप में पोस्टेड हूँ। अच्छी सैलरी मिलती है। गरीब और जरूरतमंद बच्चों की मदद करके सुकून मिलता है, इसलिए करता हूँ,” संजय ने कहा।

संजय तीन बार RAS यानी राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर चुके हैं लेकिन अच्छी पोस्ट नहीं मिलने के चलते उन्होंने ज्वाइन नहीं किया था। संजय की कोशिश है कि ‘माय मिशन’ एक ऐसा हब बने जहाँ राजस्थान भर के जरूरतमंद बच्चे पढ़ने आए।

जो गरीब है उन्हें यह नहीं लगे कि उनके लिए ऐसा कोई कोचिंग सेंटर नहीं है जहाँ फ्री में सरकारी नौकरी की तैयारी करवाई जाती हो। वे चाहते हैं कि ऐसे बच्चों के लिए ‘माय मिशन’ सदा विकल्प के तौर पर मौजूद रहे।

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Written by भरत

उदयपुर, राजस्थान से हूँ। गजल, शायरियां, लप्रेक कहानियां लिखने व पढ़ने का शौक है, जिसे आप मेरे ब्लॉग pagalbetu.blogspot.com / yourquote.in/bharatborana पर पढ़ सकते हैं। पहाड़, झील, शांत सड़कें, चाय अच्छी लगती है। घूमना व बतियाना पसंद है। कभी-कभी यूं ही बेवजह उदास हो जाता हूँ, बाकी जिंदगी अच्छी कट रही है।

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