अच्छी ख़बरों का ज़माना – एक नृत्य नाटिका

क नट और नटनी मंच पर नृत्य करते हुए प्रवेश करते हैं. पार्श्वसंगीत में ‘जॉनी मेरा नाम’ फ़िल्म का देव आनंद और हेमा मालिनी पर फ़िल्माया प्रसिद्ध गाना बज रहा है:
“हीरे से जड़े तेरे नैन बड़े
जिस दिन से लड़े नहीं चैन पड़े
सुन कर तेरी नहींsss नहीं
जाँss अपनी निकल जाए न कहीं

 

पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले – झूठा ही सही”

 

नट-नटनी के लटके-झटके अपने उरूज़ पर हैं. आख़िरी पंक्ति आते आते नटनी नट का हाथ इस ज़ोर से झटकती है कि वो मंच के एक कोने में जा गिरता है. संगीत अचानक रुक जाता है. नट की नाटकीय कराहें सुनाई देती हैं जब वह उठने का प्रयत्न कर रहा है. नटनी उसके घुटनों के पीछे एक लात मारती है वह फिर से गिर जाता है.

 

नटनी: आय हाय हाय हाय.. बड़ा आया कहने वाला ‘हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही’
तेरे जैसे प्रकृति के नमूने से प्रेम करूँ??
इतना सस्ता है न प्रेम?
और झूठ क्यों बोलूँ?
बता न, झूठ बोलूँ और अपने लिए नरक का दरवाज़ा खोलूँ?
कड़वा लगे तो लगे, झूठ मैं बोलती नहीं
नीम दवा है तो है, उसमें गुड़ घोलती नहीं
चुप सहती रहूँ – होता नहीं
दिल की चमड़ी तुम जैसों ने मोटी की है – दिल मेरा अब रोता नहीं

 

नट अब तक उठ कर खड़ा हो गया है. एक चाय का कप उठाता है, चाय के ठन्डे और कसैले होने पर मुँह बनाता है. उसे एक गमले में उड़ेल कर खीज कर कहता है:
“यार वैसे ही टेंशन बहुत है
चिल्लाओ मत
ट्रैफ़िक की कड़ाही से निकले
तो ऑफ़िस-पॉलिटिक्स की आग में घिरे
आधे सप्लायर्स ठग
ऊपर से ग्राहक सिरफ़िरे
फिर अख़बार टीवी की वहशी आवाज़ें
न्यूज़ एंकरों की हौलनाक परवाज़ें..
यार, तुस्सी ऐसे तो न थे
– यूँ डराओ मत
हमें मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
तुम चिढ़ाओ मत..”

 

नटनी: हाँ हाँ.. मैं ठहरी कर्कशा,
यूँ ही शोर करती हूँ
इमोशन के तमाशों से शबे-फ़ुर्कत को भरती हूँ
रोज़गार-ए-डोज़-ए-इमोशन काम है मेरा
चिड़चिड़ी-सिरफ़िरी-मैना नाम है मेरा

 

नट:अरी???
अर अर अरीss..
मेरी परीss..
पर पर परी
तू क्या बात करती है?
सावित्री तेरी सीरत
श्रीदेवी तेरी सूरत
तू सबसे मोहिनी है
कामिनी है
सोहनी है
तू ही है मीर की तबियत
तू है फ़ैज़ की सोहबत
निराला की हिमाकत
तू ग़ालिब की फ़िज़ाँ की डोमनी है
तुझीसे मेरी बरकत है
तू रूठे तो क़यामत है
क्यों ईरान समझ अमेरिका सी कोसती है
चीनी माल सी झूठी सही एक पल तो चमक ले
सच्चाई को ट्विस्ट करके एक शाम तो चहक ले
पॉज़िटिव अफ़रमेशन भी कोई चीज़ है
मुस्कुराहट के साथ बासी रोटी भी लज़ीज़ है

 

..दो पल के लिए कोई हमें प्यार कर ले

 

नटी: हाँ हाँ मैं तो निगेटिव नटी हूँ
झूठे वादों से घायल हूँ
तुम्हारी गुहार के झाँसों में
तुम्हारे इक़रार की फ़ाँसों में
जानकर तुम्हारे छलावे
न जाने क्यों डटी हूँ
मैं निगेटिव नटी हूँ

 

इसी वक़्त बहुत से लोग झण्डे लिए मंच पर प्रवेश करते हैं और नटी के पीछे नाचने लगते हैं. इन्हीं का कोरस बनेगा.

 

नटी: जीडीपी का क्या होगा?
नट: तुम्हारा मंदिर मैं बनवाऊँगा
गाँव को लंगर खिलाऊँगा
पल भर के लिए तू ही मुझे प्यार कर ले – झूठा ही सही

 

कोरस: तुम्हारे खोखले नारे
ये सपने लफ़्ज़ हैं सारे
तुम्हारे खोखले नारे

 

नटी : मुझे नौकरी चाहिए!
नट: यहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
तू नौकरी की बात करती है?
ज़रा इतिहास पढ़ ले
अतीत महान था, भविष्य महान होगा
वर्तमान पर क्यों बिगड़ती है..

 

कोरस: तुम्हारे खोखले नारे
ये सपने लफ़्ज़ हैं सारे
तुम्हारे खोखले नारे

 

नटी: तू फ़रेबी है लेकिन बातों का धनी है
नट: तू आगे देख क़िस्मत में मनी मनी है
नटी: तेरी पीआर तेरे काम के आगे चली है
नट: जलवा-ए-यार देख हरसू खलबली है
नटी: तेरी बातों में फिर फिर आऊँ मैं क्यों?
नट: मेरा क्या मैं फ़कीर – तेरी सेवा में हूँ
तू न हो तो मैं ये पहाड़ सर पर उठाऊँ क्यों?

 

नटी सोच में पड़ जाती है: मैं राज़ी होऊँ कैसे
ये हक़ीक़त गले न उतरे
मैं सपने खाऊँ कैसे
भूख अंतड़ियों को जब जकड़े..

 

जो भीड़ मंच पर आयी थी वह अब थकेहाल हो कर मंच पर गिरी हुई है. सिर्फ़ नटी और नट खड़े हैं. नटी सोच की मुद्रा में है. पार्श्व में रौशनियाँ जगमगाने लगी हैं, प्रतीत होता है कि कोई उत्सव हो जैसे. नटी शायद मानने वाली है. नट ज़्यादा मुस्कुरा कर शब्दों में माखन घोल कर कहता है.

 

नट: अरी यूँ निगेटिव न बन
थोड़ी सी पॉज़ीटिविटी अपना लो न
सुनहली शाम के दो चार गीत गा लो न
(गुदगुदाते हुए) थोड़ा लड़िया लो न
गार्डनिंग करो,
हाँ गार्डनिंग करो! भला लगेगा
कोरस: भला लगेगा भला लगेगा
नट: मास्क पहन, सुब्ह सैर को जाना – (कोरस थकी आवाज़ों में) भला लगेगा भला लगेगा
पब्लिक ट्रांसपोर्ट में अपनी जेब बचाना – भला लगेगा भला लगेगा
काँवड़ियों के डीजे की पश्चिमी बीट पर
ठुमके लगाना – (कोरस) भला लगेगा भला लगेगा भला लगेगा

 

नट: नेटफ़्लिक्स, फ़ेसबुक, व्हाट्सएप्प से
काम चला लो न
सुनहली शाम के गीत गा लो न

 

कोरस: भला लगेगा भला लगेगा भला लगेगा
गाना गालो – भला लगेगा
कुछ लड़िया लो – भला लगेगा
इतनी भी उज्जड्ड न बनो
गाना गा लो – भला लगेगा

 

नटी : क्या मैं इतनी निगेटिव हूँ
कि अपनी जान लेती हूँ?
अगर तुम फिर से कहते हो
तो कहना मान लेती हूँ
लेकिन इस गुस्से को कैसे छोड़ूँ?
कैसे मुँह सच्चाई से मोडूँ?

 

नट: सच्चाई.. हाय सच्चाई
क्यों तेरे पल्ले आई??
(बड़बड़ाते हुए) पहले से ही कहा था मत कर इतनी पढाई..
कोरस: क्यों की तूने पढ़ाई, क्यों अपनी समझ बढ़ाई..
क्यों की तूने पढ़ाई, हाय, क्यों की तूने पढ़ाई..

 

नट: अब प्रदूषण से रूठोगी?
कोरस: तो कहाँ जाओगी?
नदी प्रदूषित, जंगल दूषित
हवा है काली, दमे की जाली (रिपीट)

 

नट: मिलावट से रूठोगी?
कोरस: तो क्या खाओगी?
दूध कैमिकल, लौकी नकली
अण्डे, टिन्डे या हो मछली (रिपीट)

 

नट: किस किस से रूठोगी
किस किस पे रोओगी
किसी का क्या बिगड़ना है
ख़ुदी का चैन खोओगी
कहो किस किस से रूठोगी?
कहो किस किस पे रोओगी
एकता के मंच से?
सरकारी प्रपंच से?
दानिशमंदों की दानाई से?
लाचारों की रुसवाई से?
औरतों का दर्द मारेगा
कलेजा चीर डालेगा
मज़दूरों की मत सोचो
वो प्रारब्ध है उनका
भू के माफ़िया की जय
हर खित्ते पे हक़ उनका
डॉक्टर लूट लेते हैं,
मगर गोली तो देते हैं
टीचर ट्यूट करता है
दरोगा क्यूट बनता है
आईएएस हमारा जँवाई है
अफ़सरशाही हमारी पुण्यों की कमाई है..

 

कोरस: पुण्यों की कमाई है. पुण्यों की कमाई है
ये हमको रास आई है, सभी के काम आई है..

 

नट: क्या तू तैयार है इस तारणा के लिए?
सच्चाई की यूज़लैस धारणा के लिए
गर्व से कहो – (कोरस) हम सच्चे हैं
ताल ठोक कर – (कोरस) हम अच्छे हैं
एक बार फिर – (कोरस) हम सच्चे हैं
ज़ोर लगा कर – (कोरस) हम अच्छे हैं

 

‘हम सच्चे हैं – हम अच्छे हैं’ गाते गाते लोग स्टेज से चले जाते हैं. नट कमर पर हाथ रख कर बाँकी नज़र से नटी को देख रहा है. पार्श्व से गाने की आवाज़ धीरे धीरे ज़ोर पकड़ती है.. नटी मुस्कुरा कर नट की बाहों में बाँह डालती है और दोनों मिल कर साथ में गाने लगते हैं.. झूठा ही सही, झूठा ही सही..

 

अँधेरा बढ़ता है और पर्दा खिंचने लगता है.. दर्शको, आप ताली बजायेंगे न?

आज की शनिवार की चाय में दो अज़ीम शाहकार हैं. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और नसीरुद्दीन शाह:

 


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हिंदी कविता (Hindi Studio) और उर्दू स्टूडियो, आज की पूरी पीढ़ी की साहित्यिक चेतना झकझोरने वाले अब तक के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक/सांस्कृतिक प्रोजेक्ट के संस्थापक फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मनीष गुप्ता लगभग डेढ़ दशक विदेश में रहने के बाद अब मुंबई में रहते हैं और पूर्णतया भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार / और अपनी मातृभाषाओं के प्रति मोह जगाने के काम में संलग्न हैं.
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