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लखनऊ: मानसिक रोग की पीड़ा झेल चुके लोगों का सहारा है चाय की ‘केतली’!

नवंबर 2016 में शुरू हुए इस संगठन का उद्देश्य मानसिक रोग की पीड़ा झेल चुके लोगों को अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग देकर, उनके खोये आत्मविश्वास को वापस लाना और फिर उन्हें रोज़गार के अवसर प्रदान करना है।

मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 के मुताबिक, भारत में मानसिक रोग के पीड़ितों को बेहतर इलाज और देख-रेख प्राप्त करने का अधिकार है और साथ ही, इन लोगों को बिना किसी भेदभाव और हिंसा के अपना जीवन पूरे सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी है।

लेकिन इस बिल के बाहर, हमारे समाज की तस्वीर कुछ और ही है। आज भी हमारे यहाँ मानसिक रोग से जूझने वाले लोगों को एक अलग ही दृष्टिकोण से देखा जाता है। सामान्य जनजीवन में उन्हें शामिल करने में बहुत हिचकिचाहट होती है, बाहर वाले तो क्या, अपने परिवार के सदस्य भी उन्हें कोई ज़िम्मेदारी देने में झिझकते हैं। ऐसे में, ये लोग ठीक होकर भी समाज से कटे रह जाते हैं।

इसी मुद्दे को केंद्र में रखकर, अम्बरीन अब्दुल्लाह कहती हैं कि, ”मानसिक रोग के दर्दियों को किसी सामान्य इंसान की तरह नहीं बल्कि एक ऑब्जेक्ट की तरह देखा जाता है। इन लोगों से व्यवहार का हमारा तरीका बहुत ही क्लिनिकल है। हम कभी भी सीधा उनसे नहीं पूछते कि वे कैसे हैं, क्या चाहते हैं? बल्कि हमेशा उनके बारे में उनके परिवार या दोस्तों से जानते हैं, और यहीं पर हम गलत हैं।”

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाली अम्बरीन एक मेंटल हेल्थ सोशल वर्कर हैं। उन्होंने मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज से ‘सोशल वर्क इन मेंटल हेल्थ’ में मास्टर्स की डिग्री ली है। इसके बाद उन्होंने इंडियन लॉ सोसाइटी के लिए अहमदाबाद में दो साल मेंटल असायलम्स के साथ काम किया।

अम्बरीन अब्दुल्लाह

अम्बरीन बताती हैं कि यहाँ काम करते हुए उन्होंने समझा कि क्लिनिकल लेवल पर तो हर तरह से हम मानसिक रोग के पीड़ितों को सुविधाएँ दे रहे हैं। इससे ये लोग साजा भी होने लगते हैं (मतलब कि ठीक होने लगते हैं), लेकिन फिर भी इनके मन में समाज से, समुदायों से जुड़ने में एक हिचक रहती है। इसके अलावा, हमारा समाज इन्हें खुले दिल से नहीं अपना पा रहा है।

शायद यही गैप बहुत बड़ी वजह है कि मानसिक रोगों के बारे में, पीड़ितों के बारे में तरह-तरह के मिथक फैले हुए हैं। न तो इन्हें पता है कि कैसे ये लोग अपने लिए मौके बनाये और न ही हम, एक समुदाय की तरह इनके लिए किसी तरह के मौके बना रहे हैं।

इस गैप को, इस भेदभाव को समझने के बाद, अम्बरीन ने इस पर काम करने की ठानी। वे चाहतीं तो आराम से कहीं भी काउंसलर के तौर पर या फिर किसी मेंटल हेल्थ प्रोजेक्ट पर काम कर सकती थीं। लेकिन अम्बरीन सिर्फ़ मानसिक रोग के दर्दियों को समाज के लिए नहीं, बल्कि समाज को भी इन लोगों के लिए तैयार करना चाहती थीं।

अगर हम इन सभी लोगों को व्यक्तिगत, पारिवारिक और फिर सामुदायिक स्तर पर प्रोत्साहित करें, इनका साथ दें तो ये लोग भी आपकी और हमारी तरह बिना किसी पर बोझ बनें एक बेहतर ज़िंदगी गुजार सकते हैं। हम बिना सोचे-समझे इन्हें मानसिक तौर पर डिसेबल्ड करार दे देते हैं, जबकि यह सिर्फ़ हमारी सोच है।

इसी सोच पर काम करते हुए उन्होंने अपने शहर लखनऊ में अपने पार्टनर और अब पति, फ़हाद अज़ीम के साथ मिलकर एक सामाजिक संगठन ‘केतली फाउंडेशन’ की नींव रखी।

‘केतली’ का स्टॉल

नवंबर 2016 में शुरू हुए इस संगठन का उद्देश्य मानसिक रोग की पीड़ा झेल चुके लोगों को अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग देकर, उनके खोये आत्मविश्वास को वापस लाना और फिर उन्हें रोज़गार के अवसर प्रदान करना है। इसके साथ ही, यह संगठन समाज में मानसिक रोग के पीड़ितों के प्रति जागरूकता फैलाने का काम भी कर रहा है।

“हमने सबसे पहले शहर में जो भी मेंटल हेल्थ क्लिनिक या अस्पताल है, वहाँ से ऐसे लोगों का डाटा लिया जो कि अब साजा (ठीक) हो चुके हैं। फिर ऐसे बहुत से लोगों से जुड़ने के बाद, हमने इनके लिए एक प्रोग्राम डिजाईन किया ताकि हम इन लोगों को आत्मनिर्भर बना सकें और इन्हें खुद के पैरों पर खड़ा कर सकें,” अम्बरीन ने बताया।

केतली फाउंडेशन के अंतर्गत अम्बरीन और उनकी टीम ने हर एक व्यक्ति के लिए एक साल का कोर्स डिजाईन किया हुआ है। जिसमें इन लोगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हर एक कदम पर ट्रेनिंग सेशन होते हैं ताकि इस कोर्स के अंत तक इन लोगों के पास कमाई का एक साधन हो।

‘केतली’ की टीम छह भागों में काम करती है- वोकेशनल ट्रेनिंग, साइको-सोशल सपोर्ट, काउंसलिंग, स्किल डेवलपमेंट, अवेयरनेस प्रोग्राम और एडवोकेसी।

वह आगे बताती हैं कि जो भी लोग उनसे जुड़ते हैं, उन्हें सबसे पहले खुद पर निर्भर होने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, जैसे कि अकेले यात्रा करना, अपना कमरा खुद साफ़ रखना, अपने रोज़मर्रा के काम खुद करना आदि। फिर धीरे-धीरे उनके व्यक्तित्व के विकास पर काम होता है।

वोकेशनल ट्रेनिंग के तहत वे लोगों को ‘चायखाना’ से जोड़ते हैं। ‘चायखाना’, केतली का ही एक इंडोर सेट-अप है जिसमें उन्होंने चाय की एक स्टॉल लगाई हुई है। यहाँ पर इन लोगों एक-एक करके चाय बनाने से लेकर, अकाउंट संभालने और मार्केटिंग तक की ट्रेनिंग दी जाती है। फिर समय-समय पर जानने-पहचानने वाले लोगों, दोस्तों, रिश्तेदारों को चाय-नाश्ते के लिए आमंत्रित किया जाता है।

“इन जानकार लोगों को बुलाने का उद्देश्य है कि हम किसी सामान्य बाज़ार की चाय टपरी का माहौल बना सके। यह एक तरह से मॉक एक्ट है। इससे हमारी टीम के लिए इन लोगों को प्रशिक्षित करना आसान होता है। उन्हें समझाया जाता है कि कैसे ग्राहकों को संभालना है,” अम्बरीन ने आगे कहा।

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इस बेसिक ट्रेनिंग के बाद इन लोगों को केतली की कमर्शियल एंटरप्राइज पर काम करने का मौका दिया जाता है। इस पूरे प्रोग्राम के दौरान, स्वयंसेवक इनकी डेवलपमेंट नोटिस करते हैं और फिर एक रिपोर्ट तैयार की जाती है कि कौन व्यक्ति किस काम में अच्छा है। किसी को चाय बनाना पसंद है, तो किसी को पैसे गिनना तो किसी को ग्राहकों को संभालना।

सबसे पहले ये लोग हर दिन 2 घंटे चाय की स्टॉल पर काम करने से शुरू करते हैं। फिर धीरे-धीरे ये टाइम 4 घंटे होता है, फिर 6 और फिर 8 घंटों के लिए ये लोग यहाँ काम करते हैं। जिन भी मानसिक रोग के दर्दियों को केतली टीम रोज़गार के लिए तैयार करती हैं, उन्हें एक साल के इस प्रोग्राम के दौरान भी कुछ सैलरी दी जाती है।

एक-डेढ़ साल की ट्रेनिंग के बाद, केतली की टीम इन लोगों के एग्जिट प्लान पर भी काम करती है। वे इनसे पूछते हैं कि उन्हें अब आगे क्या करना है?

“जिन भी लोगों को हम ट्रेनिंग देते हैं, उनकी सबसे अच्छी स्किल के हिसाब से हम उनके लिए करियर प्लान तैयार करते हैं। हमसे ट्रेनिंग लेने वाले कई लोग आज हमारे साथ ही जुड़े हुए हैं और अपने जैसे अन्य लोगों की मदद कर रहे हैं।” अम्बरीन ने कहा।

इस कड़ी में अम्बरीन ने द बेटर इंडिया के साथ अभिषेक मिश्रा और गुरप्रीत सिंह की कहानी साझा की। साहित्य से मास्टर्स करने वाले अभिषेक मिश्रा कभी सायकोसिस और ओसीडी के शिकार थे। ट्रीटमेंट के बाद भी वे समाज का सामान्य हिस्सा नहीं बन पाए, लेकिन ‘केतली’ की कोशिशों के चलते आज वे सम्मान से अपना जीवन जी रहे हैं।

एक वक़्त था जब अभिषेक अपनी बीमारी को स्वीकार भी नहीं कर पा रहे थे लेकिन आज वे खुलकर इस पर बात करते हैं। लिखने के शौक़ीन अभिषेक, केतली के सोशल मीडिया पेज के लिए लिखते हैं। साथ ही, मानसिक रोग का दंश झेल रहे लोगों का सहारा भी बन रहे हैं।

ग्राहक से बात करते हुए अभिषेक(दायें) और गुरप्रीत सिंह (बाएं)

अभिषेक से थोड़ी अलग और थोड़ी समान सी कहानी गुरप्रीत की भी है। एक आम परिवार से आने वाले गुरप्रीत को सिजोफ्रेनिया था। जब उन्होंने केतली में ट्रेनिंग शुरू की तो वे गैस जलाने तक से डरते थे। लेकिन आज चाय बनाने से लेकर अकाउंट संभालने तक, सभी काम अकेले कर लेते हैं।

अम्बरीन मानती हैं कि जिन भी लोगों को वो प्रशिक्षित कर रही हैं, उनके बारे में उन्हें विश्वास है कि आज चाय के ठेले पर काम करने वाले ये लोग कल दफ्तरों में भी काम करते हुए मिल सकते हैं। बस ज़रूरत है तो उन्हें वो अनुकूल माहौल देने की। उनका उद्देश्य समाज के वर्किंग कल्चर में बदलाव लाना है ताकि किसी भी संगठन में काम करने वाले लोग एक-दूसरे के दर्द को समझते हुए, एक-दूसरे की मदद करते हुए काम करे और आगे बढ़े।

समाज के अन्य लोगों में जागरूकता लाने के लिए ‘केतली’ की टीम शहर भर में होने वाले छोटे-बड़े सभी इवेंट्स के साथ भागीदारी करती है। स्कूल-कॉलेज, मॉल आदि में जाकर मेंटल हेल्थ से संबंधित अलग-अलग थीम पर बात करती है। जैसे सनदकथा इवेंट में उनकी थीम ‘वर्णमाला’ थी तो अवध क्वीर परेड में ‘सेक्सुअलिटी’ और इन सभी थीम्स पर मेंटल हेल्थ के संबंध में चर्चा की जाती है।

फंड्स के बारे में बात करते हुए वे कहती हैं कि कुछ दोस्तों और परिवार की मदद के अलावा अब उन्हें बाहर से भी फंड्स मिल रहे हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र में हमेशा कुछ न कुछ नया और अच्छा सीखने के लिए वे अलग-अलग फैलोशिप के लिए अप्लाई करती हैं। चेंजलूम फैलोशिप के बाद अब वे The School for Social Entrepreneurs India की फैलोशिप का हिस्सा हैं।

‘केतली’ के ही बैनर तले अब अम्बरीन ने एक दूसरा प्रोजेक्ट, ‘डोर’ शुरू किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत वे इन लोगों को क्रोशिया की बुनाई से हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स बनाने के लिए ट्रेनिंग दिलवा रही हैं। साथ ही, उनके बनाए प्रोडक्ट्स को मार्केट तक पहुँचाने के लिए भी काम कर रही हैं।

अंत में अम्बरीन सिर्फ़ यही कहती हैं कि ये वो लोग हैं जिनसे अगर दस रुपए भी कहीं गिर जाएं तो उन्हें फिर पैसे नहीं दिए जाते। ऐसे लोग आज खुद अपने पैरों पर खड़े होकर कमा रहे हैं, इससे बड़ी बात क्या होगी? यही सबसे बड़ा बदलाव है, जिसके ज़रिए हम समाज का और इनका खुद का नज़रिया मानसिक रोग के प्रति बदल सकते हैं।

इसलिए हमें चाहिए कि हम लोगों की किसी भी ऐसी कमी को नज़रअंदाज करके उनका सम्मान करें, क्योंकि उन्हें पूरा हक़ है इज्ज़त और सम्मान से जीने का। साथ ही, द बेटर इंडिया के पाठकों से वे सिर्फ़ यही अपील करती हैं कि अगर आपके यहाँ कोई इवेंट है तो बेझिझक ‘केतली’ टी-स्टॉल को बुलाए।”

अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और मेहमानों को गिफ्ट देने के लिए ‘डोर’ के बनाए प्रोडक्ट्स खरीदकर, आप भी बदलाव की इस मुहिम में अपना योगदान दे सकते हैं। उनसे संपर्क करने के लिए 08896786783 पर डायल करें!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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